2 राज्य के 1233 श्रमिक परिवार सूरत से पहुंचे धनबाद, कहा - 29:30 घंटे के सफर में पानी तक नहीं मिला By Published On :: Thu, 07 May 2020 00:06:00 GMT सूरत से स्पेशल ट्रेन से 1233 प्रवासी श्रमिक परिवार बुधवार काे धनबाद पहुंचे। 29:30 घंटे का सफर तय करने के बाद जब वे अपने राज्य पहुंचे ताे उनके चेहरे पर खुशी के साथ थकान और परेशानियाें का सबब भी था। सूरत से धनबाद की 1775 किमी यात्रा के लिए उन्हें 750-720 रुपए चुकना पड़ा। पैसे दिए तो ट्रेन की टिकट मिली। साेचा था सरकार की ओर से खाने-पीने का उत्तम व्यवस्था हाेगी, लेकिन खिचड़ी और बिरयानी खाकर भूख मिटानी पड़ी। चाय और नाश्ता तक नहीं मिला। इस तपती गर्मी में बूंद-बूंद पानी के लिए तरस गए।तमाम मुश्किलों के के बीच सुबह 4:35 बजे प्रवासी परिवार धनबाद रेलवे स्टेशन पहुंचे। सेनेटाइजर से हैंड वॉश कराया गया। मेडिकल जांच हुई, जिसमें सभी स्वस्थ्य पाए गए। इसके बाद फूल देकर स्वागत किया गया। सभी काे अल्पाहार दिया गया। स्टेशन परिसर में ही बसाें में बैठाकर गृह जिला के लिए भेज दिया गया। माैके पर उपायुक्त अमित कुमार एसएसपी अखिलेश बी वारियार और सीनियर डीसीएम अखिलेश कुमार पांडेय सहित प्रशासन, पुलिस विभाग व धनबाद रेल मंडल के अधिकारी और कर्मचारी माैजूद थे। सबसे अधिक 1157 यात्री गिरिडीह के थे | सूरत से आने वाली ट्रेन से प्रवासी श्रमिकों को सबसे आगे और सबसे पीछे की बोगी से प्लेटफॉर्म पर उतारा गया। सूरत से अाने वाले कामगाराें में सबसे अधिक 1157 प्रवासी गिरिडीह जिला के थे। जबकि देवघर के 40, धनबाद के 2, दुमका एवं हजारीबाग के 1- 1, कोडरमा के 5 तथा रांची के 27 श्रमिक थे।सूरत से 1198 लोगों काे लेकर आज भी आएगी ट्रेनगुजरात से धनबाद के लिए दूसरी ट्रेन भी खुल गई है। सूरत से खुली यह दूसरी स्पेशल ट्रेन गुरुवार को 1198 प्रवासी मजदूरों को लेकर सुबह 3:15 बजे धनबाद स्टेशन पहुंचेगी। डीसी अमित कुमार ने बताया कि सूरत से 22 बोगियों के साथ आने वाली ट्रेन में झारखंड के गिरिडीह, देवघर, कोडरमा, हजारीबाग, जामताड़ा, सिमडेगा, सरायकेला, पलामू, लातेहार, गढ़वा तथा चतरा जिले के प्रवासी मजदूर हैं। ट्रेन में सबसे अधिक गिरिडीह के 1094 मजदूर हैं। जबकि देवघर के 7, कोडरमा के 30, हजारीबाग के 11, जामताड़ा, सिमडेगा और सरायकेला के 1-1, पलामू के 29, लातेहार के 3, गढ़वा के 2 तथा चतरा के 5 श्रमिक ट्रेन में सवार हैं। सभी काे उनके गृह जिला पहुंचाने के लिए स्टेशन पर 56 बसाें की व्यवस्था की गई है।वेल्लाेर से ट्रेन चलाने की विधायक ने की मांगलाॅकडाउन के कारण वेल्लाेर में फंसे झारखंड के लाेगाें काे वापस लाने के लिए विधायक राज सिन्हा ने पीएम अाैर सीए को पत्र लिखा है। विधायक ने वेल्लाेर से धनबाद के लिए ट्रेन चलाने की मांग की है। विधायक ने कहा कि हजाराें की संख्या में लाेग वेल्लाेर में फंसे हुए हैं। वहां फंसे लाेगाें का जीवन-यापन मुश्किल हाे गया है।तेलंगाना से 1400 लोगों को लेकर आएगी ट्रेनतेलंगाना राज्य के लिंगमपाली से एक विशेष ट्रेन चलेगी। यह ट्रेन लगभग 14 साै मजदूराें काे लेकर शुक्रवार काे दाेपहर 12:30 बजे धनबाद पहुंचेगी। कुल 24 काेच हाेंगे। ट्रेन लिंगमपाली से खुलकर बल्हारशा, नागपुर, इटावा, कटनी, मानिकपुर, प्रयागराज, पंडित दीन दयाल उपाध्याय, गया हाेते हुए धनबाद पहुंचेगी। Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today 1233 laborers of the state reached Dhanbad from Surat, said - no water was found in 29:30 hours journey Full Article
2 कोरोना जांच के लिए चार मृतक समेत 127 लोगों का लिया स्वाब By Published On :: Thu, 07 May 2020 00:20:00 GMT जिले में बुधवार को चार मृतक समेत 127 लोगों का कोरोनावायरस जांच के लिए सैंपल लिया गया। सदर अस्पताल में 97और पीएमसीएच में 30 संदिग्ध का स्वाब लिया गया। वहीं, सूरत से लौटे धनबाद के दो लोगों को हॉस्पिटल क्वारेंटाइन में रखा गया। स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट के अनुसार बुधवार को 159 संदिग्धों को क्वाेरंटाइन पर रखा गया है। इधर, कोविड-19 अस्पताल में भर्ती दो संक्रमित मरीजों की देखभाल व इलाज में लगाए गए 17 डॉक्टर्स व अन्य कर्मियों की रिपोर्ट निगेटिव मिली है। कर्मियों की रिपोर्ट निगेटिव आने के बाद विभाग ने राहत की सांस ली। धनबाद पीएमसीएच लैब से बुधवार को जारी किए गए रिपोर्ट के अनुसार कुल 155 सैंपलों की जांच की गई। इनमें सभी सैंपलों की रिपोर्ट निगेटिव आई है। धनबाद में लिए गए स्वाब की जांच धीमी हो गई है। प्रतिदिन जिले में करीब 50 से 60 संदिग्धों का स्वाब लिया जा रहा है। ग्रीन जोन बनने के लिए तीन दिनों का इंतजारधनबाद ग्रीन जोन बनने के करीब है। 18 अप्रैल से धनबाद में एक भी नया पॉजिटिव मरीज नहीं मिला है। यह खबर धनबाद के लिए राहत भरी है। बता दें कि आगामी 9 मई तक अगर एक भी पॉजिटिव मामला सामने नहीं आया तो धनबाद ग्रीन जोन में शामिल हो जाएगा। इसके लिए जरूरी है कि लोग सोशल डिस्टेंस का पालन करें। अभी जिला ऑरेंज जोन में है। Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today Full Article
2 पश्चिमी सिंहभूम में 22 में से 20 योजनाओं का काम पड़ा है अधूरा By Published On :: Fri, 08 May 2020 01:12:00 GMT लाॅकडाउन के कारण जिले में कराेड़ोंरुपए की याेजनाएं पेंडिंग पड़ी हैं। इसमें ऐसी कई महत्वपूर्ण याेजनाएं भी शामिल हैं जाे लाेगाें के लिए काफी महत्वपूर्ण हैं। जिले में ग्रामीण पेयजलापूर्ति याेजना के पाइप लाइन के जरिए घर-घर तक पीने के लिएस्वच्छ पानी पहुंचाने का काम चल रहा है।इस याेजना के तहत जिले के विभिन्न प्रखंडाें के कुल 22 जगहाें पर करीब 400 कराेड़ रुपए की लागत से काम चल रहा है। लेकिन लाॅकडाउन के वजह से यह काम ठप पड़ा हुआहै। इसमें से मात्र दाे जगह सदर प्रखंड के गायसुटी पंचायत एवं जगन्नाथपुर प्रखंड के जैंतगढ़ में पेयजलापूर्ति याेजना बनकर तैयार है और चालू भी हाे गया है। लेकिन बाकी जगहाें पर निर्माण का कार्य चल रहा है। लेकिन लाॅकडाउन के कारण यह कार्य भी ठप पड़ा हुआहै। जिले के मझगांव, सदर प्रखंड के कुरसी, मंझारी प्रखंड के जलधर, तांतनगर प्रखंड के सेरेंगबिल एवं चक्रधरपुर के छोटानागरा में करीब-करीब बनकर तैयार है। लेकिन लाॅकडाउन के कारण शेष काम नहीं हाे पा रहा है। लाॅकडाउन की स्थिति ऐसी ही रही ताे गरमी के माैसम में भी यहां के लाेगाें काे पीने का पानी नसीब नहीं हाेगा।छह कराेड़ की लागत से बन रहा जाेड़ा तालाब का काम भी ठपनगर परिषद की एक बड़ी याेजना जाेड़ा तालाब का जीर्णाेद्धार व साैंदर्यीकरण का कार्य भी लाॅकडाउन के वजह से रूका हुआ है। जाेड़ा तालाब का जीर्णाेद्धार व साैंयदयीकरण का कार्य करीब 6 कराेड़ की जा रही है। कुछ माह पहले ही इस तालाब के जीर्णाेद्धार व साैंदर्यीकरण का कार्य शुरू हुआथा। जीर्णाेद्धार का कार्य काफी तीव्रगति से चल रहा था। इसी बीच काेराेना वायरस के बढ़ते संक्रमण काे देखते हुए जिले काे लाॅकडाउन किया गया। जिस वजह से यह काम ठप पड़ गया।पेयजलापूर्ति के लिए 1200 चापाकल लगने थे, अब तक 300 ही लग सकेपेयजल विभाग के कार्यपालक अभियंता प्रभु मंडल ने बताया कि कुछ जगहाें पर योजना बनकर तैयार है। लाॅकडाउन समाप्त हाेते ही इसे चालू कर दिया जाएगा। जिले में कुल 1200 साेलर आधारित पेयजलापूर्ति याेजना के तहत नलकूप बनाने का काम चल रहा है। इसमें से 300 नलकूप बनकर तैयार हैं। लेकिन लाॅकडाउन के कारण अन्य साेलर नलकूप का निर्माण कार्य रूका हुआहै।रेलवे ओवरब्रिज का निर्माण कार्य ठपइधर, लाॅकडाउन के कारण करीब 40 कराेड़ के लागत से बन रही रेलवे ओवरब्रिज निर्माण का कार्य भी ठप पड़ा है। यहां कार्य कर रहे मजदूर लाॅकडाउन वजह से अपने अपने घराें में दुबक गए हैं। निर्माणाधीन रेलवे ओवरब्रिज के कारण लाेगाें काे काफी परेशानी हाे रही है। Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today 20 out of 22 schemes in West Singhbhum are unfinished Full Article
2 रांची से 12 साल बाद घर लौटे बुजुर्ग, बेटों ने होम क्वारेंटाइन के लिए नहीं दी जगह By Published On :: Fri, 08 May 2020 01:23:00 GMT चक्रधरपुर के जलेश्वर साहू (84) परिवार से दूर रहकर रांची में गुजारा कर जीवन जी रहे थे। वे पिछले 12 साल से रांची के खादगड़ा में अकेले किसी तरह गुजारा कर रहे थे। लॉकडाउन के कारण होटलों के बंद होने से उन्हें खाने के लाले पड़ गए। चक्रधरपुर में उनके तीन बेटे रहते हैं। इस बीच उन्हें चक्रधरपुर आने का मौका मिला तो वे तुरंत बैग लेकर चल पड़े। लेकिन यहां पहुंचते ही उल्टा हो गया। किसी ने उन्हें होम क्वारेंटाइन नहीं किया। फिर वे मायूस होकर सरकार के बने रैन बसेरा (क्वारेंंटाइन सेंटर) पहुंचे और क्वारेंटाइन हो गए। लेकिन यहां भी खाने की दिक्कत हो गई। गुरुवार दोपहर तीन बजे तक उन्हें खाने में कुछ नहीं मिला।जलेश्वर साहू बताते हैंवे 12 साल से परिवार से दूर रांची में रहे। रांची कोर्ट में अधिवक्ता और लोगों का सहयोग करते हुए दो जून की रोटी का जुगाड़ कर लेते थे। लॉकडाउन में समस्या हो गई। उनके चार बेटे हैं। तीन बेटे चक्रधरपुर के झुमका मोहल्ला में अलग-अलग रहते है। एक बेटा जमशेदपुर के बागबेड़ा में रहता है। उनका भरापूरा परिवार है। बेटों के परेशानी से वे रांची चला गया था। रांची से चाईबासा की बस आ रही ती तो उसमें चले आए। बुधवार रात नौ बजे वे चक्रधरपुर पहुंचे थे।लेकिन कोरोना को लेकर हर कोई डरा हुआ है। इस कारण बेटों ने होम क्वारेंटाइन के लिए घर में जगह नहीं दी। वे नहीं चाहते थे कि परिवार में किसी को तकलीफ नहीं हो, इसलिए बिना कुछ बोले क्वारेंटाइन सेंटर में रहने चले आए। चक्रधरपुर बस स्टैंड के रैन बसेरा को क्वारेंटाइन सेंटर बनाया गया है। वहां 28 से 30 लोग रहते हैं। Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today Elderly children returned home after 12 years from Ranchi, sons did not provide space for home quarantine Full Article
2 अपराधी लॉक, क्राइम डाउन: चोरी-छिनतई में 70-72% कमी, सीतारामडेरा गैंगवार पुलिस की बड़ी चूक By Published On :: Fri, 08 May 2020 06:46:00 GMT लॉकडाउन में चोरी-छिनतई में 70-72, सड़क हादसे में 60, जबकि हत्या में 33 फीसदी की कमी आई है। फायरिंग में कोई अंतर नहीं आया है। सीतारामडेरा में गैंगवार पुलिस की सबसे बड़ी चूक है। आंकड़ों पर गौर करें तो एक जनवरी से 23 मार्च तक अपराधी ज्यादा सक्रिय रहे। इस दौरान हत्या की 6, चोरी की 18, छिनतई की 10 और फायरिंग की तीन घटनाएं हुईं। सड़क हादसों में पांच लोगों की मौत हुई।वहीं, 24 मार्च से 30 अप्रैल तक हत्या की 4, चोरी 5, छिनतई और फायरिंग की तीन-तीन घटनाएं हुईं। सड़क हादसों में दो लोगों की मौत हुई। सीतारामडेरा में गैंगवार को छोड़कर कोई संगीन अपराध नहीं हुआ है। एक जनवरी से लेकर 23 मार्च तक जहां शहर के 18 थानों में 355 से अधिक मामले दर्ज हुए। वहीं, 24 मार्च से 30 अप्रैल तक महज 170 मामले ही दर्ज हुए। इनमें सबसे अधिक 40 केस लॉकडाउन तोड़ने के हैं।लॉकडाउन में लूट, डकैती, छिनतई जैसे अपराध का आंकड़ा नहीं के बराबर रहा। सड़क हादसे, हत्या, साइबर ठगी सहित अन्य मामलों में भी कमी आई है। लॉकडाउन में कोरोना को लेकर फेसबुक पर जारी पोस्ट में धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाने के 4 केस हुए। तीन बिष्टुपुर साइबर थाना में और एक कदमा थाना में दर्ज हुआ है। लॉकडाउन के पहले की घटनाएं लॉकडाउन के पहले के मामले साइबर ठगी- 23 साइबर ठगी- 04 हत्या- 06 हत्या- 04 चोरी- 18 चोरी- 05 सड़क दुर्घटना- 05 सड़क दुर्घटना- 02 छिनतई- 10 छिनतई- 03 फायरिंग- 03 फायरिंग- 03 वाहन चोरी- 30 वाहन चोरी- 04 Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today Coronavirus Lockdown In Jamshedpur (Jharkhand) Crime Rate and Statistics News Updates Full Article
2 सूरत से आए 1208 श्रमिकों का जसीडीह रेलवे स्टेशन पर स्वागत, स्वास्थ्य जांच के बाद 14 दिन के होम क्वारैंटाइन में भेजा By Published On :: Fri, 08 May 2020 12:16:00 GMT केंद्र और राज्य सरकार के पहल के बाद लॉकडाउन की वजह से बाहर फंसे श्रमिकों, छात्रों और अन्य लोगों की घर वापसी का सिलसिला लगातार जसीडीह स्टेशन पर जारी है। शुक्रवार को गुजरात के सूरत में फंसे झारखंड के विभिन्न जिलों के 1208 मजदूरों को स्पेशल ट्रेन से जसीडीह स्टेशन लाया गया। इस दौरान स्टेशन पर ट्रेन को पहले पूरी तरह से सैनिटाइज्ड किया गया, जिसके बाद सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए एक-एक कर सभी श्रमिकों का स्वागत उपायुक्त सह जिला दण्डाधिकारी नैंसी सहाय एवं वरीय अधिकारियों के द्वारा किया गया एवं उनके सकुशल घर वापसी के लिए शुभकामनाएं दी गयी। इसके अलावे स्टेशन परिसर में स्वास्थ्य जांच के लिए बने काउंटर पर श्रमिकों की थर्मल स्कैनिंग भी की गई।स्टेशन पहुंचने के बाद सभी श्रमिकों को प्रशासन की ओर से नाश्ता, पानी उपलब्ध कराया गया जिसके बाद उन्हें घर भेजा गया।उपायुक्त ने सभी श्रमिकों को 14 दिनों तक होम क्वारैंटाइन के नियमों का पालन करने का निर्देश दिया गया। साथ ही सभी को सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए सरकार द्वारा जारी गाइडलाइन एवं चिकित्सकों द्वारा दिए गए चिकित्सकीय परामर्श का भी पालन करते हुए साफ-सफाई पर विशेष ध्यान देने की बात कही है। उपायुक्त ने बताया कि श्रमिकों को उनके गंतव्य स्थान तक भेजने के लिए प्रयोग किये जाने वाले बसों को पूरी तरह से सैनिटाइज्ड कर सोशल डिस्टेंसिंग का ध्यान रखा गया। इसके अलावे ट्रेन के भीतर से लेकर प्लेटफॉर्म तक हर जगह सोशल डिस्टेंसिंग का पालन किया जा रहा है।श्रमिकों को ट्रैन से उतारे जाने के बाद स्टेशन परिसर में स्वास्थ्य जांच के लिए बनाए गए काउंटर पर सभी की स्क्रीनिंग की गई।चिकित्सकों की विशेष टीम की थी तैनातीश्रमिकों के आगमन को लेकर उपायुक्त के निर्देशानुसार चिकित्सकों की विशेष टीम की प्रतिनियुक्ति भी की गयी थी, ताकि थर्मल स्कैनिंग और स्वास्थ्य जांच के साथ किसी भी अपात स्थिति में आने वाले लोगों के अन्य स्वास्थ्य संबंधी जांच भी किये जा सके।श्रमिकों को घर भेजने से पहले सभी बसों को प्रशासन ने सैनिटाइज्ड कराया था। बस के अंदर भी सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए श्रमिकों को बैठाया गया।सुरक्षा के दृष्टिकोण से उठाये गए सभी कदमश्रमिकों के आगमन को लेकर जसीडीह रेलवे स्टेशन परिसर को पूर्ण रूप से सैनिटाइज्ड किया गया। साथ ही सोशल डिस्टेंसिंग के पालन के लिए बैरिकेडिंग कर जगह-जगह पर गोल घेरा का निर्माण कराया गया है। इसके अलावे सुरक्षित व्यवस्था व विधि-व्यवस्था के लिए जसीडीह स्टेशन परिसर में पर्याप्त संख्या में चिकित्सकों की टीम के साथ रेलवे के अधिकारी, जिला स्तर के दण्डाधिकारी एवं सुरक्षाकर्मियों की तैनाती भी की गई थी। Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today सभी को सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए सरकार द्वारा जारी गाइडलाइन एवं चिकित्सकों द्वारा दिए गए चिकित्सकीय परामर्श का भी पालन करते हुए साफ-सफाई पर विशेष ध्यान देने की बात कही है। Full Article
2 विश्व रेडक्रॉस दिवस पर 251 रक्त यूनिट संग्रह By Published On :: Fri, 08 May 2020 23:33:00 GMT विश्व रेडक्रॉस दिवस पर रेड क्रॉस सोसायटी द्वारा चांडिल सामुदायिक भवन में स्वैच्छिक रक्तदान शिविर का आयोजन कर 251 रक्त यूनिट संग्रह किया गया। एसडीओ चांडिल के उपस्थिति में उक्त कार्यक्रम हुई जिसमें जिले के स्वास्थ्य विभाग का महत्वपूर्ण योगदान रहा। रेड क्रॉस सोसाइटी के सचिव डॉ डीडी चटर्जी ने स्वैच्छिक रक्तदान शिविर में शामिल होकर ब्लड देने वाले लोगों का हौसला बढ़ाया और उन्हें प्रशस्ति पत्र दी। उन्होंने कहा कि रेड क्रॉस सोसायटी द्वारा प्रत्येक वर्ष विश्व एड्स दिवस पर विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं। इस वर्ष केवल रक्तदान शिविर का आयोजन किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि जिले में रेड क्रॉस की गतिविधि काफी अच्छी है ।प्रत्येक वर्ष हजारों की संख्या में लोगों को मदद की जा रही है। Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today Full Article
2 टाटा स्टील फाउंडेशन ने 250 जरूरतमंदों में बांटा राशन By Published On :: Fri, 08 May 2020 23:34:00 GMT खरसावां प्रखंड के प्रोजेक्ट उच्च विद्यालय परिसर जोरडीहा में शुक्रवार काे टाटा स्टील फाउंडेशन के सहयोग से कृष्णापुर और जोरडीहा के 250 जरूरतमंदों के बीच खाद्य सामग्री का वितरण किय। खरसावां विधायक दशरथ गागराई के हाथों से सामाजिक दूरी का पालन करते हुए कृष्णापुर पंचायत के 120 और जाेरडीहा पंचायत के 130 जरूरतमंद लोगों के बीच खाद्यान्न का वितरण किया। मौके पर श्री गागराई ने कहा कि कोरोना महामारी के कारण जारी लॉकडाउन में कोई भी व्यक्ति भूखा नही रहेगा। इसके लिए सरकार द्वारा काफी प्रयास किया जा राह है। इस दौरान मुख्य रूप से विधायक के धर्मपत्नी बासंती गागराई, प्रखंड अध्यक्ष अर्जुन उर्फ नायडू गोप, पंचायत के मुखिया दशरथ सोय, निर्मल महतो, नियती महतो, प्राण मेलगांडी, सानगी हेम्ब्रम, दिलीप तांती, परमेश्वर तांती आिद मौजूद थे। Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today Full Article
2 श्रमिक स्पेशल ट्रेन से पहुंचे पूर्वी सिंहभूम के 7 मजदूर, इनमें 2 मुसाबनी के कागदोहा के By Published On :: Sat, 09 May 2020 00:01:00 GMT मुसाबनी प्रखंड की माटीगोड़ा पंचायत के कुलामारा मौजा के पोंडाकोचा में अवैध पत्थर खनन की खबर दैनिक भास्कर में 6 मई को प्रकाशित होने के बाद खनन बंद कर दिया गया है। वहां गत दिनों से पोकलेन लगाकर पहाड़ पर खनन किया जा रहा था। पोकलेन में ड्रिल मशीन लगाकर पहाड़ को छलनी किया जा रहा था। जानकारी हो कि पोंडाकोचा गांव राखा वन क्षेत्र के अंतर्गत आता है। अवैध खनन के दौरान पहाड़ की सुंदरता को चार चांद लगाने वाले साल के पेड़ों को भी नुकसान पहुंचाया गया है। इसकी शिकायत ग्रामीणों ने वन विभाग से की थी।दैनिक भास्कर में प्रमुखता के साथ खबर प्रकाशित होने के बाद वन विभाग की टीम मौके पर जाकर जांच पड़ताल की। उसके बाद खनन स्थल से पोकलेन हटाए गए। शुक्रवार को वहां कोई मजदूर काम करते नहीं दिखा। धालभूम वन प्रमंडल के डीएफओ अभिषेक कुमार के आदेश पर रोआम बीट के सब बीट पदाधिकारी रंजू सोरेन ने खनन स्थल पर जाकर मौका मुआयना किया। वहां का जीपीएस लिया। इसकी रिपोर्ट डीएफओको सौंप दी है। उन्होंने बताया कि डीएफअो के आदेश पर खनन स्थल की जांच की गई।रिपोर्ट तैयार करके डीएफओको सौंप दी गई है। इस संबंध में डीएफओने बताया कि राखा फाॅरेस्ट रेंज में रेंजर की पदस्थापन नहीं होने के कारण जांच पूरी नहीं हो सकी है। फिलहाल सब बीट अफसर भेजकर प्रारंभिक जांच कराई गई है।प्रथम दृष्टया वन भूमि प्रतीत नहीं हो रही है। इसके बाद भी जांच की जाएगी। उसके बाद आगे की कार्रवाई होगी। Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today Full Article
2 श्रमिक स्पेशल ट्रेन से पहुंचे पूर्वी सिंहभूम के 7 मजदूर, इनमें 2 मुसाबनी के कागदोहा के By Published On :: Sat, 09 May 2020 00:04:00 GMT गुजरात के मोरोवी से झारखंड के 1257 मजदूरों को लेकर आज अपराह्न करीब चार बजे श्रमिक स्पेशल ट्रेन टाटानगर पहुंची। ट्रेन में पश्चिम सिंहभूम के 1231, सरायकेला-खरसावां के 13 और पूर्वी सिंहभूम के 7 मजदूर थे। इनमेंमुसाबनी के कागदोहा के बसंत हेंब्रम व मुकेश नायक भी शामिल थे। पूर्वी सिंहभूम के 7 मजदूरों को जमशेदपुर अंचल कार्यालय के रंजीत शर्मा व बीरेंद्र कुमार ने बस से सरस्वती विद्या मंदिर में बनाए गए क्वारेंटाइन सेंटर में पहुंचाया। ट्रेन के टाटानगर पहुंचने पर सबसे पहले पश्चिम सिंहभूम के यात्रियों को उतारा गया। मेडिकल जांचके बाद भोजन-पानी बोतल देकर सबको बस से रवाना किया गया। इन सबको होम क्वारेंटाइन में रहने का निर्देश दिया गया है। अपने घर लौटे अधिकतर मजदूरों ने एक सुर में कहा- गांव में खेती कर लेंगे, पर दूसरे प्रदेश नहीं जाएंगे।झींकपानी की महिला हुई बीमार, नहीं मिले लक्षणट्रेन से आई झींकपानी के बासेबाड़ा गांव की सोमारी बारी की तबीयत रेलवे स्टेशन पर खराब हो गई। इस सूचना पर स्टेशन परिसर में खलबली मच गई। डॉक्टरों ने जांच की तो महिला में कोरोना संक्रमण वाला लक्षण नहीं पाया।पंखे-बिस्तर तक लेकर आए थे मजदूरटाटानगर रेलवे स्टेशन पहुंचे कई मजदूर पंखा और बिस्तर तक लेकर आए थे। कुमारडुंगी का निर्मल गागराई टेबल फैन व जगन्नाथपुर की सविता देवी बिस्तर के साथ पहुंची थी। कई मजदूर पानी रखने वाला बर्तन भी लेकर आए थे। Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today Workers arrived by special train, 7 laborers from East Singhbhum, 2 of them from Kagadoha in Musabani Full Article
2 10 साल में पहली बार मई में भरपूर पानी, घाटशिला प्रखंड में 20 मीटर की गहराई पर भी मिल रहा पानी By Published On :: Sat, 09 May 2020 00:13:00 GMT पश्चिमी विक्षोभ के कारण अप्रैल व मई में कई दिन बारिश हुई है। मई में आसमान में भादो महीने जैसा बादल छाए हुए हैं। थोड़े अंतराल में तेज बारिश हो रही है। इस बेमौसम बारिश की बदौलत बीते दस साल में इस वर्ष मई में ग्राउंड वाटर लेवल सबसे अच्छा है। प्रखंड भर में 12 से 20 मीटर की गहराई में पानी मिल रहा है। हर साल गर्मी के दिनों में वाटर लेवल 35 से 50 मीटर तक चला जाता था। इस वर्ष बारिश ने गर्मी में न तो नदियों को सूखने दिया और न ही तालाब व कुएं सूखे हैं। सबसे अच्छी बात यह है कि इस साल कहीं भी अब तक हैंडपंप सूखने की समस्या नहीं सुनी गई है। गर्मी में हो रही बारिश के चलते पूरे इलाके में भू-जल रिचार्ज हुआ है। इसका फायदा आने वाले कई सालों तक मिलेगा। शहर की बात करें तो इन दिनों शहर के तालाब में पानी कम जरूर हुए पर सूखे नहीं हैं। कटिंगपाड़ा व गोपालपुर के दोनों मुख्य तालाब भरे हुए हैं। शहर के कई इलाके ऐसे हैं, जहां 15 मीटर की खुदाई के बाद ही पानी निकल जा रहा है। इस वर्ष निजी कुओं से लोगों को पर्याप्त पानी मिल रहा है। हर साल गर्मी में सूख जाने वाले कुओं में भी पर्याप्त पानी है। ग्राउंड वाटर के रिचार्ज होने का सबसे अधिक फायदा जल व स्वच्छता विभाग को पहुंचा है।इस वर्ष शहर में जलापूर्ति नहीं हो रही बाधितहर साल गर्मी के दिनों में शहर में जलापूर्ति व्यवस्था चरमरा जाती थी। इसकी मुख्य वजह सुवर्णरेखा नदी में पानी कम हो जाना था। बीते साल नदी की धार पतली हो जाने के कारण दाहीगोड़ा स्थित इंटकवेल तक पानी नहीं पहुंच पा रहा था। इससे शहर में जलापूर्ति बार-बार ठप हो रही थी। इसके अलावा नलों में पर्याप्त पानी की सप्लाई नहीं हो पा रही थी। इस वर्ष नदी में पर्याप्त पानी होने से ऐसी समस्या नहीं है। शहर में जलापूर्ति के लिए फिल्टर प्लांट में नदी से पानी लाया जाता है। नदी के पानी की धार को इंटेकवेल की अोर करने के लिए बालू भरकर बोरियां नदी में डाली जाती थी। इस बार ऐसी स्थिति नहीं है।मार्च और अप्रैल में बारिश होने से गर्मी का नहीं हो रहा अहसासवर्ष 2020 में ऐसा कोई महीना नहीं है, जिसमें बारिश न हुई हो। जनवरी में पहले दस दिन बारिश का मौैसम बना रहा। फरवरी में भी करीब 20 दिन बारिश हुई। मार्च व अप्रैल में भी बारिश होने से इस वर्ष गर्मी का एहसास नहीं हुआ। शहर सहित जिले के कई इलाकों में बुधवार की शाम को जमकर बारिश हुई थी। मौसम वैज्ञानिकों ने 10 मई तक बारिश की संभावना जताई है।बीते दस साल में पहली बार हैंडपंप मरम्मत की नौबत नहींबीते दस साल में यह पहली बार हुआ है जब हैंडपंप सुधारने के लिए मिस्त्री को किसी गांव में नहीं जाना पड़ा हो। हर साल मार्च से ही हैंडपंप सूखने की समस्या पैदा हाेने लगती थी। एक दो अपवाद को छोड़कर कहीं भी पानी की समस्या नहीं है। हालांकि हैंडपंप खराब होने की सूचना प्राप्त करने के लिए कंट्रोल रूम स्थापित कर नंबर जारी किया गया है। Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today For the first time in 10 years, water is available in May, Ghatsila block is getting water even at a depth of 20 meters Full Article
2 वेल्लाेर से आए 119 लोगों का शहर पहुंचते ही लिया स्वाब, 28 दिन रहेंगे होम क्वारेंटाइन By Published On :: Sat, 09 May 2020 00:52:00 GMT वेल्लोर में फंसे जिले के 119 लोगाें काे शुक्रवार काे रांची से छह बसाें में जमशेदपुर लाया गया। इनमेंे इलाज कराने वालाें के साथ मजदूर भी शामिल हैं। सभी बसें पहले बिष्टुपुर के लोयोला स्कूल मैदान पहुंची। वहां मेडिकल टीम ने एक-एक व्यक्ति की स्वास्थ्य जांच की और स्वाब का सैंपल लेकर 28 दिन के लिए हाेम कवारेंटाइन में भेज दिया।स्वाब का सैंपल लेकर जांच के लिए एमजीएम भेजा गया। जिले में पहली बार एक साथ कोरोना जांच के लिए इतनी संख्या में स्वाब का सैंपल कलेक्ट किया गया। इससे पहले सुबह में इन लाेगाें काे लेकर स्पेशल ट्रेन रांची पहुंची। इनमें ज्यादातर वेल्लोर इलाज कराने गए थे। लेकिन लॉकडाउन में फंस गए। जबकि जिले के कुछ मजदूर भी फंसे थे। रांची से इन्हें लाने के लिए जिला प्रशासन ने मजिस्ट्रेट के साथ छह बसें भेजी थी। हटिया रेलवे स्टेशन पर थर्मल स्कैनर से जांच के बाद इन्हें जमशेदपुर के लिए रवाना किया गया। इधर, लाेयला स्कूल पहुंचने पर सोशल डिस्टेंसिंग की पूरी व्यवस्था थी। सभी काे घर भेजने से पहले इनका नाम, पता, फोन नंबर भी नाेट किया गया। एडीएम एनके लाल ने बताया कि सैंपल की जांच रिपोर्ट आने के बाद संक्रमण का पता चलेगा। तब तक सभी होम क्वेंरटाइन में ही रहेंगे।तीन दिव्यांगाें को दी ट्राईसाइकिल वेल्लोर से जमशेदपुर पहुंचने वाले तीन दिव्यांग भी थे। जो इलाज के लिए वेल्लोर गए हुए थे। वे वहां से आए तो उनकी राहत मिली। तीन विकलांगों को जिला प्रशासन ने ट्राइसाइकिल प्रदान किया गया। इलाज करने गई महिला ने बताया कि लॉक डाउन की अवधि में काफी परेशानी हुई। अपना शहर आने से राहत मिली।16 लोग रांची में थे क्वेंरटाइन रांची से आई बस में 16 ऐसे लोग भी थे, जिन्हें रांची जिला प्रशासन ने 28 दिन क्वेंरटाइन सेंटर में रखा था। सभी लाेग बहरागोड़ा और गालूडीह के प्रवासी मजदूर हैं। जिनको रांची में रखा गया था। इनकी भी सैंपल लिया गया है। Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today Swab taken by 119 people from Vellar as soon as they reach the city, will be home quarantine for 28 days Full Article
2 दिन के 24 घंटे और बदलता व्यक्तित्व By Published On :: Fri, 21 Feb 2020 20:03:00 GMT कभी विचार कीजिएगा कि 24 घंटे में हमारा व्यक्तित्व कितनी बार बदलता है। सुबह आप कोई और होते हैं, दोपहर आपके भीतर कोई और व्यक्ति प्रवेश कर जाता है। शाम होते-होते अपने आपको बदला महसूस करते हैं और रात होने पर तो लगता है, क्या मैं वो ही हूं जो सुबह उठते समय था? एक मनुष्य के भीतर इतने लोग कैसे प्रवेश कर जाते हैं?हमारे शरीर में जो जीवन ऊर्जा है, वह दिनभर में चार बार बदलती है तो हमारा व्यक्तित्व भी बदल जाता है। यदि इसमें संतुलन बनाए रखना है तो योगियों का कहना है अपनी सांस पर काम कीजिए। दिनभर में हम अपने काम-धंधे, नौकरी, व्यापार, परिवार, व्यवहारिक संबंधों पर तो काम करते हैं, लेकिन सांस पर नहीं करते।सांस-क्रिया पर काम करते हुए यदि इसमें संतुलन बैठा दिया तो फिर हम पूरे समय एक ही व्यक्तित्व होंगे जो मूल रूप से हैं। फिर भीतर दूसरा व्यक्तित्व प्रवेश कर हमें अव्यवस्थित और अशांत नहीं करेगा। जिन लोगों की नींद गड़बड़ हो, जो भोजन पर संयम न रख पाएं, उन्हें अपनी सांस पर प्रयोग करना चाहिए।यदि भोजन से पहले सांस को संतुलित कर लें तो भीतर मन जो अधिक भोजन करने का आग्रह करता है, वह चुप रहेगा। आप उतना ही भोजन करेंगे जितनी जरूरत है। ऐसे ही सोने से पहले और सुबह उठने पर सबसे पहले सांस पर काम कीजिए। यदि अन्न और नींद पर नियंत्रण पा लिया तो फिर पूरे समय आपका अपना मूल व्यक्तित्व ही काम करेगा, आप शांत रहेंगे। Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today प्रतीकात्मक फोटो। Full Article
2 भारत में साल भर में करीब 1 करोड़ टूरिस्ट आते हैं, उसका 20% तक मार्च-अप्रैल में आ जाते हैं; वीजा पर प्रतिबंधों से सरकार को 33 से 34 हजार करोड़ का नुकसान संभव By Published On :: Fri, 13 Mar 2020 05:44:21 GMT नई दिल्ली.कोरोनावायरस केडर से दुनिया सहमी हुई है। कोरोना को रोकने के लिए केंद्र सरकार ने 15 अप्रैल तक दुनियाभर के लोगों के वीजा पर प्रतिबंध लगा दिया है। मतलब, 15 अप्रैल तक अब कोई भी विदेशी व्यक्ति भारत नहीं आ सकेगा। हालांकि, डिप्लोमैटिक और एम्प्लॉयमेंट वीजा को इस दायरे से बाहर रखा गया है। सरकार के इस फैसले का सबसे ज्यादा असर टूरिज्म सेक्टर पर पड़ेगा। पर्यटन मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि भारत में सालभर में जितने विदेशी पर्यटक आते हैं, उनका करीब 15 से 20% अकेले मार्च-अप्रैल में ही आते हैं। 2019 में मार्च-अप्रैल के दौरान 17 लाख 44 हजार 219 विदेशी पर्यटक भारत आए थे। जबकि, पूरे सालभर में 1.08 करोड़ पर्यटकों ने भारत की यात्रा की थी। वीजा रद्द होने से सरकार को 33 से 34 हजार करोड़ रुपए का नुकसान भी हो सकता है। पिछले साल मार्च-अप्रैल में सरकार को टूरिज्म सेक्टर से 33 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा की कमाई हुई थी।बिजनेस: 2019 में जितनी कमाई हुई, उसकी 16% अकेले मार्च-अप्रैल महीने में हुईटूरिज्म सेक्टर से सरकार को हर साल करीब 2 लाख करोड़ रुपए की कमाई होती है। 2019 में सरकार को विदेशी पर्यटकों से 2.10 लाख करोड़ रुपए की कमाई हुई थी। इसमें से 16% यानी 33 हजार 186 करोड़ रुपए की कमाई अकेले मार्च-अप्रैल में हुई थी। पिछले 5 साल के आंकड़े भी यही कहते हैं कि सरकार को विदेशी पर्यटकों से सालभर में जितनी कमाई होती है, उसमें से 15 से 20% की कमाई अकेले मार्च-अप्रैल में ही हो जाती है। मार्केट एक्सपर्ट्स कहते हैं कि यदि पिछले साल के आंकड़ों को देखें तो मार्च-अप्रैल में पर्यटकों के नहीं आने से सरकार को 33 हजार से 34 हजार करोड़ रुपए का नुकसान हो सकता है। ये कमाई सरकार को फॉरेन करंसी में होती है।कोरोना की दहशत:इस साल जनवरी में पिछले 10 साल में सबसे कम रही पर्यटकों की ग्रोथकोरोना का असर दुनियाभर के टूरिज्म सेक्टर पर पड़ा है। दुनिया के प्रमुख पर्यटक स्थल सूने हो गए हैं। भारत में भी इसका असर देखने को मिल रहा है। पर्यटन मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि इस साल जनवरी में 11.18 लाख विदेशी पर्यटक ही आए, जबकि जनवरी 2019 में 11.03 लाख पर्यटक भारत आए थे। जनवरी 2019 की तुलना में जनवरी 2020 में विदेशी पर्यटकों की संख्या भले ही बढ़ी है, लेकिन ग्रोथ रेट 10 साल में सबसे कम रहा। जनवरी 2020 में विदेशी पर्यटकों का ग्रोथ रेट सिर्फ 1.3% रहा। जबकि, जनवरी 2019 में यही ग्रोथ रेट 5.6% था।10 साल में जनवरी में आने वाले पर्यटकों की संख्या और ग्रोथ रेट साल पर्यटकों की संख्या ग्रोथ रेट जनवरी 2020 11.18 लाख 1.3% जनवरी 2019 11.03 लाख 5.6% जनवरी 2018 10.45 लाख 8.4% जनवरी 2017 9.83 लाख 16.5% जनवरी 2016 8.44 लाख 6.8% जनवरी 2015 7.90 लाख 4.4% जनवरी 2014 7.57 लाख 5.2% जनवरी 2013 7.20 लाख 5.8% जनवरी 2012 6.81 लाख 9.4% जनवरी 2011 6.22 लाख 9.5% राहत की बात: जनवरी 2020 में विदेशी पर्यटकों से होने वाली कमाई 12.2% बढ़ीभारत आने वाले विदेशी पर्यटकों की ग्रोथ रेट में भले ही कमी आई हो, लेकिन उनसे होने वाली कमाई बढ़ी है। जनवरी 2020 में सरकार को विदेशी पर्यटकों से 20 हजार 282 करोड़ रुपए की कमाई हुई, जो पिछले साल से 12.2% ज्यादा रही। जबकि, जनवरी 2019 में सरकार को 18 हजार 79 करोड़ रुपए की कमाई हुई थी, जो जनवरी 2018 की तुलना में सिर्फ 1.8% ही ज्यादा थी। हालांकि, फरवरी के बाद कोरोनावायरस के मामले बढ़ने और मार्च-अप्रैल में वीजा पर प्रतिबंध लगने की वजह से विदेशी पर्यटकों की संख्या में कमी आनी तय है। इससे सरकार की आमदनी पर भी असर पड़ेगा।पांच साल में जनवरी महीने में सरकार को पर्यटन सेक्टर से होने वाली आमदनी साल कमाई ग्रोथ रेट जनवरी 2020 20,282 12.2% जनवरी 2019 18,079 1.8% जनवरी 2018 17,755 9.9% जनवरी 2017 16,135 18% जनवरी 2016 13,671 13% सबसे ज्यादा पर्यटक दिल्ली एयरपोर्ट पर उतरते हैं, लेकिन घूमने के लिए तमिलनाडु पसंदीदा जगहपर्यटन मंत्रालय की 2019 की रिपोर्ट के मुताबिक, विदेशों से आने वाले पर्यटक सबसे ज्यादा दिल्ली एयरपोर्ट पर उतरते हैं। 2018 में दिल्ली एयरपोर्ट पर 30.43 लाख पर्यटक उतरे थे। लेकिन पर्यटकों को घूमने के लिए तमिलनाडु सबसे पसंदीदा जगह है। 2018 में 60.74 लाख विदेशी पर्यटक तमिलनाडु गए थे। दूसरे नंबर पर महाराष्ट्र और तीसरे पर उत्तर प्रदेश है।5 एयरपोर्ट या इंटरनेशनल चेक पोस्ट, जहां सबसे ज्यादा विदेशी पर्यटक उतरते हैं एयरपोर्ट/ इंटरनेशनल चेक पोस्ट पर्यटकों की संख्या दिल्ली 30.43 लाख मुंबई 16.36 लाख हरिदासपुर 10.37 लाख चेन्नई 7.84 लाख बेंगलुरु 6.08 लाख Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today India Tourist Visa | Coronavirus India Tourist Visas Ban Latest Updates On India ForeignTourist Arrivals Research and Statistics Full Article
2 26 साल पहले तक सरकार बर्खास्त करने से पहले फ्लोर टेस्ट जरूरी नहीं था, 1989 में कर्नाटक की बोम्मई सरकार गिरने के 5 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने इसे जरूरी किया By Published On :: Thu, 19 Mar 2020 05:37:13 GMT नई दिल्ली. पिछले एक-दोसाल में कई बार फ्लोर टेस्ट के बारे में हम सुनते आ रहे हैं। कभी कर्नाटक में। कभी महाराष्ट्र मेंऔर अब मध्य प्रदेश में। जब भी किसी सरकार पर संकट आता है, जैसे- अभी मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार पर आया है। तो उसे भी फ्लोर टेस्ट से गुजरना ही पड़ता है। पहली बार ऐसा 26साल पहले हुआ।कर्नाटक में 1985 में 8वीं विधानसभा के लिए चुनाव हुए। इस चुनाव में जनता पार्टी ने राज्य की 224 में से 139 सीटें जीतीं। कांग्रेस 65 ही जीत सकी। जनता पार्टी की सरकार बनी। मुख्यमंत्री बने रामकृष्ण हेगड़े,लेकिन हेगड़े पर फोन टैपिंग के आरोप लगे, जिस वजह से उन्होंने 10 अगस्त 1988 को इस्तीफा दे दिया। इसके बाद मुख्यमंत्री बने एसआर बोम्मई,लेकिन कुछ ही महीनों में यानी अप्रैल 1989 में उनकी सरकार को भी कर्नाटक के उस समय के राज्यपाल पी वेंकटसुब्बैया ने बर्खास्त कर दिया। कारण दिया कि बोम्मई के पास बहुमत नहीं था। हालांकि, बोम्मई ने दावा किया था कि उनके पास बहुमत है।मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया। कई सालों तक सुनवाई चली। सरकार बर्खास्त होने के 5 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया और कहा कि फ्लोर टेस्ट ही एकमात्र ऐसा तरीका है, जिससे बहुमत साबित हो सकता है। उस समय सुप्रीम कोर्ट ने कहा था,‘जहां भी ये संदेह पैदा हो कि सरकार या मंत्रिपरिषद ने सदन का विश्वास खो दिया है, तो वहां परीक्षण ही एकमात्र तरीका है- सदन के पटल पर बहुमत हासिल करना।’ सरल शब्दों में कहें तो सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि किसी सरकार के पास बहुमत है या नहीं, उसका फैसला सिर्फ विधानसभा में ही हो सकता है।कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एसआर बोम्मई।- फाइल फोटोसंविधान एक्सपर्ट मानते हैं कि आजादी के बाद कई सालों तक राज्यपाल बिना किसी फ्लोर टेस्ट के ही सरकारें बर्खास्त कर देते थे। अगर किसी सरकार पर संकट आता भी था, तो ऐसे हालात में विधायकस्पीकर या राज्यपाल के सामने परेड करते थे या फिर अपने समर्थन की चिट्ठी भेजते थे। इससे गड़बड़ियां भी होती थीं। 1989 में भी कर्नाटक की एसआर बोम्मई की सरकार ऐसे ही बर्खास्त कर दी गई थी। 1967 में बंगाल की अजॉय मुखर्जी के नेतृत्व वाली यूनाइटेड फ्रंट सरकार को बर्खास्त कर दिया गया। कहा गया कि उनके पास बहुमत नहीं है।उनकी जगह कांग्रेस के समर्थन से पीसी घोष को मुख्यमंत्री बना दिया गया। हालांकि, कुछ विशेष परिस्थितियों में राज्यपाल सरकार बर्खास्त करने की सिफारिश कर सकते हैं।1994 के फैसले के 23 साल बाद यानी 2017 में गोवा से जुड़े एक मामले में फ्लोर टेस्ट को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक और टिप्पणी की,‘फ्लोर टेस्ट से सारी शंकाएं दूर हो जाएंगी और इसका जो नतीजा आएगा, उससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया को भी विश्वसनीयता मिल जाएगी।’दो तरह के फ्लोर टेस्टहोते हैं सामान्यफ्लोर टेस्टजब भी कोई पार्टी या गठबंधन का नेता मुख्यमंत्री बनता है, तो उसे सदन में बहुमत साबित करना होता है। इसके अलावा अगर सरकार पर कोई संकट आ जाए या राज्यपाल को लगे कि सरकार सदन में विश्वास खो चुकी है, तो भी फ्लोर टेस्ट होता है। इसमें मुख्यमंत्री सदन में विश्वास प्रस्ताव लाता है और उस पर वोटिंग होती है।इसको ऐसे समझिए किजुलाई 2019 में कर्नाटक मेंकांग्रेस-जेडीएस गठबंधनकी सरकार पर संकट आ गया। सदन में फ्लोर टेस्ट हुआ। इसमें कांग्रेस-जेडीएस के पक्ष में 99 और विरोध में 105 वोट पड़े। इस तरह सरकार गिर गई थी। कंपोजिट फ्लोर:जब एक से ज्यादा नेता सरकार बनाने का दावा कर दें। ऐसे हालात बनने पर राज्यपाल विशेष सत्र बुला सकते हैं और देख सकते हैं कि किसके पास बहुमत है। इसमें विधायक सदन में खड़े होकर, हाथ उठाकर, ध्वनिमत से या डिविजन के जरिए वोट देते हैं। इसको ऐसे समझ सकते हैं कि फरवरी 1998 में उत्तर प्रदेश की कल्याण सिंह के नेतृत्व वाली जनता पार्टी की सरकार को बर्खास्त कर दिया गयाऔर कांग्रेस के जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री बना दिया गया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने 48 घंटे के अंदर कंपोजिट फ्लोर टेस्ट कराने का आदेश दे दिया। इसमें कल्याण सिंह की जीत हुई। उन्हें 225 वोट मिले और जगदंबिका पाल को 195 वोट। Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today Kamal Nath MP Floor Test | Dainik Bhaskar Research On Floor Test; Facts History of Floor Test in Madhya Pradesh Karnataka Full Article
2 23 साल 7 महीने पहले इंदौर में हत्या के दोषी को दी गई फांसी की आंखों देखी रिपोर्ट By Published On :: Fri, 20 Mar 2020 08:05:54 GMT शुक्रवारसुबह 5 बजे निर्भया के चारों दोषियाें को फांसी होनी है।क्या होता है फांसी के वक्त? कौन क्या करता है? आखिरी के दो घंटे कैसे होते हैं? फांसी के बाद माहौल कैसा होता है?क्या आपको मालूम है इस बारे में? नहीं ना... हमें भी नहीं मालूम। लेकिन हम आपसे एक फांसी का आंखों देखा हाल साझा कर रहे हैं। भास्कर आर्काइव से। ये फांसी 5 अगस्त 1996 को इंदौर जेल में दी गई थी। 23 साल7 महीने पहले हुई इस फांसी की आंखों देखी रिपोर्ट सिर्फ भास्कर के पास थी।हत्यारे उमाशंकर को ऐसे दी गई फांसीकीर्ति राणाइंदौर, 5 अगस्त 1996टिक-टिक करती घड़ी की सुइयां 4.57 से 58 की ओर खिसक रही हैं... पानी का बरसना जारी है... फांसी घर में एकत्र अधिकारियों, जेल कर्मचारियों के दिलों की धड़कन तेज होती जा रही हैं... 15 कदम की दूरी पर बने चबूतरे में मोटी रस्सी के फंदे में कैदी उमाशंकर पांडे की गर्दन फंसी हुई है... जल्लाद बालकृष्ण राव गर्दन पर रस्सी की गठान को हल्का सा झटका देकर अपने अनुभव का परीक्षण करता है... पांच के अंक पर खड़ा छोटा कांटा दोनों बड़े कांटों के 12 के अंक पर पहुंचने की बेताबी से प्रतीक्षा कर रहा है...। बड़ा कांटा 59 मिनट की परिक्रमा पूरी कर चुका है... सेकंड के कांटे का सफर जारी है...।गहरे नीले रंग की नकाब से कैदी उमाशंकर का मुंह ढंका बंधा है... दोनों हाथ पीछे की तरफ कमर से नायलोन की गुलाबी रस्सी से कसकर बंधे हैं... पैरों में करीब 25 किलोग्राम रेत की पोटली बांधी जा चुकी है... कैदी की अनंत यात्रा की सभी तैयारियां ठीक हैं। जल्लाद के चेहरे पर निश्चिंतता के भाव हैं.....। सन्नाटा और गहराता जा रहा है। सबकी सांसें थम सी गई हैं...।दोनों बड़े कांटे 12 की तरफ खिसक रहे हैं... हाथों में मजबूती से लीवर का हत्था पकड़े जल्लाद की नजर जेलर एसपी. जैन के हाथ के इशारे पर है... उधर, हाथ का हल्का सा इशारा होता है, इधर जल्लाद के लीवर के हत्थे को पूरी ताकत से अपनी ओर खींचता है... ‘खट’ की हल्की सी आवाज होती है... चबूतरे पर कुछ पल पहले छटपटाता-पानी मांगता उमाशंकर सबकी नजरों से ओझल हो चुका है...।चेहरे पर नकाब, पैरों में 25 किलो बालू रेत की पोटली, वह नीचे की कोशिश....पत्नी और दो बच्चों के हत्यारे उमाशंकर की देह झूल रही है, मोटी रस्सी से। हैलोजन की तेज पीली रोशनी...। बारिश पानी और सन्नाटे में कुछ सुनाई दे रहा है, तो बूंदों की टप-टप... स्टेशन से गुजरती हुई रेलगाड़ी की सीटी...। अपने सेवाकाल में पहली फांसी देखने और इस कार्रवाई को कराने वाले करीब 50 लोग बुत बने खड़े हैं। मानो इन सबने ही फांसी की पीड़ा को भोगा हो...। सावन के पहले सोमवार पर ब्रह्ममुहुर्त में उमाशंकर पांडे की इस फांसी बाद निर्मित खामोशी जल्लाद बालकृष्ण राव की चहलकदमी से टूटती है...। गर्दन झुकाकर नीचे कोठरी में कुछ देखने के बाद उसकी गर्दन गर्व से तन जाती है...। कुछ पल पहले लीवर का हत्था पकड़ने वाले हाथ अपनी बड़ी-बड़ी मूंछों पर फेरते हुए वह अधिकारियों की तरफ देखता है...। जेल अधिकारी और कर्मचारी हरकत में आते हैं। चबूतरे के नीचे बनी कोठरी का दरवाजा खुल रहा है...। हल्के उजाले में मृत उमाशंकर पांडे की देह झूल रही है...। कुछ पल पहले मौत से बचने के लिए छटपटाने वाले उमाशंकर की आत्मा सारे बंधनों से मुक्त हो चुकी है...। आस्था की इस अनंत यात्रा में कहीं न कहीं उसकी पत्नी और दो बच्चों की आत्माएं भी भटक रही होंगी।सुबह के चार बजने को हैं...। सेंट्रल जेल में स्थित कैदियों की बैरक से पृथक एक कोने में बनी काल कोठरी में जाग रहे उमाशंकर की जिंदगी और मौत मात्र एक छोटा सा शेष है...। जेल कर्मचारियों के साथ पहुंचे जेलर जैन आवाज लगाते हैं... ‘ऐ उमाशंकर। बाहर आओ।’ अन्य जवान भी पुकारते हैं। ‘पांडेजी बाहर आ जाओ... देखो, साहब आए हैं मिलने’ जवानों की फुसफुसाहट से स्पष्ट होता है कि जेलर के समीप खड़े एसडीएम पीसी. राठी हैं, कुछ जवान बहस कर रहे हैं कि ये नए कलेक्टर हैं....।वृद्ध पुलिसकर्मी खान को जेल की कोठरी का दरवाजा खोलने का निर्देश देते हैं। अपना छाता और डंडा दूसरे जवानों को सौंपते हुए खान दरवाजा खोलता है...। कुछ समय बाद मरने जा रहे उमाशंकर के ‘अंतिम दर्शन’ हेतु जेल जवान गर्दन ऊंची कर-करके उसे देख रहे हैं। लठ्ठे के मटमैले कपड़े....उनींदी आंखें... एक हड्डी की काया... बढ़ी हुई दाढ़ी... चढ़ी हुई त्योरियां... एक नजर में सबको पहचानने का प्रयास करती आंखें...। फिर भी हालत ऐसी कि शेर के सामने मेमना खड़ा हो...। एसडीएम राठी पूछ रहे हैं, ‘क्या नाम है? अरे भाई क्या नाम है तुम्हारा....। रूखा सा जवाब, उमाशंकर पांडे। फिर बाप, गांव, जिले आदि के बारे में पूछा जाता है, हर प्रश्न का संक्षिप्त जवाब देने के साथ ही उमाशंकर की बेचैनी भी बढ़ती जाती है...।सेंट्रल जेल के अनुभवी चिकित्सक डॉक्टर बीएल निधान और शरद जैन आगे बढ़ते हैं और उसका मरने से पहले स्वास्थ्य परीक्षण करते हैं....। वजन तौलने की मशीन उसका वजन बताती है 50 किलो। डॉक्टर निधान आश्चर्यचकित स्वर में कहते हैं, ‘अरे साहब, इसका तो वजन बढ़ गया है...’ जेलर जैन एसडीएम राठी को बताते हैं कि पहले इसका वजन 46 किलो था...। अब कैदी भी समझ चुका है कि ये सारी तैयारियां उसकी अंतिम विदाई की हैं...। जेल जवान अनुरोध करते हैं, आओ पंडित जी स्नान कर लो...। वह आगे बढ़ता है। एक जवान साबुन, तौलिया लेकर खड़ा है...। गर्म पानी की कोठी, ठंडे पानी से भरी बाल्टी के समीप जाकर वह ठिठक जाता है...। जवान फिर अनुरोध कर रहे हैं, ‘चलो पांडे जी नहा लो, आज महाकाल का दिन है... सावन का पहला सोमवार है।’ एक जवान चुल्लु में गर्म पानी लेकर उसके हाथ पर डालता है। ये लो पांडे जी, आप गर्म पानी से नहा लो। सबके अनुरोध मनुहार की अनसुनी करते हुए वह निर्विकार भाव से खड़ा रहता है...। जेल अधीक्षक राजाराम खन्ना पूछते हैं, ‘क्यों भई पांडेजी, क्या बात है इच्छा नहीं है क्या...’ अब वह धीरे से कहता है... टट्टी जाना है। जेल जवान लोटा भरके उसके हाथ में देते हैं, कहते हैं वहां सामने आड़ में कर लो, चार जवानों के घेरे में वह शौच के लिए जा रहा है...। लौटने पर साबुन से हाथ धोता है, फिर मनुहार की जाती है, नहा लो भाई, लेकिन वह इनकार कर देता है, तो अधिकारी कहते हैं- चलो जैसी तुम्हारी इच्छा वैसे भी बारिश में भीगने से स्नान जैसा तो हो ही गया...।नीले रंग की स्लीपर पहने उमाशंकर को जेल जवान पकड़कर पुन: कोठरी की तरफ ला रहे है... एक जवान हाथ में लठ्ठे के कपड़े की आधे बांह की कमीज, पैजामा लेकर आगे बढ़ता है... लो उमाशंकर नए कपड़े पहन लो। आज सावन सोमवार है... भगवान को याद करो... चादर की आड़ की जाती है....उमाशंकर नए कपड़े पहन रहा है। वह उदास है और उसकी उदासी जेलकर्मियों को झकझोर रही है। नामी गिरामी अपराधियों की दादागिरी भुला देने वाले जेलकर्मियों में से कई के लिए किसी आदमी को कुछ मिनट बाद अपनी आंखों के सामने मरते देखने का पहला अनुभव है।सुबह के 4 बजकर 25 मिनट हो चुके हैं, जेलर जैन अधिकारियों से अनुरोध करते हैं कि सब अपनी घड़ियां मिला लें... जल्लाद बालकृष्ण राव, जेल अधीक्षक राजाराम खन्ना, एसडीएम पीसी. राठी, सीएसपी राजेश हिंगनकर आदि अपनी-अपनी घड़ियों के कांटे 4.25 पर कर लेते हैं, यह व्यवस्था इसलिए की जाती है, ताकि सुबह ठीक 5 बजे फांसी देने के आदेश के पालन में समय का हेरफेर न हो पाए।जेल जवानों-अधिकारियों के बीच से निकलकर सफेद-कुर्ता पैजामा पहने एक व्यक्ति उमाशंकर के पास जाने लगता है, अधिकारी पूछते हैं तो जवाब मिलता है, ‘पंडित जी हैं...’ कुर्ते की जेब में रखी एक पुस्तिका निकालकर पंडित सत्यनारायण जोशी गीता के श्लोक बुदबुदाने लगते हैं। कंबल पर खड़े पांडे से चप्पल उतारकर बैठने के लिए कहा जाता है, वह चप्पल उतार देता है, लेकिन खड़ा ही रहता है...पंडित जी बैठ चुके हैं, दरवाजे की देहरी पर उमाशंकर का ध्यान भी श्लोक सुनने में नहीं है, पंडित जी भी जैसे-तैसे पाठ करके खड़े हो जाते हैं।साढ़े चार बज चुके हैं... जल्लाद बालकृष्ण राव दो मुस्टंडे जवानों को पांडे के हाथ पीछे कसने के लिए कहता है, वह विरोध करता है, लेकिन फुर्ती से अपने एक हाथ में पकड़ी नायलोन की गुलाबी रस्सी से उसके हाथ कमर के पीछे बांध देता है... जेल अधीक्षक आरआर खन्ना ब्लैक वॉरंट की फाइल लाने के लिए कह रहे हैं। फाइल जेलर जैन के हाथों में सौंपी जाती है।फांसी दिए जाने वाले कैदी का हुलिया बताया जा रहा है... कद पांच फीट ढाई इंच, दाएं तरफ नाक पर मस्सा, दाएं कंधे पर तिल, बाएं कंधे पर चोट के निशान...। अब ब्लैक वॉरंट पढ़ा जा रहा है, जिसमें आजीवन कारावास, उच्च न्यायालय, उच्चतम न्यायालय में चले प्रकरण, दया की अपील पर राज्यपाल एवं राष्ट्रपति की असहमति के उल्लेख के साथ कहा गया है उम्र 42 वर्ष, जाति ब्राह्मण, निवासी लक्ष्मीपुरा (कायथा थाना) उज्जैन- आपको प्रथम श्रेणी अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश एससी. व्यास के न्यायालय ने 22 फरवरी 95 को धारा 302, 302, 302 एवं धारा 307, 307, 307 के अंतर्गत मृत्युदंड-आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। 24 फरवरी 95 को उच्च न्यायालय इंदौर से आपकी अपील पत्र क्रमांक 340/ विधि दिनांक 11 जुलाई 95 को खारिज कर दी गई थी। इस कार्यालय के माध्यम से उच्चतम न्यायालय नई दिल्ली को की गई अपील क्रमांक 771/95 भी खारिज कर दी गई थी। उच्च न्यायालय डेथ रिफरेंस क्रमांक 2/95 क्रिमिनल अपील 113/95 पेश हुआ, जिस पर मृत्यु दंडादेश की पुष्टिकर अपील निरस्त कर दी गई।काल-कोठरी परिसर में सन्नाटा है... बारिश से बचने के लिए अधिकारी, कर्मचारी छाते ताने खड़े हैं... जेलर जैन अंतिम पत्र पढ़ रहे हैं... उज्जैन के प्रथम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश केके सक्सेना के पत्र क्रमांक 216, 27 मार्च 96 द्वारा सूचना भेजी गई कि मध्य प्रदेश की जेल नियमावली वॉल्यूम 2 के नियम 475 के नियम तथा समस्त जेल नियमों के पालन पश्चात मृत्युदंड का निष्पादन करें। कार्यालय के पत्र 2475/ डेथ वॉरंट/ 3 अप्रैल 96 द्वारा आपकी दया याचिका मृत्युदंड को निरस्त करने के लिए राज्यपाल एवं राष्ट्रपतिजी को भेजी गई थी। राज्यपाल एवं राष्ट्रपतिजी द्वारा दया अपील को मंजूरी देने में असमर्थता व्यक्त की गई। तदपश्चात जेल नियमावली 778 (6) डी. द्वारा निर्धारित नियमों के तहत 5 अगस्त 96 की सुबह पांच बजे फांसी देना तय किया गया है।...तुम्हारी कोई अंतिम इच्छा हो तो बोलो उमाशंकर... वह चुप है, उसकी चुप्पी यथावत है, जेल के बंदूकधारी जवान गीले हो रहे हैं, लेकिन उसका चेहरा देखने की उत्सुकता भी है...। कलेक्टर के प्रतिनिधी के रूप में मौजूद एसडीएम पीसी. राठी स्नेह भरे स्वर में पूछ रहे हैं... देखो भई तुम्हारी कोई अंतिम इच्छा हो तो बोलो। कुछ खाना चाहते हो... किसी से मिलना हो... बच्चों के लिए कुछ संदेश देना हो तो बता दो... उसका शरीर निढाल हो चुका है... चेहरे के हावभाव में लाचारी झलक रही है। राठी फिर पूछते हैं- क्यों भई कोई इच्छा तो नहीं है... मृत्यु मार्ग की ओर धकेले जाने की मुद्रा में जवान सतर्क हो जाते हैं...। एसडीएम राठी के निर्देश पर उमाशंकर को फांसी घर की तरफ ले जाने की तैयारी हो जाती है...।चिड़ियों के चहचहाने से नई सुबह का आभास होने लगा है... सुबह के 4:40 हो चुके हैं... जेलर जैन व्यंग्य से कहते हैं- चलो उमाशंकर तुमने अपनी पत्नी और बच्चों को जहां भेजा है वहां भी तुम्हें भी चलना है... आगे बंदूकधारी जवान बीच में जवानों से घिरे उमाशंकर को धकियाते हुए ले जा रहे हैं, फांसी घर की तरफ पीछे-पीछे कीचड़ में मजबूती से पांव जमाते हाथ में छाता संभाले अधिकारी भी चल रहे हैं। काल-कोठरी से फांसी घर के चबूतरे का 50 कदम का फासला तय हो चुका है.... अधिकारी फांसी घर के आगे खड़े हैं... अधिकारियों से ऊंचाई पर खड़ा है वह... उसकी बेअदबी माफ है। उसके चेहरे पर गहरे नीले रंग के मोटे कपड़े का नकाब पहनाया जा चुका है। इस चबूतरे पर एक साथ दो कैदियों को फांसी देने की व्यवस्था है। थुल-थुल शरीर, बड़ी-बड़ी सफेद मूंछ, हल्के कत्थई रंग का चटकदार स्वेटर पहने जल्लाद बालकृष्ण राव अपने पैंट की जेब से रूमाल निकालकर हाथ और चेहरा पोंछते हैं... रस्सी को झटके से खींचने वाले लीवर के हत्थे को साफ करता है, तीन बार प्रणाम की मुद्रा में हाथों से लीवर को छूता है।बारिश जारी है... घड़ी की टिक-टिक जारी है। चबूतरे के सामने खड़े अधिकारी-जवान देख रहे हैं... कुछ मिनट बाद मरने वाले उमाशंकर को। उमाशंकर के चेहरे पर नकाब है। पैरों में 25 किलो बालू रेत की पोटली बांधी जा चुकी है, फांसी का फंदा एक झटके में ही आपा ले ले इसलिए फंदे पर कम से कम 75 किलो का वजन लटकना जरूरी है, 50 किलो का उमाशंकर और 25 किलो की रेत की पोटली। तेल कम हो तो दिये के जैसे बुझने से पहले अचानक रोशनी से तेज हो जाती है। ऐसे ही उमाशंकर मौत के फंदे से मुक्ति के लिए जान छुड़ाने की कोशिश करता है। जेल के जवानों की मजबूत पकड़ उसके मंसूबों को विफल कर देती है...वह बैठने की कोशिश करता है, लेकिन जवान उसे फिर विफल कर देते हैं। मौत से कुछ सेकंड के फासले पर खड़ा उमाशंकर ताकत लगाकर बचने की कोशिश करता है। दूसरी तरफ, जल्लाद और चबूतरे पर खड़े जवान कहते हैं, ‘उमाशंकर राम-राम बोलो...’। उमाशंकर कुछ सुनने का प्रयास करता है कि तभी ‘खट’ की आवाज के साथ लीवर हिल जाता है। चबूतरे पर उमाशंकर के पैरों के नीचे लगी लोहे की प्लेट नीचे की तरफ खुल जाती है। और उमाशंकर नीचे कोठरी में लटक जाता है...हवा के जोर से हिल रही रस्सी के कारण उसकी देह लोहे के पिंजरे में हिल रही है लेकिन पंछी उड़ चुका है....। आधे घंटे तक शव कोठरी में लटका रहने दिया जाता है। कुछ देर पहले जो जवान अपने हाथों से पकड़कर उसे चबूतरे तक लाए थे, अब फटे हुए कपड़े एकत्र कर एक-दूसरे को बांटते हैं। और इन कपड़ों की मदद से उसकी भूत देह पकड़ते हैं। डॉक्टर विधान और डॉक्टर जैन द्वारा उसे मृत घोषित किए जाने के पश्चात ये जवान उसकी देह स्ट्रेचर पर रखकर बाहर खड़े रिश्तेदारों के सुपुर्द कर देते हैं।5 अगस्त 1996 को भास्कर में प्रकाशित रिपोर्ट। Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today Nirbhaya Rapist Hanging Tihar Jail Live | Dainik Bhaskar Latest News Updates Nirbhaya Hanging; Know What happens at the time of hanging? 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2 अमेरिका के कॉर्पोरेट सेक्टर पर कुल ऋण स्तर उसकी जीडीपी का 75%, 2008 से भी ज्यादा By Published On :: Fri, 20 Mar 2020 17:57:00 GMT दुनियाभर के केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में आक्रामक कटौती कर रहे हैं, लेकिन इससे बाजार को शायद ही कोई लाभ हो रहा हो। अब कोरोना वायरस ने 12 साल पहले की आर्थिक मंदी की तुलना में विश्व अर्थव्यवस्था में बहुत ही संवेदनशील वित्तीय संक्रमण के फैलने का खतरा पैदा कर दिया है। पिछले संकट की तुलना में दुनिया इस बार कर्ज में अधिक गहरे डूबी हुई है। दुनियाभर में इस बार सबसे जोखिमभरा कर्ज का बड़ा हिस्सा घरों व बैंकों से हटकर कॉर्पोरेशनों के पास चला गया है। नगदी के प्रवाह में अचानक रोक की संभावनाओं से निपटने वाले व्यवसायों में अधिकांश नई पीढ़ी की वे कंपनियां हैं, जो पहले से ही अपने ऋण चुकाने के लिए संघर्ष कर रही हैं। इस वर्ग में वे जॉम्बी (प्रेत) कंपनियां हैं, जो इतना कम कमाती हैं कि अपने ऋण पर ब्याज भी नहीं चुका सकतीं, ये सिर्फ हर बार नया ऋण लेकर ही चल रही हैं। यह महामारी जितनी लंबी चलेगी, वित्तीय संकट के उतना ही गहराने का खतरा उत्पन्न होगा और साथ ही इन जॉम्बी कंपनियों के एक के बाद एक डिफॉल्टर होने की शुरुआत हो जाएगी।पिछली एक शताब्दी में मंदी हमेशा ही ऊंची ब्याज दरों के लंबे समय तक बने रहने से शुरू हुई। कभी भी वायरस की वजह से नहीं। दुनिया की अर्थव्यवस्था को इस संक्रमण से होने वाला नुकसान तीन महीने से अधिक तो नहीं चलेगा। लेकिन, अब सदी में एक बार होने वाली यह वैश्विक महामारी रिकॉर्ड कर्ज के बोझ से दबी दुनिया को चोट पहुंचा रही है। दुनियाभर के केंद्रीय बैंक महसूस रहे हैं कि नगदी की कमी एक और वित्तीय संकट को जन्म दे सकती है। जिस तरह से फेड ने 2008 की तरह आक्रामक उपाय किए, ताकि बाजार में डर को दूर किया जा सके, लेकिन अब यह जांच का विषय है कि वित्तीय सिस्टम फिर भी इतना संवेदनशील क्यों दिख रहा है। 1980 के आसपास दुनिया में कर्ज का तेजी से बढ़ना शुरू हुआ, क्योंकि ब्याज दरों में कमी हो रही थी और विनियमन की वजह से ऋण देना आसान हो गया था। 2008 के संकट के शुरू होने से ठीक पहले कर्ज अपनी ऐतिहासिक ऊंचाई पर पहुंच गया था। तब यह दुनिया की कुल अर्थव्यवस्था का तीन गुना हो गया था। संकट के दौरान यह कर्ज गिरा और दुनियाभर के केंद्रीय बैंकों ने वसूली में तेजी की उम्मीद में ब्याज दरों को न्यूनतम स्तर पर ला दिया। जैसे-जैसे आर्थिक विस्तार होता रहा, उधार देने वाले बहुत ही शिथिल हो गए और उन कंपनियों को भी सस्ते ऋण देने लगे जिनकी आय को लेकर सवाल थे। आज भी दुनिया पर कर्ज का भार अब तक का सबसे अधिक है।अमेरिका के कॉर्पोरेट सेक्टर पर ऋण का कुल स्तर देश की जीडीपी का 75 फीसदी है, यह 2008 से भी अधिक है। इस 16 ट्रिलियन डॉलर के कर्ज के भीतर भारी संकट की आशंका छिपी हुई है। इनमें कई जॉम्बी कंपनियां भी हैं। बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट के अनुसार अमेरिका में ऐसी जॉम्बी कंपनियां सार्वजनिक कंपनियों का 16 फीसदी और यूरोप में 10 फीसदी से अधिक हैं। ट्रांसपोर्ट, ऑटो और तेल क्षेत्र में तनाव के लक्षण लगातार बढ़ रहे हैं। अधिक आपूर्ति और वायरस की वजह से मांग में कमी के डर से तेल की कीमत 35 डॉलर प्रति बैरल से भी नीचे आ गई है। यह कई तेल कंपनियों के लिए इतनी कम है कि वे अपना कर्ज भी नहीं चुका सकते।जब बाजार गिरता है तो निवेशक कम समृद्धि महसूस करते हैं और अपने खर्चों में कमी करने लगते हैं। इससे अर्थव्यवस्था धीमी हो जाती है। बड़े बाजारों पर इसका अधिक नकारात्मक असर होता है। वॉलस्ट्रीट में तेजड़िए आज भी चीन को लेकर उम्मीदों से भरे हैं कि यह बुरी स्थिति जल्द ही गुजर सकती है। चीन में वायरस का पहला मामला 31 दिसंबर को सामने आया और नए मामले आने की दर सिर्फ सात हफ्ते बाद 13 फरवरी को चरम पर पहुंच गई। शुरुआती नुकसान के बाद चीन के स्टॉक मार्केट ने दोबारा उछाल मारी और अर्थव्यवस्था पहले जैसी ही दिख रही है। लेकिन रिटेल बिक्री और निवेश के ताजा डाटा से पता चलता है कि इस तिमाही में चीन की अर्थव्यवस्था सिकुड़ रही है।जैसे-जैसे वायरस दुनिया में फैल रहा है, एक बार फिर इस बात का डर है कि निर्यात की मांग घटने से संकट फिर चीन के चारों ओर आ सकता है। पिछले एक दशक में चीन का कॉर्पोरेट कर्ज चार गुना बढ़कर 20 ट्रिलियन डॉलर से अधिक हो गया है। आईएमएफ का अनुमान है कि इस कर्ज का दसवां हिस्सा जॉम्बी कंपनियों में है, जो जिंदा रहने के लिए सरकार निर्देशित कर्ज के भरोसे हैं। दुनियाभर में मांग उठ रही है कि कमजोर कॉर्पोरेशनों को सरकारें इसी तरह का समर्थन दें। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि नीति निर्धारक क्या करते हैं। परिणाम तो इस बात पर निर्भर है कि कितनी जल्दी कोरोना वायरस अपने चरम पर पहुंचता है। यह मौजूदा गति से जितने अधिक समय तक फैलता रहेगा, संभव है कि जॉम्बी कंपनियों की मौत शुरू हो जाए, जो बाजार को और अधिक हताश करेगा और इसे वित्तीय संक्रमण के और बढ़ने की आशंका उत्पन्न हो जाएगी। (यह लेखक के अपने विचार हैं।) Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today US corporate sector total debt level of 75% of its GDP, more than 2008 Full Article
2 फरवरी में 3 मरीज थे; महीनेभर तक कोई मामला नहीं आया, 2 मार्च के बाद 320 मामले आए, पिछले 10 दिन में ही 454% की बढ़ोतरी By Published On :: Sat, 21 Mar 2020 18:32:50 GMT नई दिल्ली.देश में कोरोनावायरस का पहला मामला 30 जनवरी को केरल में सामने आया था। उसके बाद 1 और 2 फरवरी को भी केरल में 1-1 मरीज मिला। ये तीनों मरीज कुछ ही समय में ठीक हो गए। इसके बाद पूरे महीनेभर देशभर में एक भी कोरोनावायरस का नया मामला नहीं आया। लेकिन, 2 मार्च के बाद से मामलों की संख्या दिनोंदिन बढ़ती गई। 2 मार्च को कोरोनावायरस के 5 मामले (इसमें 3 केरल के केस, जो अब ठीक हो चुके हैं) थे। इसके बाद 21 मार्च तक 320 नए मामले सामने आए। पिछले 10 दिन में ही 11 मार्च से 21 मार्च के बीच देश में कोरोना के मामलों में 454% की बढ़ोतरी हुई है। 11 मार्च को 71 मामले थे और 21 मार्च को रात 11 बजे तक कुल 323 केस हो गए। संक्रमण के चलतेदेश में 4 लोगों ने अपनी जान गंवाई है। अब तक सबसे ज्यादा 64मामले महाराष्ट्र में आए हैं। उसके बाद केरल (52 मामले) और दिल्ली (26 मामले) हैं। अभी तक जितने भी लोग कोरोना से संक्रमित मिले हैं, उनमें से ज्यादातर की ट्रैवल हिस्ट्री रही हैयानी ये लोग हाल में विदेश से लौटे थे।मार्च के पहले हफ्ते में 36 नए मामले आए थे, तीसरे हफ्ते में 176 नए मामले मिलेदेश में कोरोनावायरस के नए मामले 2 मार्च के बाद से ही बढ़ने शुरू हो गए। मार्च के पहले हफ्ते यानी 2 मार्च से 8 मार्च के बीच कोरोनावायरस के 36 नए मामले सामने आए थे।दूसरे हफ्ते यानी 9 मार्च से 15 मार्च के बीच 70 नए मामले सामने आए। लेकिन, तीसरे हफ्ते यानी 16 मार्च से 21 मार्च के बीच 181 नए मामले सामने आ चुके हैं। शनिवार को ही शाम 7:30बजे तक 57 नए मामले सामने आ गए।ईरान में सबसे ज्यादा 255 भारतीय कोरोना संक्रमित18 मार्च को लोकसभा में विदेश राज्य मंत्री वी मुरलीधरन के दिए जवाब के मुताबिक, 7 देशों में 276 भारतीय कोरोनावायरस से संक्रमित हैं। ईरान में सबसे ज्यादा 255 भारतीय कोरोनावायरस से संक्रमित हैं। उसके बाद यूएई है, जहां 12 भारतीय संक्रमित हैं। देश कोरोना से संक्रमित भारतीय ईरान 255 यूएई 12 इटली 5 हॉन्ग कॉन्ग 1 कुवैत 1 रवांडा 1 श्रीलंका 1 कोरोनावायरस से जुड़ी और भी खबरें पढ़ना चाहेंगे क्या...# क्या पालतू कुत्ते-बिल्ली से भी हाे सकता है कोरोना का खतरा, हमें इसकी जांच कब करानी चाहिए, एक्सपर्ट से जानिए ऐसे सवालों के जवाब# देश में कोरोना का बढ़ता खतरा /रिपोर्ट में दावा: भारत की स्थिति इटली से एक महीने और अमेरिका से सिर्फ 15 दिन दूर# दुष्यंत ने 13 मार्च को सिंगर कनिका के साथ पार्टी की, उसके बाद 3 दिन लोकसभा गए, 18 तारीख को यूपी-राजस्थान के 96 सांसदों के साथ राष्ट्रपति से भी मिले Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today Coronavirus India Comparison; Delhi Cases Vs Mumbai Pune Maharashtra Corona Vs Kerala COVID-19 Death Toll Comparison Latest News Updates Full Article
2 21 दिन नहीं संभले तो 21 साल पीछे चले जाएंगे By Published On :: Tue, 24 Mar 2020 19:35:00 GMT प्यारे देशवासियों,मैं आज एक बार फिर काेराेना वैश्विक महामारी पर बात करने के लिए आपके बीच आया हूं। 22 मार्च काे जनता कर्फ्यू का जाे संकल्प हमने लिया था, एक राष्ट्र के नाते उसकी सिद्धि के लिए हर भारतवासी ने पूरी संवेदनशीलता के साथ, पूरी जिम्मेदारी के साथ अपना याेगदान दिया। बच्चे, बुजुर्ग, छाेटे-बड़े, गरीब, मध्यम, हर वर्ग के लाेग, हर काेई परीक्षा की इस घड़ी में साथ आए। जनता कर्फ्यू काे हर भारतवासी ने सफल बनाया। एक दिन के जनता कर्फ्यू से भारत ने दिखा दिया कि जब देश पर संकट आता है, जब मानवता पर संकट आता है ताे किस प्रकार से हम भारतीय मिलकर उसका मुकाबला करते हैं।आप सभी जनता कर्फ्यू की सफलता के लिए प्रशंसा के पात्र हैं। आप काेराेना महामारी पर पूरी दुनिया की स्थिति सुन रहे हैं और देख रहे हैं। आप यह भी देख रहे हैं कि दुनिया के समर्थ से समर्थ देशाें काे भी कैसे इस महामारी ने बिल्कुल बेबस कर दिया है। ऐसा नहीं है कि यह देश प्रयास नहीं कर रहे हैं या उनके पास संसाधनाें की कमी है। लेकिन, काेराेना इतनी तेजी से फैल रहा है कि तमाम तैयारियाें और प्रयासाें के बावजूद इन देशाें में चुनाैती बढ़ती ही जा रही है। इन सभी देशाें के दाे महीनाें के अध्ययन से जाे निष्कर्ष निकल रहा है और एक्सपर्ट भी यही कह रहे हैं कि इस वैश्विक महामारी काेराेना से प्रभावी मुकाबले के लिए एकमात्र विकल्प है- साेशल डिस्टेंसिंग। साेशल डिस्टेंसिंग यानी एक दूसरे से दूर रहना। अपने घराें में ही बंद रहना। काेराेना से बचने का इसके अलावा काेई तरीका नहीं है। काेई रास्ता नहीं है। काेराेना काे फैलने से राेकना है ताे उसके संक्रमण की साइकल काे ताेड़ना ही हाेगा। कुछ लाेग इस गलतफहमी में हैं कि साेशल डिस्टेंसिंग सिर्फ मरीज के लिए जरूरी है। यह साेचना सही नहीं है। साेशल डिस्टेंसिंग हर नागरिक के लिए, हर परिवार के लिए है। परिवार के हर सदस्य के लिए है। प्रधानमंत्री के लिए भी है। कुछ लाेगाें की लापरवाही, कुछ लाेगाें की गलत साेच आपकाे, आपके बच्चों, माता-पिता को, परिवार काे, आपके दाेस्ताें काे और आगे चलकर पूरे देश काे बहुत बड़ी मुश्किल में झाेंक देगी।अगर ऐसी लापरवाही जारी रही ताे भारत काे इसकी बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है और ये कीमत कितनी हाेगी, इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है।पिछले दाे दिनाें से देश के अनेक भागाें में लाॅकडाउन कर दिया गया है। राज्य सरकारों के इन प्रयासाें काे बहुत गंभीरता से लेना चाहिए। हेल्थ एक्सपर्ट और अन्य देशाें के अनुभवाें काे ध्यान में रखते हुए देश आज एक अहम फैसला करने जा रहा है।आज रात 12 बजे से पूरे देश में संपूर्ण लाॅकडाउन हाेने जा रहा है। हिंदुस्तान काे बचाने के लिए हिंदुस्तान के हर नागरिक काे बचाने के लिए आपकाे और आपके परिवार काे बचाने के लिए रात 12 बजे से घराें से बाहर निकलने पर पूरी तरह पाबंदी लगाई जा रही है। देश के हर राज्य काे, हर केंद्र शासित प्रदेश काे, हर जिले, हर गांव, कस्बे, गली, मोहल्ले काे लाॅकडाउन किया जा रहा है। यह एक तरह से कर्फ्यू है, जनता कर्फ्यू से कुछ कदम आगे की बात। उससे ज्यादा सख्त। काेराेना के खिलाफ निर्णायक लड़ाई के लिए यह कदम बहुत आवश्यक है। निश्चित ताैर पर लाॅकडाउन की आर्थिक कीमत देश उठाएगा, लेकिन एक-एक भारतीय के जीवन काे बचाना, आपके जीवन काे बचाना, आपके परिवार काे बचाना इस समय भारत सरकार की, देश की हर राज्य सरकार की, हर स्थानीय निकाय की सबसे बड़ी प्राथमिकता है। इसलिए मेरी हाथ जाेड़कर प्रार्थना है कि आप इस समय देश में जहां भी हैं, वहीं रहें। अभी के हालात काे देखते हुए देश में लाॅकडाउन 21 दिन का हाेगा। तीन सप्ताह का हाेगा।मैं आपसे कुछ सप्ताह मांगने आया हूं। आने वाले 21 दिन हर नागरिक के लिए हर परिवार के लिए बहुत महत्वपू्र्ण हैं। हेल्थ एक्सपर्ट्स के अनुसार काेराेना के संक्रमण साइकल को ताेड़ने के लिए 21 दिन का समय बहुत अहम है। अगर ये 21 दिन नहीं संभले ताे देश और आपका परिवार 21 साल पीछे चला जाएगा। अगर ये 21 दिन नहीं संभले ताे कई परिवार हमेशा-हमेशा के लिए तबाह हाे जाएंगे। मैं ये बात प्रधानमंत्री नहीं, आपके परिवार के सदस्य के नाते कह रहा हूं। इसलिए बाहर निकलना क्या हाेता है, यह 21 दिन के लिए भूल जाएं। घर में रहें, घर में रहें और एक ही काम करें कि अपने घर में ही रहें।आज के फैसले ने, देशव्यापी लाॅकडाउन ने आपके घर के दरवाजे पर एक लक्ष्मण रेखा खींच दी है। आपकाे ये याद रखना है कि घर से बाहर पड़ने वाला आपका सिर्फ एक कदम कोरोना जैसी गंभीर महामारी काे आपके घर में ला सकता है। आपकाे याद रखना है कि कई बार काेराेना से संक्रमित व्यक्ति शुरुआत में स्वस्थ लगता है। वह संक्रमित है, इसका पता ही नहीं चलता। इसलिए एहतियात बरतें, घराें में रहें। जाे लोग घर में हैं, वह साेशल मीडिया पर नए तरीकाें से, इस बात काे बता रहे हैं। एक बैनर जाे मुझे भी पसंद आया, मैं आपकाे भी दिखाता हूं। काेराेना यानी काेई राेड पर ना निकले।एक्सपर्ट्स का कहना है कि आज अगर किसी भी व्यक्ति में काेराेना वायरस पहुंचता है ताे उसके शरीर में इसके लक्षण दिखने में कई कई दिन लग जाते हैं। इस दाैरान वह जाने अनजाने में हर उस व्यक्ति काे संक्रमित कर देता है जाे उसके संपर्क में आता है। डब्लूएचओ की रिपाेर्ट के अनुसार इस महामारी से संक्रमित एक व्यक्ति सिर्फ हफ्ते दस दिन में सैकड़ाें लाेगाें तक इसे पहुंचा सकता है। यानी ये आग की तरह तेजी से फैलता है। डब्लूएचओ का ही एक और आंकड़ा बहुत महत्वपूर्ण है। दुनिया में काेरोना से संक्रमिताें की संख्या काे पहले एक लाख तक पहुंचने में 67 दिन लग गए थे। उसके बाद सिर्फ 11 दिन में ही एक लाख नए लाेग संक्रमित हाे गए। ये और भी भयावह है कि दाे लाख संक्रमिताें से तीन लाख तक ये बीमारी पहुंचने में सिर्फ चार दिन लगे। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि काेराेना कितनी तेजी से फैलता है और जब ये फैलना शुरू करता है, ताे इसे राेकना बहुत मुश्किल हाेता है।यही वजह है कि चीन, अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, स्पेन, इटली, ईरान जैसे अनेक देशाें में जब काेराेना ने फैलना शुरू किया ताे हालात बेकाबू हाे गए। और ये भी याद रखें कि इटली हाे या अमेरिका इन देशाें की स्वास्थ्य सेवा, अस्पताल, आधुनिक संसाधन दुनिया में बेहतरीन माने जाते हैं, फिर भी ये देश काेराेना का प्रभाव कम नहीं कर पाए। सवाल ये है कि उम्मीद की किरण कहां है? उपाय और विकल्प क्या हैं? इससे निपटने के लिए उम्मीद की किरण उन देशाें से मिले अनुभव हैं, जाे काेराेना काे कुछ हद तक नियंत्रित कर पाए। हफ्ताें तक उनके नागरिक घराें से नहीं निकले। उन्हाेंने 100 फीसदी सरकारी निर्देशाें का पालन किया और इसलिए ये कुछ देश अब इस महामारी से बाहर आने की ओर बढ़ रहे हैं। हमें भी ये मानकर चलना चाहिए कि हमारे सामने सिर्फ और सिर्फ यही एक मार्ग है। एष: पंथा:।घर से बाहर नहीं निकलना है, चाहे जाे हाे जाए। घर में ही रहना है। साेशल डिस्टेंसिंग। प्रधानमंत्री से लेकर गांव के छाेटे से नागरिक तक सबके लिए। काेराेना से तभी बच सकते हैं, जब घर की लक्ष्मण रेखा न लांघी जाए। हमें इस महामारी के वायरस का संक्रमण राेकना है। इसके फैलने की चेन काे ताेड़ना है। ये धैर्य और अनुशासन की घड़ी है। जब तक देश में लाॅकडाउन है, हमें अपना संकल्प निभाना है। अपना वचन निभाना है। मेरी आपसे हाथ जाेड़कर प्रार्थना है कि घराें में रहते हुए आप उनके बारे में साेचिए, उनके लिए मंगल कामना करें, जाे कर्तव्य निभाने के लिए खुद काे खतरे में डालकर काम कर रहे हैं। डाॅक्टरों व उनके बारे में सोचें जो एक-एक जीवन काे बचाने के लिए दिन-रात अस्पताल में काम कर रहे हैं। अस्पताल के लाेग, एंबुलेंस ड्राइवर, वार्ड बॉय, सफाईकर्मी के बारे मेंसाेचें, जाे दूसराें की सेवा कर रहे हैं। आप उनके लिए प्रर्थना करें जाे आपके यहां सेनिटाइज करने में लगे हैं। आपकाे सही जानकारी देने के लिए 24 घंटे काम कर रहे मीडिया के लोगाें के बारे में भी साेचें, जाे संक्रमण का खतरा उठाकर सड़काें पर हैं। अपने आसपास के पुलिसकर्मियों के बारे में साेचें जाे परिवार की चिंता के बिना आपकाे बचाने के लिए दिन रात ड्यूटी पर हैं। कई बार कुछ लाेगों की गुस्ताखी का शिकार भी हाे रहे हैं। काेराेना वैश्विक महामारी के बीच केंद्र और देश की राज्य सरकारें तेजी से काम कर रही हैं। राेजमर्रा की जिंदगी में लाेगाें काे असुविधा न हाे इसके लिए काेशिश कर रहे हैं। जरूरी वस्तुओं की सप्लाई के लिए सभी उपाय किए गए हैं। आगे भी किए जाएंगे। निश्चित ताैर पर संकट की ये घड़ी गरीबाें के लिए भी मुश्किल वक्त लाई है। केंद्र और राज्याें के साथ समाज के संगठन गरीबाें की मुसीबत कम हाे इसके लिए जुटे हुए हैं। गरीबाें की मदद के लिए कई लाेग साथ आ रहे हैं। जीवन जीने के लिए जाे जरूरी है, उसके लिए सारे प्रयासाें के साथ ही जीवन बचाने के लिए जाे जरूरी है, उसे सर्वाेच्च प्राथमिकता देनी ही पड़ेगी। इससे मुकाबला करने के लिए स्वास्थ्य सुविधाएं तैयार की जा रही हैं। डब्ल्यूएचओ, भारत के बड़े संस्थानाें की सलाह पर काम करते हुए सरकार ने निरंतर फैसले लिए हैं।काेराेना के इलाज के लिए केंद्र ने आज 15 हजार करोड़ का प्रावधान किया है। इससे जांच सुविधा, आइसाेलेशन, आईसीयू बेड, वेंटिलेटर और अन्य जरूरी साधन बढ़ाए जाएंगे। राज्याें से अनुराेध किया गया है कि इस समय सभी राज्याें की प्राथमिकता सिर्फ और सिर्फ स्वास्थ्य सेवा ही हाे। मुझे संताेष है कि देश का प्राइवेट सेक्टर भी पूरी तरह से कंधे से कंधा मिलाकर संकट और संक्रमण की इस घड़ी में देश के साथ खड़ा है।ध्यान रखें कि ऐसे समय में अनजाने कई बार अफवाहें भी जाेर पकड़ती हैं। किसी भी अफवाह और अंधविश्वास से बचें। आप केंद्र, राज्य और मेडिकल संस्थानों के निर्देश और सुझावाें का पालन करें। आपसे प्रार्थना है कि इस बीमारी के लक्षणाें के दौरान डाॅक्टर की सलाह के बिना काेई दवा न लें। किसी भी तरह का खिलवाड़ आपके जीवन काे खतरे में डाल सकता है। विश्वास है कि हर भारतीय सरकार के स्थानीय प्रशासन के निर्देशों का पालन करेगा। 21 दिन का लॉकडाउन लंबा समय है। लेकिन, आपके जीवन की रक्षा के लिए, आपके परिवार के लिए उतना ही महत्वपूर्ण है। यही एक रास्ता है। हर हिंदुस्तानी इसका न सिर्फ सफलता से मुकाबला करेगा, बल्कि विजयी हाेकर निकलेगा। आप अपना ध्यान रखें, अपनाें का ध्यान रखें और आत्मविश्वास के साथ कानून नियमाें का पालन करते हुए पूरी तरह संयम के साथ विजय का संकल्प लेकर हम सब इन बंधनाें काे स्वीकार करें। Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र को संबोधित किया। Full Article
2 मार्च के 27 दिनों में चीन में कोरोना के 1.7% केस आए, 383 मौतें हुईं; दुनिया में 573% मामले बढ़े और 27 हजार की जान गई By Published On :: Sun, 29 Mar 2020 12:09:33 GMT नई दिल्ली.दुनिया के लिए मार्च का महीना बेहद खराब रहा। वो इसलिए, क्योंकि मार्च के 27 दिनों में दुनियाभर में कोरोनावायरस के मामले 573% बढ़ गए। लेकिन इसी दौरान जिस चीन से ये वायरस निकला, वहां सिर्फ 1.7% ही नए मामले आए। 1 मार्च तकदुनियाभर में 88 हजार 585 और चीन में 80 हजार 26 मामले थे। इस तरह से उस समय दुनिया के कुल मामलों में चीन की हिस्सेदारी 90% तक थी। लेकिन 27 तारीख तक दुनिया में कोरोना के 5.96 लाख और चीन में 81 हजार 394 मामले हो गए। अब कुल मामलों में चीन की हिस्सेदारी घटकर 15% से भी कम हो गई।मौतें : दुनिया में 27 दिन में मौतों का आंकड़ा 798% बढ़ा, चीन में 13% हीमार्च के इन 27 दिनों में मौतों का आंकड़ा भी लगातार बढ़ता रहा। 1 मार्च तक दुनियाभर में 3 हजार 50 मौतें हुई थीं, उनमें से 95% से ज्यादा यानी 2 हजार 912 मौतें अकेले चीन में हुई थी। इसके बाद 27 मार्च तक चीन में मौत का आंकड़ा बढ़कर 3 हजार 295 पर पहुंच गया, लेकिन दुनियाभर में ये आंकड़ा 798% बढ़कर 27 हजार 371 पर आ गया।रिकवरी : चीन में अब तक 92% मरीज ठीक हुए, दुनिया में यही आंकड़ा 22% काचीन में कोरोनावायरस का पहला केस 27 दिसंबर को सामना आया था। उसके बाद से 27 मार्च तक चीन में 81 हजार 394 मामले आ चुके हैं। इनमें से 92% यानी 74 हजार 971 मरीज ठीक भी हो गए। जबकि, 3 हजार 295 मरीजों की मौत हो गई। जबकि, दुनियाभर में अब तक 5.96 लाख मामले मिले हैं, जिनमें से 22% यानी 1.33 लाख से ज्यादा मरीज ही रिकवर हुए हैं।और भारत में : 885 नए मरीज आए, 22 मौतें हुईंमार्च का महीना हमारे देश के लिए भी बहुत खराब रहा। देश में कोरोनावायरस का पहला केस 30 जनवरी को केरल में आया था। उसके बाद 1 और 2 फरवरी को भी केरल से ही 1-1 केस और आए। लेकिन कुछ ही समय में ये तीनों मरीज ठीक भी हो गए। लेकिन मार्च के महीने में देश में 2 मार्च के बाद से रोजाना मामले बढ़ते गए। इस महीने 27 मार्च तक देश में 886 मामले आए। इस दौरान 22 मौतें भी हुईं।इस महीने सबसे ज्यादा मामले अमेरिका में बढ़े, लेकिन सबसे ज्यादा मौतें इटली में हुईं देश मामले बढ़े मौतें हुईं अमेरिका 1.04 लाख+ 1,695 इटली 85,370 9,105 स्पेन 65,661 5,138 जर्मनी 50,792 351 फ्रांस 32,864 1,993 Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today In 27 days of March, 1.7% of Corona cases occurred in China, 383 deaths occurred, but 573% cases increased in the world and 27 thousand deaths occurred. Full Article
2 2 हजार सालों में कोरोना 17वीं ऐसी बीमारी, जिसमें एक लाख से ज्यादा मौतें हुईं By Published On :: Sat, 11 Apr 2020 03:31:52 GMT दुनियाभर में तबाही मचा रहे कोरोनावायरस से मरने वालों की संख्या 1 लाख के पार पहुंच गई है। इंसान ने जब से तारीखों का हिसाब रखना शुरू किया है, यानी जीरो एडी(0 AD) से अब तक इन 2 हजार सालों में 20 बड़ी महामारियां फैल चुकी हैं। इनमें कोरोना 17वीं ऐसी महामारी है, जिसमें मौतों का आंकड़ा 1 लाख के ऊपर चला गया है। इतिहास में जाएं तो पहली बार साल 165 में महामारी फैली थी। उस समय एन्टोनाइन प्लेग नाम की महामारी एशिया, मिस्र, यूनान (ग्रीस) और इटली में फैली थी। इससे 50 लाख के आसपास लोगों की मौत हुई थी।एन्टोनाइन प्लेग पर ये तस्वीर फ्रांसीसी चित्रकार जे. डेलुनॉय (1828-2891) ने बनाई थी। इस बीमारी से रोम में रोजाना 2 हजार लोगों की जान गई थी। फोटो क्रेडिट :fineartamerica.comजस्टिनियन प्लेगसाल : 541-542मौतें : 5 करोड़उसके बाद जो महामारी फैली थी, उसका नाम था- जस्टिनियन प्लेग। ये महामारी साल 541-542 में एशिया, उत्तरी अफ्रीका, अरेबिया और यूरोप में फैली थी। लेकिन, इसका सबसे ज्यादा असर पूर्वी रोमन साम्राज्य बाइजेंटाइन पर हुआ था। 1500 साल पहले फैली इस महामारी से 5 करोड़ लोगों की जान चली गई थी। ये उस समय की दुनिया की कुल आबादी का आधा हिस्सा था। यानी एक साल के अंदर दुनिया की आधी आबादी खत्म हो गई थी। ये बीमारी इतनी खतरनाक थी कि इसने बाइजेंटाइन साम्राज्य को खत्म कर दिया था।जस्टिनियन प्लेग पर ये तस्वीर इटली के चित्रकार फ्रा एंजेलिको (1395-1455) ने बनाई थी। इसमें सेंट कॉस्मॉस और सेंट डेमियन जस्टिनियन प्लेग से पीड़ित मरीज का इलाज करते दिख रहे हैं। फोटो क्रेडिट : www.medievalists.netद ब्लैक डेथसाल : 1347-1351मौतें : 20 करोड़जस्टिनियन प्लेग के बाद सन् 1347 से 1351 के बीच एक बार फिर प्लेग फैला। इसे 'द ब्लैक डेथ' नाम दिया गया। इसका सबसे ज्यादा असर यूरोप और एशिया में हुआ था। ये प्लेग चीन से फैला था। उस समय ज्यादातर कारोबार समुद्री रास्तों से ही होता था और समुद्री जहाजों पर चूहे भी रहते थे। इन्हीं चूहों से मक्खियों के जरिए ये बीमारी फैलती गई। ऐसा कहा जाता है कि इस बीमारी से अकेले यूरोप में इतनी मौतें हुई थीं कि उसे 1347 से पहले के पॉपुलेशन लेवल पर पहुंचने पर 200 साल लग गए थे।14वीं सदी में फैली ब्लैक डेथ बीमारी पर ये तस्वीर डच आर्टिस्ट पीटर ब्रूजेल द एल्डर ने 1562 में बनाई थी। फोटो क्रेडिट : wikipediaस्मॉलपॉक्ससाल : 1492 से अब तकमौतें : 5.5 करोड़+1492 में यूरोपियन्स अमेरिका पहुंचे। उनके आते ही अमेरिका में स्मॉलपॉक्स यानी चेचक नाम का संक्रमण फैल गया। ये बीमारी इतनी खतरनाक थी कि इससे संक्रमित लोगों में 30% की जान चली गई थी। उस समय इस संक्रमण ने करीब 2 करोड़ लोगों की जान ली थी, जो उस समय अमेरिका की कुल आबादी का 90% हिस्सा थी। इससे यूरोपियन्स को फायदा हुआ। उन्हें अमेरिका में खाली जगहें मिल गईं। उन्होंने यहां अपने कॉलोनियां बसाना शुरू किया। स्मॉलपॉक्स अभी भी फैल रही है और एक अनुमान के मुताबिक, इससे अब तक 5.5 करोड़ लोगों की जान जा चुकी है।1492 में क्रिस्टोफर कोलंबस ने अमेरिका की खोज की थी। उसके साथ ही यूरोपीय अमेरिका आए और उनके साथ स्मॉलपॉक्स बीमारी आई। इस बीमारी से इतने अमेरिकी मरे थे, जिससे ग्लोबल कूलिंग की समस्या आ गई थी। फोटो क्रेडिट : newyorktimesकॉलरासाल : 1817 से अब तकमौतें : 10 लाख+19वीं सदी में एक ऐसी बीमारी भी थी, जो भारत से ही जन्मी थी। इस बीमारी का नाम था- कॉलरा यानी हैजा। ये बीमारी गंगा नदी के डेल्टा के जरिए एशिया, यूरोप, उत्तरी अमेरिका और अफ्रीका में भी फैल गई थी। गंदा पानी पीना, इस बीमारी का कारण था। इस बीमारी की वजह से उस समय 10 लाख से ज्यादा मौतें हुई थीं। डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, अभी भी हर साल 13 लाख से 40 लाख के बीच लोग इस बीमारी की चपेट में आते हैं। जबकि, हर साल 1.5 लाख तक मौतें हो इस बीमारी से हो रही है।कोलरा से बचाव के लिए अमेरिकी सरकार ने 1832 में एक नोटिस जारी किया था। इस नोटिस को हर शहर की दीवार पर चिपकाया गया था। फोटो क्रेडिट : wikipediaस्पैनिश फ्लूसाल : 1918-19मौतें : 5 करोड़1918-19 में फैली स्पैनिश फ्लू महामारी पिछले 500 साल के इतिहास की सबसे खतरनाक महामारी थी। ये बीमारी कहां से फैली? इस बारे में अभी तक पता नहीं चला है। अनुमान लगाया जाता है कि इस महामारी से दुनिया की एक तिहाई आबादी या 50 करोड़ लोग संक्रमित हुए थे। दुनियाभर में इससे 5 करोड़ मौतें हुई थीं। अकेले भारत में ही इससे 1.7 करोड़ से ज्यादा लोग मारे गए थे। इस महामारी में ठीक होने के चांस सिर्फ 10 या 20% ही थे। ये बीमारी इतनी अजीब थी कि इसकी वजह से सबसे ज्यादा मौतें स्वस्थ लोगों की हुई थी। स्पैनिश फ्लू से सबसे ज्यादा मौतें 20 से 40 साल की उम्र के लोगों की हुई थी।स्पैनिश फ्लू वर्ल्ड वॉर-1 के बाद फैली थी। माना जाता है कि वर्ल्ड वॉर के समय सैनिक जिन बंकरों में रहते थे, वहां गंदगी थी। जिससे ये बीमारी सैनिकों में फैली। उसके बाद सैनिक जब अपने-अपने देश लौटे, तो उससे बीमारी सब जगह फैल गई। फोटो क्रेडिट : cdc.govस्पैनिश फ्लू के बाद कोरोना चौथा सबसे खतरनाक फ्लू1) एशियन फ्लू या एच2एन2 वायरससाल : 1957-58मौतें : 11 लाखये बीमारी फरवरी 1957 में हॉन्गकॉन्ग से शुरू हुई थी। क्योंकि ये बीमारी पूर्वी एशिया से निकली थी, इसलिए इसे एशियन फ्लू भी कहा गया। कुछ ही महीनों में कई देशों में फैल गई।ये तस्वीर 16 अगस्त 1957 की है। इसमें एक डॉक्टर नर्स को एशियन फ्लू का पहला वैक्सीन दे रहा है। फोटो क्रेडिट : news-decoder.com2) हॉन्गकॉन्ग फ्लू या एच3एन2 वायरससाल : 1968-70मौतें : 10 लाखपहली बार ये बीमारी सितंबर 1968 में अमेरिका में रिपोर्ट हुई थी। इस वायरस से मरने वाले ज्यादातर लोगों की उम्र 65 साल से ज्यादा थी। इसकी चपेट में ज्यादातर वही लोग आए थे, जिन्हें पहले से कोई गंभीर बीमारी थी।ये तस्वीर जुलाई 1968 में ली गई थी। इस तस्वीर में हॉन्गकॉन्ग की एक क्लीनिक के बाहर मरीज अपनी बारी का इंतजार करते दिख रहे हैं। फोटो क्रेडिट : scmp.com3) स्वाइन फ्लू या एच1एन1 वायरससाल : 2009मौतें : 5.5 लाख+इस वायरस को भी सबसे पहले अमेरिका में ही रिपोर्ट किया गया था और कुछ ही समय में ये दुनियाभर में फैल गया था। इससे मरने वाले 80% लोग ऐसे थे, जिनकी उम्र 65 साल से ज्यादा थी।तस्वीर 20 दिसंबर 2009 की है। इस तस्वीर में व्हाइट हाउस की नर्स उस समय के अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को एच1एन1 की वैक्सीन दे रही है। फोटो क्रेडिट : whitehouse4) कोरोनावायरस या कोविड-19साल : 2019मौतें : 1 लाख+कोरोनावायरस या कोविड-19 चीन के वुहान शहर से शुरू हुआ। पहली बार 8 दिसंबर 2019 को इससे संक्रमित पहला मरीज मिला था। 13 मार्च 2020 को डब्ल्यूएचओ ने इसे महामारी घोषित किया। कोरोना अब तक दुनिया के 200 देशों में फैल चुका है। इससे अब तक 1 लाख से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं।ये तस्वीर वुहान के सीफूड मार्केट की है। अभी तक यही माना जा रहा है कि कोरोनावायरस इसी मार्केट से निकला। कोरोना से पीड़ित पहली मरीज यहीं पर दुकान लगाती थी। फोटो क्रेडिट : scmp.comदो हजार साल में फैलीं 20 बड़ी महामारियां, इनमें 40 करोड़ से ज्यादा जानें गईं बीमारी टाइम पीरियड मौतें एन्टोनाइन प्लेग 165-180 50 लाख जापानी स्मॉलपॉक्स 735-737 10 लाख जस्टिनियन प्लेग 541-542 5 करोड़ ब्लैक डेथ 1347-1351 20 करोड़ स्मॉलपॉक्स 1492 से अभी तक 5.6 करोड़ इटैलियन प्लेग 1629-1631 10 लाख ग्रेट प्लेग ऑफ लंदन 1665 1 लाख यलो फीवर 1790 से अभी तक 1.50 लाख+ कोलरा 1817 से अभी तक 10 लाख+ थर्ड प्लेग 1885 1.20 करोड़ रशियन फ्लू 1889-1890 10 लाख स्पैनिश फ्लू 1918-1919 5 करोड़ एशियन फ्लू 1957-1958 11 लाख हॉन्गकॉन्ग फ्लू 1968-1970 10 लाख एचआईवी एड्स 1981 से अभी तक 3.5 करोड़+ स्वाइन फ्लू 2009-10 5.5 लाख+ सार्स 2002-2003 770 इबोला 2014-16 11 हजार मर्स 2015 से अभी तक 850 कोविड-19 2019 से अभी तक 1 लाख+ (ये स्टोरी नेशनल जियो ग्राफिक, अमेरिका के सेंटर फॉर डिसीज कंट्रोल एंड प्रिवेन्शन, visualcapitalist.comऔर मीडिया रिपोर्ट्स से मिली जानकारी के आधार पर तैयार की गई है) Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today Coronavirus Death Count Worldwide | Novel Coronavirus Total Death Toll Count Worldwide From (COVID-19) Virus Pandemic: India Pakistan USA Spain Italy Germany China UK Russia Full Article
2 लॉकडाउन 2.0 में ‘खलनायक’ से लड़ने को तैयार और ज्यादा ‘नायक’ By Published On :: Tue, 14 Apr 2020 22:18:00 GMT वर्तमान के ‘खलनायक’ कोरोना वायरस ने इंसानों में त्याग, समर्पण, प्रतिबद्धता, एकजुटता, पहल करना, रचनात्मकता, जरूरत के मुताबिक अपनी भूमिका बदलना जैसे और कई गुण ला दिए हैं। मंगलवार की सुबह प्रधानमंत्री मोदी ने भी लॉकडाउन की अवधि को 3 मई, 2020 तक बढ़ाते समय ‘त्याग’ के बारे में बात की। यहां इससे जुड़े कुछ उदाहरण हैं-1.राजस्थान में चुरू के कलेक्टर संदेश नायक की पहल ‘गिव अप समथिंग’ (कुछ त्याग दें) लोगों से लॉकडाउन के समय में संयम वाले जीवन को अपनाने का वचन लेने को कहती है। उन्होंने घोषणा की है कि जब तक स्थितियां सामान्य नहीं हो जातीं, वे दोपहर का भोजन छोड़ देंगे। इसके दो प्रभाव हैं। पहला, इससे हम सब की दैनिक जरूरत नियंत्रित होती है और दूसरा, इस पहल के जरिए बचाए गए पैसों को किसी बड़े और बेहतर काम के लिए दान किया जा सकता है।2.राजस्थान में कोटा के ‘रोजगार उत्थान थेला फुटकर सेवा समिति’ के कम से कम 60 स्वयंसेवकों ने कोटा नगर निगम के 150 वार्डों में से लगभग 23 को सैनिटाइज कर दिया है। ये लोग तकरीबन 20 किलो वजन वाले झोले कंधों पर लेकर कीटाणुनाशक का छिड़काव करते हैं।3. महाराष्ट्र के पुणे में आग बुझाने वाली सामग्री और उपकरणों को संभालने के लिए प्रशिक्षित किए गए फायरमैन अब गली-गली में जाकर सैनिटाइजर छिड़क रहे हैं।4. उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले की पल्लवी सिंह अपनी मां, जो एक स्टाफ नर्स हैं, के साथ स्थानीय सरकारी अस्पताल जाती हैं। वहां जाकर, वे स्टाफ डॉक्टरों और नर्सों की मदद के लिए हर संभव काम करती हैं। जब शहर से प्रवासी मजदूर आने लगे तो अस्पताल में अचानक भीड़ बढ़ गई और मास्क की कमी हो गई। यह देख पल्लवी मजदूरों के लिए मास्क बनाकर मदद भी करने लगीं।5. रिटायर्ड जनरल प्रैक्टिशनर, 69 वर्षीय डॉ. अब्दुल अज़ीज़ ओमान लौटने वाले थे, जहां वे रिटायरमेंट के बाद काम करते हैं। जब वे ओमान लौटने के लिए कोच्चि से निकलने वाले थे, तभी उन्हें इंडियन मेडिकल एसोसिएशन से फोन आया और उनसे पूछा गया कि क्या वह टेलीमेडिसिन वॉलंटियर (फोन पर इलाज संबंधी सलाह देने वाले) के रूप में काम करना चाहते हैं। उन्होंनेे तुरंत हां कह दिया। हर तीन से पांच मिनट में वह चिंतित लोगों के कॉल का जवाब देकर लोगों को अस्पतालों में भीड़ बढ़ाने से रोक रहे हैं। 6.शिखा मल्होत्रा पेशे से अभिनेत्री हैं। फिल्म ‘फैन’ में सहायक कलाकार के रूप में काम कर चुकी हैं। वे 27 मार्च के बाद से, वे मुंबई में ‘बाला साहेब ठाकरे ट्रॉमा केयर अस्पताल’ में आइसोलेशन वार्ड में बतौर नर्स सेवा दे रही हैं।7. ‘बिग बास्केट’ आपके लिए एक जाना माना नाम हो सकता है। लेकिन कुछ कम मशहूर एप्स भी हैं। जैसे ‘मायबास्केट’, जो चेन्नई स्थित एक स्टोर के मालिक महेश द्वारा बनाया गया एक एप है। शुरुआत में वे वॉट्सएप पर ऑर्डर ले रहे थे। मांग बढ़ने पर उन्होंने खुद की एप बनाने का निर्णय लिया। कोच्चि की ‘QBurst’ टेक्नोलॉजीज ने ‘PiQup’ एप बनाया है, जो लोगों को अपने इलाके में अपनी इच्छानुसार किसी भी दुकान में ऑर्डर देने और पिकअप के लिए टाइम चुनने की सुविधा देती है।फंडा यह है कि अब 3 मई तक लॉकडाउन का समय बढ़ गया है। ऐसे में कोरोना वायरस ‘खलनायक’ से लड़ने के लिए और भी ज्यादा ‘नायकों’ के लिए जगह बन गई है। क्या आप तैयार हैं? Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today More 'heroes' ready to fight 'villains' in Lockdown 2.0 Full Article
2 वैक्सीन नहीं आया तो सीजनल फ्लू बन सकता है कोविड-19, यानी हर साल लौटेगा; 2022 तक तो सोशल डिस्टेंसिंग रखनी ही होगी By Published On :: Sat, 18 Apr 2020 02:11:07 GMT महज दो महीने के भीतर ही चीन से निकलकर कोरोनावायरस पूरी दुनिया में फैल गया। 1.5 लाख लोगों की जान ले चुके कोरोनावायरस के डर से दुनिया की आधी से ज्यादा आबादी घर पर रहने को मजबूर है। अमेरिका जैसे ताकतवर देश भी इसके आगे बेबस हैं। लेकिन, बड़ा सवाल अब भी है कि ये महामारी खत्म कैसे होगी?कुछ दिन पहले अमेरिका के कोरोनावायरस टास्क फोर्स के डॉ. एंथनी फाउची ने कहा था कि इस बात की पूरी संभावना है कि कोरोना सीजनल फ्लू या मौसमी बीमारी बन जाए। अब ऐसी ही बात साइंस मैगजीनमें छपी हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की रिसर्च में भी सामने आई है। इस रिसर्च में कहा गया है, जब तक कोरोनावायरस का कोई असरदार इलाज या वैक्सीन नहीं मिल जाता, तब तक इस महामारी को खत्म करना नामुमकिन है। इसके मुताबिक, बिना वैक्सीन या असरदार इलाज के कोरोना सीजनल फ्लू बन सकता है और 2025 तक हर साल इसका संक्रमण फैलने की संभावना है।17 अप्रैल तक दुनियाभर में कोरोनावायरस के 22 लाख से ज्यादा मामले आ चुके हैं। जबकि, 1.50 लाख लोगों की मौत हुई है।कोरोना क्यों सीजनल फ्लू बन सकता है?सबसे पहले तो ये कि इस बीमारी का नाम कोविड-19 है, जो सार्स कोव-2 नाम के कोरोनावायरस से फैलती है। कोरोनावायरस फैमिली में ही सार्स और मर्स जैसे वायरस भी होते हैं। सार्स 2002-03 और मर्स 2015 में फैल चुका है। इसी फैमिली में दो ह्यूमन वायरस भी होते हैं। पहला: HCoV-OC43 और दूसरा : HCoV-HKU1।सार्स और मर्स जैसी महामारियों से जल्द ही छुटकारा मिल गया था। जबकि, HCoV वायरस हर साल सर्दियों के मौसम में इंसानों को संक्रमित करता है। इसी वायरस की वजह से सर्दी के मौसम में सर्दी-जुकाम होता है।दरअसल, किसी भी बीमारी से लड़ने में इम्यून सिस्टम मददगार होता है। किसी इंसान का इम्यून सिस्टम जितना स्ट्रॉन्ग होगा, वह किसी बीमारी से उतनी ही मजबूती से लड़ सकेगा। इसलिए जब हम बीमार होते हैं, तो हमारा शरीर उस बीमारी से लड़ने की इम्युनिटी बना लेता है और हम ठीक हो जाते हैं।अब दोबारा HCoV पर आते हैं। हर साल इंसानों को सर्दी के मौसम सर्दी-जुकाम होता है। इसका मतलब हुआ कि, इस वायरस से लड़ने के लिए इंसानों में इम्युनिटी शॉर्ट-टर्म के लिए ही डेवलप होती है। यही वजह है हर साल हमें सर्दी-जुकाम हो जाता है।इसी तरह से अगर सार्स कोव-2 से लड़ने की इम्युनिटी भी शॉर्ट-टर्म के लिए रही तो ये वायरस हमारे जीवन का हिस्सा बन सकता है और हर साल लौट सकता है। यानी, कोरोनावायरस या कोविड-19 के सीजनल फ्लू बनने की संभावना भी है।डब्ल्यूएचओ ने हाल ही में बताया है कि दुनियाभर में कोरोना की 70 वैक्सीन पर काम हो रहा है। जिसमें से 3 पर ह्यूमन ट्रायल भी शुरू हो चुका है।2025 तक भी रह सकती ये बीमारीहार्वर्ड यूनिवर्सिटी की स्टडी में पाया गया है कि अगर कोविड-19 को लेकर इम्युनिटी बन भी गई, तो भी इस बीमारी को पूरी तरह से खत्म होने में 2025 तक का समय लगेगा। हालांकि, इस बात की संभावना भी कम है क्योंकि, अकेले दक्षिण कोरिया में 111 लोग जो कोरोना से ठीक हो गए थे, वे दोबारा संक्रमित हुए हैं।कोरोना से निपटने के लिए ज्यादातर देशों में लॉकडाउन है और सोशल डिस्टेंसिंग जैसे तरीक अपना रहे हैं। लेकिन, वैज्ञानिकों का कहना है कि लॉकडाउन से भी कोरोना के संक्रमण को खत्म नहीं किया जा सकता है। उनके मुताबिक, लॉकडाउन लगाकर कोविड-19 के फैलने की रफ्तार को कुछ दिन के लिए कम कर सकते हैं या रोक सकते हैं, लेकिन जैसे ही लॉकडाउन खुलेगा, दोबारा इसका संक्रमण फैल सकता है। इसीलिए, जब तक कोविड-19 का कोई असरदार इलाज या वैक्सीन नहीं आ जाता, तब तक इससे बचने का एकमात्र तरीका है- सोशल डिस्टेंसिंग।हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में डिपार्टमेंट ऑफ इम्यूनोलॉजी एंड इन्फेक्शियस के रिसर्चर और इस स्टडी के लीड ऑथर स्टीफन किसलेर का मानना है कि कोविड-19 से बचने के लिए हमें कम से कम 2022 तक सोशल डिस्टेंसिंग बनानी होगी।टोटल लॉकडाउन नहीं, लेकिन डेढ़ साल तक कुछ प्रतिबंध जारी रखने होंगेअमेरिका की स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की शोधकर्ता एरिन मोर्डेकाई कहती हैं कि, 1918 में जब स्पैनिश फ्लू फैला था, तब अमेरिका के कुछ शहरों ने 3 से 8 सप्ताह तक लगी पाबंदी को अचानक हटा दिया था। इसका नतीजा ये हुआ था कि ये फ्लू कम समय में ही ज्यादा जगहों में फैल गया। स्पैनिश फ्लू से 50 करोड़ से ज्यादा लोग संक्रमित हुए थे, जबकि 5 करोड़ लोगों की मौत हुई थी।एरिन आगे कहती हैं किकोरोना के डर से हमें साल-डेढ़ साल के लिए पूरी तरह से लॉकडाउन रखने की जरूरत नहीं है,लेकिन12 से 18 महीनों तक हमें कुछ प्रतिबंध जारी रखने होंगे। Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today Coronavirus Vaccine | Harvard University Researchers Novel Coronavirus (COVID-19) Report Updates On How To Stop Global Spread OF Virus Over Coronavirus Vaccine Full Article
2 कोरोना के सबसे ज्यादा असर वाले 20 देशों में से भारत ने सबसे कम मामले रहते हुए लॉकडाउन लगाया, 6 देशों में अब तक टोटल लॉकडाउन नहीं By Published On :: Sat, 18 Apr 2020 12:31:26 GMT भारत में कोरोना का पहला मामला 30 जनवरी को आया था। 4 मार्च को इसके मरीजों की संख्या 7 से बढ़कर 29 हो गई थी। इसी दिन के बाद से केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों ने एहतियात के तौर पर कदम उठाने शुरू कर दिए। दिल्ली ने सबसे पहले स्कूल कॉलेज बंद किए। 10 मार्च को जब मामले दोगुने (60) हुए तो अलग-अलग राज्य सरकारों ने भी स्कूल-कॉलेजों बंद करने के आदेश जारी करदिए।15 मार्च आते-आते मरीजों की संख्या 100 पार हुई तो देश के धार्मिक स्थलों पर तालाबंदी होने लगी। 22 मार्च को पूरे देश में जनता कर्फ्यू लगाया गया और इसी दिन से देशभर के अलग-अलग शहरों में लॉकडाउन का ऐलान होने लगा। इसके बाद 25 मार्च से पूरे देश में ही लॉकडाउन कर दिया गया।कोरोना के सबसे ज्यादा असर वाले 20 देशों में से भारत ही ऐसा देश है, जिसने महज 500 मामले सामने आने के बाद ही टोटल लॉकडाउन कर दिया। प्रधानमंत्री मोदी का यह फैसला चौंकाने वाला था। न ही देश में और न ही बाहर किसी को उम्मीद थी कि 135 करोड़ से ज्यादा आबादी वाले देश में महज 536 मामले आने के बाद ही पूरे देश को लॉकडाउन कर दिया जाएगा।भारत के अलावा ऑस्ट्रिया, स्विट्जरलैंड और पुर्तगाल में भी 1000 मामले होते ही फौरन टोटल लॉकडाउन लगा दिया गया था। हालांकि इन देशों की जनसंख्या भारत की10% भी नहीं थी। समय रहते लॉकडाउन के बाद इन चारों देशों में हालात ठीक हैं, जबकि जिन देशों में लॉकडाउन लगाने में देरी हुई या जिनमें अब तक लॉकडाउन नहीं लगाया गया, वहां हालात काबू से बाहर है।20 सबसे ज्यादा प्रभावित देशों में से अमेरिका समेत 6 देशों में अब तक नेशनल लेवल का लॉकडाउन नहीं है। अमेरिका में कुल संक्रमितों की संख्या 7 लाख के करीब पहुंच गई है, मौतों का आंकड़ा भी यहां 35 हजार हो गया है। उधर, यूरोप के सबसे ज्यादा प्रभावित 5 देशों में 5-5 हजार मामले सामने आने के बाद लॉकडाउन लगाया गया था, वहां अब संक्रमण के लाखों मामले हैं। इन 5 देशों में मौतों का आंकड़ा 10-10 हजार से ज्यादा है।10 सबसे ज्यादा प्रभावित देशों में से 3 में अब तक टोटल लॉकडाउन नहीं1. अमेरिकास्टेटस: टोटल लॉकडाउन नहींपहला केस: 23 जनवरीकुल कोरोना संक्रमित : 6.8 लाख+, कोरोना से कुल मौतें: 33 हजार+लॉकडाउन से जुड़े कदम: 29 फरवरी को वॉशिंगटन के 2 स्कूलों को बंद किया गया। इसके बाद 5 मार्च को वॉशिंगटन के सभी स्कूलों को बंद कर दिया गया। 12 मार्च को ओरिगन राज्य में 250 से ज्यादा लोगों की भीड़ पर प्रतिबंध लगा। 13 मार्च को न्यूयॉर्क में 500 से ज्यादा लोगों की भीड़ पर पाबंदी लगी। इसके बाद 19 मार्च से लेकर 3 अप्रैल तक 17 राज्यों ने स्टे एट होम पॉलिसी लागू की। यहां लॉकडाउन का फैसला राज्यों पर छोड़ा गया है। नेशनल लेवल पर अब तक लॉकडाउन की घोषणा नहीं हुई है।अमेरिका में नेशनल लेवल पर लॉकडाउन नहीं है। अलग-अलग राज्यों और शहरों के एडमिनिस्ट्रेशन ने अपनी जरूरत के हिसाब से लॉकडाउन कर रखा है। तस्वीर अमेरिका के सिएटल शहर की है। यहां सड़कें इन दिनों खामोश हैं।2. स्पेनस्टेटस: टोटल लॉकडाउनपहला केस: 1 फरवरीकुल कोरोना संक्रमित: 1.8 लाख+ , कोरोना से कुल मौतें: 19 हजार+लॉकडाउन से जुड़े कदम: 14 मार्च से टार्गेटेड लॉकडाउन शुरू हुआ। 16 मार्च से सभी स्कूल, कॉलेज और एजुकेशन सेंटरों को बंद करने का आदेश दिया गया। 31 मार्च तक सभी गैरजरूरी सेवाओं और दुकानों को बंद कर दिया गया।तस्वीर स्पेन के मैड्रिड शहर की है। यहां लॉकडाउन के बीच रोजाना काम पर जाने वालों के लिए मेट्रो सर्विस चालू है।3. इटलीस्टेटस: टोटल लॉकडाउनपहला केस: 31 जनवरीकुल कोरोना संक्रमित: 1.7 लाख+, कोरोना से कुल मौतें: 22 हजार+लॉकडाउन से जुड़े कदम: 22 फरवरी को इटली के वेनेटो और लोम्बॉर्डी में कुछ शहरों को लॉकडाउन किया गया। इनके बाद उत्तरी हिस्से के कई शहरों में लॉकडाउन लगाया जाने लगा। 4 मार्च को सभी स्कूल और कॉलेज को बंद किया गया। इटैलियन फुटबॉल लीग सीरी-ए समेत सभी स्पोर्ट्स एक्टिविटी भी बंद कर दी गईं। 10 मार्च से टोटल लॉकडाउन लागू किया गया। फिलहाल यहां, 14 अप्रैल से स्टेशनरी और बुक स्टोर को खोला जाने लगा है।लॉकडाउन के बीच इटली के ज्यादातर शहरों में वॉलेंटियर्स ही लोगों के घरों तक खाना पहुंचा रहे हैं।4. फ्रांसस्टेटस: टोटल लॉकडाउनपहला केस: 24 जनवरीकुल कोरोना संक्रमित: 1.5 लाख+, कोरोना से कुल मौतें: 18 हजार+लॉकडाउन से जुड़े कदम: 29 फरवरी को 5 हजार से ज्यादा की भीड़ पर बैन लगाया। 16 मार्च से फ्रांस के सभी स्कूलों को बंद करने के आदेश दिए गए। इसके 2 दिन पहले ही बार, रेस्टोरेंट और सभी गैरजरूरी दुकानों और सेवाओं को बंद करने के आदेश आ चुके थे। 17 मार्च को फ्रांस ने अपनी सीमाएं भी सील कर लीं।फ्रांस में हर दिन कैबिनेट मीटिंग के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस होती है। यहां 11 मई तक लॉकडाउन को बढ़ा दिया गया है।5. जर्मनीस्टेटस: टोटल लॉकडाउनपहला केस: 27 जनवरीकुल कोरोना संक्रमित: 1.4 लाख+ , कोरोना से कुल मौतें: 4 हजार+लॉकडाउन से जुड़े कदम: 10 मार्च को जर्मनी के कई राज्यों ने 1000 से ज्यादा की भीड़ को बैन किया। 16 मार्च से स्कूलों को बंद करने के आदेश दिए गए। 20 मार्च को जर्मनी के सभी राज्यों ने सोशल इवेंट और हर छोटी-बड़ी भीड़ पर पाबंदी लगाई। 22 मार्च से देश में टोटल लॉकडाउन लागू हुआ।म्यूनिख के बीयर गार्डन में इन दिनों टेबलें खाली हैं।6. यूकेस्टेटस: टोटल लॉकडाउनपहला केस: 31 जनवरीकुल कोरोना संक्रमित: 1 लाख+ , कोरोना से कुल मौतें: 13 हजार+लॉकडाउन से जुड़े कदम: 21 मार्च को कुछ वेन्यू और बिजनेस को बंद करने को कहा गया। 23 मार्च से सभी स्कूल, कॉलेज बंद करने का ऐलान हुआ। 24 मार्च से टोटल लॉकडाउन लागू हुआ।मैनचेस्टर का एम-60 मोटरवे पर इन दिनों इक्का-दुक्का गाड़ियां नजर आती हैं।7. चीनस्टेटस: टोटल लॉकडाउन नहींपहला केस: 31 दिसंबर 2019कुल कोरोना संक्रमित: 83 हजार+, कोरोना से कुल मौतें: 4,500+लॉकडाउन से जुड़े कदम: 23 जनवरी को वुहान लॉकडाउन किया गया, इसके बाद हुबेई राज्य और फिर कई अन्य शहरों को भी लॉकडाउन किया गया। 9 फरवरी से कुछ और राज्यों में लॉकडाउन लागू किया गया। फिलहाल, 16 मार्च से यहां स्कूल खुलने लगे। हुबेई प्रांत को छोड़कर 90% लोग काम पर लौटे। 26 मार्च से वुहान शहर में भी कमर्शियल आउटलेट खुल रहे हैं।चीन का वुहान शहर 76 दिन तक लॉकडाउन रहा। 8 अप्रैल को यहां से लॉकडाउन हटा लिया गया।8. ईरानस्टेटस: टोटल लॉकडाउनपहला केस: 19 फरवरीकुल कोरोना संक्रमित: 78 हजार+ , कोरोना से कुल मौतें: 4,800+लॉकडाउन से जुड़े कदम: 22 फरवरी को किसी भी तरह के आर्ट और फिल्म से जुडे़ इवेंट कैंसिल किए गए। 24 फरवरी से स्पोर्टिंग इवेंट कैंसिल हुए और 1 मार्च से जुमे की नमाज बैन कर दी गई। 5 मार्च को सभी स्कूल, कॉलेज बंद कर दिए गए। 13 मार्च से लॉकडाउन लागू हुआ। ईरान रिवॉल्युशनरी गॉर्ड्स को सड़के और दुकानों को खाली कराने की जिम्मेदारी दी गई। फिलहाल यहां 11 अप्रैल से देश के बाहरी हिस्से में बिजनेस और कामकाज फिर से शुरू हुआ है।ईरान में लॉकडाउन के बीच जरूरी काम के लिए बाहर जाने की छूट है। तस्वीर तेहरान के तजरीस बाजार की है।9. तुर्कीस्टेटस: टोटल लॉकडाउन नहींपहला केस: 12 मार्चकुल कोरोना संक्रमित: 70 हजार+ , कोरोना से कुल मौतें: 1500+लॉकडाउन से जुड़े कदम: 16 मार्च को स्कूलों को बंद किया गया। कैफे, स्पोर्ट्स, एंटरटेनमेंट वैन्यू भी बंद किए गए। हाल ही में 11-12 अप्रैल को यहां कुछ शहरों में दो दिन का कर्फ्यू भी लगाया गया। यहां अभी तक टोटल लॉकडाउन नहीं है।तुर्की की राजधानी इस्तांबुल में दो दिन के कर्फ्यू लगने के पहले की तस्वीर। यहां 70 हजार से ज्यादा कोरोना मरीज होने के बावजूद अब तक लॉकडाउन नहीं किया गया है।10. बेल्जियमस्टेटस: टोटल लॉकडाउनपहला केस: 4 फरवरीकुल कोरोना संक्रमित: 35 हजार+ , कोरोना से कुल मौतें: 4800+लॉकडाउन से जुड़े कदम: 14 मार्च को स्कूलों को बंद करने का आदेश जारी किया गया। इसके साथ ही रेस्टोरेंट, जिम, सिनेमा और अन्य जगहें भी बंद किए गए। 18 मार्च से टोटल लॉकडाउन शुरू हो गया। भारत की तरह ही बेल्जियम ने भी कम मामले सामने आते ही टोटल लॉकडाउन लगाया।तस्वीर बेल्जियम के लाईग शहर के नेशनल थियेटर की है। बेल्जियम में कोरोना संक्रमण के 1000 से ज्यादा मामले होते ही लॉकडाउन लागू कर दिया गया था।(सोर्स: ऑक्सफोर्ड कोविड-19 गवर्मेंट रिस्पोंस ट्रैकर, जॉन हॉपकिंस कोरोनावायरस रिसोर्स सेंटर) Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today Coronavirus India US Italy | Coronavirus India Latest Update Vs Italy Spain USA Canda COVID-19 Cases Death from COVID-19 Virus Pandemic Full Article
2 लॉकडाउन से गंगा में मानव मल की मात्रा लक्ष्मण झूले के पास 47 और हरिद्वार में 25 प्रतिशत कम हुई By Published On :: Sun, 19 Apr 2020 11:03:37 GMT इन दिनों गंगा-यमुना के कई वीडियो सोशल मीडिया पर तैर रहे हैं। सुखद आश्चर्य के साथ लोग इन वीडियो में बता रहे हैं कि कैसे देश भर में हुए लॉकडाउन के बाद इन नदियों का पानी स्वतः ही बेहद साफ नजर आने लगा है। दिल्ली तक आते-आते जो यमुना पूरी तरह से गंदा नाला दिखने लगती है, इन दिनों फिर से नदी लगने लगी है। ऐसे ही गंगा भी इन दिनों इतनी साफ लगने लगी है कि ऋषिकेश-हरिद्वार तक तो उसके पानी को पीने योग्य बताया जाने लगा है।उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की हालिया रिपोर्ट बताती है कि ऋषिकेश के लक्ष्मण झूला क्षेत्र में इन दिनों गंगा के पानी में फ़ीकल कॉलिफोर्म (मानव मल) की मात्रा में 47 प्रतिशत की कमी आई है। वहीं ऋषिकेश में बैराज से आगे यह कमी 46 प्रतिशत, हरिद्वार में बिंदुघाट के पास 25 प्रतिशत और हर की पौड़ी पर 34 प्रतिशत दर्ज की गई है। इस रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है लॉकडाउन के दौरान हर की पौड़ी पा गंगा का पानी ‘क्लास-ए’ स्तर का हो चुका है। यानी इसे ट्रीट किए बिना ही सिर्फ़ क्लॉरिनेशन करके भी पिया जा सकता है।ऐसे में यह सवाल बेहद प्रासंगिक लगता है कि गंगा-यमुना सफ़ाई के नाम पर खर्च हो चुके हज़ारों करोड़ रुपए और तमाम सरकारी प्रयास जो नहीं कर सके, क्या लॉकडाउन ने नदियों को साफ करने का वो काम कर दिया है? इस सवाल के जवाब में ‘इंडिया वॉटर पोर्टल’ के संपादक केसर सिराज कहते हैं, ‘काफ़ी हद तक किया है। लेकिन इसके कई पहलू हैं। नदी के प्रदूषित होने के कई कारण हैं। ये कारण शहरों में अलग हैं और पहाड़ों में अलग। इनमें सबसे बड़े कारण कारख़ानों से निकलने वाले रसायनों का नदी में मिलना है और दूसरा बिना ट्रीट हुए मानव मल का इनमें मिलना। इन दिनों चूंकि पूरे देश में कारख़ाने हैं लिहाज़ा पानी का स्तर कुछ बेहतर हुआ है।’सेंट्रल पॉल्यूशन बोर्ड के डेटा के मुताबिक गंगा नदी के 36 मॉनिटरिंग यूनिट हैं जिनमें से 27 पर पानी नहाने और वाइल्ड लाइफ और फिशरीज के लिहाज से सुरक्षित है। (फोटो : 15 जनवरी 2020, गंगासागर मेला)हरिद्वार में स्थित ‘मातृ सदन’ गंगा को बचाने के लिए बीते कई दशकों से अभियान चला रहा है। इस अभियान में सदन से जुड़े स्वामी निगमानंद और प्रोफ़ेसर जीडी अग्रवाल समेत कई लोगों ने तो अपने प्राण तक त्याग दिए हैं। इस सदन के प्रमुख स्वामी शिवानंद कहते हैं, ‘लॉकडाउन के बाद गंगा का पानी कुछ हद तक साफ हुआ है। इससे एक बात तो यही स्पष्ट होती है कि सरकार जो दावा करती है कि हरिद्वार से ऊपर सिर्फ़ ट्रीट किया हुआ सीवेज ही गंगा में मिलता है, वह दावा झूठा है। इन दिनों क्योंकि यात्रा बंद है, पहाड़ पर पर्यटकों की भरमार नहीं है इसलिए अंट्रीटेड सीवेज गंगा में नहीं जा रहा और तभी ये पानी साफ नजर आ रहा है। लेकिन इसके बावजूद भी हरिद्वार में गंगा का पानी पीने लायक़ नहीं हुआ है। हम गंगा किनारे रहते हैं, इसलिए ये बात दावे से कह सकते हैं। जो वैज्ञानिक ये दावा कर रहे हैं मैं उन्हें चुनौती देता हूँ कि अगर गंगा का पानी पीने लायक़ हो गया है तो वे यहां आकर ये पानी पीकर दिखाएं।’स्वामी शिवानंद कुछ और महत्वपूर्ण पहलुओं का भी ज़िक्र करते हैं। वे कहते हैं, ‘गंगा या यमुना को एक पैसे की ज़रूरत नहीं है। वो ख़ुद को साफ करने में सक्षम है और यह बात इस लॉकडाउन ने काफ़ी हद तक साबित भी की है। हमें सिर्फ़ इतना करना है कि गंगा की अविरलता को बने रहने दिया जाए। लेकिन आप देखिए कि हरिद्वार पहुँचने से पहले ही गंगा को सैकड़ों जगह बांध दिया गया है। अलकनंदा, मंदाकिनी, भागीरथी जैसी गंगा की सभी धाराओं पर डैम बना दिए गए हैं तो उसकी अविरलता तो वहीं बाधित हो चुकी है। ऐसे में गंगा ख़ुद को साफ कैसे करेगी जब उसका प्रवाह ही रोक दिया जाएगा।’गंगा के मुक़ाबले यमुना इस लिहाज़ से ख़ुशक़िस्मत है कि उस पर जल विद्युत परियोजनाओं का ऐसा बोझ नहीं है। लेकिन यमुना जैसे ही पहाड़ों से मैदान में पहुँचती है, इसकी हत्या शुरू हो जाती है। डाक पत्थर नाम की जगह से ही यमुना पर बैराजों और नहरों का सिलसिला शुरू हो जाता है। यह स्थिति इतनी ख़राब हो चुकी है कि यमुना के नाम पर बसे यमुनानगर तक पहुँचने से पहले ही यमुना पूरी तरह मर चुकी होती है। इसकी मुख्यधारा का लगभग पूरा पानी नहरों में मोड़ दिया जाता है और तब सिर्फ़ कुछ नालों, बरसाती नदियों और छोटी-बड़ी धाराओं के साथ फैक्ट्रियों की गंदगी लिए जो कथित नदी आगे बढ़ती है, वह सिर्फ़ नाम की ही यमुना होती है।उफनते नाले सी दिखने वाली यमुना नदी शायद पहली बार नीले साफ पानी से लबालब नजर आई है, पहली बार यहां प्रवासी पक्षी और मछलियां दिखाई दी हैं। (फोटो : 5 अप्रैल 2020, आईटीओ ब्रिज, नई दिल्ली)साल 2000 में आई सीएजी की एक रिपोर्ट बताती है कि 1985 में शुरू हुआ ‘गंगा ऐक्शन प्लान’ 15 सालों में क़रीब 902 करोड़ रुपए खर्च करने के बाद भी अपना ये उद्देश्य पूरा नहीं कर पाया कि गंगा के पानी को नहाने लायक़ भी साफ किया जा सके। लगभग यही स्थित ‘यमुना ऐक्शन प्लान’ की भी है जिसके तीन चरणों में अब तक 1656 करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके हैं और नतीजा दिल्ली में बदबू मारती यमुना के रूप में सबके सामने है।यमुना जिए अभियान से जुड़े मनोज मिश्रा एक लेख में बताते हैं कि इतने सालों तक गंगा और यमुना सफ़ाई के नाम पर कारख़ानों से निकलने वाले रसायनों को अनदेखा किया गया जबकि ज़्यादा ध्यान सीवेज ट्रीटमेंट पर दिया गया। इन दिनों भी सीवेज तो हमेशा की तरह नदी में जा ही रहा है लेकिन कारख़ाने पूरी तरह बंद हैं और नदियों में पानी काफ़ी साफ दिख रहा है। इससे समझा जा सकता है कि नदियों को दूषित करने का बड़ा कारण क्या रहा है।मनोज मिश्रा इस तथ्य पर भी ध्यान दिलाते हैं कि इस साल अच्छी वर्षा होने के कारण नदियों में पानी ज़्यादा छोड़ा गया है। यह भी एक बड़ी वजह है कि लॉकडाउन के दौरान नदियाँ साफ दिख रही हैं क्योंकि उनमें प्रवाह ज़्यादा है।स्वामी शिवानंद कहते हैं, ‘गंगा हो यमुना हो या कोई भी नदी हो, उसमें ख़ुद को साफ रखने की क्षमता होती है। इन नदियों ने ही सभ्यताएँ बसाई हैं, सभ्यताओं ने नदियाँ नहीं। नदी को साफ़ करने की बात कहना सिर्फ़ ढोंग है और इस देश में तो भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा खेल है। नदियों को बस उनके प्राकृतिक बहाव के साथ अविरल बहने दिया जाए, बड़े बांध बनाकर उनका प्रवाह न रोका जाए, कारख़ानों और मानव मल के सीवेज उनमें न छोड़े जाएँ, वो ख़ुद ही साफ रह लेंगी रहेंगी और हम सबको जीवन भी देती रहेंगी। जिन्हें ये बात पहले नहीं समझ आती थी, इस लॉकडाउन में मिली झलक से समझ सकते हैं। नदियों को सफ़ाई के लिए पैसों की नहीं, नीयत की ज़रूरत है।’ Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today सेंट्रल पॉल्यूशन बोर्ड के डेटा के मुताबिक गंगा नदी के 36 मॉनिटरिंग यूनिट हैं जिनमें से 27 पर पानी नहाने और वाइल्ड लाइफ और फिशरीज के लिहाज से सुरक्षित है। (फोटो : 11 अप्रैल 2020, प्रयागराज) Full Article
2 कई गांव सील, किसान गन्ना भी नहीं काट पा रहे; जहां कटाई को मंजूरी, वहां मजदूर नहीं; चीनी मिलों पर 420 करोड़ रु. बकाया By Published On :: Wed, 22 Apr 2020 03:46:08 GMT (पारस जैन)बागपत जिले का औसिक्का गांव कोरोना संक्रमित जमातियों के मिलने के बाद से पूरी तरह सील है। खेतों में गन्ने, गेहूं और सरसों की फसल पककर तैयार है, लेकिन यह घर तक कैसे आएगी? इसका जवाब किसी के पास नहीं है। गांव के हर रास्ते पर बैरियर है। किसान और मजदूर खेतों पर भी नहीं जा रहे हैं।किसान मेहरपाल कहते हैं, ‘‘खेतों में गेंहू और गन्ने की फसल पक चुकी है, लेकिन अनुमति न मिलने के कारण फसलों को काट नहीं पा रहे। हम अपना खर्चा तो जैसे-तैसे चला भी लेंगे लेकिन अगले कुछ दिनों में पशुओं के लिए चारा कहां से लाएंगे, ये समझ नहीं आ रहा।’’किसान जयवीर ने अपने खेतों में गन्ने के साथ सरसों भी लगाया है। वे बताते हैं कि अब बस रात-दिन प्रशासनिक अधिकारियों से फसल काटने की गुहार लगा रहे हैं।औसिक्का की तरह ही बागपत जिले के कई ऐसे गांव हैं, जहां कोरोना संक्रमित जमाती मिले थे। ये सभी गांव अब पूरी तरह सील हैं। यहां भी गांववालों की समस्या एक जैसी ही है।जिन गांवों में सीलबंदी नहीं है, वहां भी हालात ज्यादा अलग नहीं है।मजदूर नहीं मिल रहे तो घर के ही लोग गन्ने की कटाई कर रहेबागपत के टिकरी गांव के जसबीर राठी सुबह-सुबह पूरे परिवार के साथ खेत पर आते हैं और एक से डेढ़ घंटे काम करने के बाद घर लौट जाते हैं। वे बताते हैं कि लॉकडाउन के कारण फसलें काटने के लिए न तो मशीन मिल रही है और न ही मजदूर। ऐसे में हम परिवार के साथ मिलकर ही खेतो में गन्ने और गेहूं की फसल काट रहे हैं।टिकरी के ही रहने वाले नरेश कहते हैं कि हम लोग गन्ना काट तो रहे हैं, लेकिन यह मिलों तक पहुंच भी पाएगा या नहीं, ये हम नहीं जानते। गेहूं को तो घरों में रखा भी जा सकता है लेकिन गन्ना नहीं काटा तो खेतों में सड़ जाएगा और काट लिया तो भी इस बार शायद इसे खेतों में ही सड़ते हुए देखना पड़े।निरपुडा गांव के रहने वाले बाबूराम कहते हैं कि किसानों को तो अब तक गन्ने का पुराना बकाया ही नहीं मिला। आज के हालात में तो हमें चीनी मिलों से हमारा पुराना पैसा मिल जाए, वही बहुत है। कम से कम उस पैसे से खेत मे दवा-बीज तो डाल देंगे।गन्ने की फसल 10 से 11 महीने की होती है। एक बार गन्ना काटने के बाद उसकी दोबारा बुआई नही की जाती, बल्कि जड़ों को छोड़ दिया जाता है। खाद, पानी देने से फिर फसल हो जाती है।चीनी मिलों पर गन्ना किसानों का 15 हजार करोड़ से ज्यादा बकायाहर साल गन्ना किसानों को चीनी मिलों से पैसा मिलने में देरी होती रही है, लेकिन लॉकडाउन के चलते इस बार देरी तो बढ़ी ही है, साथ ही बकाया भी बढ़ गया है। 14 अप्रैल तक उत्तर प्रदेश की 100 से ज्यादा मिलों पर गन्ना किसानों का कुल 15 हजार 686 करोड़ रुपए बकाया था। पिछले साल इस समय तक यह आंकड़ा 10 हजार करोड़ के आसपास था। अकेले बागपत जिले के गन्ना किसानों के ही चीनी मिलों पर 420 करोड़ रुपए बकाया हैं।नगद पैसा देने वाले कोल्हू भी बंद पड़े हैंआमतौर पर यहां किसान ज्यादातर गन्ना तो मिलों में पहुंचा देते हैं, लेकिन कुछ हिस्सा लोकल कोल्हू मशीन के जरिए गुड़ और खांदसारी शकर बनाने वालों को बेच देते हैं। ये लोग राज्य सरकार द्वारा जारी समर्थन मूल्य से कम कीमत पर किसान से गन्ना खरीदते हैं, लेकिन पैसा तुरंत दे देते हैं। इससे जरूरतमंद किसानों का काम चल जाता है।लॉकडाउन के चलते इन दिनों कोल्हूमशीनें भी बंद हैं। Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today इस साल देश में करीब 35 करोड़ मीट्रिक टन गन्ना पैदा होने का अनुमान। इसमें से 45% (15.76 करोड़ मीट्रिक टन) पैदावर सिर्फ उत्तर प्रदेश से। - सोर्स: शुगरकेन ब्रीडिंग इंस्टिट्यूट, कोयंबटूर Full Article
2 किसी ने कमरा किराए से लिया, तो किसी ने होटल को ही घर बनाया, सुबह 5 से रात 12 बजे तक काम पर लगी रहती हैं ये वीरांगनाएं By Published On :: Wed, 22 Apr 2020 08:10:03 GMT वो घर भी संभाल रही हैं औरड्यूटी भी निभा रही हैं। उन्हें अपने बच्चों की दिन-रात फ्रिक भी हैऔरकर्तव्य का अहसास भी। उनकी जिंदगी सुबह 5 बजे से शुरू होतीहै, जो रात में 12 बजे तक चलतीहै। इस दौरान ड्यूटी के साथ ही घर के भी तमाम काम उन्हें करना होते हैं। घर और बाहर दोनों की जिम्मेदारियों को पूरा कर रही इन वीरांगनाओं में सेकिसी ने खुद और परिवार को सुरक्षित रखने के लिएकिराए से कमरा लिया है तो किसी ने परिवार से दूरी ही बना ली। आज हम ऐसीही महिला पुलिसकर्मियों की कहानी सुना रहे हैं,जो खाकी वर्दी में न सिर्फ कोरोनावायरस को हराने में लगी हुई हैं, बल्कि इस मुश्किल दौर में अपने परिवार को भी संभाल रही हैं।भोपाल में महिला पुलिसकर्मियों के संघर्ष को बयां करती पांच कहानियां...ड्यूटी पर तैनात महिला पुलिसकर्मी।1. शीला दांगी, थाना कोतवालीआपका मौजूदा वक्त में घर में क्या रोल है?मेरा दिन सुबह 6.30 बजे से शुरू होता है। पहले बच्चे को नहलाती हूं। तैयार करती हूं। फिर खुद नहाती हूं। इसके बाद पीने का पानी भरना, पति और खुद का टिफिन तैयार करना, घर की साफ-सफाई करने जैसे तमाम छोटे-मोटे काम निपटाने होते हैं। हसबैंड 9 बजे ऑफिस के लिए निकल जाते हैं। उससे पहले उनका टिफिन तैयार करना होता है। मेरा बच्चा अभी 5 साल का है। उसे अकेला घर में नहीं छोड़ सकते। रोज ड्यूटी पर आते वक्त बच्चे को पति के ऑफिस में छोड़ते हुए आती हूं,क्योंकि उन्हें फील्ड में नहीं जाना होता। वे ऑफिस में ही रहते हैं। मैं फील्ड और ऑफिस दोनों जगह काम करती हूं। कई लोगों से मिलती-जुलती हूं। इसलिए बच्चे को अपने साथ नहीं ला सकती। शाम को 7 बजे ड्यूटी खत्म होने के बाद बच्चे को हसबैंड के ऑफिस से लेते हुए घर जाती हूं। क्योंकि हसबैंड 9 बजे तक घर आते हैं। घर पहुंचकर खुद सैनिटाइज होती हूं फिर बच्चे को सैनिटाइज करती हूं। यूनिफॉर्म वॉश करती हूं। बच्चे के कपड़े वॉश करती हूं। फिर लग जाती हूं रात का खाना तैयार करने में। हसबैंड के आने के बाद हम साथ खाना खाते हैं। सोते-सोते 12 बजे जाते हैं। 6 घंटे बाद दोबारा उठने की फ्रिक के साथ कुछ घंटे सुकून की नींद लेने की कोशिश करते हैं। अगले दिन फिर वही रूटीन।ड्यूटी पर क्या रोल होता है?मैं कोतवाली थाने में कॉन्स्टेबल हूं। कभी फील्ड में ड्यूटी करनी होती है, कभी थाने में काम करना होता है। फील्ड पर रहते हैं तो इधर-उधर जाने वालों को रोकते हैं। समझाते हैं। मास्क पहनने को बोलते हैं। कई बार लोग हम पर चिढ़ भी जाते हैं। हमें ही डांटने लगते हैं, फिर भी हम रिक्वेस्ट करते हैं कि हम ये सब आपकी भलाई के लिए कर रहे हैं। कई दफा गुस्सा भी आता है। तब हम भी लोगों पर भड़क जाते हैं। पर मकसद तो यही होता है कि कोई कोरोना का शिकार न हो। भीड़ न जमा हो बस।2. मीरा सिंह, 23 बटालियनघर में आपका रोल क्या होता है?मैं सुबह 5 बजे उठ जाती हूं। क्योंकि 7 बजे मुझे ड्यूटी पर पहुंचना होता है। सुबह के दो घंटे बेहद व्यस्त होते हैं। नहाना, सफाई और खाना तैयार करना। मेरे दो बच्चे हैं। आठ साल का बेटा और तेरह साल की बेटी। दोनों पिता के साथ घर में रहते हैं। मैं खुद का टिफिन लेकर निकलती हूं। हमें भोजन तो उपलब्ध करवाया जा रहा, पर संक्रमण के डर से बाहर का खाना नहीं खाती। ड्यूटी खत्म होने पर पहले घर नहीं जाती। किराये का कमरा ले रखा है। वहां जाकर नहाती हूं। यूनिफॉर्म वॉश करती हूं। खुद को सैनिटाइज करती हूं। तभी घर जाती हूं। हमें विभाग ने होटल में रहने की सुविधा दी है, पर होटल में रहने लगी तो बच्चे का घर पर ध्यान कौन रखेगा? उसे खाना-पीना कौन देगा? इसलिए जैसे कोरोनावायरस का मामला सामने आया हमने घर के पास ही किराये का एक कमरा ले लिया था। बच्चे और पति को सुरक्षित रखने के लिए ये जरूरी था।और काम के दौरान आपका रोल क्या होता है?हमारी ड्यूटी सुबह 7 से दोपहर 3 बजे तक चलती है। इस दौरान कई बार लोगों के गुस्से का सामना करना पड़ता है। जांच के लिए रोके जाने पर तो कई लोग धमकी देते हुए जाते हैं, कि देख लेंगे तुम्हें। महिलाएं बिना मास्क लगाए बच्चों को गाड़ी पर ले जाती हुई दिखती हैं, उन्हें रोको तो वो भी झगड़ पड़ती हैं। फील्ड पर रहने के दौरान लोगों के ऐसे बिहेवियर से कई बार गुस्सा भी आता है। लेकिन फिर लगता है कि सब तो परेशान ही हैं। हम हर किसी को समझाने का काम कर रहे हैं। तपती धूप में 8 घंटे तक खड़े रहना भी चुनौती है। हालांकि बीच-बीच में बैठ भी जाते हैं। छांव में भी चले जाते हैं, लेकिन लोगों को संभालना आसान नहीं होता। हर गाड़ी को चेक करना, समझाना, कागज देखना, मास्क पहनने को कहना, ये सब हमारी ड्यटी है।3. सुमन सिंह, 23 बटालियनअभी आप घर में क्या रोल अदा करती हैं?मैं सरकारी क्वार्टर में रहती हूं। अभी घर पर अकेली ही हूं, क्योंकि मां और भाई लॉकडाउन के चलते गांव में फंस गए हैं। मैं लॉकडाउन के पहले आ गई थी। अकेले रहना ठीक भी है, लेकिन अकेले रहने की चुनौतियां भी हैं। ड्यूटी सुबह 7 बजे से शुरू होती है। इसलिए 5 बजे से उठकरखाना तैयार करती हूं। चाय और नाश्ता भी घर से ही बनाकर लाती हूं, क्योंकि बाहर तो कुछ मिल नहीं रहा। मां फोन करती रहती हैं। वो कई बार रोने लगती हैंकि कब खत्म होगा कोरोना। तुम ठीक हो कि नहीं। टेंशन में ही रहती हैं। मेरे पास आना चाहती हैं, लेकिन आ नहीं सकती। ड्यूटी से आने के बाद घर की सफाई करती हूं। खुद को सैनिटाइज करती हूं। हर रोज कपड़े वॉश करती हूं। यूनिफॉर्म में प्रेस भी करना होता है। फिर डिनर तैयार करती हूं। सोते-सोते रात के 11 बज जाते हैं। अगली सुबह फिर से वही काम।और बाहर क्या रोल रहता है?मेरी ड्यूटी भोपाल चौराहे पर लगी है। चेकिंग में ड्यूटी है। दिनभर लोगों को समझाने और जांच करने में निकल जाता है। कई लोग सहयोग करते हैं और नियमों का पालन करते हैं। लेकिन कुछ लोग नियमों को नहीं मानते और हम पर ही गुस्सा निकालते हैं। ऐसे लोगों से भी डील करना होता है। जब से कोरोनावायरस आया है, तब से मन में डर भी हमेशा बना हुआ रहता है। फील्ड पर पूरे समय कपड़ा बांधकर ही रहते हैं। धूप में कपड़ा बांधकर खड़े होने से पसीना-पसीना हो जाते हैं, लेकिन कपड़ा हटा भी नहीं सकते, क्योंकि ऐसे में खतरा ज्यादा है। अभी जिंदगी बहुत चुनौतीपूर्ण चल रही है।4. सोनम सूर्यवंशी, यातायात थानाअभी घर में क्या रोल होता है?मैं अकेले रहती हूं। सुबह 7 बजे से दोपहर 3 बजे तक ड्यूटी रहती है। विभाग भोजन उपलब्ध करवा रहा है, पर मैं तो अपना खाना खुद बनाकर लाती हूं। ताकि संक्रमण का शिकार होने की रिस्क न रहे। सुबह 5 बजे उठ जाती हूं। नहाने के बाद खाना बनाती हूं। 7 बजे तक ड्य्टी पर आ जाती हूं। दोपहर 3 बजे ड्यूटी के बाद घर जाती हूं। पहले खुद को सैनिटाइज करती हूं। नहाती हूं। यूनिफॉर्म वॉश करती हूं। फिर घर की साफ-सफाई करके रात का खाना बनाती हूं। सोना साढ़े दस, ग्यारह बजे तक ही हो पाता है। मैंने पिछले साल ही पुलिस विभाग जॉइन किया है। मैं बैतूल की रहने वाली हूं। चिंता में घरवाले दिनभर फोन करके पूछते रहते हैं। उन्हें टेंशन रहता है कि मैं बाहर जा रही हूं। ड्यूटी पर हूं, ऐसे में किसी तरह का खतरा न हो।और बाहर क्या रोल होता है?26 मार्च से फील्ड ड्यूटी लगा दी गई थी। सब अलग-अलग प्वॉइंट पर चेकिंग कर रहे हैं। हमें देखना होता है कि, कौन-कहां जा रहा है। कोई फालतू तो नहीं घूम रहा। मैं मैथ्स से एमएससी करके पुलिस की फील्ड में आई हूं। लोगों को प्यार से समझाते हुए मैनेज कर लेती हूं। उन्हें बाहर निकलने के नुकसान और घर में रहने के फायदे बताती हूं। अधिकतर लोग समझ जाते हैं। कुछ लोग मिसबिहेव भी करते हैं। अब हम चालानी कार्रवाई भी शुरू कर चुके हैं। कुछ लोग अलग-अलग बहाने करके निकलने की कोशिश करते हैं। कोई कहता है पेट्रोल लेने जाना है, तो कोई कहता है राशन लेना है। हम सबसे यही रिक्वेक्ट कर रहे हैं कि घर से बाहर न निकलिए। आठ घंटे सड़क पर तपती धूप में नौकरी करना किसी चुनौती से कम नहीं होता। जब मौका मिलता है, तब थोड़ी देर के लिए बैठकर आराम कर लेते हैं।5. पल्लवी शर्मा, एमपी नगर थानाघर में क्या रोल होता है?मैं सीहोर की रहने वाली हूं। भोपाल में घर-परिवार का कोई नहीं है। यहां विभाग ने होटल में रुकने की व्यवस्था की है। किसी को घर नहीं जाना है, सिर्फ लोकल में जिनके परिवार हैं, वहीं लोग घर जाते हैं। मैं होटल के कमरे में ही रहती हूं। खाना भी विभाग जो उपलब्ध करवाता है, वहीं खाती हूं। घरवाले बहुत टेंशन में हैं। वे बार-बार फोन करते हैं। चिंता करते हैं, लेकिन हमें इस कठिन समय में अपनी ड्यटी भी करना है। मां को बहुत टेंशन रहता है। वो दिन में कई बार कॉल करती हैं, लेकिन ड्यूटी मेरे लिए पहले है।और बाहर क्या रोल होता है?सुबह 10 से शाम 6 बजे तक ड्यूटी पर रहती हूं। सबसे बड़ी चुनौती धूप में खड़े रहना ही है। एमपी नगर थाने के सामने वाले चौराहे पर मेरी ड्यूटी होती है। यह चौराहा भी थोड़ा ढलान में है, जिस कारण यहां पैर एकदम समतल नहीं होते। इस कारण रात में सोते वक्त बहुत दर्द देते हैं। हालांकि मैं अपने काम को बहुत एन्जॉय कर रही हूं। हम खाली सड़कों के फोटो लेते हैं। चाय पीते हुए सेल्फी लेते हैं। लोगों को प्यार से समझाते हैं। कई लोग चिढ़ते भी हैं। एक डॉक्टर साहब चिढ़ गए थे कि मैं यहां से रोज निकलता हूं, आप मुझे रोज रोकती हैं। अब हम किस-किस को पहचानें। हम लोगों को रोककर उनसे पूछताछ तो करना ही है। यही हमारा काम है। Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today (BHOPAL) Corona Warriors; Madhya Pradesh Women Police Playing an Important Role To Fight Against Coronavirus, Report Updates From Akshay Bajpai Full Article
2 मोदी ने 5 महीने में कोई विदेश यात्रा नहीं की, 6 साल में दूसरी बार ऐसा; 29 फरवरी से तो दिल्ली से बाहर भी नहीं गए By Published On :: Wed, 22 Apr 2020 12:26:59 GMT कोरोनावायरस को फैलने से रोकने के लिए दुनियाभर की सरकारें लॉकडाउन का तरीका अपना रही हैं। भारत में भी40 दिन का लॉकडाउन है, जिसका आज 29वां दिन है। पिछले करीब एक महीने से देश की 135 करोड़ की आबादी घर में कैद है। लेकिन, लॉकडाउन की वजह से सिर्फ आम लोग ही नहीं, जो कहीं आ-जा नहीं पा रहे। बल्कि, प्रधानमंत्री मोदी भी कहीं आ-जा नहीं पा रहे हैं।प्रधानमंत्री मोदी को विदेश से लौटे आज 5 महीने, 6 दिन हो चुके हैं। मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद 6 साल में ये दूसरी बार है, जब वे इतने लंबे समय तक देश में ही हैं।इससे पहले मोदी ने 2016-17 में 6 महीने तक कोई विदेश यात्रा नहीं की थी। उस समय मोदी 12 नवंबर 2016 को जापान से लौटे थे और उसके बाद 11 मई 2017 को श्रीलंका के दौरे पर गए थे। हालांकि, उस समय देश में चुनाव भी थे। मार्च 2017 में उत्तर प्रदेश समेत 5 राज्यों में चुनाव हुए थे।हर साल 10 से ज्यादा विदेशी यात्राएं करते हैं मोदीमोदी को प्रधानमंत्री बने करीब 5 साल 11 महीने हो चुके हैं। मोदी ने 26 मई 2014 को पहली बार और 30 मई 2019 को दूसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली।प्रधानमंत्री कार्यालय की वेबसाइट पर मौजूद जानकारी के मुताबिक, मोदी ने 2014 से लेकर अब तक 59 बार विदेश के लिए रवाना हुए हैं। इस दौरान उन्होंने 106 देश (इनमें 2 या उससे ज्यादा दौरे भी) की यात्रा की है। मोदी जब से प्रधानमंत्री बने हैं, तब से हर साल 10 से ज्यादा विदेशी यात्राएं करते हैं।दिसंबर 2018 में राज्यसभा में दिए जवाब में उस समय के विदेश राज्य मंत्री जनरल वीके सिंह ने प्रधानमंत्री के विदेश दौरे पर होने वाले खर्च का ब्योरा दिया था। इसके मुताबिक, 2018-19 तक मोदी की विदेश यात्रा पर 2,021.54 करोड़ रुपए खर्च हुए थे। इसके बाद मोदी ने 14 यात्राएं और कीं, जिसमें 90.70 करोड़ रुपए और खर्च हुए थे। हालांकि, इस खर्चमें प्रधानमंत्री के विमान के रखरखाव और हॉटलाइन का खर्चशामिल नहीं था।2017 में 5 राज्यों में चुनाव थे, इस बीच 6 महीने तक मोदी विदेश नहीं गए थेनवंबर 2016 से मई 2017 के बीच प्रधानमंत्री मोदी किसी भी विदेश दौरे पर नहीं गए थे। इसका एक कारण ये भी था कि, उस समय उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर में विधानसभा चुनाव भी थे। इन 5 राज्यों में मोदी ने नवंबर 2016 से लेकर मार्च 2017 के बीच 38 दौरे किए थे। इसमें से सबसे ज्यादा 27 दौरे अकेले उत्तर प्रदेश में किए थे। चुनाव में भाजपा ने यहां की 403 सीटों में से 325 सीटें जीती थीं। भाजपा 5 में से 4 राज्यों में सरकार बनाने में कामयाब रही थी। अकेले पंजाब में उसे सरकार गंवानी पड़ी थी।मोदी हर साल राज्यों के दौरे पर भी जाते हैं, लेकिन 29 फरवरी से दिल्ली में ही हैंप्रधानमंत्री मोदी आखिरी बार दिल्ली से बाहर 29 फरवरी को गए थे। इस दिन वे उत्तर प्रदेश के प्रयागराज और मध्य प्रदेश के चित्रकूट आए थे। प्रयागराज में वे सामाजिक आधिकारिता शिविर में शामिल हुए थे। जबकि, चित्रकूट में बुंदेलखंड एक्सप्रेस-वे का शिलान्यास करने और किसानों को किसान क्रेडिट कार्ड बांटने गए थे।भास्कर नॉलेज : चौधरी चरण सिंह ऐसे प्रधानमंत्री, जो किसी विदेशी दौरे पर नहीं गए पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने 68 देशों की यात्रा की थी। वे 1947 से 1962 तक प्रधानमंत्री रहे थे। उनकी पहली विदेश यात्रा 11 से 15 अक्टूबर 1949 को हुई थी। पहली विदेश यात्रा पर नेहरू अमेरिका गए थे। इंदिरा गांधी ने 15 साल के दौरान 116 देशों की यात्राएं की थीं। 5वें प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह (28 जुलाई 1979 से 14 जनवरी 1980 तक) ऐसे प्रधानमंत्री थे, जिन्होंने एक भी विदेशी दौरा नहीं किया था। अटल बिहारी वाजपेयी ने 48 देशों की यात्रा की थी। डॉ. मनमोहन सिंह ने अपने 10 साल के कार्यकाल में 93 देशों की यात्रा की थी। Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today Narendra Modi Latest News; Coronavirus | Coronavirus (COVID-19) Spread Latest Impact On PM Narendra Modi Foreign Trips Full Article
2 2.5 लाख हेक्टेयर में आम के बाग, 40 करोड़ के आम विदेश जाते हैं, इस बार आसपास की मंडियों में भी नहीं पहुंच पा रहे By Published On :: Fri, 24 Apr 2020 07:43:45 GMT मलीहाबादी... मलीहाबादी...। ये शब्द पढ़कर एक खास स्वाद आपको जरूर याद आया होगा। वह स्वाद, जिसके लिए गर्मजोशी से गर्मियों का इंतजार होता है। हर साल इन दिनों में चौक-चौराहे पर ये शब्द गूंजते रहते थे। लेकिन इसबार न ये शब्द सुनाई दे रहे हैं और न ही लोग इस आम की खास किस्म का स्वाद ले पा रहे हैं।उत्तरप्रदेश में करीब 2.5 लाख हेक्टेयर में आम के बाग हैं। लॉकडाउन के कारण इस बार ये सूने पड़े हैं। यहां मजदूर और कोरोबारीनजर नहीं आ रहे।हम मलीहाबाद में मैंगोमैन के नाम से मशहूर पद्मश्री कलीम उल्लाह खां के बाग में पहुंचे।कलीम प्रधानमंत्री मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ-साथ कई हस्तियों के नामों पर आम की किस्में ईजाद कर चुके हैं। वे बताते हैं किइस साल ज्यादा ठंड और फिर बारिश के कारण वैसे ही आम की पैदावार कम हुई है और जो हुई है वह भी मंडियों तक नहीं पहुंच पा रही है।मलीहाबाद के कलीम उल्लाह खां पद्मश्रीसे सम्मानित हैं। वे एक ही पेड़ पर आम की 350 किस्में उगा चुके हैं।कलीम कहते हैं कि लॉकडाउन के कारण मजदूर घर से निकल नहीं पा रहे हैं। बागों की चौकीदारी तक के लिए मजदूर नहीं मिल रहे हैं। पके आमजानवर खा रहे हैं। कहीं मजदूर मिल भी रहे हैं तोआम को मंडी तक ले जाने के साधन नहीं हैं। मंडी में भी खरीदार हो तो ले जाने का मतलब है। बाहर ही मांग नहीं है तो मंडी में व्यापारी आम खरीद कर क्या करेगा?ऑल इंडिया मैंगो ग्रोवर एसोसिएशन के अध्यक्ष इसराम अली कहते हैं कि यूपी से दशहरीआम समेत कईकिस्मों के आमकी सप्लाई मुंबई, पुणे जैसे बड़े शहरों की मंडियों में होती है, लेकिन इस बार ऐसा होना मुश्किल लग रहा है। अगर ऐसा ही रहा तो आम की सप्लाई 70 से 80 प्रतिशत तक कम होगी, यानी इतने प्रतिशत नुकसान होगा।यूपी के दशहरी, चौसा, लंगड़ा, फजली, मल्लिका, गुलाब खस और आम्रपाली आम की किस्में देशभर में मशहूरहैं।एग्रीकल्चर एंड प्रोसेस्ड फूड प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट डेवलपमेंट अथॉरिटी (एपीडा) के सदस्य शबीहुल खान बताते हैं कि पहले आम की फसल के लिए जनवरी से लेकर मार्च तक बुकिंग हो जाती थी, लेकिन इस बार अब तक एक भी बुकिंग नहीं है। खाड़ी देशों में लगभग 60 टन आम हर साल भेजा जाता है। हर साल बाहरी देशों में लगभग 40 करोड़ रुपए का आम निर्यात होता है, लेकिन इस बार किसानों को यह नुकसान झेलना पड़ सकता है। Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today Coronavirus uttar pradesh covid 19 lockdown mango business impact updates from lucknow, malihabad Full Article
2 सिक्किम में रोज 20 से 100 ट्रक चीन-तिब्बत से सामान लेकर आते थे, इसके बावजूद राज्य में एक भी कोरोना पॉजिटिव नहीं By Published On :: Fri, 24 Apr 2020 10:12:06 GMT चीन के जिस वुहान शहर से कोरोनावायरस निकला, वहां से करीब ढाई हजार किमी दूर है सिक्किम की राजधानी गंगटोक। जबकि, वुहान से 12 हजार किमी से भी ज्यादा दूर है अमेरिका का न्यूयॉर्क। एक तरफ वुहान से इतनी दूर स्थित न्यूयॉर्क में कोरोना के 1.5 लाख मरीज हैं। दूसरी तरफ, इतने पास होकर भी सिक्किम में कोरोना का एक भी मरीज नहीं है। देशभर में लॉकडाउन का एक महीना 25 अप्रैल को पूरा हो रहा है। इस मौके पर पढ़ें उस सिक्किम से रिपोर्ट जिससे तीन देशों की सीमा सटी है और इसके बावजूद वहां कोरोना का एक भी मरीज नहीं है...सिक्किम भारत का ऐसा राज्य है, जहां 23 अप्रैल तक कोरोना का एक भी केस नहीं मिला है। यहां, अब तक कोरोना के 81 संदिग्ध मिले तो थे, लेकिन सभी की रिपोर्ट निगेटिव आई। 7 लाख से ज्यादा की आबादी वाले सिक्किम नेकोरोना के खिलाफ लड़ाई जनवरी में उसी समय शुरू कर दी थी, जब कोरोना ने चीन समेत बाकी देशों में पैर पसारने शुरू ही किए थे। 28 जनवरी से ही यहां की सरकार ने राज्य के दो एंट्री पॉइंट- रंगपो और मेल्ली पर स्क्रीनिंग जरूरी कर दी थी।राज्य के मुख्यमंत्री पीएस गोले कहते हैं, ‘‘सख्त निगरानी की वजह से हम कोविड-19को रोकने में सफल रहे हैं। हम देश के एकमात्र राज्य हैं, जहां अब तक कोई मामला नहीं आया। ये सब हमारे वॉरियर्स और नागरिकों के प्रयासों से हुआ है।’’हालांकि, उन्होंने ये भी कहा कि अभी भी हमें सतर्क रहने की जरूरत है।नाथुला दर्रा। यहीं से कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए जाते हैं और यहीं से चीन-तिब्बत से ट्रेड भी होता है।तीन तरफ से दूसरे देशों से घिरा हुआ है सिक्किमतीन तरफ से हिमालय से घिरे हुए सिक्किम की उत्तरी सीमा तिब्बत, पश्चिमी सीमा नेपाल और पूर्वी सीमा भूटान से लगती है। जबकि, दक्षिणी सीमा पश्चिम बंगाल से लगती है। सिक्किम नाथुला के जरिए तिब्बत-चीन से एक ट्रेडिंग पोस्ट भी साझा करता है,जहां से रोजाना 20 से 100 ट्रक सीमा पार से आते हैं। इन ट्रकों से चावल, आटा, मसाले, चाय, डेयरी प्रोडक्ट और बर्तन आते हैं।पहाड़ी इलाका होने की वजह से यहां कोई रेलवे लाइन और स्टेशन भी नहीं है। यहां का पहला पाक्योंग एयरपोर्ट सितंबर 2018 में शुरू हुआ।सख्ती के बिना भी यहां लोगों ने लॉकडाउन का अच्छे से पालन किया। राज्य में सिर्फ जरूरी सेवा देने वाले ही घरों से निकल रहे थे।कोरोना से लड़ने के लिए सिक्किम ने क्या किया?1.पर्यटकों की एंट्री रोकी : सिक्किम को अपनी जीडीपी का करीब 8% टूरिज्म से मिलता है। सिक्किम टूरिज्म डिपार्टमेंट की 2018 की रिपोर्ट के मुताबिक, टूरिज्म सेराज्य को 2016-17 में 1.44 लाख से ज्यादा का रेवेन्यू मिला था।राज्य में सालाना 12 से 14 लाख विदेशी और घरेलू पर्टक आते हैं। इनमें से भी सबसे ज्यादा मार्च-अप्रैल में आते हैं। फिर भी यहां की सरकार ने 5 मार्च से विदेशी और 17 मार्च से घरेलू पर्यटकों की एंट्री पर रोक लगा दी थी। एक तरह से 17 मार्च से ही सिक्किम सेल्फ-क्वारैंटाइन में चला गया था। यहां घरेलू पर्यटकों के आने पर अक्टूबर तक रोक है। वहीं, विदेशी पर्यटकों की एंट्री पर भी इस साल के अंत तक रोक रहेगी। इसके साथ ही सिक्किम के नाथुल दर्रे के जरिए कैलाश मानसरोवर जाने का रास्ता भी बंद रहेगा।2.दूसरे राज्यों से लौटने वाले नागरिकों को क्वारैंटाइन किया : सिक्किम ने दूसरे राज्यों की तुलना में काफी पहले से ही संदिग्ध लोगों की निगरानी और स्क्रीनिंग शुरू कर दी थी। दूसरे राज्यों से सिक्किम लौट रहे राज्य के नागरिकों को सरकार के बनाए गए क्वारैंटाइन सेंटर में 14 दिन रखा गया। इनके अलावा, दूसरे राज्यों से लौटने वाले छात्रों को भी इन्हीं सेंटरों में 14 दिनों के लिए क्वारैंटाइन किया गया।दूसरे राज्यों में काम करने वाले और छात्र, जो सिक्किम लौटे थे, उन्हें 14 दिन क्वारैंटाइन किया गया था।3.लॉकडाउन का अच्छे से पालन किया : सिक्किम के लोगों ने सख्ती के बिना भी लॉकडाउन का अच्छे से पालन किया। यहां सिर्फ जरूरी सेवाएं ही चालू हैं। अगर लोग किराना या सब्जी खरीदने के लिए बाहर निकलते भी हैं, तो भी सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हैं। राज्य सरकार ने प्रवासी मजदूरों और रोजाना कमाने वाले कामगारों के साथ-साथ जरूरतमंदों की पहचान कर उन्हें चावल, आलू, तेल और जरूरी सामान भी बांटे हैं। Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today देश में कोरोना का पहला मामला 30 जनवरी को आया था। लेकिन, सिक्किम में 28 जनवरी से ही एंट्री पॉइंट पर स्क्रीनिंग जरूरी हो गई थी। Full Article
2 2004 की एक गलती ने 2013 में दस हजार लोगों की जान ली, पर सजा आज तक किसी को नहीं मिली By Published On :: Sun, 26 Apr 2020 11:10:29 GMT 16 साल पहले इन्होंने केदारनाथ से पहली रिपोर्ट की थीअगले हफ्ते केदारनाथ के कपाट खुलेंगे। कहते हैं करीब हजार साल पुराना है यह मंदिर। आदि शंकराचार्य ने बनवाया था। यह मंदिर उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले के इस शहर कीऐसी पहचान है कि उसी के नाम से जाना भी जाता है।सात साल पहले यानी 2013 में इस शहर ने सबसे बड़ी त्रासदी झेली थी। तब दस हजार लोगों की मौत हो गई थी। और कितने अब भी गायब बताए जाते हैं। दैनिक भास्कर के एडिटर लक्ष्मी पंत ने उस त्रासदी को कवर किया था। पर ऐसा होने वाला है, इसकी आशंका उन्होंने 2004 में अपनी एक रिपोर्ट में जता दी थी। 16 साल पुरानी उस पहली खबर से लेकर त्रासदी तक की कहानी उन्होंने ही बांची हैं...तो पढ़ें इसे...वह 15-16 जुलाई 2004 का खूबसूरत दिन था। सूरज घर के बरामदे में अच्छा लगने लगा था। काले और नमी से भरे बादल लंबी और सूखी गर्मी के खत्म होने का इशारा कर रहे थे। आप कह सकते हैं कि मानसून हिमालय में पहुंच गया था और अब पहाड़ की खूबसूरत तस्वीर एक स्वप्न की मानिंद हमारे सामने आने ही वाली थी। देहरादून घाटी में पहाड़ की कठिनाई और ऊंचाई तो नहीं है लेकिन उसकी आब-ओ-हवा बदस्तूर महसूस कर सकते हैं। दूसरे लफ्जों में शहर का शहर और पहाड़ का पहाड़।किसी से सुना है कि जिंदगी लकीरों और तकदीरों का खेल है। मेरे कलम की लकीरें, पहाड़ की पथरीली पगडंडियों से यूं ही नहीं जुड़ जातीं। पहाड़ और इससे मेरा कभी न खत्म होने वाला आकर्षण कोई इत्तेफाक नहीं है। बस यूं कहिए कि एक-एक वाकया और बात चुन-चुनकर लिखी और रखी गई है।पत्रकार के तौर पर चाहे वो देहरादून में रहते हुए एन्वायरमेंट और वैदर रिपोर्टिंगकरना हो या इसी जिम्मेदारी के रहते कपां देने वाली केदारनाथ त्रासदी की वैज्ञानिक भविष्यवाणी इसके घटने से दस साल पहले कर देना हो। आपको याद दिलाना जरूरी है कि केदारनाथ त्रासदी जून 2013 में हुई। इस हादसा में दस हजार से ज्यादा लोग मारे गए। कितने लापता हैं यह आज तक राज ही है।लेकिन एक दूसरा सच यह है कि तमाम रिसर्च और सूबतों के आधार पर मैंने 2004 में अपनी एक रिपोर्ट में इसकी भविष्यवाणी 2004 में ही कर दी थी। पत्रकार के तौर पर यह एक सनसनीखेज खुलासा था। लेकिन सरकारी व्यवस्था केदारनाथ मंदिर और अपने कामकाजी सम्मोहन में इस कदर लिप्त थी उसे मेरे सारे दस्तावेजी सच पूरी तरह झूठे ही लगे।और पूरी जिम्मेदारी से यह भी कह रहा हूं कि आप जिस वक्त या जिस भी कालखंड में केदारनाथ त्रासदी की इस कहानी से गुजरेंगे इसे पढ़ते वक्त त्रासदी की कराहऔर कराहकर रोते लाखों श्रद्धालुओं की चीखें आपको जरूर सुनाई देंगी।यह कहानी कुछ पुरानी जरूर है लेकिन आज भी बिलकुल ताजा। इसके एक-एक पात्र किसी दुराग्रह से नहीं गढ़े गए हैं। सभी सच के साक्षी हैं। कहानी का अनदेखा-अनजाना यह घटनाक्रम कुछ तरह है। हुआ यूं कि मैं उन दिनों दैनिक जागरण के देहरादून संस्करण में विशेष संवाददाता हुआ करता था। हिमालय और उसके ग्लेशियर मेरी जिंदगी का हिस्सा तो थे ही, अब रिपोर्टिंग का हिस्सा भी थे।वह तबाही मंदाकिनी के किनारे केदानाथ से लेकर 18 किमी दूर सोनप्रयाग तक सबकुछ बहाकर ले गई थी।इसी कारण जब भी मेरे सर्किल में किसी को पहाड़ से जुड़ी किसी हलचल की जानकारी मिलती, खबर मुझतक पहुंच जाती। मेरा काम होता उसकी जड़ तक पहुंचना और सच सामने लाना। इसी रौ में जब मुझे पता चला कि केदारनाथ के ठीक ऊपर स्थित चैराबाड़ी ग्लेशियर पर ग्लेशियोलॉजिस्ट की एक टीम रिपोर्ट तैयार कर रही है तो मेरी भी बेचैनी बढ़ गई। मैं देहरादून से ऊखीमठ और फिर गौरीकुंड होते हुए केदारनाथ जा पहुंचा।केदारनाथ से चैराबाड़ी ग्लेशियर की दूरी 6 किलोमीटर है। 8 जुलाई 2004 को जब मैं उस ग्लेशियर लेक के पास पहुंचा तो वहां मेरी मुलाकात वाडिया इंस्टीट्यूट के ग्लेशियोलॉजिस्ट डॉ. डीपी डोभाल से (अब वे यहां एचओडी हैं) हुई। डोभाल उस वक्त वहां उस झील की निगरानी के लिए अपने यंत्र इन्स्टॉल कर रहे थे। झील का जलस्तर 4 मीटर के आसपास रहा होगा।मैंने पूछा- जलस्तर नापने और ग्लेशियर के अध्ययन के मायने क्या हैं? डोभाल कुछ हिचकते हुए बोले- मंदिर के ठीक ऊपर होने के कारण चैराबाड़ी झील के स्तर से केदारनाथ सीधे जुड़ा है। यदि जलस्तर खतरे से ऊपर जाता है तो कभी भी केदारनाथ मंदिर और आसपास के इलाके में तबाही आ सकती है।लक्ष्मी प्रसाद पंत की यह रिपोर्ट 2 अगस्त 2004 को प्रकाशित हुई थी।मेरी जिज्ञासा डोभाल के जवाब से और बढ़ गई। मैंने पूछा कि क्या इतना पुराना मंदिर भी इस झील के सैलाब में बह सकता है? उनका जवाब था, हां। यह संभव है, लेकिन अभी तक झील का स्तर खतरनाक होने के प्रमाण नहीं मिले हैं। यदि यह 11 से 12 मीटर तक पहुंचता है तो जरूर खतरा होगा। उन्होंने बात संभालते हुए कहा- एवलांच तो इस इलाके के लिए आम हैं। ये कितने खतरनाक हो सकते हैं, किसी से छुपा नहीं है।यदि झील का स्तर बढ़ा तो एवलांच के साथ मिलकर यह किसी बम से भी ज्यादा खतरनाक असर वाला होगा। यूं समझिए कि बम के साथ बारूद का ढेर रखा है। बम फटा तो बारूद उसका असर कई गुणा बढ़ा देगा। मेरे माथे पर शिकन पड़ गई। खबर का कुछ मसौदा मिलता दिखाई दिया।अब मेरा सवाल था, इतना खतरा? फिर तो काफी दिन से निगरानी चल रही होगी? मेरे सीधे सवालों से लगातार परेशान हो रहे डोभाल ने झल्लाते हुए कहा- हां, 2003 से। इसके बाद उन्होंने मेरे बाकी सवाल अनसुने कर दिए। हकीकत यही है कि मेरा उनसे संपर्क इससे आगे नहीं बढ़ पाया।अब केदारनाथ के ठीक ऊपर पल रहे एक खतरे ने मुझे चौकन्ना कर दिया। फिर एक खबरनवीस के तौर पर खबर ब्रेक करने की बेचैनी कैसी रही होगी, आप समझ सकते हैं। जानकारी बेहद अहम थी। सवाल सिर्फ हिन्दू आस्था के एक बड़े तीर्थ केदारनाथ से ही नहीं, कई लोगों की जिंदगी से भी सीधे जुड़ा था। चैराबाड़ी ग्लेशियर झील की कुछ तस्वीरें लेकर मैं देहरादून पटेल नगर स्थित अपने दफ्तर लौट आया।केदारनाथ के खतरे और चैराबाड़ी ग्लेशियर की नाजुक स्थिति पर खबर लिखकर मैंने पहला ड्राफ्ट अपने संपादक अशोक पांडे को सौंपा। इसे पढ़कर वे भी चौंक गए। बोले, ग्लेशियर, झील और एवलांच कैसे केदारनाथ जैसे ऐतिहासिक मंदिर के लिए खतरा हो सकते हैं? मैंने इतना ही कहा, विशेषज्ञ ग्लेशियर झीलों पर जाकर 2003 से ग्राउंड स्टडी कर रहे हैं। डाटा इकठ्ठा किया जा रहा है। टीम बनी है। इतना सब कुछ किसी आधार पर ही कर रहे होंगे। मैं खुद उन्हें ये सब करते हुए देखकर आया हूं।जवाब मिला- लेकिन कोई कुछ बता क्यों नहीं रहा? प्रशासन को तो कोई जानकारी होगी? क्या सीएम या किसी मंत्री से कुछ पूछा? सबके वर्जन हैं या नहीं? मैं चुप था। मैंने समझाने की कोशिश की- सर। अगर बात इतनी आगे पहुंच गई तो खबर सबको मिल जाएगी। फिर मेरे वहां रातों रात जाने का क्या फायदा? अब मैंने अपनी पत्रकारीय जिम्मेदारी का हवाला देते हुए खबर छापने पर जोर दिया। केदारनाथ में कितना बडा खतरा पल रहा है इसके दस्तावेजी सबूत उनकी टेबल पर रखें।फिर भी लंबे तर्क-वितर्क हुए। खबर में कुछ काट-छांट भी। इसके बाद खबर छपने के लिए तैयार हुई। मामला चूंकि बड़ा था इसलिए पांडे जी ने कानपुर स्थित हैड ऑफिस में फोन कर जानकारी दे दी। अंत में, एक अगस्त के दिन फैसला हुआ कि खबर वाकई बड़ी है और फ्रंट पेज की लीड बनाई जाए।केदारनाथ से सिर्फ 2 किमी दूर चौराबाड़ी झील जो 400 मीटर लंबी, 200 मीटर चौड़ी और 20 मीटर गहरी थी, फटने से 10 मिनट में खाली हो गई।खबर छपने के बाद चैराबाड़ी झील तो खैर नहीं फटी, लेकिन मेरे ऑफिस में पूछताछ का एवलांच सा आ गया। वाडिया इंस्टीट्यूट के कार्यवाहक डायरेक्टर और भू-वैज्ञानिक ए के नंदा (डायरेक्टर प्रो. बीआर अरोड़ा उस वक्त छुट्टी पर थे) ने गुस्से में मुझे फोन किया। बौखलाहट में बोले- यह क्या छाप दिया है। आपको कुछ गलतफहमी है। हमारा कोई वैज्ञानिक चैराबाड़ी लेक पर गया ही नहीं है और न ही हम कोई ऐसी रिपोर्ट तैयार कर रहे हैं।एकबारगी तो मैं भी हैरान रह गया। मैंने कहा यह खबर दफ्तर में बैठकर नहीं लिखी है। झील पर होकर आया हूं। वही लिखा है जो मुझे आपके ही एक वैज्ञानिक डीपी डोभाल ने बताया है। न तो उन्होंने मेरी दलील सुनी और न यकीन किया। और तो और उन्होंने खबर के गलत और बेबुनियाद होने का एक लंबा-चैड़ा नोटिस भी इंस्टीट्यूट की ओर से भेज दिया। मुझ पर खंडन छापने के लिए दबाव डाला गया। इंस्टीट्यूट में आने के लिए भी मुझ पर पाबंदी लगा दी गई।पत्रकार जानते हैं कि जब किसी रिपोर्टर की खबर फ्रंट पेज की लीड खबर बनी हो और उसे गलत करार दे दिया जाए तो उस पर कितना दबाव रहता है। साथी पत्रकार भी टेढे-मेढे कयास लगाने लगते हैं। मेरे पास पर्याप्त सबूत और रिकॉर्डिंग्स होने के कारण खंडन तो नहीं छपा लेकिन मेरी इस खबर ने मुझ पर संदेह का एवलांच जरूर छोड़ दिया। जाहिर है, इंस्टीट्यूट ने सवाल-जवाब डोभाल से भी किए। मैंने भी बाद में उनसे मिलकर अपनी खबर पर बात करनी चाही कि आखिर इसमें गलत क्या था? जवाब तो नहीं मिला, लेकिन उन्होंने मुझसे दूरी जरूर बना ली। खबर से मची हलचल भी धीरे-धीरे थम गई। लेक की निगरानी कर रही टीम देहरादून लौट आई। प्रोजेक्ट रोक दिया गया।अक्टूबर 2004 में मैंने दैनिक जागरण देहरादून छोड़ दिया। खबर भी भुला दी गई। खुद पर उठे सवालों का जवाब देने की बेचैनी मन में ही बनी रही। मैं उत्तराखंड से राजस्थान, फिर कश्मीर और फिर राजस्थान आ गया। बेहतर से और बेहतर होने की यह यात्रा चलती रही। जिंदगी सिखाती रही, मैं सीखता रहा।समय के साथ बहुत कुछ बदला। बेहिसाब चुनौतियां भी आईं लेकिन कुछ चीजों की पहचान कभी खत्म नहीं हुई। देहरादून छोड़ने के नौ साल बाद 15-16 जून 2013 की अल-सुबह चैराबाड़ी का सच केदारनाथ की तबाही के तौर पर पहाड़ से नीचे उतरा। मेरी खबर के सच का खुलासा इस तरह होगा, मैंने कभी नहीं सोचा था।कुछ ऐसे कि इसने मुझे हिला दिया और दुनिया को भी। मैं दुखी था। दिल भी रो पड़ा। चांद की तरह गोल चैराबाड़ी झील पहाड़ों को भी खा गई। सब बहा ले गई। पीड़ा और उत्तेजना दोनों मुझ पर हावी होने लगे। आज मैं उस दिन को कोस रहा था जब इस खबर के सही होने की जिद पकड़े था। तब मैं चाहता था कि यह खबर सही हो, आज मुझे अपनी चाहत पर अफसोस और क्षोभ था। पत्रकार की जीत थी, मगर जीवन प्रकृति से हार गया था।2013 की घटना के बाद सेना के दस हजार जवान, 11 हेलिकॉप्टर, नौसेना के 45 गोताखोर और वायुसेना के 43 विमान यहां फंसे यात्रियों को बचाने में जुटे हुए थे।20 हजार लोगों को वायुसेना ने एयरलिफ्ट किया था।दुनिया छोटी है और गोल भी। 2004 में छोड़ी अपनी बीट पर जून 2013 में मैं फिर तैनात था। देहरादून जाकर डोभाल से मिला। मेरे जाने के बाद उनके साथ इस खबर के बारे में क्या-क्या हुआ मैं नहीं जानता। लेकिन तबाही के बाद एके नंदा ने डोभाल को फिर फोन किया और कहा- डोभाल तुम भी उस वक्त सही थे और पंत की वह खबर भी सही थी। ये स्वीकारोक्ति महज औपचारिक थी। खबर पर तो प्रकृति की निर्मम मुहर पहले ही लग चुकी थी।देहरादून सचिवालय में मेरी मुलाकात मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा (अब बीजेपी में शामिल) से भी हुई। मेरा सवाल था-दस हजार मौतों का जिम्मेदार कौन? क्या आपदा रोकी जा सकती थी? इस सवाल पर उनका जवाब था...यह इंसानी नहीं दैवीय आपदा है। डरपोक और कायर सरकारें अपनी नाकामी ऐसी ही छिपाती हैं।मैं चैराबाड़ी ग्लेशियरभी गया। जिस नीली झील को नौ साल पहले मैंने लबालब देखा था आज जैसे यहां किसी ने ट्रैक्टर चलाकर उसे सपाट कर दिया हो। झील नहीं यहां उसके अवशेषही शेष थे। केदारनाथ तबाही का ये एपिसेंटर उजाड़ और वीरान पड़ा था। तबाही ने मौत और जिंदगी सबके मायने बदल दिए थे। और क्या लिखा जाए। नंदा कुछ साल पहले रिटायर हो चुके हैं। डोभाल अब वाडिया में विभाध्यक्ष हैं और किसी और ग्लेश्यिर पर काम कर रहे हैं। लेकिन मुझे आज भी केदारनाथ त्रासदी का दर्द परेशान करता है। क्योंकि धूर्त और अंहकारी व्यवस्था के कारण चैराबाड़ी झील को पालने-पोसने की भारी कीमत केदारनाथ हादसे के रूप में पूरे देश ने चुकाई है।और हां, मैं यकीनी तौर पर कह सकता हूं कि आपदा के तीन अक्षर, आशाके दो अक्षरों पर भारी रहे हैं। और यह कहानी भरोसे के बनने की नहीं, भरोसे के टूटने की कहानी भी है।-लक्ष्मी प्रसाद पंत दैनिक भास्करराजस्थान के स्टेट एडिटर हैं। Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today साल के कुछ महीनों के लिए खुलनेवाले इस केदारनाथ मंदिर में 2013 में आई त्रासदी के वक्त पहली बार पूजा रोकी गई थी। Full Article
2 दुनियाभर में अवसाद और घबराहट के मरीज बढ़ रहे, 12% भारतीयों को भी कोरोना के डर से नींद नहीं आती: रिपोर्ट By Published On :: Tue, 28 Apr 2020 02:56:30 GMT संतोष कौर (65) पंजाब के फगवाड़ा की रहने वाली थीं। 4 अप्रैल को उन्होंने सुसाइड कर लिया। पुलिस का कहना हैकि उनके दिमाग मेंकोरोना संक्रमित होने का डर बैठ गया था। संतोषकी बेटी बलजीत कौर ने भी बतायाकि न्यूज चैनल देख-देख कर उन्होंने दिमाग में बैठा लिया था कि मुझे भी कोरोना हो गया है।यह महज एक मामला है। पिछले 2-3 महीनों में ऐसे कई मामले भारत और बाकी कोरोना प्रभावित देशों से आते रहे हैं। सुसाइड के मामले इतने ज्यादा तो नहीं हैं, लेकिन तनाव, घबराहट के मामले इतने आ रहे हैं कि इन्हें गिना नहीं जा सकता। कहीं कोराना संक्रमित होने के डर से लोगों में घबराहट और अवसाद बढ़ रहा हैतो कहीं लॉकडाउन के कारण लोगों की मानसिक हालत बिगड़ रही है। जिन लोगों को होम क्वारैंटाइन या क्वारैंटाइन सेंटरों में रखा गया है, वहां तो हालात और ज्यादा खराब है।कोरोना के इस दौर में लोगों को नींद नहीं आ रही है, वे डरे हुए हैं, उदास हैं और कहीं-कहीं गुस्से में भी हैं। डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट, अलग-अलग यूनिवर्सिटी की स्टडी और मेडिकल जर्नल में यह सामने आया है कि कोरोना और लॉकडाउन के चलते लोग अवसाद में जा रहे हैं। इससे निपटने के लिए अलग-अलग तरह की सलाहें भी दी जा रही हैं। डब्ल्यूएचओ ने तो लोगों को यह तक सलाह दे दी थी कि चिंता और घबराहट बढ़ाने वाली खबरों को देखना और पढ़ना बंद कर दें।भारत में कोरोना के 30 हजारमामले हैं। अन्य देशों के मुकाबले यहां मौतों का आंकड़ा (900) कम है। लेकिन लोगों में घबराहट बनी हुई है। एशियन जर्नल ऑफ सायकाइट्री में छपी एकस्टडी में भारतीय लोगों में डिप्रेशन की रिपोर्ट सामने आई थी। अप्रैल के पहले हफ्ते में 18 से ज्यादा उम्र के 662 लोगों पर हुई स्टडी में 12% लोगों का कहना था कि कोरोना के डर के कारण उन्हें नींद नहीं आती। 40% का कहना था कि महामारी के बारे में सोचते हैं तो दिमाग अस्थिर हो जाता है। 72% ने यह माना था कि उन्हें इस महामारी के दौर में खुद की और परिवार की बहुत ज्यादा चिंता होती है। 41% का कहना ये भी था कि जब ग्रुप में कोई बीमार होता है तो हमारी घबराहट बढ़ जाती है।भारत में 25 मार्च से लॉकडाउन है। फिलहाल 3 मई तक यह जारी रहेगा। इसके आगे भी बढ़ने के आसार हैं। तस्वीर नई दिल्ली के जंगपुरा इलाके की है।लॉकडाउन के पांचवे दिन (29 मार्च) स्वास्थ्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव लव अग्रवाल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि कोरोनावायरस के डर और लॉकडाउन के चलते लोगों के मानसिक और व्यवहारिक तौर-तरीकों में बदलाव की खबरें मिल रही हैं। इसे देखते हुए नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंस (निमहान्स) ने हेल्पलाइन नम्बर (08046110007) जारी किया है। अगर किसी को तनाव या घबराहट हो रही है तो इस टोलफ्री नम्बर पर कॉल कर आप डॉक्टरों से सुझाव ले सकते हैं।वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन की 2019 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 7.5% भारतीयों को किसी न किसी तरह का मानसिक रोग है और इनमें से 70% को ही इलाज मिल पाता है। इसी रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि 2020 में भारत की 20% जनसंख्या का मानसिक स्वास्थ्य ठीक नहीं होगा। महज 4000 विशेषज्ञों के लिए यह संख्या बहुत ज्यादा होगी।केरल में लॉकडाउन के 100 घंटे के अंदर 7 सुसाइड हुए थे। शराब न मिलने के कारण लोग सुसाइड कर रहे थे। इसके बाद राज्य सरकार ने शराब के आदी लोगों के लिए डॉक्टर से पर्ची लाकर शराब खरीदने की मंजूरी दी थी।अमेरिका में कोरोनावायरस से 55हजार से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं। यहां एक सर्वे के मुताबिक, 45% लोगों को महसूस हो रहा है कि कोरोना के कारण उनकी मानसिक स्थिति को नुकसान हुआ है। केजर फैमिली फाउंडेशन का यह सर्वे 25 से 30 मार्च के बीच हुआ था। इसी तरह वॉशिंगटन पोस्ट और एबीसी न्यूज पोल के के सर्वे में 77% अमेरिकी महिलाओं और 61% पुरुषों ने संक्रमण के डर से तनाव और घबराहट की बात कही थी। अमेरिका ने भी ऐसे मामलों की संख्या बढ़ने पर हेल्पलाइन नम्बर के साथ-साथ बच्चों, वयस्कों और बुजुर्गों के लिए अलग-अलग एक्टिविटीज कराने की एडवाइजरी जारी की थी।ब्रिटेन कोरोना से हुई मौतों के मामले में 5वेंनम्बर पर है। यहां भी लोगों में डिप्रेशन है लेकिन यह थोड़ा चौंकाने वाला है। यूनिवर्सिटी ऑफ शेफिल्ड और अल्सटर यूनिवर्सिटी की स्टडी के मुताबिक, लॉकडाउन के बाद यहां अचानक डिप्रेशन बढ़ा है। लॉकडाउन के दूसरे दिन 38% लोगों में डिप्रेशन और 36% लोगों में घबराहट की बात सामने आई थी। लॉकडाउन के ऐलान के एक दिन पहले तक ऐसे लोगों का प्रतिशत 16 और 17 था।अमेरिका के लुईसविले शहर के एंट्री पॉइंट पर पॉजिटिव मैसेज देता पोस्टर लगा हुआ है। घबराहट को दूर करने के लिए इस तरह के पोस्टर कई अमेरिकी शहरों में दिखाई दे रहे हैं।ब्रिटेन में 23 मार्च से लॉकडाउन है। 2 हजार लोगों पर यह स्टडी हुई थी। इस स्टडी में यह भी पाया गया था कि 35 से कम उम्र के लोगों में अवसाद और घबराहट सबसे ज्यादा था। ये वे लोग थे जिनकी इनकम बहुत कम थी या लॉकडाउन के बाद उनके पास पैसा आना पूरी तरह से बंद हो गया था। ब्रिटेन सरकार ने भी महामारी और लॉकडाउन के कारण मानसिक हालत को हो रहे नुकसान से बचाने के लिए मार्च के आखिरी हफ्ते में ऑनलाइन सपोर्ट और प्रैक्टिकल गाइड लाइन जारी की थी।चीन के वुहान से कोरोना दुनियाभर में फैल चुका है। ज्यादातर देशों की सरकारों ने इसके लिए लॉकडाउन को ही सबसे बड़ा उपाय माना है। कहीं सख्त लॉकडाउन है तो कहीं बहुत सारी छूट के साथ यह लागू है। एक अनुमान के मुताबिक, दुनिया की एक तिहाई जनसंख्या इन दिनों घरों में कैद है। इन्हें अपनी नौकरी जाने का डर है, खुद और परिवार के लोगों को कोरोना होने का डर है, किसी ने अपनो को खोया है, कोई क्वारैंटाइन में रहकर मानसिक रोगों का शिकार हो रहा है। अलग-अलग देशों की सरकारें लोगों में देखे जा रहे इस मानसिक अवसाद को दूर करने के लिए अपने-अपने स्तर पर कोशिशें कर रही हैं। इस क्रम में सबसे अच्छी कोशिश चीन में ही देखी गई थी। यहां सरकार ने सेल्फ क्वारैंटाइन के पहले फेज में ही वुहान शहर में सॉयकोलॉजिस्ट और सायकायट्रिस्ट की टीम को पहुंचा दिया था।यूरोपीय देश और अमेरिकी हॉस्पिटल्स में मरीजों और उनके परिवारों को अवसाद से निकालने के लिए गाना-बजाना होता रहता है।पहले की महामारियों के दौरान भी कई स्टडियों में अवसाद और घबराहट को देखा गया था। दुनिया के सबसे पुराने मेडिकल जर्नल “द लॉसेंट” 26 फरवरी को क्वारैंटाइन के सॉयकोलॉजिकल प्रभाव पर एक पेपर पब्लिश हुआ था। इसमें पुरानी महमारियों के रिसर्च पेपरोंं का रिव्यू कर बताया गया था कि अपने किसी खास साथी को खो देना, अपने अधिकारों का सीमित हो जाना, रोग की स्थिति और अनिश्चितिता और जिंदगी में आई उदासी के कारण लोगों में अवसाद, घबराहट और गुस्से के लक्षण आने लगते हैं। कई बार यह सुसाइड का कारण बन जाता है। पिछली महामारियों के दौरान लोगों ने इस तरह के क्वारैंटाइन पर केस भी फाइल किए थे।” Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today अमेरिका के फाल्स चर्च शहर का इनोवा फेयर फैक्स हॉस्पिटल। नर्स कोरोनावायरस के कारण आइसोलेशन में रह रहीं एक मरीज के साथ कांच के ग्लास पर मार्कर के जरिए टिक-टेक-टौ खेल रही हैं। क्वारैंटाइन पीरियड में लोगों का अवसाद दूर करने के लिए इस तरह के उपाय कई देशों में अपनाए जा रहे हैं। Full Article
2 भारत और न्यूजीलैंड में एक ही दिन लॉकडाउन लगा, लेकिन वहां कोरोना खत्म होने पर; 15 दिनों से वहां रोज 20 से भी कम मरीज आ रहे By Published On :: Wed, 29 Apr 2020 14:10:52 GMT भारत और न्यूजीलैंड दो देश। दोनों के बीच करीब 12 हजार किमी की दूरी। दोनों की आबादी में भी जमीन-आसमान का अंतर। एक तरफ भारत की आबादी 135 करोड़। दूसरी तरफ न्यूजीलैंड की आबादी करीब 50 लाख।भारत और न्यूजीलैंड दोनों ही देशों में कोरोना को फैलने से रोकने के लिए एक ही दिन लॉकडाउन लगाया गया। भारत में 25 मार्च से ही लॉकडाउन लागू है, तो वहीं न्यूजीलैंड में भी इसी दिन दोपहर 12 बजे से।दोनों ही देशों में लॉकडाउन लगे एक महीने हो चुके हैं। इस एक महीने में एक तरफ न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री जेसिंडा आर्डर्न ने दो दिन पहले कहा था किउनका देश कोरोनावायरस से लड़ाई जीत गया है। उनका कहना था कि हम इकोनॉमी खोल रहे हैं, लेकिन लोगों की सोशल लाइफ नहीं।दूसरी तरफ, भारत में 3 मई के बाद भी हॉटस्पॉट वाले इलाकों में लॉकडाउन बढ़ाने की तैयारी हो रही है। अभी देश में 170 से ज्यादा इलाके हॉटस्पॉट हैं।हालांकि, कोरोना से लड़ने में न्यूजीलैंड को अपनी कम आबादी और ज्योग्राफी का भी फायदा मिला। पिछले 15 दिन से वहां रोज 20 से कम ही मरीज आ रहे हैं। 28 अप्रैल तक वहां 1472 केस आ चुके हैं, जिसमें से अब सिर्फ 239 केस ही एक्टिव हैं,जबकि19 लोगों की मौत हुई है। जबकि, भारत में कोरोना संक्रमितों का आंकड़ा 31 हजार के पार पहुंच गया है। यहां अब तक 1 हजार से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है।फरवरी में ही चीन से आने वाले यात्रियों की एंट्री पर रोकन्यूजीलैंड में कोरोना का पहला मरीज 28 फरवरी को मिला था। लेकिन, उससे पहले से ही सरकार ने इससे निपटने की तैयारियां शुरू कर दीं।3 फरवरी से ही सरकार ने चीन से न्यूजीलैंड आने वाले यात्रियों की एंट्री पर रोक लगा दी थी। हालांकि, इससे न्यूजीलैंड के नागरिकों और यहां के परमानेंट रेसिडेंट को छूट थी। इसके अलावा, जो लोग चीन से निकलने के बाद किसी दूसरे देश में 14 दिन बिताकर आए, उन्हें ही न्यूजीलैंड में आने की इजाजत थी।इसके बाद 5 फरवरी को ही न्यूजीलैंड ने चीन के वुहान में फंसे अपने यात्रियों को चार्टर्ड फ्लाइट से देश लेकर आ गई। इनमें 35 ऑस्ट्रेलियाई नागरिक भी थे। इन सभी लोगों को आर्मी के बनाए क्वारैंटाइन सेंटर में 14 दिन रखा गया।इसके अलावा, न्यूजीलैंड में 20 मार्च से ही विदेशी नागरिकों की एंट्री पर रोक लगा दी थी, जबकिभारत में 25 मार्च से अंतरराष्ट्रीय उड़ानें बंद हुईं।ये तस्वीर न्यूजीलैंड के ऑकलैंड शहर की है। सोमवार से ही यहां पर लॉकडाउन में थोड़ी ढील देकर लेवल-3 लागू किया गया है।4-लेवल अलर्ट सिस्टम बनाया, बहुत पहले ही लॉकडाउन लगाया23 मार्च को न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री जेसिंडा आर्डर्न ने देश को संबोधित किया। उन्होंने कहा, ‘हमारे देश में अभी कोरोना के 102 मामले हैं। लेकिन, इतने ही मामले कभी इटली में भी थे।' ये कहने का मकसद एक ही था कि अभी नहीं संभले तो बहुत देर हो जाएगी।’वहां की सरकार ने कोरोना से निपटने के लिए 4-लेवल अलर्ट सिस्टम बनाया। इसमें जितना ज्यादा लेवल, उतनी ज्यादा सख्ती, उतना ज्यादा खतरा।21 मार्च को जब सरकार ने इस अलर्ट सिस्टम को इंट्रोड्यूस किया, तब वहां लेवल-2 रखा गया था। उसके बाद 23 मार्च की शाम को लेवल-3 और 25 मार्च की दोपहर को लेवल-4 यानी लॉकडाउन लगाया गया। सोमवार से वहां लेवल-4 से लेवल-3 लागू कर दिया गया है। 25 मार्च से लेकर अभी तक दोनों ही देशों में लॉकडाउन है। न्यूजीलैंड में जब लॉकडाउन लगा तब वहां कोरोना के 205 मरीज थे और भारत में जब लॉकडाउन लगा, तब यहां 571 मरीज थे।कोरोना पॉजिटिव मरीजों की कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग कीन्यूजीलैंड में अगर कोई व्यक्ति कोरोना पॉजिटिव मिलता, तो वहां की सरकार 48 घंटे के अंदर उसकी कॉन्टेक्ट ट्रेसिंग भी करती है। यानी, किसी व्यक्ति के कोरोना पॉजिटिव मिलने पर उसके सभी करीबी रिश्तेदारों-दोस्तों को कॉल किया जाता था और उन्हें अलर्ट किया जाता था।ऐसा इसलिए ताकि लोग खुद ही टेस्ट करवा लें या सेल्फ-क्वारैंटाइन में चले जाएं।ये तस्वीर न्यूजीलैंड के क्राइस्टचर्च शहर की है। यहां महीनेभर बाद मंगलवार को फिर कंस्ट्रक्शन साइट पर मजदूर दिखाई दिए।लॉकडाउन तोड़ने वालों पर सख्ती, तुरंत एक्शन25 मार्च को लॉकडाउन लागू होने के बाद भी कुछ लोग घरों से बाहर निकल रहे थे। इनमें ज्यादातर यंगस्टर्स थे। इस पर प्रधानमंत्री जेसिंडा आर्डन ने समझाइश दी कि देश में कोरोना के ज्यादातर मामले 20 से 29 साल के लोगों में आ रहे हैं। अगर आप घर से बाहर निकलेंगे तो आपको कोरोना होने के चांस ज्यादा हैं।31 मार्च कोरेमंड गैरी कूम्ब्स नाम का व्यक्ति लोगों पर थूक रहा था। उसने इसका वीडियो बनाकर फेसबुक पर शेयर भी किया। उसके बाद 4 अप्रैल को भी वह ऐसा ही कर रहा था। अगले ही दिन पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया। और उसके अगले दिन कोर्ट ने उसे जेल भेज दिया। हालांकि, बाद में उसे जमानत मिल गई। कूम्ब्स की सजा पर 19 मई को फैसला होना है।न्यूजीलैंड पुलिस के मुताबिक, 28 अप्रैल तक 5 हजार 857 लोगों ने लॉकडाउन के नियमों का उल्लंघन किया। इनमें से 629 लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया गया। जबकि, 5 हजार 41 लोगों को वॉर्निंग देकर छोड़ दिया गया। Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today Coronavirus India Lockdown Vs New Zealand Comparison Update, COVID-19 News; Total Corona Cases and Death From Virus Pandemic Full Article
2 लॉकडाउन में निकले मजदूरों की कहानी: कोई 25 दिन में 2800 किमी सफर कर घर पहुंचा, तो किसी ने रास्ते में ही दम तोड़ा By Published On :: Fri, 01 May 2020 02:04:38 GMT देश में कोरोना के चलते अचानक लगाया लॉकडाउन प्रवासी मजदूरों पर सबसे ज्यादा भारी पड़ा है। उन्हें जब ये पता चला की जिन फैक्ट्रियों और काम धंधे से उनकी रोजी-रोटी का जुगाड़ होता था, वह न जाने कितने दिनों के लिए बंद हो गया है, तो वे घर लौटने को छटपटाने लगे।ट्रेन-बस सब बंद थीं। घर का राशन भी इक्का-दुक्का दिन का बाकी था। जिन ठिकानों में रहते थे उसका किराया भरना नामुमकिन लगा। हाथ में न के बराबर पैसा था। और जिम्मेदारी के नाम पर बीवी बच्चों वाला भरापूरा परिवार था। तो फैसला किया पैदल ही निकल चलते हैं। चलते-चलते पहुंच ही जाएंगे। यहां रहे तो भूखे मरेंगे।कुछ पैदल, कुछ साइकिल पर तो कुछ तीन पहियों वाले उस साइकिल रिक्शे पर जो उनकी कमाई का साधन था।जो फासला तय करना था वह कोई 20-50 किमी नहीं बल्कि 100-200 और 3000 किमी लंबा था।1886 की बात है। तारीख 1 मई थी। अमेरिका के शिकागो के हेमोर्केट मार्केट में मजदूर आंदोलन कर रहे थे। आंदोलन दबाने को पुलिस ने फायरिंग की, जिसमें कुछ मजदूर मारे भी गए। प्रदर्शन बढ़ता गया रुका नहीं। और तभी से 1 मई को मारे गए मजदूरों की याद में मजदूर दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।आज फिर 1 मई आई है। इस बार थोड़ी अलग भी है। इसलिए, मजदूर दिवस पर लॉकडाउन में फंसे, पैदल चले और अपनी जान गंवा बैठे प्रवासियों के संघर्ष और सफर की पांच कहानियां -ये तस्वीर 27 मार्च की दिल्ली-यूपी बॉर्डर की है। लॉकडाउन लगने के दो दिन बाद ही प्रवासी मजदूर बच्चों को कंधे पर बैठाकर पैदल ही घर के लिए निकल पड़े थे।पहली कहानी : मुंबई से 500 दूर उप्र सिर्फ बिस्किट खाकर निकले थे, घर तो पहुंचेलेकिन मौत हो गईउत्तर प्रदेश के श्रावस्ती जिले का इंसाफ अली मुंबई में एक मिस्त्री का हेल्पर था। लॉकडाउन की वजह से काम बंद हुआ तो घर पहुंचने की ठानी। इंसाफ 13 अप्रैल को मुंबई से यूपी के लिए निकल पड़ा। 1500 किमी के सफर में ज्यादातर पैदल ही चला। बीच-बीच में अगर कोई गाड़ी मिल जाती, तो उसमें सवार हो जाता।जैसे-तैसे 14 दिन बाद यानी 27 अप्रैल को इंसाफ अपने गांव मठकनवा तो पहुंच गया, लेकिन वहां क्वारैंटाइन कर दिया गया। उसी दिन दोपहर में इंसाफ की मौत हो गई। पत्नी सलमा बेगम का कहना था कि इंसाफ ने उसे फोन पर बताया था कि वह सिर्फ बिस्किट खाकर ही जिंदा है।ये तस्वीर भी 27 मार्च की दिल्ली-यूपी बॉर्डर के पास एनएच-24 की है। प्रवासी मजदूरों की जो भीड़ शहरों से अपने गांव की तरफ जा रही थी। उनमें छोटे-छोटे बच्चे भी थे।दूसरी कहानी : 1400 किमी दूर घर जाने के लिए पैदल निकला, 60 किमी बाद दम तोड़ दियामध्य प्रदेश के सीधी के मोतीलाल साहू नवी मुंबई में हाउस पेंटर का काम करते थे। जब देश में पहला लॉकडाउन लगा तब तक मोतीलाल मुंबई में ही रहे। लेकिन, दूसरे फेज की घोषणा होने के बाद 24 अप्रैल को वे पैदल ही घर के लिए निकल पड़े। उनका घर नवी मुंबई से 1400 किमी दूर है।मोतीलाल के साथ 50 और प्रवासी मजदूर भी थे। मोतीलाल खाली पेट ही चल पड़े थे। उन्होंने 60 किमी का सफर तय किया ही था कि रास्ते में ठाणे पहुंचते ही उनकी मौत हो गई। उनके परिवार में पत्नी और तीन बेटियां हैं और बड़ी मुश्किल से घर का गुजारा हो पाता है।तीसरी कहानी : दिल्ली से 1100 किमी दूर बिहार जा रहे थे, आधे रास्ते पहुंच बेहोश होकर गिर पड़े, मौत हो गईबिहार के बेगूसराय के रहने वाले रामजी महतो दिल्ली से अपने घर के लिए पैदल ही निकल पड़े। दिल्ली से बेगूसराय के बीच की दूरी 1100 किमी है। उन्होंने 850 किमी का सफर तय भी कर लिया था। रामजी 3 अप्रैल को दिल्ली से निकले, लेकिन 16 अप्रैल को यूपी के वाराणसी में बेहोश होकर गिर पड़े। उन्हें एंबुलेंस में चढ़ाया ही था कि उन्होंने दम तोड़ दिया।जिन घर वालों के पास पहुंचने के लिए रामजी बिना कुछ सोचे-समझे पैदल ही निकल पड़े थे, उन घर वालों के पास इतने पैसे भी नहीं थे कि वे वाराणसी जाकर रामजी का शव ले सकें और उनका अंतिम संस्कार कर सकें। बाद में वाराणसी पुलिस ने ही उनका अंतिम संस्कार किया।ये तस्वीर 30 मार्च की मुंबई-अहमदाबाद हाईवे की है। इसी रास्ते से पालघर में मजदूरी करने वाला एक मजदूर अपने पूरे परिवार के साथ भूख-प्यास की चिंता किए बगैर घर की ओर लौट रहा है।चौथी कहानी : 300 किमी जाना था, 200 किमी चलने के बाद पुलिस के मुताबिक हार्टअटैक से मौत हो गई39 साल के रणवीर सिंह मध्य प्रदेश के मुरैना के बादफरा गांव के रहने वाले थे। तीन साल पहले पत्नी और तीन बच्चों की परवरिश के लिए दिल्ली आ गए। यहां आकर एक रेस्टोरेंट में डिलीवरी बॉय का काम भी किया। लेकिन, लॉकडाउन की वजह से सब काम बंद हो गया। इससे रणवीर दिल्ली से मुरैना के लिए पैदल ही निकल गए।दिल्ली से उनके गांव तक की दूरी 300 किमी के आसपास थी। वे 200 किमी तक चल भी चुके थे, लेकिन 28 मार्च को रास्ते में ही आगरा पहुंचते ही उनकी मौत हो गई। उनके घरवालों का कहना था कि रणवीर की मौत भूख-प्यास से हुई है। जबकि, पुलिस का कहना था कि पोस्टमार्टम के मुताबिक, उनकी मौत हार्ट अटैक से हुई है।पांचवी कहानी : 25 दिन में 2800 किमी का सफर तय कर गुजरात से असम पहुंचे जादवपैदल घर जाने वालों में एक नाम जादव गोगोई का भी है। वे असम के नागांव जिले में रहते हैं। लेकिन, मजदूरी गुजरात के वापी शहर में करते हैं। लॉकडाउन लगने के बाद 27 मार्च को जादव वापी से अपने घर आने के लिए निकल पड़े। 25 दिन में 2800 किमी का सफर तय करने के बाद, 19 अप्रैल को आखिरकार जादव अपने घर पहुंच ही गए।46 साल के जादव चार हजार रुपए लेकर वापी से निकले थे। कभी पैदल तो कभी ट्रक वालों से लिफ्ट भी ली। ऐसा करते-करते बिहार तक आ गए। बिहार से फिर पैदल ही असम भी पहुंच गए। Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today Labour Day 2020/Majdur Diwas | Latest Story On Migrant Workers Travel Death Due To Coronavirus Lockdown Full Article
2 भारत में हर 10 कैंसर मरीजों में से 7 की मौत हो जाती है, यहां एक डॉक्टर पर 2000 मरीजों का बोझ होता है By Published On :: Fri, 01 May 2020 06:59:00 GMT पिछले दो दिनों में बॉलीवुड ने अपने दो बेहतरीन कलाकार खो दिए। दोनों को वह बीमारी थी, जो दुनिया की हर छठीमौत का कारण बनती है।ऋषि कपूर को ब्लड कैंसर था और इरफान खान को ब्रेन कैंसर। दोनों का इलाज देश में भी चला और विदेश में भी, लेकिन इलाज के 2 साल के अंदर ही दोनों की मौत हो गई।हर साल देश और दुनिया में कैंसर से लाखों मौत होती हैं। डबल्यूएचओ के एक अनुमान के मुताबिक, 2018 में कैंसर से कुल 96 लाख मौतें हुईं थीं। इनमें से 70% मौतें गरीब देश या भारत जैसे मिडिल इंकम देशों में हुईं। इसी रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में कैंसर से 7.84 लाख मौतें हुईं। यानी कैंसर से हुईं कुल मौतों की 8% मौतें अकेले भारत में हुईं।जर्नल ऑफ ग्लोबल ऑन्कोलॉजी में 2017 पब्लिश हुईएक स्टडी के मुताबिक, भारत में कैंसर से मरने वालों की दर विकसित देशों से लगभग दोगुनी है। इसके मुताबिक भारत में हर 10 कैंसर मरीजों में से 7 की मौत हो जाती है जबकि विकसित देशों में यह संख्या 3 या 4 है। रिपोर्ट में इसका कारण कैंसर का इलाज करने वाले डॉक्टरों की कमी बताया गया था। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 2000 कैंसर मरीजों पर महज एक डॉक्टर है। अमेरिका में कैंसर मरीजों और डॉक्टरों का यही रेशियो 100:1 है, यानी भारत से 20 गुना बेहतर।कम डॉक्टर होने के बावजूद भारत में कैंसर के कई बड़े अस्पताल हैं, जहां स्पेशलिस्ट और सुविधाएं बेहतर हैं। खाड़ी देशों समेत कई अफ्रीकी देशों के मरीज भी यहां इलाज के लिए आते हैं। इसका एक बड़ा कारण यह है कि विकसित देशों के मुकाबले में भारत में कैंसर का बेहद सस्ता इलाज होता है। लेकिन इसके बावजूद भारत से कई लोग विदेशों में कैंसर का इलाज करवाना पसंद करते हैं।ऋषि कपूर अपने इलाज के लिए न्यूयॉर्क गए थे। इसी तरह इरफान खान का इलाज लंदन में चला था। बॉलीवुड में यह फेहरिस्त लंबी है। इसमें सोनाली बेंद्रे और मनीषा कोइराला और क्रिकेटर युवराज सिंह जैसे सितारे भी शामिल हैं, जिनका इलाज अमेरिका के ही कैंसर अस्पतालों में हुआ।एक्सपर्ट मानते हैं कि कैंसर के इलाज में भारत कहीं भी विकसित देशों से पीछे नहीं हैं लेकिन जब लोगों के पास पैसा होता है तो वे और बेहतर के विकल्प खोजते रहते हैं। हां यह जरूर है कि भारत में सभी मरीजों को सही इलाज नहीं मिल पाता इसलिए विकसित देशों के मुकाबले डेथ रेशियो ज्यादा है, लेकिन जिन्हें भी सही इलाज मिल जाता है, तो ठीक होने की संभावना विकसित देशों के ही बराबर ही होती है।भारत: साल 2018 में महिलाओं के मुकाबले पुरुषों में कैंसर के मामले कम रहे, लेकिन मौतें ज्यादा हुईंडब्लूएचओ की ही रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में साल 2018 में महिलाओं में कैंसर के 5.87 लाख मामले आए थे जबकि पुरुषों में यह संख्या 5.70 लाख थी। हालांकि कैंसर से हुईं मौतों के मामले में पुरुषों की संख्या महिलाओं से 42 हजार ज्यादा थी। 2018 में कैंसर से 4.13 लाख पुरुषों की मौत हुई जबकि महिलाओं की संख्या 3.71 लाख थी। पुरुषों में जहां सबसे ज्यादा मामले मुंह और फेफड़ों के कैंसर के आए, वहीं महिलाओं में सबसे ज्यादा मामले ब्रेस्ट और गर्भाशय के कैंसर के रहे। पुरुषों में कैंसर नए मामले महिलाओं में कैंसर नए मामले मुंह 92 हजार ब्रेस्ट 1.62 लाख फेफड़े 49 हजार गर्भाशय 97 हजार अमाशय 39 हजार अंडाशय 36 हजार मलाशय 36 हजार मुंह 28 हजार आहारनली 34 हजार मलाशय 20 हजार सोर्स: ग्लोबल कैंसर ऑब्जर्वेटरी, डब्लूएचओ (आंकड़े-2018)-भारत में साल 2018 में ब्रेस्ट कैंसर से 87 हजार महिलाओं की मौत हुई यानी हर दिन 239 मौत। इसी तरह गर्भाशय के कैंसर से हर दिन 164 और अंडाशय के कैंसर से हर दिन 99 मौतें हुईं।दुनिया : 18% मौतें फेफड़ों के कैंसर सेसाल 2018 में कैंसर के कुल 1.81 करोड़ मामले आए। इसमें पुरुषों के 94 लाख और महिलाओं के 86 लाख मामले थे। मौतें भी पुरुषों में ज्यादा देखी गई। 53.85 लाख पुरुषों की कैंसर से मौत हुई, वहीं महिलाओं की संख्या 41.69 लाख रही। पुरुषों में सबसे ज्यादा मामले फेफेड़ों, प्रोस्टेट और मलाशय कैंसरके आए। वहीं महिलाओं में ब्रेस्ट, मलाशय और फेफड़ों के कैंसर के ज्यादा केस थे। कैंसर मामले मौतें फेफड़े 20.93 लाख 17.61 लाख ब्रेस्ट 20.88 लाख 6.26 लाख प्रोस्टेट 12.76 लाख 3.59 लाख आंत 10.96 लाख 5.51 लाख अमाशय 10.33 लाख 7.82 लाख सोर्स: ग्लोबल कैंसर ऑब्जर्वेटरी, डब्लूएचओ (आंकड़े-2018)- दुनियाभर में साल 2018 में कैंसर की22% मौतों का कारण महज तंबाकू था। गरीब और मिडिल इनकम देशों में कैंसर के25% मामले हैपेटाइटिस और एचपीवी जैसे वायरस इंफेक्शन के कारण हुए। Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today In India, 7 out of every 10 cancer patients die, here a doctor carries a burden of 2000 patients. Full Article
2 2025 में आप 2020 की कहानी कैसे सुनाएंगे? By Published On :: Sat, 02 May 2020 23:59:00 GMT हाल ही में यूएन पॉपुलेशन फंड द्वारा जारी आंकड़ों में दावा किया गया है कि लॉकडाउन की वजह से करीब 70 लाख ऐसी ‘अनइंटेंडेड’ प्रेग्नेंसी हो सकती हैं, जिनकी प्लानिंग नहीं की गई। अगर यह सच है तो चार-पांच साल बाद हमें इन बच्चों को आज की कहानी सुनानी पड़ेगी, जो कुछ इस तरह होगी:बच्चा बोलता है, ‘प्लीज मेरी पसंदीदा वो वाली कहानी सुनाओ न, जब मैं पैदा हुआ था और दुनिया पर वायरस का हमला हुआ था।’ पिता कहानी शुरू करता है, ‘वह कचरे और अचंभे की दुनिया थी। हमने बहुत कम समय में लंबी बिल्डिंग्स बना लीं, कुछ हफ्तों में ही पुल बना दिए और वह सबकुछ हासिल किया जो हम पाना चाहते थे। हम 24 घंटे में ही दुनिया के किसी भी कोने से जो चाहें, मंगवा सकते थे क्योंकि तब आसमान में पंछी कम हवाईजहाज ज्यादा थे।लेकिन इस प्रक्रिया में हम कचरा कम करना भूल गए और हमें हैसियत से भी बाहर, बेहिसाब खरीदारी की बीमारी हो गई। हमने सारा प्लास्टिक समंदर में फेंक दिया, जिससे व्हेल जैसे जानवर तक मर गए। उत्पादकों ने ज्यादा से ज्यादा सामान बनाने के लिए हमने पेड़ काटे, जितना हो सके उतना तेल निकाला, चौबीसों घंटे, सातों दिन फैक्टरी चलाईं, लेकिन यह नहीं समझ पाए कि हम नीले आसमान को काला कर रहे थे।फिर हमने मोबाइल फोन की खोज की, जो सबसे पास था, यहां तक कि तुम्हारे जैसे बच्चों के पास भी। उसके बाद लोगों ने एक ही कमरे में रहते हुए भी एक-दूसरे से बात करना बंद कर दिया। हम प्रार्थना और एक्सरसाइज तक ऑनलाइन करने लगे। धीरे-धीरे अकेलापन पैर पसारने लगा, खासतौर पर बच्चों को यह बहुत महसूस होने लगा। फिर 2020 में वायरस आया। लाखों लोग मारे गए। हम सभी मौत के डर से महीनों घरों में कैद रहे। हमने एक-दूसरे से बात की, साथ में नाचे, कहानियां पढ़ीं, दूसरों के लिए खाना पकाया, जरूरतमंदों की मदद की। अचानक इंसान खुद के लिए नहीं, दूसरों के लिए जीने लगा, जैसा हम आज करते हैं। न सिर्फ हमारे माता-पिता, बल्कि हमारे दादा-दादियों ने भी जीवन में जो कुछ किया, उसे हमने अपना बनाया और तुम सभी के लिए इस धरती को फिर से खूबसूरत बनाया। प्रकृति के साथ रहने की नई आदत ने प्रकृति को नुकसान पहुंचाने की पुरानी आदत खत्म कर दी। यही कारण है कि तुम समंदर किनारे कछुए, फुटपाथ पर नाचते मोर, सड़क के डिवाइडर्स पर सोते हिरण और बेडरूम की खिड़की पर चहचहाती चिड़िया देख पाते हो।’जिज्ञासु बच्चे ने पूछा, ‘मानवता केलिए यह अच्छा है, आपको यह बताने के लिए वायरस की जरूरत क्यों पड़ी?’ यह सुनकर बच्चे के जन्मदिन के लिए केक बना रही मां बोल पड़ीं, ‘मैं समझाती हूं।’उसने बच्चे को गले लगाया और पूछा, ‘तुम्हें केक पसंद है?’ बच्चे ने कहा, ‘हां, बहुत।’ मां ने उसके माथे को चूमा और पूछा, ‘तो तुम कच्चा अंडा क्यों नहीं खाते?’ बच्चा बोला, ‘छी, मैं नहीं खा सकता।’ फिर मां ने बेकिंग सोडा, थोड़ा आटा और कड़वे कोको समेत सारी चीजें उसकी ओर बढ़ा दीं। बच्चे ने इन्हें छूने से इनकार कर दिया। तब मां बोलीं, ‘जब तुम इन सभी चीजों को सही मात्रा में मिलाते हो, तभी मेरे राजा बेटे के लिए शानदार चॉकलेट केक बनता है, है न?’बच्चे ने हामी भरी और मां को चूम लिया। मां ने आंखें बंदकर बच्चे के इस प्रेम का आनंद लिया और बोली, ‘भगवान भी ऐसे ही काम करते हैं। जब तुम उनकी रचनाओं का सम्मान नहीं करते और उन्हें नष्ट करते हो तो वे थोड़े मुश्किल दौर में डाल देते हैं। लेकिन भगवान जानते हैं कि वे जब उन सभी चीजों को सही ढंग से रखेंगे, तो वे सभी मानवता के हित में काम करेंगी। भगवान तुम्हें बहुत चाहते हैं। वे रोज सुबह ताजा फूलों के साथ धूप भेजते हैं। क्योंकि वे सोचते हैं कि तुम खास हो क्योंकि तुम 2020 के दौर में तब पैदा हुए, जब इंसान ने उनकी रचनाओं का सम्मान करना शुरू किया।’ जब तक कहानी खत्म हुई, केक बन चुका था। फंडा यह है कि इस लॉकडाउन में हो रहे छोटे-से-छोटे बदलाव को भी अपनी यादों में दर्ज करें। हो सकता है कि ये सीखें हमारे बच्चों, नाती-पोतों के लिए 2025 में शानदार कहानियां बन जाएं। Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today Full Article
2 2020 आपके लिए ‘गैप ईयर’ हो सकता है! By Published On :: Mon, 04 May 2020 00:07:00 GMT ‘अरे वाह, तू तो बड़ा हो गया, अभी तो तेरे लिए नया घर ढूंढना पड़ेगा।’ मुझे याद है कि मां ये शब्द एक छोटे पौधे से कह रही थीं, जो दूसरे पौधे की छांव में थोड़ा बड़ा हो गया था। यही कारण था कि वह उस छोटे पौधे से वादा कर रही थीं कि वे उसे अलग घर (यानी गमला) देंगी। मैं उनके बगल में खड़ा होकर सोच रहा था कि आखिर यह पौधा जवाब कैसे देगा। मुझे मेरी मां का पौधों से बात करना हमेशा मजेदार लगता था। और नागपुर के घर में पीछे के आंगन में बने छोटे से बगीचे में पिता अचानक घुस आते थे और मां को मजाकिया लहजे में डांटते थे- ‘अगर तुम हमारे बेटे को ये पेड़-पौधों से बात करने का पागलपन सिखाओगी तो वह कभी प्राइमरी स्कूल भी पास नहीं कर पाएगा।’ हालांकि, मैं उनके इन शब्दों से बेकल हो जाता था, लेकिन मेरी मां को कोई फर्क नहीं पड़ता था। वे कहती थीं- ‘अगर हमारा बेटा कुछ देर खड़ा रहेगा और कुछ नहीं करेगा तो धरती फट नहीं जाएगी।’बचपन का यह अनुभव मुझे तब याद आया जब दिल्ली में रहने वाले मेरे प्रकाशक दोस्त पीयूष कुमार ने मुझे आज सुबह फोन किया और अपनी तीन वर्षीय बेटी पीयू से जुड़ी चिंता साझा की। उनकी बेटी को गैजेट्स की लत हो रही है। जो लॉकडाउन से पहले 30 मिनट गैजेट इस्तेमाल करती थी, अब लॉकडाउन के दौरान तीन घंटे कर रही है।इस बात के बाद मैंने पुणे के आनंदवन व्यसनमुक्ति केंद्र में कार्यरत मेरे एक परिचित को फोन किया, जिन्होंने मेरे डर की पुष्टि की। स्क्रीन की लत एक बड़ी समस्या बन चुकी है, खासतौर पर बच्चों के लिए। लॉकडाउन में बीते हफ्तों के दौरान यह एक गंभीर सामाजिक बीमारी बनती जा रही है। इसका असर इतना है कि इस केंद्र पर रोजाना ढेरों फोन आ रहे हैं, यहां तक कि कोल्हापुर, बीड, नांदेड़ और औरंगाबाद जैसे छोटे शहरों से भी, जबकि उनके पास बच्चों के साथ वक्त बिताने के कई अन्य तरीके भी हैं।व्यसनमुक्ति केंद्र द्वारा कराए गए अध्ययन के अनुसार 12 से 14 साल के उम्रवर्ग के बच्चों को गेम्स की लत है, जिनकी उम्र 14 से 24 साल के बीच है वे सोशल मीडिया पर ज्यादा व्यस्त हैं, वहीं 25 से 35 वर्ष की उम्रवर्ग वाले लोग ज्यादातर बिंज-वॉचिंग (लगातार फिल्म-टीवी देखना) के साथ सोशल मीडिया में लगे हुए हैं। वहीं 35 वर्ष से ज्यादा उम्र के लोग वीडियो, न्यूज और सोशल मीडिया से समय काट रहे हैं।हिसार के विजडम स्कूल के अधिकारियों और कई माता-पिता भी इस बात पर सहमत हैं कि ‘अगर एक साल थोड़ी औपचारिक पढ़ाई नहीं भी होगी, तो कौन-सा पहाड़ टूट जाएगा।’ वे इस बात पर एकमत हैं कि सामान्य तरीकों से पढ़ाने की बजाय, गैजेट्स से पढ़ाने से कोई ऐसी बीमारी हो जाएगी, जिसे बाद में संभालना मुश्किल होगा। बच्चों को तो ऐसे ही अगली क्लास में प्रमोट किया जा सकता है। लेकिन जो 14 से 24 साल या इससे ज्यादा के उम्र वर्ग के हैं या बाजार की स्थितियों की वजह से जिनकी नौकरियां चली गई हैं, उन्हें मैं सलाह दूंगा कि अगर आर्थिक रूप से संभव हो तो अमेरिकी लाइफस्टाइल अपनाएं, जहां ‘गैप ईयर’ काफी प्रचलित है।तो ‘गैप ईयर’ है क्या? यह आमतौर पर पढ़ाई या काम से लिया गया 12 महीने का रचनात्मक ब्रेक है, ताकि कोई व्यक्ति अपनी अन्य रुचियों पर ध्यान दे सके, जो आमतौर पर नियमित जीवन से या काम के क्षेत्र से ही जुड़ी हुई हों, लेकिन कुछ अलग हों या उससे पूरी तरह हटकर हों। इससे छात्रों को उनकी रुचि के मुताबिक ग्रेजुएशन के लिए सही कॉलेज चुनने में मदद मिलेगी। वे लोग, जिनकी कंपनियां बंद हो गईं या नौकरी चली गई है, वे इसे ‘सबैटिकल ईयर’ (विश्राम का साल) मान लें और अपनी औपचारिक नौकरी से ब्रेक लेकर अन्य नौकरियां तलाशें या अन्य रुचियां अपनाएं। हो सकता है ये आपको जीवन में किसी नई राह पर ले जाए।फंडा यह है कि 2020 ‘गैप ईयर’ बन सकता है और अलग-अलग उम्र वर्गों के लिए इसका मतलब अलग हो सकता है। लेकिन कुल मिलाकर यह तनाव न लेकर हमारे अस्तित्व के कारण पर विचार करने का साल है।मैनेजमेंट फंडा एन. रघुरामन की आवाज में मोबाइल पर सुनने के लिए9190000071 पर मिस्ड कॉल करें Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today Full Article
2 मानसरोवर में 90 और अमरनाथ में 45 किमी की चढ़ाई, 12 साल में एक बार होने वाली नंदा देवी यात्रा में 280 किमी का सफर 3 हफ्ते में By Published On :: Tue, 05 May 2020 00:22:00 GMT नेशनल लॉकडाउन के कारण अमरनाथ यात्रा से लेकर कैलाश मानसरोवर तक की यात्राओं पर संशय के बादल हैं। केदारनाथ के कपाट खुल चुके हैं लेकिन अभी वहां जाने पर रोक है। अमरनाथ, केदारनाथ और मानसरोवर तीनों ही दुर्गम यात्राएं मानी जाती हैं। यहां पहुंचना आसान नहीं है। पर्वतों के खतरों से भरे रास्तों से गुजरना होता है। लेकिन, ये तीन ही अकेले ऐसे तीर्थ नहीं हैं। दर्जन भर से ज्यादा ऐसे कठिन रास्तों वाले तीर्थ हैं, जहां पहुंचना हर किसी के बूते का नहीं है। कुछ स्थान तो ऐसे हैं, जहां पहुंचने में एक दिन से लेकर एक हफ्ते तक का समय लग सकता है।ऊंचे पर्वत क्षेत्रों के मंदिर आम भक्तों के लिए कब खोले जाएंगे, ये स्पष्ट नहीं है। हाल ही में केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनौत्री धाम के कपाट खुल गए हैं, बद्रीनाथ के कपाट भी खुलने वाले हैं, लेकिन यहां आम भक्त अभी दर्शन नहीं कर पाएंगे। भारत के 14 ऐसे दुर्गम तीर्थों जहां हर साल लाखों भक्त पहुंचते हैं, लेकिन इस साल ये यात्राएं अभी तक बंद हैं...अमरनाथ यात्रासबसे कठिन तीर्थ यात्राओं में से एक है अमरनाथ की यात्रा। से कश्मीर के बलटाल और पहलगाम से अमरनाथ यात्रा शुरू होती है। ये तीर्थ अनंतनाग जिले में स्थित है। अमरनाथ की गुफा में बर्फ से प्राकृतिक शिवलिंग बनता है। यहां पहुंचने का रास्ता चुनौतियों से भरा है। प्रतिकूल मौसम, लैंडस्लाइड, ऑक्सीजन की कमी जैसी समस्याओं के बावजूद लाखों भक्त यहां पहुंचते हैं। शिवजी के इस तीर्थ का इतिहास हजारों साल पुराना है। यहां स्थित शिवलिंग पर लगातार बर्फ की बूंदें टपकती रहती हैं, जिससे 10-12 फीट ऊंचा शिवलिंग निर्मित होता है। गुफा में शिवलिंग के साथ ही श्रीगणेश, पार्वती और भैरव के हिमखंड भी निर्मित होते हैं।हेमकुंड साहिबउत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित हेमकुंड साहिब सिखों का प्रमुख धार्मिक स्थल है। यहां बर्फ की बनी झील है जो सात विशाल पर्वतों से घिरी हुई है, जिन्हें हेमकुंड पर्वत भी कहते हैं। मान्यता है कि हेमकुंड साहिब में सिखों के दसवें गुरु गुरुगोबिंद सिंह ने करीब 20 सालों तक तपस्या की थी। जहां गुरुजी ने तप किया था, वहीं गुरुद्वारा बना हुआ है। यहां स्थित सरोवर को हेम सरोवर कहते हैं। जून से अक्टूबर तक हेमकुंड साहिब का मौसम ट्रैकिंग के लिए अनुकूल रहता है। इस दौरान अधिकतम तापमान 25 डिग्री और न्यूनतम तापमान -4 डिग्री तक हो जाता है। यहां पहुंचने के लिए ग्लेशियर और बर्फ से ढंके रास्तों से होकर गुजरना पड़ता है।कैलाश मानसरोवरशिवजी का वास कैलाश पर्वत माना गया है और ये पर्वत चीन के कब्जे वाले तिब्बत में स्थित है। ये यात्रा सबसे कठिन तीर्थ यात्राओं में से एक है। यहां एक सरोवर है, जिसे मानसरोवर कहते हैं। मान्यता है कि यहीं माता पार्वती स्नान करती हैं। प्रचलित कथाओं के अनुसार ये सरोवर ब्रह्माजी के मन से उत्पन्न हुआ था। इसके पास ही कैलाश पर्वत स्थित है। इस जगह को हिंदू धर्म के साथ-साथ बौद्ध धर्म में भी बहुत पवित्र माना जाता है। मानसरोवर का नीला पानी पर्यटकों के लिए आकर्षण और आस्था का केंद्र है। यह यात्रा पारंपरिक रूप से लिपुलेख उत्तराखंड रूट और सिक्किम नाथुला के नए रूट से होती है।वैष्णोदेवीजम्मू के रियासी जिले में वैष्णोदेवी का मंदिर स्थित है। ये मंदिर त्रिकुटा पर्वत पर स्थित है। यहां भैरव घाटी में भैरव मंदिर स्थित है। मान्यता के अनुसार यहां स्थित पुरानी गुफा में भैरव का शरीर मौजूद है। माता ने यहीं पर भैरव को अपने त्रिशूल से मारा था और उसका सिर उड़कर भैरव घाटी में चला गया और शरीर इस गुफा में रह गया था। प्राचीन गुफा में गंगा जल प्रवाहित होता रहता है। वैष्णो देवी मंदिर तक पहुंचने के लिए कई पड़ाव पार करने होते हैं। इन पड़ावों में से एक है आदि कुंवारी या आद्यकुंवारी।केदारनाथबुधवार, 29 अप्रैल को केदारनाथ धाम के कपाट खुल गए हैं। बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक ज्योतिर्लिंग केदारनाथ है। ये मंदिर उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित है। मान्यता है कि प्राचीन समय में बदरीवन में विष्णुजी के अवतार नर-नारायण इस क्षेत्र में पार्थिव शिवलिंग बनाकर पूजा करते थे। नर-नारायण की भक्ति से प्रसन्न होकर शिवजी प्रकट हुए थे। केदारनाथ मंदिर का निर्माण पाण्डव वंश के राजा जनमेजय द्वारा करवाया गया था और आदि गुरु शंकराचार्य ने इस मंदिर का जिर्णोद्धार करवाया था। गौरीकुंड से केदारनाथ के लिए 16 किमी की ट्रेकिंग शुरू होती है। मंदाकिनी नदी के किनारे बेहद खूबसूरत दृश्य दिखाई देते हैं। एक यात्रा गुप्तकाशी से भी होती है। नए रूट में सीतापुर या सोनप्रयाग से यात्रा शुरू होती है। गुप्तकाशी रूट पर ट्रैकिंग ज्यादा करना होती है।श्रीखंड महादेवहिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में श्रीखंड महादेव शिवलिंग स्थित है। यहां शिवलिंग की ऊंचाई करीब 75 फीट है। इस यात्रा के लिए जाओं क्षेत्र में पहुंचना होता है। यहां से करीब 32 किमी की ट्रेकिंग है। मार्ग में जाओं में माता पार्वती का मंदिर, परशुराम मंदिर, दक्षिणेश्वर महादेव, हनुमान मंदिर स्थित हैं। मान्यता है शिवजी से भस्मासुर को वरदान दिया था कि वह जिसके सिर पर हाथ रखेगा वह भस्म हो जाएगा। तब भगवान विष्णु ने भस्मासुर को इसी स्थान पर नृत्य करने के लिए राजी किया था। नृत्य करते-करते भस्मासुर ने खुद का हाथ अपने सिर पर ही रख लिया था, जिससे वह भस्म हो गया।नंदादेवी यात्राउत्तराखंड के चमोली क्षेत्र में हर 12 साल में एक बार नंदादेवी की यात्रा होती है। नंदा देवी पर्वत तक जानेवाली यह यात्रा छोटे गांव और मंदिरों से होकर गुजरती है। इसकी शुरूआत कर्णप्रयाग के नौटी गांव से होती है। 2014 में ये यात्रा आयोजित हुई थी। मान्यता है कि हर 12 साल में नंदा मां यानी देवी पार्वती अपने मायके पहुंचती हैं और कुछ दिन वहां रूकने के बाद भक्तों के द्वारा नंदा को घुंघटी पर्वत तक छोड़ा जाता है। घुंघटी पर्वत को शिव का निवास स्थान और नंदा का सुसराल माना जाता है।मणिमहेशहिमाचल के चंबा जिले में स्थित है मणिमहेश। यहां शिवजी मणि के रूप में दर्शन देते है। मंदिर भरमौर क्षेत्र में है। भरमौर मरु वंश के राजा मरुवर्मा की राजधानी थी। मणिमहेश जाने के लिए भी बुद्धिल घाटी से होकर जाना पड़ता है। यहां स्थित झील के दर्शन के लिए भक्त पहुंचते हैं।शिखरजीझारखंड के गिरीडीह जिले में जैन धर्म का प्रमुख तीर्थ शिखरजी स्थित है। ये मंदिर झारखंड की सबसे ऊंची पहाड़ी पर बना हुआ है। इस क्षेत्र में जैन धर्म के 24 में से 20 तीर्थंकरों ने मोक्ष प्राप्त किया था।यमनोत्रीयमुनादेवी का ये मंदिर उत्तराखंड के चारधामों में से एक है। यमुनोत्री मंदिर उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में स्थित है। ये यमुना नदी का उद्गम स्थल है और ऊंची पर्वतों पर स्थित है। हनुमान चट्टी से 6 किमी की ट्रेकिंग करनी होती है और जानकी चट्टी करीब 4 किमी ट्रेकिंग करनी होती है।फुगताल या फुक्ताललद्दाख के जांस्कर क्षेत्र में स्थित है फुगताल यानी फुक्ताल। यहां 3850 मीटर ऊंचाई पर बौद्ध मठ स्थित है। ये मंदिर 12वीं शताब्दी का माना जाता है।तुंगनाथउत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में तुंगनाथ शिव मंदिर स्थित है। मंदिर के संबंध में मान्यता है कि ये हजार साल पुराना है। यहां मंदाकिनी नदी और अलकनंदा नदी बहती है। इस क्षेत्र में चोपटा चंद्रशिला ट्रेक पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है।गौमुखउत्तराखंड राज्य के उत्तरकाशी जिले में गंगोत्री स्थित है। यहां से करीब 18 किमी दूर गौमुख है। यहीं से गंगा का उद्गम माना जाता है। इस क्षेत्र में गंगा को भागीरथी कहते हैं। ये क्षेत्र उत्तराखंड के चार धामों में से एक है।रुद्रनाथरुद्रनाथ मंदिर उत्तराखंड के गढ़वाल में स्थित है। यहां शिवजी का मंदिर है। समुद्र तल से इसकी ऊंचाई 3,600 मीटर है। मान्यता है कि रुद्रनाथ मंदिर की स्थापना पांडवों द्वारा की गई थी। सभी पांडव यहां शिवजी की खोज में पहुंचे थे। महाभारत युद्ध में मारे गए यौद्धाओं के पाप के प्रायश्चित के लिए पांडव यहां आए थे। Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today Pilgrimage in India | 14 Famous Pilgrimage in India Full List Updates; Amarnath Yatra to Kailash Mansarovar Full Article
2 राहुल देव बने पाकिस्तान एयरफोर्स के पहले हिंदू पायलट; 12 लाख सैनिकों में हिंदू कितने कोई नहीं जानता, खबर सिर्फ उनकी जो मारे गए या मशहूर हुए By Published On :: Tue, 05 May 2020 09:56:51 GMT पाकिस्तान एयरफोर्स में पहली बार एक हिंदू पायलट बना है। नाम है राहुल देव और वे सिंध इलाके के थरपरकर से हैं। राहुल पाकिस्तान एयरफोर्स में दूसरे हिंदू होंगे, उनसे पहले एयर कमोडोर बलवंत कुमार दास पाकिस्तानी एयरफोर्स में भर्ती हुए थे, लेकिन वह एयर डिफेंस का हिस्सा था, जिसके जिम्मे ग्राउंड ड्यूटी से जुड़े काम होते थे।राहुल बतौर जीडी पायलट भर्ती हुए हैं। जनरल ड्यूटी (जीडी) के जो पायलट होते हैं वह कोई भी एयरक्राफ्ट उड़ा सकते हैं, फिर चाहे वह फाइटर हो या ट्रांसपोर्ट। पाकिस्तान एयरफोर्स में जीडी पायलट अहम होता है और वह ज्यादा ताकतवर एयरक्राफ्ट उड़ता है।16 अप्रैल को 143 जीडी पायलट, 89 इंजीनियरिंग, 99 एयर डिफेंस और बाकी कोर्स की ग्रेजुएशन सेरेमनी पाकिस्तान एयरफोर्स एकेडमी रिसालपुर में थी। जहां वायुसेना प्रमुख एयरचीफ मार्शल मुजाहिद अनवर खान चीफ गेस्ट थे।राहुल से जुड़ी इस खबर को सबसे पहले प्रिंसिपल स्टाफ ऑफिसर रफीक अहमद खोखर ने जासूस से राजनेता बने इंटीरियर मिनिस्टर रिटायर्ड ब्रिगेडियर एजाज शाह से ट्वीट के जरिए साझा की थी -पाकिस्तान फोर्सेस में अल्पसंख्यकों की स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब कमोडोर बलवंत कुमार दास के बारे में पता करने की कोशिश की तो बस इतना ही पता चला की वह ग्राउंड ड्यूटी ऑफिसर थे और उन्होंने युद्ध में हिस्सा लिया था। इससे ज्यादा कुछ भी नहीं।पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की स्थिति कोई रहस्य नहीं है। बार-बार इल्जाम लगता है कि पाकिस्तान हिंदुओं को वह जिंदगी नहीं देता जो इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ पाकिस्तान में मिले संविधान के तहत उनका हक है। बावजूद इसके हाल ही में यूनाइटेड स्टेट्स कमिशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम ने यह कहा था कि पाकिस्तान के हिंदू और सिखके लिए मुल्क पहले आता है। हाल ही के दिनों में पाक मिलिट्री में भर्ती होने वाले हिंदुओं और सिखोंकि संख्या बढ़ गई है। जबकि, पाकिस्तान बनने से लेकर दशकों तक मिलिट्री में सिर्फ मुसलमानों का एकाधिकार रहा है। वहीं ईसाइयों को पाकिस्तानी फोर्सेस में जगह भी दी गई और ओहदा भी।2000 तक हिंदुओं की सेना में शामिल होने पर भी पाबंदी थी। जनरल परवेज मुशर्रफ के मिलिट्री रूल के वक्त वह पहली बार सेना में शामिल हो पाए। 2006 में कैप्टन दानिश पाकिस्तान सेना के पहले हिंदू ऑफिसर बने।ब्रिगेडियर एजाज के साथ काम करने वाले इंटीरियर मिनिस्ट्री के एक ऑफिसर के मुताबिक राहुल देव का इंडक्शन इसलिए भी खास है क्योंकि वह सिंध के थरपरकर जैसे कमजोर इलाके से आते हैं।सिंध के अंदरूनी इलाकों में हिंदुओं की ठीक-ठाक आबादी है। इस इलाके में जरूरी सुविधाएं भी मौजूद नहीं हैं। हाल के कुछ सालों में यहां भूख और कुपोषण से मौत की कई खबरें आई हैं जिनमें बच्चे भी शामिल हैं। महेश मलानी इसी थरपरकर इलाके से नेशनल असेंबली में सीट जीतने वाले पहले हिंदू हैं।अधिकारी के मुताबिक, पाकिस्तान अल्पसंख्यकों के लिए सबसे खराब देश है। यहां जबरन धर्म परिवर्तन आम है, ईशनिंदा के मामले और धर्म के नाम पर हत्याएं भी होती रहती हैं। यहां कानून के जरिए समुदायों को ठगा जाता है। हांलाकि यह बदल रहा है।इंटीरियर मिनिस्ट्री के अधिकारी इस सवाल का जवाब नहीं दे पाए कि हिंदू और सिखऑफिसर के कमिशन की शुरूआत करने में इस देश को इतना वक्त क्यों लगा। सीनियर जर्नलिस्ट नसीम जेहरा का ये ट्वीट पढ़िए -##ट्विटर पर जहां राहुल के लिए सरहद के दोनों ओर से बधाईयों का ढेर लग गया वहीं एक शहीद हिंदू सैनिक का परिवार इस मसले पर बात करने राजी हुआ। 27 साल के लालचंद रबारी बेहद भावुक व्यक्ति थे और उनका सपना था देश की रक्षा। 2017 में मंगला फ्रंट पर लड़ते हुए उनकी मौत हुई।मेजर कैलाश पिछले साल ही पहले हिंदू अफसर हैं जो मेजर बने। उन्हें सियाचिन पोस्टिंग के लिए तमगा-ए-दफा भी हासिल हुआ।रबारी इस्माइल खान नौटकानी गांव बादिन जिले के रहनेवाले थे। गरीब चरवाहे पिता और किसान मां की पांचवी औलाद। उनके भाई कहते हैं रबारी की पोस्टिंग फाटा इलाके के वजीरिस्तान में हुई थी। वह देश को तबाह करने वाले आतंकियो को कुचलना चाहता था। वह कहते हैं मेरे भाई की तकदीर में लिखा था कि वह देश के लिए लड़ते शहीद होगा।रबारी के मुताबिक जिस देश में हम रहते हैं वह हमारा घर है। जो भी उसपर हमला करेगा उसे हम जवाब देंगे, अपनी आखिरी सांस तक। वह ये भी कहते हैं कि हम राजपूत हैं जो हमेशा दुश्मन से खून के आखिरी कतरे तक लड़ते हैं।कराची के एक हिंदू रिसर्चर कहते हैं, ‘अगर हमारी पाकिस्तान के साथ वफादारी पर कोई शक है तो उसे आंकड़ों से साबित करो। बताओ कितने पाकिस्तानी हिंदू हैं जिन्होंने देश को धोखा दिया या जिनपर धोखेबाजी के केस कोर्ट में चल रहे हैं? यह सिर्फ झूठा प्रोपेगेंडा है, जो बंद होना चाहिए और पाकिस्तान को हमें अपना मानना चाहिए। सरकार ने हम गैर मुसलमानों की उपलब्धियों को कभी माना ही नहीं।’एयर कमोडोर बलवंत कुमार दास पाकिस्तान एयरफोर्स के पहले सीनियर हिंदू ऑफिसर थे। उन्होंने 1948 और 1965 की जंग में हिस्सा भी लिया, लेकिन उनकी कहानी को सालों पहले भुला दिया गयाा है।कैजाद सुपारी वाला पहले पारसी और गैर मुसलमान पाकिस्तानी जनरल हैं। 1965 और 1971 की जंग में उनकी काबीलियत के किस्से सब जानते हैं लेकिन सरकार, मीडिया या लोग कभी उनका जिक्र तक नहीं करते। एक और हिंदू सैनिक अशोक कुमार हैं जिन्होंने 2013 में वजीरीस्तान में आतंकवादियों से लड़ते अपनी जान दी। उन्हें तमगा-ए-शुजात दिया गया। लेकिन आश्चर्य की बात यह कि उनके नाम के आगे शहीद की जगह महरूम लिखा गया। जबकि मुसलमान शहीदों के साथ ऐसा नहीं होता।हैदराबाद के डॉक्टर कैलाश गरवड़ा पिछले साल पहले हिंदू मेजर बने। उन्होंने युगांडा, मिस्त्र, दुबई, स्पेन, फ्रांस, नीदरलैंड, बेल्जियम, इटली और स्विट्जरलैंड में पाकिस्तान को रिप्रेजेंट किया। 36 दिन भारत पाकिस्तान के बीच विवादित के-2 के पास बाल्त्रो सेक्टर में दुनिया की सबसे ऊंचाई पोस्ट पर रहने के बाद उन्होंने तमगा-ए-दफा हासिल किया।ये मेडल सियाचिन में पोस्टिंग पाने वाले सैनिकों को दिया जाता है। वह वजीरिस्तान में आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन एमीजन और स्वात में ऑपरेशन राहे निजात का हिस्सा भी थे।मेजर हरचरण सिंह पाकिस्तान सेना में कमिशन पाने वाले पहले सिख अफसर हैं।वहीं मेजर हरचरण सिंह ने 2007 अक्टूबर में सेना के पहले सिखअफसर बनकर इतिहास रचा। ननकाना साहिब में 1986 में पैदा हरचरण ने पाकिस्तान मिलिट्री एकेडमी से पास होते वक्त कहा था, ‘ये मेरे लिए गर्व की बात है कि आज आपके सामने खाकी वर्दी पहने खड़ा हूं, मुझे बड़ी जिम्मेदारी मिली है।पगड़ी पहने सरदार को बलूच रेजिमेंट का बैच लगाए देखना फख्र की बात है।’पाकिस्तान की आबादी 22 करोड़ है। उसमें से हिंदू 80 लाख हैं। पाकिस्तान हिंदू काउंसिल के आंकड़े तो यही कहते हैं, हालांकि जबरन धर्मपरिवर्तन को लेकर सही आंकड़े बताना मुश्किल है। सबसे ज्यादा हिंदू सिंध में हैं जहां आबादी में हिंदू94 प्रतिशत हैं।वहीं पाकिस्तान की सेना में 12 लाख 40 हजार सैनिक हैं। इनमें से 6 लाख एक्टिव हैं। बाकी रिजर्व। इनमें कुल 100 भी हिंदू नहीं हैं। कितने हैं इसका कोई हिसाब नहीं है। न पाकिस्तान हिंदू काउंसिल के पास न ही इंटीरियर मिनिस्ट्री की फाइलों में। खबर सिर्फ उनकी है जो या तो मशहूर हुए या मारे गए। Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today राहुल देव उसी सिंध प्रांत से आते हैं जहां हिंदुओं की आबादी 94 प्रतिशत है। Full Article
2 शराब नहीं बिकने से राज्यों को हर दिन 700 करोड़ रुपए तक का नुकसान हो रहा था; जब बिकती है तो हर साल 24% तक की कमाई कर लेती हैं सरकारें By Published On :: Tue, 05 May 2020 13:39:38 GMT कोरोना को फैलने से रोकने के लिए देश में लगे लॉकडाउन में अब थोड़ी ढील मिलने लगी है। जान के साथ-साथ अब जहान की भी फिक्र होने लगी है।इस बार जब लॉकडाउन में क्या छूट मिलेगी गृह मंत्रालय ने लिस्ट जारी की तो सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा चर्चा शराब की दुकानें खुलने को लेकर थीं।किस जोन में ये दुकानें खुलेंगी और कहां नहीं इसे लेकर जमकर पूछ परख होने लगी और सोशल मीडिया पर मीमभी चल पड़े।सोमवार से शराब की दुकानें खुलने भी लगीं। इन्हीं पर सबसे ज्यादा भीड़ भी देखी गई। और तो और सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियां भी यहीं उड़ीं। इतनी किकई जगह पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा।लेकिन, सवाल यह है कि जब 40 दिन से देश में टोटल लॉकडाउन था और 17 मई तक भी लॉकडाउन ही रहेगा, तो फिर शराब की दुकानें खोलने की क्या जल्दबाजी थी? जवाब है- राज्यों की अर्थव्यवस्था। दरअसल, शराब की बिक्री से राज्यों को सालाना 24% तक की कमाई होती है।कुछ दिन पहले पंजाब के सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह ने केंद्र सरकार से शराब की दुकानें खोलने की इजाजत मांगी थी। लेकिन, सरकार ने उनकी इस मांग को ठुकरा दिया। अमरिंदर सिंह ने एक इंटरव्यू में बोला भी कि उनकी सरकार को 6 हजार 200 करोड़ रुपए की कमाई एक्साइज ड्यूटी से होती है। उन्होंने कहा, 'मैं ये घाटा कहां से पूरा करूंगा? क्या दिल्ली वाले मुझे ये पैसा देंगे? वो तो 1 रुपया भी नहीं देने वाले।'ये तस्वीर पूर्वी दिल्ली के चंदेर नगर में बनी एक वाइन शॉप के बाहर की है। लोग यहां सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करें, इसके लिए मार्किंग तो थी, लेकिन फिर भी लोग एक-दूसरे से चिपक कर खड़े हुए थे।आखिर कैसे शराब से राज्य सरकारों की कमाई होती है?राज्य सरकारों की कमाई के मुख्य सोर्स हैं- स्टेट जीएसटी, लैंड रेवेन्यू, पेट्रोल-डीजल पर लगने वाले वैट-सेल्स टैक्स, शराब पर लगने वाली एक्साइज ड्यूटी और बाकी टैक्स।सरकार को होने वाली कुल कमाई में एक्साइज ड्यूटी का एक बड़ा हिस्सा होता है। एक्साइज ड्यूटी सबसे ज्यादा शराब पर ही लगती है। इसका सिर्फ कुछ हिस्सा ही दूसरी चीजों पर लगता है।क्योंकि, शराब और पेट्रोल-डीजल को जीएसटी से बाहर रखा गया है। इसलिए, राज्य सरकारें इन पर टैक्स लगाकर रेवेन्यू बढ़ाती हैं।पीआरएस इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य सरकारों को सबसे ज्यादा कमाई स्टेट जीएसटी से होती है। इससे औसतन 43% का रेवेन्यू आता है। उसके बाद सेल्स-वैट टैक्स से औसतन 23% और स्टेट एक्साइज ड्यूटी से 13% की कमाई होती है। इनके अलावा, गाड़ियों और इलेक्ट्रिसिटी पर लगने वाले टैक्स से भी सरकारें कमाती हैं।ये तस्वीर उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की है।40 दिन के लॉकडाउन के बाद जब सोमवार को शराब की दुकानें खुलीं, तो लोग इकट्ठे चार-पांच बोतलें खरीदकर ले गए।पिछले साल ही शराब बेचने से राज्य सरकारों को 2.5 लाख करोड़ रुपए का रेवेन्यू मिला था।लेकिन, लॉकडाउन की वजह से देशभर में शराब बंदी भी लग गई थी। अंग्रेजी अखबार द हिंदू के मुताबिक, शराब की बिक्री बंद होने से सभी राज्यों को रोजाना 700 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है।यूपी-ओड़िशा की 24% कमाई शराब बिक्री सेशराब पर लगने वाली एक्साइज ड्यूटी से राज्य सरकारों को 1 से लेकर 24% तक की कमाई होती है। इससे सबसे कम सिर्फ 1% कमाई मिजोरम और नागालैंड को होती है। जबकि, सबसे ज्यादा 24% कमाई उत्तर प्रदेश और ओड़िशा को होती है।कमाई प्रतिशत में। सोर्स- पीआरएस इंडियाबिहार और गुजरात दो ऐसे राज्य हैं, जहां पूरी तरह से शराबबंदी है। 1960 में जब महाराष्ट्र से अलग होकर गुजरात नया राज्य बना, तभी से वहां शराबबंदी लागू है। जबकि, बिहार में अप्रैल 2016 से शराबबंदी है। इसलिए, इन दोनों राज्यों को एक्साइज ड्यूटी से कोई कमाई नहीं होती।पहले दिन 5 राज्यों में ही बिक गई 554 करोड़ रुपए की शराबइसको ऐसे भी देख सकते हैं कि देश के 5 राज्यों में एक ही दिन में 554 करोड़ रुपए की शराब बिक गई। सोमवार को उत्तर प्रदेश में 225 करोड़, महाराष्ट्र में 200 करोड़, राजस्थान में 59 करोड़, कर्नाटक में 45 करोड़ और छत्तीसगढ़ में 25 करोड़ रुपए की शराब बिकी।देश में हर व्यक्ति सालाना 5.7 लीटर शराब पीता हैभारत में शराब पीने वाले भी हर साल बढ़ते जा रहे हैं। 2018 में डब्ल्यूएचओ की एक रिपोर्ट आई थी। इसके मुताबिक, देश में 2005 में हर व्यक्ति (15 साल से ऊपर) 2.4 लीटर शराब पीता था, लेकिन 2016 में ये खपत 5.7 लीटर हो गई। हालांकि, इसका मतलब ये नहीं है कि देश का हर व्यक्ति शराब पीता है।इसके साथ ही पुरुष और महिलाओं में भी हर साल शराब पीने की मात्रा भी 2010 की तुलना में 2016 में बढ़ गई। 2010 में पुरुष सालाना 7.1 लीटर शराब पीते थे, जिसकी मात्रा 2016 में बढ़कर 9.4 लीटर हो गई। जबकि, 2010 में महिलाएं 1.3 लीटर शराब पीती थीं। 2016 में यही मात्रा बढ़कर 1.7 लीटर हो गई। साल देश पुरुष महिला 2010 4.3 7.1 1.3 2016 5.7 9.4 1.7 (आंकड़े लीटर में)ये तस्वीर भी दिल्ली के चंदेर नगर में बनी वाइन शॉप के बाहर की है। यहां शराब खरीदने के लिए सुबह से ही लोग दुकान के बाहर लाइन लगाकर खड़े हो गए थे। यहां सोशल डिस्टेंसिंग की खुलेआम धज्जियां उड़ीं।डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट के मुताबिक, 2016 में भारत में शराब पीने की वजह से 2.64 लाख से ज्यादा मौतें हुई थीं। इनमें 1 लाख 40 हजार 632 जानें सिर्फ लिवर सिरोसिस से गई थी। जबकि, 92 हजार से ज्यादा लोग सड़क हादसों में मारे गए थे।शराब पीने की वजह से हुई मौतें लिवर सिरोसिस 1,40,632 सड़क हादसों में 92,878 कैंसर 30,958 कुल 2,64,468 Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today India Liquor Lockdown News | State Liquor Tax Revenue and Economy Update: Rajasthan Haryana Maharashtra Chhattisgarh Madhya Pradesh Full Article
2 2020 नए सिरे से कार्ल मार्क्स की वापसी का साल है, इसलिए इस वर्ष का शब्द सिर्फ कोरोना नहीं होगा By Published On :: Tue, 05 May 2020 15:14:05 GMT यह साल मार्क्स की वापसी का वर्ष है। इसलिए कि इस वर्ष का शब्द सिर्फ कोरोना नहीं होगा बल्कि जो शब्द इस साल पूरी दुनिया में केंद्रीय शब्द बनकर उभरा, वह हैश्रमिक या मज़दूर। और श्रमिक शब्द सुनते ही जो पहली तस्वीर उभरती है, वह है कार्ल मार्क्स की। वह श्रमिक अचानक सामने निकल आया। वह फिलीपींस में पैदल चल रहा था, वह भारत में पैदल चलते हुए दम तोड़ रहा था, वह दुनिया के सबसे गर्वीलेपूंजीवादी देश अमेरिका में खाने के लिए कतारों में खड़ा था।यह श्रमिक था, इस दुनिया की नींव जो अब तक वस्तुओं में छिपा था और अब वह साक्षात सामने था। और सरकारों ने उसे एक बड़ी समस्या या सिरदर्द की तरह देखा,लेकिन वे उस श्रमिक को मरने नहीं देना चाहतीं, इतनी मानवीयता उनमें है। वे उन्हें दो शाम खाना खिला रही हैं, उनके खाते में एक महीने का 500रुपया डाल रही हैं।क़िस्सा कोताह यह कि वे उन्हें मरने नहीं देंगी। मार्क्स व्यंग्यपूर्वक मुस्कुराते हुए पूछते हैं, “क्या सचमुच मानवीयता है जो इन्हें ज़िंदा रखना चाहती है या है वह पूंजी की मजबूरी ? क्या यह साफ़ नहीं हो गया है कि इस शरीर के बिना जिसे बस ज़िंदा रखने की इंसानियत इन समाजों में है, सारा कारोबार ठप हो गया है और अगर उसे वापस पटरी पर लाना है तो इस शरीर की ज़रूरत होगी ही। यह शरीर जो इस श्रमिक का है, श्रम जिसका गुण है।”क्या मार्क्स ने यह नहीं कहा था कि पूंजी ही पूंजी को पैदा नहीं करती? श्रम के बिना वह एक निष्क्रिय, अनुत्पादक वस्तु है। उसमें जीवन श्रम ही भरता है। सच तो यह है, जो मार्क्स ने डेढ़ सौ साल पहले ही कहा था, पूंजी और कुछ नहीं, संचित श्रमहै। फर्क़ सिर्फ़ यह है कि यह श्रम अब मज़दूर की देह से अलग हो गया है और उस पर उसकी मिल्कियत भी नहीं रह गई है। जितना ही वह पूंजी मुटियाती जाती है, मज़दूर उतना ही कंकाल होता जाता है।ये सारी बातें पुराने जमाने की मान ली गई थीं। मार्क्स ने चेतावनी दी थी कि यह जो पूंजी का विराट रूप दिख रहा है, वह स्वास्थ्य का नहीं, व्याधि का लक्षण है। यह स्वस्थ नहीं, सूजा हुआ शरीर है । लेकिन इसके सामने है वह मात्र जीवनशेष , जीवन की कगार पर किसी तरह पांव टिकाए मज़दूर। यह नहीं कि मज़दूर ही खुद अपनी रक्षा नहीं कर सकता, पूंजी भी अपनी हिफ़ाज़त खुद नहीं कर सकती। क्या अब भी यह स्पष्ट नहीं है जब वह सरकारों के सामने गुहार लगा रही है कि हमें उबार लो! और उबारने के लिए किसका निवेश होगा फिर? हमारा और आपका और उसका जो अब कृपापूर्वक ट्रेनों और बसों में अपने अपने घरों को भेजा जा रहा है।सबसे पहला भरोसा क्या दिलाया सरकार ने इन पूंजीपतियों को? घबराइए नहीं, हम काम केघंटेबढ़ाकर 12 कर देंगे। कार्ल मार्क्स फिर मुस्कुराते हैं, “इन्हीं घंटों में तो सारा राज छिपा है। काम के घंटे जितने बढ़ेंगे, काम पर मज़दूर उतने ही कम होंगे। श्रम और समय के योग का कोई रिश्ता तो है मूल्य से जो उस वस्तु का होता है जो पैदा की जा रही है?”डेविड हार्वे इस समस्या पर विचार करते हैं। अभी सशरीर श्रम के अलावा दूसरी जो चीज़ सबसे अधिक महसूस हुई, वह थी समय। समय ही समय था। वह भी शरीर से विलग समय। कुछ के लिए वह समय उनके आंतरिक जगत में प्रवेश का एक अयाचित अवकाश था तो बहुलांश के लिए जबरन उनपर लाद दिया गया बोझ था। उस समय के सहारे अपने आंतरिक जगत को उपलब्ध करने की सुविधा उन्हें नहीं थी। वह समय उन्हें आत्मा को धारण करने वाली बाहरी काया में बचाए रखने की जुगत में ही लगाने की बाध्यता थी। संक्षेप में, आध्यात्मिकता की सुविधा उन्हें क़तई नहीं।इस बात को फूहड़ क्रूरता के साथ शासक दल के एक सांसद ने कह ही दिया जब झुंड के झुंड मज़दूर सड़कों पर निकल आए अपने घरों के लिए। इन “ग़ैरज़िम्मेदार” मज़दूरों को बिना मांगे अवकाश मिल गया है और वे सोचते हैं कि यह उन्हें यार दोस्तों के साथ मेलजोल के लिए मिला है।यही आशय था उस भर्त्सना का। इस वाक्य में यह भाव छिपा है कि अवकाश अधिकार नहीं है इन मज़दूरों का, वह अतिरिक्त विलासिता है। इनके समय या अवकाश की मिल्कियत पूंजी कीहै या उसकी चौकीदार सरकारों की जो इसका इस्तेमाल “राष्ट्रीय संपदा” के उत्पादन और संचयन के लिए करते हैं। सांसद महोदय जो कह रहे थे, वह सिर्फ़ उन्हीं की बात न थी। यह तो समझ ही है कि मज़दूरों को बस खुद को जीवित रखना है राष्ट्र के लिए, वे खुद को बीमार नहीं पड़ने दे सकते, यह आगे राष्ट्रीय संपदा के निर्माण में बाधा है, उनके स्वास्थ्य पर अलग से खर्च देश पर अतिरिक्त बोझ है।इस तरह हम देख पा रहे हैं कि एक ही देशकाल में समय का अर्थ मज़दूरों के लिए जो है वह अन्य वर्गों के लिए नहीं है। इसका मतलब सिर्फ़ यही है कि हम कितना ही साझेदारी और सामूहिकता की बात करें, वास्तव में इस समाज में कोई साझा समय नहीं है।जब साझा समय नहीं है तो सामने पड़ी विपदा का सामना करने के लिए जिस साझा सक्रियता की मांग की जा रही है, वह कैसे और क्यों कर हो? हार्वे इस समस्या पर विचार करते हुए मार्क्स को याद करते हैं।अगर हमें वापस अपने देश या राष्ट्र को स्वास्थ्य और संपन्नता को ओर ले जाना है तो एक सामूहिकता विकसित करनी होगी जो समय से जुड़े अंतर्विरोध को हाल की बिना नहीं हासिल की जा सकती।तो एक संपन्न देश कौन या कैसा होगा? मार्क्स का उत्तर स्पष्ट है, “एक सच्चा संपन्न देश वह है जहांकाम के घंटे 6हों, न कि 12। संपदा अतिरिक्त श्रम समय पर नियंत्रण नहीं है, बल्कि सीधे उत्पादन के में लगे समय के अलावा बचा हुआ समय है जो पूरे समाज में प्रत्येक व्यक्ति के पास होगा जिसे वह अपनी मर्ज़ी से इस्तेमाल कर सकेगा।मार्क्स श्रमिक को और हर किसी को विलक्षण व्यक्ति के रूप में ग्रहण करने और स्वीकार करने के लिए सामूहिक सक्रियता पर ज़ोर देते हैं। बहुतों के पास कोई अतिरिक्त समय न हो और बहुत कम के पास समय ही समय हो, यह अन्याय है। वह सामूहिकता का उल्लंघन भी है।कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए सामूहिक एकजुटता का बारंबार आह्वान किया गया है। वह एकजुटता नामुमकिन है अगर श्रमिकों के अतिरिक्त समय को उनसे छीन लिया जाए। श्रमिकों के ख़ाली बदन से इस समय को निचोड़ने के लिए राज्य के सारे बल का इस्तेमाल।फिर विद्रोह क्यों नहीं? उनके जन्म के 202 साल बाद मार्क्स का वही पुराना सवाल नया बन कर सामने आ खड़ा हुआ है।अपूर्वानंद दिल्ली यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं। Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today The year 2020 is the year of renewed Karl Marx's return, so the term of this year will not be just Corona Full Article
2 26 अप्रैल को आ गई थी रिपोर्ट, मरीज को 2 मई को मिली, हॉस्पिटल ने 76 हजार रुपए भरवाए By Published On :: Thu, 07 May 2020 01:34:49 GMT जो इंदौर कोरोनावायरस का हॉटस्पॉट बना हुआ है, वहां अब मरीजों से कोरोना के नाम पर लूट की शिकायतें भी सामने आ रही हैं। कुछ ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें कोरोना की रिपोर्ट के आधार पर मरीजों को जबरन हॉस्पिटल में एडमिट किया गया और फिर लंबा बिल थमा दिया गया।एक कोरोना मरीज की रिपोर्ट 26 अप्रैल को आ गई थी लेकिन मरीज को उसके बारे में 2 मई को पता चला। हॉस्पिटल ने मरीज से 2 मई तक का कुल 76 हजार रुपए बिल भरवाया।इसी तरह के अन्य मामले में हॉस्पिटल मरीज की रिपोर्ट देने से इंकार करता रहा और मरीज के परिजन खुद ही लैब से रिपोर्ट लेकर हॉस्पिटल पहुंच गए, तब जाकर कहीं मरीज की छुट्टी हो पाई।पहला मामला 59 वर्षीय ओमप्रकाश पांडे का है। उन्हें तेज बुखार के बाद 24 अप्रैल को गोकुलदास हॉस्पिटल में एडमिट करवाया था।निमोनिया से संक्रमित पाए गए ओमप्रकाश 28 अप्रैल तक ठीक हो चुके थे। इसके बाद परिजनों ने हॉस्पिटल प्रबंधन से डिस्चार्ज करने की बात कही।अपने परिवार के साथ ओमप्रकाश पांडे।इस पर हॉस्पिटल ने यह कहते हुए डिस्चार्ज करने से मना कर दिया कि अभी कोरोना की रिपोर्ट नहीं आई है और मरीज कोरोना संदिग्ध हैं। इसलिए डिस्चार्ज नहीं कर सकते।परिजनों ने भी प्रबंधन की बात का समर्थन किया लेकिन उनका सब्र तब टूट गया जब रिपोर्ट अगले चार दिनों तक भी उन्हें नहीं दी गई।मरीज की परिजन नम्रता पांडे ने बताया कि, प्रबंधन रिपोर्ट के बारे में कोई पुख्ता जानकारी नहीं दे रहा था। वे लोग सिर्फ इंतजार करने का कह रहे थे।फिर जब 2 मई को हमने काफी ज्यादा पूछताछ की तो बताया गया कि आपकी रिपोर्ट धोखे से अहमदाबाद चली गई है, जो शाम तक आ जाएगी।इसी बीच नम्रता के एडवोकेट भाई ने छोटी ग्वालटोली थाने के जरिए रिपोर्ट की जानकारी ली। वहां से पता चला कि ओमप्रकाश पांडे की रिपोर्ट नेगेटिव है। जो 26 अप्रैल को ही आ गई थी।जबकि हॉस्पिटल ने इस बात की जानकारी मरीज को 2 मई को दी। उन्होंने पूछा कि, रिपोर्ट 26 अप्रैल को आ गई थी तो हमें 2 मई को क्यों दी गई तो प्रबंधन ने कहा कि, हमें 2 मई को ही मिली, इसलिए लेट दी।इसके बाद मरीज से 2 मई तक का 76 हजार रुपए बिल जमा करवाया गया। इसका मरीज के परिजनों ने पहले विरोध किया लेकिन बाद में उन्हें पैसे जमा करना ही पड़े।तेज बुखार के बाद ओमप्रकाश पांडे को हॉस्पिटल में एडमिट करवाया गया था।नम्रता का कहना है कि, हमारे पिताजी का निमोनिया का इलाज हुआ है। वो 27-28 अप्रैल को ही ठीक हो गए थे।हमें 28 तक का पैसा भरने में कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन 2 मई तक रिपोर्ट के बारे में न बताकर हमारे साथ धोखाधड़ी की गई है।मरीज को लिखित में रिपोर्ट नहीं दी गई। सिर्फ मौखिक बताया गया कि रिपोर्ट नेगेटिव है और 2 मई को डिस्चार्ज कर दिया गया।नम्रता ने बुधवार रात इस मामले में पुलिस में लिखित में शिकायत दर्ज करवाई।जिम्मेदार बोले, 48 से 72 घंटे तक का लगता है समयभास्कर ने इंदौर में कोरोनावायरस की रिपोर्ट का कामकाज देख रहे एमवाय के डॉ.बृजेश लाहोटी (पीडियाट्रिक सर्जन) से रिपोर्ट तैयार होने की प्रक्रिया और समय जाना।उन्होंने बताया कि, रिपोर्ट तैयार होने में 48 से 72 घंटे तक लग जातेहैं। लैब से रिपोर्ट आने के बाद डीन के पास जाती है।वहां से सभी प्रक्रियाएं पूरी होने के बाद ईमेल के जरिए उसी दिन हॉस्पिटल को भेज दी जाती है।उन्होंने बताया कि, रिपोर्ट के पहले और बाद की कागजी प्रक्रिया भी काफी लंबी है। सभी जानकारियों का दो बार मिलान होता है इसके बाद ही रिपोर्ट जारी कर पाते हैं, ताकि किसी तरह की गड़बड़ी न हो।थाने से जो पीडीएफ मिली, उसमें तारीख 26 अप्रैलनम्रता के भाई ने अपने व्यक्तिगत संपर्क से छोटी ग्वालटोली थाने से कोरोना जांच वाले मरीजों की लिस्ट निकवाई तो वहां से पता चला कि ओमप्रकाश पांडे की रिपोर्ट 26 अप्रैल को ही नेगेटिव आ गई थी।सभी एसडीएम द्वारा थानों को भी कोरोना मरीजों की रिपोर्ट मुहैया करवाई जा रही है, ताकि वे पॉजिटिव मरीजों को क्वारेंटाइन करवा सकें।अब सवाल ये खड़े हो रहे हैं कि, जब रिपोर्ट 26 अप्रैल को आ गई थी तो फिर मरीज को छटवें दिन क्यों दी गई? और इन दिनों के पैसे भी जमा करवाए गए।डॉक्टर ने कहा, बिल का क्या है मैडमनम्रता ने बताया कि, डिस्चार्ज करने पर जब मैंने हॉस्पिटल में डॉक्टर से कहा कि सर हमारा बिल बढ़ रहा है और हम इतना अफोर्ड नहीं कर सकते।उन्होंने जवाब दिया कि, बिल का क्या है मैडम। बाहर जाओ, पुलिस डंडे मारती है तब भी तो बचने के लिए पैसे देना ही होते हैं।हॉस्पिटल ने 76 हजार 600 रुपए बिल वसूला।नम्रता के मुताबिक, हमारा परिवार जिस स्थिति से गुजरा, उसे बयां भी नहीं कर सकते। मेरे देवर आर्मी में हैं, जो अभी असम में पोस्टेड हैं। घर में चार बच्चे, देवरानी और पति हैं।जब तक पिताजी की रिपोर्ट नहीं आई तब तक हम लोग मानसिक रूप से प्रताड़ित होते रहे। दिनरात चिंता लगी रहती थी। न खाने में मन लगता था, न ही नींद आती थी।बोंली, रिपोर्ट देरी से आई या हॉस्पिटल ने देर से दी तो इसमें हमारी क्या गलती। यह खर्चा हम क्यों भुगतें।रश्मि तिवारी का भी ऐसा ही मामलाराधानगर की रहने वाली कोरोना पॉजिटिव रश्मि तिवारी के साथ भी ऐसा ही मामला सामने आया है। वे भी एक निजी अस्पताल में एडमिट थीं।पहले उनकी रिपोर्ट 2 मई को आने वाली थी। लेकिन नहीं आई।फिर उनका 4 मई को दोबारासैंपल लिया गया और कहा गया कि पिछले सैंपल की रिपोर्ट नहीं आ पाई है, इसलिए ये सैंपल ले रहे हैं।शक होने पर उनके पतिविशाल तिवारी ने एमजीएम मेडिकल कॉलेज में संपर्क किया तो उन्हें 4 मई को ही वहां से रिपोर्ट मिल गई जो नेगेटिव निकली। उन्होंने रिपोर्ट हॉस्पिटल में दिखाई तो मरीज की उसी दिनछुट्टी कर दी गई। Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today Indore Coronavirus Latest News Updates; COVID19 Hospital Looting Suspect Patients In The Name Of Corona Report Full Article
2 ऑनलाइन आपूर्ति नहीं हो रही, 2 घंटे दुकानें खोलने की छूट दें By Published On :: Tue, 28 Apr 2020 23:30:00 GMT काेराेना संक्रमण के चलते शहर में जारी लाॅकडाउन के साथ ही अनिश्चितकालीन कर्फ्यू व के ग्रामीण क्षेत्रों में एक महीने से ज्यादा समय से जारी बंद से लाेगाें की स्थिति खराब हाे चुकी है। प्रशासनिक स्तर पर आवश्यक सामग्रियाें की व्यवस्था करने संबंधी दुकानें खाेलने के लिए जाे दिशा-निर्देश जारी किए थे, उनका समुचित पालन नहीं हाेने से परेशानियां बढ़ती जा रही हैं। इस अाशय का एक ज्ञापन नगर कांग्रेसाध्यक्ष महेश जायसवाल ने एसडीएम अभिलाष मिश्रा काे माेबाइल के माध्यम से प्रेषित कर समस्या के निराकरण की मांग की है।ज्ञापन से उन्हाेंने बताया महू का व्यवसाय, यातायात व सामान्य जीवन ठप हो गया है। इस संक्रामक बीमारी से निजात पाने के लिए आपके द्वारा प्रशासनिक कार्रवाई की गई है। इनमें से कुछ कार्रवाई तो सफल है कुछेक की निगरानी नहीं होने से गुणात्मक सुधार नजर नहीं आ रहे हैं। उन्हाेंने चार सवालाें के अाधार पर ज्ञापन मेें समस्याओंकी जानकारी देते हुए बताया कि जिन काेराेना संदिग्धाें के सैंपल लिए गए हैं। उनकी रिपोर्ट लंबे समय से नहीं मिल पा रही है। समय से रिपोर्ट नहीं मिल पाने की स्थिति में डाॅक्टर उनका उपचार अन्य दवाइयों के आधारहीन प्रयोग से कर रहे हैं। इस दौरान कुछ की ताे मौत हाे चुकी है। कम मात्रा में सामग्री मांगने पर नहीं दे रहे दुकानदारलाॅकडाउन व अनिश्चितकालीन कर्फ्यू के चलते प्रशासनिक स्तर पर आवश्यक सामग्री की अाॅनलाइन अापूर्ति नहीं हाे पा रही है। विशेषकर जिन किराना दुकान संचालकाें की सूचना प्रशासन ने वाट्स-एप मैसेज व अखबारों के माध्यम से करीब 25 दिन पहले सार्वजनिक की थी, वे आपूर्ति नहीं कर रहे हैं। ये संबंधित किराना व्यवसायी छोटे जरूरतमंद तबकों के परिवार को कम मात्रा में किराना सामग्री मांगने पर नहीं दे रहे हैं। कई ऑनलाइन किराना दुकानदारों ने दिए गए मोबाइल नंबर भी बंद कर रखे हैं। आग्रह है गली-मोहल्लाें की कुछ किराना दुकानाें काे राेज करीब दाे घंटे खाेलने की रियायत दी जाए, जिससे आम छोटे तबकों के जरूरतमंद वर्ग को किराना सामान मिल सके। इसी प्रकार साग-सब्जी, फल के वितरण के लिए व्यवस्था संबंधी योजना बनाई जाए। नगर के आसपास करीब 170 से अधिक ग्रामीण क्षेत्र हैं। इनके वासियाें का जीविकोपार्जन कृषि उत्पादन से होता है। इनके माध्यम से उत्पादित सब्जी, आलू, प्याज, फल के लिए प्रशासन सोसाइटी के माध्यम से केंद्र बनाकर आमजनता काे उपलब्ध कराई जाए।उन्हाेंने यह भी मांग रखी कि निजी डाॅक्टराें के नगर में 25 से अधिक क्लिनिक हैं, कुछ उनके निवास स्थान पर हैं। आम दिनाें में इन डॉक्टराें के पास 50-100 से अधिक मरीज चेकअप करा अपना इलाज कराते हैं। इनमें छह से अधिक डॉक्टर ताे बच्चाें का इलाज करते हैं। डॉक्टरों ने स्वयं को काेराेना वायरस संक्रमण से सुरक्षित करने के उद्देश्य वर्तमान में अपने निजी क्लिनिक बंद कर दिए हैं। इसकी वजह से आम मरीज अधूरे इलाज के अभाव में अपना जीवन घर में गुजार रहे हैं। उपचार नहीं मिल पाने से जीवन-मौत से जूझ रहे हैं। अतः निजी डॉक्टरों के क्लिनिक को खुलवाया जाए अन्यथा इनके विरूद्ध कार्रवाई की जाए। एसडीएम मिश्रा ने इन बिंदुअाें पर ध्यान देकर इस संबंध में उचित निर्णय लिए जाने का अाश्वासन दिया है। Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today No supply online, allow 2 hours to open shops Full Article
2 महू में 15 नए पॉजिटिव, इनमें से 2 की पहले ही हो चुकी है मौत, अब तक 61 संक्रमित, 32 में से 17 की रिपोर्ट आई निगेटिव By Published On :: Tue, 28 Apr 2020 23:30:00 GMT शहर में कोरोना संक्रमितों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। मंगलवार देर रात मिली 32 और सैंपल रिपोर्टों में से 15 पॉजिटिव निकली हैं, शेष 17 की रिपोर्ट निगेटिव आई है। संक्रमितों का अब तक का यह सबसे बड़ा आंकड़ा है। पॉजिटिव रिपोर्टों में शामिल दो की रिपोर्ट आने के पहले मौत हो चुकी है। इन्हें मिलाकर संक्रमितों की कुल संख्या 61 हो चुकी है। कुल संक्रमितों की रिपोर्ट में शामिल मृतकों की संख्या आठ हो चुकी है। जिन 15 लोगों की रिपोर्ट आई है उनमें शहर के दो नए क्षेत्रों पेंशनपुरा और राजा गली के भी शामिल हैं।स्थानीय प्रशासन ने अागामी अादेश तक के लिए कर्फ्यू लगाया है। मंगलवार काे शहर के विभिन्न स्थानाें पर लाेग कर्फ्यू का उल्लंघन करते हुए घर से ही सब्जी व किराना का व्यापार कर रहे थे। इस मामले में पुलिस-प्रशासन ने अलसुबह ही दबिश देकर ऐसे लाेगाें काे पकड़ा। इसमें सब्जी बेचने के मामले में महिला सहित दाे व बेवजह घूमते हुए पांच लाेगाें पर लाॅकडाउन उल्लंघन की कार्रवाई की गई। अभी भी लोगों द्वारा लॉकडाउन का पालन नहीं किया जा रहा है। यदि ऐसा ही रहा तो संक्रमण का खतरा अाैर बढ़ने की संभावना है।शहर में मंगलवार सुबह छह बजे से ही नायब तहसीलदार रीतेश जाेशी पुलिस बल के साथ हाट मैदान पहुंचेे। यहां पर भगवान काैशल अपने घर से ही बड़ी मात्रा में सब्जी बेचने का काम करता मिला। जिस पर सब्जी जब्त करने के साथ ही उसे पकड़कर थाने भिजवाया। इसके अलावा गुजरखेड़ा में भी राधा नामक महिला अपने घर से सब्जी बेच रही थी। टीम ने उसे भी पकड़ा व थाने भिजवाया।188 में कार्रवाई : हाट मैदान के काैशल काे दूसरी बार सब्जी बेचते पकड़ा...प्रशासन ने हाट मैदान में भगवान काैशल काे घर से सब्जी बेचते हुए पकड़ा है। इस पर घर से सब्जी बेचने व लाॅकडाउन उल्लंघन की दूसरी बार कार्रवाई की गई है। इससे पहले भी कर्फ्यू के दाैरान प्रशासन काैशल काे घर से सब्जी बेचने के मामले में पकड़ा जा चुका है, उस पर लाॅकडाउन उल्लंघन के तहत 188 की कार्रवाई की गई थी।बेवजह घूम रहे लोगों को कोर्ट में पेश किया : राजमाेहल्ला, श्याम विलास चाैराहा, हाट मैदान आदि क्षेत्राें से प्रशासन ने दाेपहिया वाहनाें पर बेवजह घूम रहे उमेश पिता श्रीराम पाल निवासी गुजरखेड़ा, भीम पिता कुंजीलाल काैशल निवासी हाट मैदान, पिंटू पिता रामअवतार वर्मा निवासी राजमाेहल्ला पर भी केस दर्ज किया। दाेपहर में इन सभी काे प्रशासन ने न्यायालय में भी पेश किया गया। शहर के अलग-अलग इलाकाें में काेराेना संक्रमित मिलने के बाद बनाए गए कंटेनमेंट एरिया में लाेगाें की सुबह के समय खासी चहल-पहल देखी जा रही है। इसके लिए प्रशासन काे सतर्कता बरतने की खासी जरूरत है।घर से बेच रहा था किराना, दुकान बंद करवाई...नायब तहसीलदार जाेशी काे सूचना मिली थी कि गाेकुलगंज क्षेत्र में कुणाल नामक व्यक्ति अपने घर से ही किराना बेच रहा है। जिस पर टीम ने वहां दबिश दी, ताे कुणाल अपने घर से ही लाेगाें काे किराना सामग्री बेचता मिला। जिस पर उसे भी पकड़कर थाने भिजवाया। अभी कर्फ्यू के दाैरान प्रशासन ने सिर्फ एक दिन छाेड़कर एक दिन किराना सामग्री हाेम डिलीवरी के माध्यम से ही सप्लाय करने की अनुमति दी है। इसके बावजूद नगर में सब्जी बेची जा रही है।एसएएफ की कंपनी भी शहर पहुंची, आज से 80 जवान संभालेंगे माेर्चाशहर में लगातार बढ़ रहे काेराेना संक्रमित अांकड़े काे लेकर लाेगाें से सख्ती के साथ लाॅकडाउन का पालन कराने के लिए पुलिस-प्रशासन लगातार काेशिश कर रहा है। इसी के चलते अब ईगल वन कमांडेंट छिंदवाड़ा धर्मराज मीणा ने एसएएफ के 80 जवानाें की कंपनी अाैर बुलवाई है। इस कंपनी के जवानाें काे बुधवार से शहर के विभिन्न पाइंट पर तैनात किया जाएगा, जिससे लाॅकडाउन का पालन अाैर बेहतर तरीके से हाे सके। Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today 15 new positives in Mhow, 2 of them have already died, 61 infected so far, 17 out of 32 reported negative Full Article
2 दाहोद के क्वारेंटाइन सेंटरों से 230 लोग लौटे, राजस्थान-उत्तर प्रदेश वाले भी जाएंगे By Published On :: Tue, 28 Apr 2020 23:30:00 GMT गुजरात से मजदूरों को लाने के लिए बॉर्डर चार दिन पहले खोली गई, लेकिन अभी तक इसका कुछ खास फायदा नजर नहीं आ रहा। सैकड़ों गाड़ियां लोगों को अपने जिले में छोड़ने के लिए बुलवाई गई, लेकिन गुजरात की तरफ से लोग आ नहीं रहे। अब प्रदेश सरकार और गुजरात सरकार की बात चल रही है। गुजरात से आसपास के जिलों के मजदूर बसों से छुड़वा दिए गए, लेकिन दूर के जिलों के नहीं। अब ये चर्चा की जा रही है कि या तो गुजरात सरकार मजदूरों को लाकर यहां छोड़ दे या प्रदेश की बसों को वहां तक जाने की अनुमति दे दी जाए। अभी राजस्थान और उत्तर प्रदेश से भी इसे लेकर बात चल रही है।अब तक इतने आए 3575 मजदूर 74गाड़ियों से भेजेउप्र और राजस्थान के लोग वहां ज्यादा संख्या में हैंमजदूरों के अलावा दाहोद के 42 क्वारेंटाइन सेंटरों में लॉकडाउन के समय से रह रहे प्रदेश के 230 लोग यहां आ चुके हैं। प्रदेश के अलावा उत्तर प्रदेश और राजस्थान के लोग वहां ज्यादा संख्या में हैं। दाहोद कलेक्टर विजय खराड़ी ने बताया, जैसे ही कोई निर्णय होता है और निर्देश आते हैं, वैसा किया जाएगा।छांव के लिए टेंट लगाएगुजरात की ओर से आने वालों की स्क्रीनिंग की जगह पर टेंट नहीं होने से 40 डिग्री तापमान के बीच लोगों को धूप में कतार में खड़े रहकर इंतजार करना पड़ रहा था। इनमें बच्चे भी शामिल थे। दैनिक भास्कर में खबर के बाद स्क्रीनिंग वाली जगह पर टेंट व्यवस्था की गई। Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today 230 people returned from quarantine centers of Dahod, Rajasthan-Uttar Pradesh people will also go Full Article
2 सड़क किनारे सोते वक्त मजदूरों को ट्रक ने रौंदा, तीन की मौत; जैसलमेर से गांव लौट रहे थे 12 लोग By Published On :: Wed, 29 Apr 2020 08:33:41 GMT कोरोनावायरस के प्रकोप से बचकर राजस्थान के जैसलमेर से लौटे तीन मजदूरों की ट्रक से कुचलकर मौत हो गई। हादसा बुधवार तड़के भैरवगढ़ स्थित साडू माता मंदिर सड़क के मोड़ पर हुआ। हादसे के वक्तमजदूर सड़क के किनारे सो रहे थे।जानकारी के अनुसार उज्जैन के मोहनपुरा गांव के 12 मजदूर राजस्थान के जैसलमेर में मजदूरी करने गए थे। कोरोनावायरस के चलते लॉकडाउन होने से वे जैसलमेर में ही फंस गए। मध्य प्रदेशसरकार द्वारा बस भेजकर राजस्थान सेमजदूरों को यहां लाया गया था। इसमें यह सभी12 मजदूर भी शामिल थे।राजस्थान से आए इन मजदूरों ने जब अपने गांव में प्रवेश करना चाहा तो गांववालों ने आपत्ति जताईऔर कोरोना जांच कराने को कहा। इसके बाद यह मजदूर गांव से पैदल चलकर उज्जैन के आरडी गार्डी मेडिकल कॉलेज जांच के लिए पहुंचे। संभवत: वहां से लौटते समय भैरवगढ़ स्थित साडू माता मंदिर के पास सड़क किनारे सो गए थे।तड़के लगभग 4 बजे इंदौर से मैदा लेकर उज्जैन से गुजर रहा एक ट्रक इन मजदूरों पर चढ़ गया। हादसे में तीन मजदूरों की मौके पर ही मौत हो गई। हादसे के बाद ड्राइवर ट्रक छोड़कर भाग गया। पुलिस के अनुसार मृतकों में दो पुरुष व एक महिला शामिल है। जिनकी शिनाख्त विक्रम, बद्री और भोली बाई निवासी ग्राम मोहनपुरा, भैरवगढ़ थाना क्षेत्र के रूप में की गई है। Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today हादसा बुधवार तड़के भैरवगढ़ स्थित साडू माता मंदिर सड़क के मोड़ पर हुआ। हादसे के समय मजदूर सड़क के किनारे सो रहे थे। Full Article
2 उत्तर प्रदेश सरकार अपने लोगों को नहीं अाने दे रही, 2 दिन में 600 लोगों को पिटोल से वापस गुजरात भेजा By Published On :: Thu, 30 Apr 2020 01:58:00 GMT गुजरात में फंसे लोगों को घर तक पहुंचाने के मामले में यहां के प्रशासन और पुलिस का काम बढ़ गया है। 25 से 27 तारीख तक सभी प्रदेशों के लोग आ रहे थे, लेकिन अब उत्तर प्रदेश के लोगों को नहीं आने दिया जा रहा। दरअसल उत्तर प्रदेश सरकार ने अपने यहां की सीमाएं पूरी तरह सील कर दी हैं। ऐसे में गुजरात से प्रदेश में आ गए वहां के लोगों को वापस गुजरात भेजा जा रहा है। 2 दिन में लगभग 600 लोग लौटा दिए गए हैं। कई लोग मोटरसाइकिलों, ऑटो रिक्शा, साइकिल और साइकिल रिक्शा से पिटोल बॉर्डर पर पहुंचे। इन सब की गाड़ियां जब्त कर बसों में बिठाकर गुजरात के गोधरा भेज दिया गया।गुजरात से जो लोग आ रहे हैं उनमें बड़ी संख्या में उत्तर प्रदेश के लोग भी हैं। इन लोगों को उम्मीद थी कि सीमावर्ती जिलों तक पहुंचकर यह उत्तर प्रदेश की सीमा में चले जाएंगे और वहां से अपने गांव या घर। लेकिन उनकी यह उम्मीद गलत निकली। 25, 26 और 27 तारीख को जो लोग प्रदेश के लोगों के साथ उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती जिलों में पहुंचे, उन्हें यूपी पुलिस ने अंदर नहीं आने दिया।गुजरात के भरूच में साइकिल रिक्शा से सामान यहां से वहां ढोने का काम करने वाले लाला और अरविंद अपने परिवारों को इन्हीं साइकिल रिक्शा में बिठाकर 8 दिन पहले भरूच से निकले। बुधवार दोपहर पिटोल बॉर्डर पहुंचे तो यहां पुलिस वालों ने रोक लिया। लाला बताते हैं वह कानपुर के पास भोगिनीपुरा के रहने वाले हैं। भरूच में खाना-पीना मिलना बंद हो गया था। राशन भी नहीं था, इसलिए बीवी, बच्चों को लेकर निकल पड़े। अरविंद की भी यही कहानी है। वह कानपुर के पास अकबरपुर जा रहे हैं। बोले अब समझ नहीं आ रहा क्या होगा। यहां फंसे पड़े हैं। पुलिस वाले कह रहे साइकिल अभी वापस नहीं देंगे।अहमदाबाद से ऑटो से ले आए परिवार को : ऋषि अहमदाबाद में ऑटो चलाते हैं। उन्हें जब खबर मिली कि यहां से लोग जा रहे हैं तो अपने घर के लिए निकल पड़े। उन्हें जाना मुरैना जिले में है। ऋषि ने बताया मंगलवार को निकले थे लेकिन इसके पहले कई दिन तक किसी बस या दूसरे वाहन का इंतजार करते रहे। नहीं आया तो ऑटो से ही निकल आए। यहां पता चला कि बस से आगे भेज देंगे, लेकिन हम ऑटो कहां छोड़े। अब वापस भी नहीं जाने दे रहे। हमारी रोजी-रोटी ऑटो से चलती है। इसे यहां छोड़कर नहीं जा सकते। पुलिस वालों से हाथ जोड़कर विनती कर रहे हैं कि अगर आगे नहीं जाने दे रहे तो कम से कम वापस अहमदाबाद ही जाने दो।बाइक रखवा ली, वापस भेज रहे हैंअरविंद और रामराज उत्तर प्रदेश के बस्ती के रहने वाले हैं। सूरत से मंगलवार को 20 और लोगों के साथ बाइक से निकल आए। अरविंद ने बताया यहां आकर बाइक जब्त कर ली और बसों में बिठाकर वापस भेज रहे हैं। कुछ समझ नहीं आ रहा क्या करें। हमें बताया कि उत्तरप्रदेश में अंदर नहीं आने दे रहे इसलिए वापस भेज रहे हैं। सूरत में काम नहीं है, खाने को भी नहीं ऐसे में वहां से निकल आना हमारी मजबूरी थी। यूपी सरकार से विनती है हमें अपने घर जाने दे।ये करेंगे गाड़ियों का : उत्तरप्रदेश सरकार के इनकार के बाद अब यहां पुलिस वाले गुजरात से आ रहे यूपी के नागरिकों के वाहन जब्त कर पिटोल चौकी पर रखेंगे। लॉकडाउन खत्म होने के बाद इनके मालिकों को लौटा दिया जाएगा। उन्हें यहां आकर गाड़ियां वापस लेना पड़ेंगी।वापस आए लोगों को गोधरा भेजा हैवापस आए इन लोगों को प्रदेश के ही क्वॉरेंटाइन सेंटरों में रखा गया या फिर वापस गुजरात भेज दिया गया। अब 2 दिन से पिटोल में ही उत्तर प्रदेश के लोगों को रोका जा रहा है। उन्हें गुजरात के लिए तैयार खड़ी बसों में बिठाकर रवाना किया जा रहा है। फिलहाल गोधरा भेजा जा रहा है। वहां गुजरात प्रशासन तय करेगा कि इनके घर भेजना है या वहां किसी सेंटर में ही रखना है।प्रदेश के 3 हजार लोग ही लौटे5 दिनों में गुजरात से लौटने वाले प्रदेश के नागरिकों की संख्या 3 से सवा 3 हजार है। इन्हें बसों से इनके घर के लिए रवाना कर दिया गया। अभी भी डेढ़ सौ से ज्यादा बसें और जीप पिटोल बॉर्डर पर खड़ी हैं लेकिन इतनी संख्या में लोग यहां पहुंच नहीं रहे हैं। दोनों राज्यों के बीच बड़े स्तर पर चल रही बातचीत के बाद यह संख्या बढ़ सकती है। खबर है कि कई लोग गुजरात से आने की तैयारी करके बैठे हैं, लेकिन उन्हें वहां साधन नहीं मिल रहे। चर्चा इस बात पर हो रही है कि या तो गुजरात सरकार बसों से पिटोल भेज दे या वहां तक यहां से बसों को जाने की इजाजत दे दी जाए। Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today Uttar Pradesh government is not allowing its people, in 2 days 600 people were sent back from Gujarat from Pitol Full Article
2 पिछले साल अप्रैल में 400 से ज्यादा तापमान 23 दिन रहा, इस साल 9 दिन ही By Published On :: Thu, 30 Apr 2020 03:11:41 GMT लॉकडाउन के कारण प्रदूषण कम हुआ तो गर्मी भी कम पड़ रही है। अप्रैल में भी लू के थपेड़े अब जाकर महसूस हो रहे हैं। जबकि हर साल मार्च के आखिर में मौसम ऐसा हो जाता है। पिछले साल मार्च के आखिरी तीन दिन जितना तापमान था, वो इस साल अप्रैल के आखिरी में हुआ। ोसाल 2019 में अप्रैल महीने में 23 दिन अधिकतम तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा रहा। इस बार ऐसा 9 दिन हुआ। गुरुवार को महीने का आखिरी दिन है। आज भी पारा 40 डिग्री रहा तो कुल 10 दिन होंगे।ज्यादा तापमान और लू के थपेड़ों के बीच दोपहर बाद आसमान में बादल भी छाए। लेकिन इनके कारण गर्मी कम नहीं हुई। फिलहाल लोग घरों में हैं तो गर्मी से राहत मिली हुई है। मई में अगर लॉकडाउन खुलता है तो गर्मी सहन कर पाना मुश्किल होगा। मौसम विभाग के अनुसार अब तापमान ज्यादा बना रह सकता है। मौसम विभाग से मिले पूर्वानुमान के अनुसार फिलहाल 3 मई तक तो पारा 40 डिग्री से ज्यादा ही रहेगा। अच्छे मानसून के लिए ये जरूरी भी है।अधिकतम तापमान1 डिग्री कमसाल 2019 की 27 अप्रैल को अधिकतम तापमान 43 डिग्री सेल्सियस था। इस बार सबसे ज्यादा तापमान 15 अप्रैल काे 42 डिग्री सेल्सियस रहा। मार्च काे देखा जाए तो 2019 के मार्च की 29, 30 और 31 तारीख को तापमान 40 डिग्री से ज्यादा था। इस बार मार्च भी ठंडा था। 13 मार्च को तापमान 28 डिग्री से ऊपर नहीं गया। इस दिन न्यूनतम तापमान 10.6 डिग्री था। Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today Last year in April, more than 400 temperatures were 23 days, this year only 9 days. Full Article
2 पॉजिटिव आने की रफ्तार गिरी, स्वस्थ होने वालों की तादाद बढ़ी; तीन अस्पतालों से घर लौटे 44 मरीज, अब तक 221 स्वस्थ By Published On :: Thu, 30 Apr 2020 03:11:49 GMT कोरोना से गंभीर पीड़ित मकमुद्दीन आखिर 25 दिन चले इलाज के बाद स्वस्थ होकर बुधवार को घर लौट गए। अधिक उम्र और फेफड़ों में इंफेक्शन जैसी कई परेशानियों से जूझ रहे मकमुद्दीन का इलाज करना एमआर टीबी अस्पताल के डॉक्टर्स के लिए भी चुनौतीपूर्ण था। चेस्ट फिजिशियन डॉ. सलिल भार्गव ने बताया कि 4 अप्रैल को मकमुद्दीन को जब आईसीयू में लाए, तब हालत काफी गंभीर थी और सांस लेने में परेशानी आ रही थी। तेज बुखार के साथ खांसी भी बहुत ज्यादा चल रही थी। उस समय उनका ऑक्सीजन लेवल 76% रह गया था। उन्हें तुरंत ऑक्सीजन के साथ नॉन इनवेंसिव वेंटिलेटर पर रखा। साथ ही एंटीबायोटिक, हाइड्राॅक्सी क्लोरोक्विन टैबलेट, एजीथ्रोमायसिन, स्ट्रोइड, विटामिन सी के साथ सपोर्टिव ट्रीटमेंट दिया।जब इनके ब्लड से स्पेशल जांच एबीजी कराई तो उसमें वे मॉडरेट एआरडीएस की कैटेगरी में मिले। इनका एक्स-रे भी बहुत खराब आया। दोनों फेफड़ों में निमोनिया और ग्राउंड ग्लास ऑपेसिटी थी। इस तरह के मरीजों को सारी (सीवियर एक्यूटरे स्पिरेट्री इंफेक्शन) में रखा जाता है। करीब 10 से 12 दिनों तक नॉन-इनवेंसिव वेंटीलेटर पर रखने के बाद उन्हें बाहर निकालने में सफल रहे। उसके बाद 10 दिन तक ऑक्सीजन पर रखा। ऑक्सीजन हटाने के बाद भी स्थिति ठीक रही। उनका ऑक्सीजन स्तर 94% है और एक्स-रे भी सामान्य हो गया है। इसके बाद हमने 24 घंटे के अंतराल में दो टेस्ट करवाए, जो निगेटिव निकले। अब वे स्वस्थ हैं। - डॉ. सलिल भार्गव, सीनियर चेस्ट फिजिशियनये थे टीम में शामिलएमआरटीबी हॉस्पिटल की इलाज करने वाली टीम में डॉ. संजय अवर्सिया, डॉ. दीपक बंसल, डॉ. मिलिंद बल्दी, डॉ. सुनील मुकाती, डॉ. दिलीप चावड़ा, डॉ. विजय अग्रवाल, डॉ. शैलेंद्र जैन, डॉ. तपन, डॉ. सुदर्शन शामिल थे।आप इंदौर में अटके हैं या अन्य जिलों में तो indore.nic.in पर अपलोड करें जानकारी।2 मई से सैनिटाइज की सब्जी घर-घर मिलेगी, एक पैक में 8 सब्जियां, रेट 150 रुपएनगर निगम की घर-घर सब्जी पहुंचाने की योजना 2 मई से शुरू होगी। लोगों को इसका ऑर्डर किराना वालों को देना होगा, उसी दिन से डिलीवरी मिलेगी। 4 किलो के पैक में 8 तरह की सब्जियां होंगी, जिसका रेट 150 रुपए रहेगा। खंडवा रोड पर 7 स्थानों पर इनकी पैकिंग के बाद अल्ट्रावॉयलेट किरणाें से सैनिटाइजेशन होगा। कलेक्टर मनीष सिंह और निगमायुक्त आशीष सिंह ने सभी 85 वार्ड के प्रभारियों के साथ बैठक कर योजना को फाइनल किया। ये पैकेट 10 रुपए डिलीवरी चार्ज जोड़कर 150 रुपए में लोगों को मिलेगा। एक व्यक्ति का एक ही ऑर्डर लेंगे।। यह होगा पैक में- मिर्ची-200 ग्राम, अदरक-100 ग्राम, धनिया-200 ग्राम, नींबू-2, लौकी/गिलकी-1 किलो, भिंडी-500 ग्राम, टमाटर-1 किलो, सीजनल सब्जी 1 किलो (बैंगन, पालक, ककड़ी, गाजर, गोभी) Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today फाइल फोटो Full Article
2 पिछले साल की अपेक्षा पांच दिन पहले 22 जून को आएगा मानसून By Published On :: Thu, 30 Apr 2020 03:12:15 GMT इस साल दक्षिण-पश्चिम मानसून पिछले साल के मुकाबले पांच दिन पहले इंदौर में दस्तक देगा। इंदौर सेे पहले खंडवा, खरगोन में यह प्रवेश करेगा। मध्यप्रदेश के किस जिले में कब मानसून सक्रिय होगा, इसकी तारीख मौसम विभागने जारी कर दी। इंदौर जिले में मानसून 22 जून तक आएगा और 22 सितंबर तक विदा हो जाएगा।पिछले साल 27 जून को आमद हुई थी। वैसे मानसून दस्तक देने की तारीख 15 जून मानी जाती है, लेकिन पिछले दो-तीन साल मानसून देरी से आया। पिछले साल 27 जून को आया था और 30 सितंबर को विदा होने के बाद भी अक्टूबर मध्य तक जोरदार बारिश होती रही। इस बार भी प्रदेश में सामान्य बारिश होने के आसार हैं। वहीं देश में 96 से 104 फीसदी तक बारिश होने का अनुमान है। कहीं-कहीं औसत से भी ज्यादा बारिश हो सकती है। मौसम विशेषज्ञ एके शुक्ला ने बताया मध्यप्रदेश में 1 जून से 30सितंबर तक की अवधि बारिश की मानी जाती है, लेकिन हर जिले में मानसून अलग-अलग तारीखों पर पहुंचता है। 30 मई तक केरल पहुंचने के बाद यह मध्यप्रदेश का रुख करता है। इंदौर से पहले खंडवा में 19 से 20 जून तक मानसून पहुंचेगा। खंडवा और इंदौर से मानसून विदाई की तारीख समान है।इस साल दक्षिण-पश्चिम मानसून पिछले साल के मुकाबले पांच दिन पहले इंदौर में दस्तक देगा। इंदौर सेे पहले खंडवा, खरगोन में यह प्रवेश करेगा। मध्यप्रदेश के किस जिले में कब मानसून सक्रिय होगा, इसकी तारीख मौसम विभागने जारी कर दी। इंदौर जिले में मानसून 22 जून तक आएगा और 22 सितंबर तक विदा हो जाएगा।पिछले साल 27 जून को आमद हुई थी। वैसे मानसून दस्तक देने की तारीख 15 जून मानी जाती है, लेकिन पिछले दो-तीन साल मानसून देरी से आया। पिछले साल 27 जून को आया था और 30 सितंबर को विदा होने के बाद भी अक्टूबर मध्य तक जोरदार बारिश होती रही। इस बार भी प्रदेश में सामान्य बारिश होने के आसार हैं। वहीं देश में 96 से 104 फीसदी तक बारिश होने का अनुमान है। कहीं-कहीं औसत से भी ज्यादा बारिश हो सकती है। मौसम विशेषज्ञ एके शुक्ला ने बताया मध्यप्रदेश में 1 जून से 30सितंबर तक की अवधि बारिश की मानी जाती है, लेकिन हर जिले में मानसून अलग-अलग तारीखों पर पहुंचता है। 30 मई तक केरल पहुंचने के बाद यह मध्यप्रदेश का रुख करता है। इंदौर से पहले खंडवा में 19 से 20 जून तक मानसून पहुंचेगा। खंडवा और इंदौर से मानसून विदाई की तारीख समान है।राहत : तालाबों में मानसून आने तक उपलब्ध रहेगा पानीइस बार इंदौर के सभी प्रमुख तालाबों में भरपूर पानी हैै। मानसून आने तक इनमें काफी मात्रा में पानी उपलब्ध रहेगा। एेसे में इंदौर मेें औसत बारिश भी होती हैतो सालभर सप्लाय लायक पानी उपलब्ध रहेगा। इसका फायदा 2021 तक मिलता रहेगा। 2015 में भी पानी की एेसी ही चेन बनी थी। तब 56इंच बारिश हुई थी। इसका फायदा ये हुआ था कि 2016 में सामान्य बारिश होने पर भी तालाब लबालब थे।इस बार इंदौर के सभी प्रमुख तालाबों में भरपूर पानी हैै। मानसून आने तक इनमें काफी मात्रा में पानी उपलब्ध रहेगा। एेसे में इंदौर मेें औसत बारिश भी होती हैतो सालभर सप्लाय लायक पानी उपलब्ध रहेगा। इसका फायदा 2021 तक मिलता रहेगा। 2015 में भी पानी की एेसी ही चेन बनी थी। तब 56इंच बारिश हुई थी। इसका फायदा ये हुआ था कि 2016 में सामान्य बारिश होने पर भी तालाब लबालब थे। Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today Monsoon will come five days earlier than last year on June 22 Full Article