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अमित शाह ने दिल्ली में 18% वोट और शून्य सीटें मिलने की रिपोर्ट से बेचैन होकर खुद को प्रचार के मैदान में झोंका था

नई दिल्ली. दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा भले ही जीत का दावा कर रही थी, लेकिन अंदरूनी रिपोर्ट में उसे हार तय दिख रही थी। अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी शुरू से बढ़त लेती दिख रही थी, लेकिन केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की आक्रामकता ने इस एकतरफा चुनाव को बहुत हद तक मुकाबले वाला चुनाव बना दिया था। इसके बाद ही यह बहस शुरू हो गई थी कि पहले वॉकओवर देती भाजपा अब चुनाव लड़ती नजर आ रही है। लेकिन नतीजों के बाद सवाल उठा कि चुनाव में हार सामने नजर आने के बावजूद शाह खुद इस तरह मैदान में क्यों कूदे और प्रचार में पूरी ताकत क्यों झोंक दी?

भास्कर ने इस रणनीति को समझने के लिए पड़ताल की तो पाया कि 21 और 22 जनवरी को शाह के घर पर रात ढाई बजे तक बैठक हुई थी। इसमें भाजपा को दिल्ली चुनाव में 18% वोट मिलने के अनुमान पर चर्चा की गई थी। यानी 2015 के विधानसभा चुनाव में मिले 32.19% वोट से करीब आधे और लोकसभा चुनाव में मिले 56.86% वोट से तीन गुना कम। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने खुलासा किया कि दिल्ली चुनाव से जुड़े तमाम रणनीतिकारों के साथ हुई इस बैठक में जो रिपोर्ट रखी गई, उसके मुताबिक दिल्ली में भाजपा भी कांग्रेस की तरह शून्य पर सिमट रही थी। इस रिपोर्ट ने शाह को बेचैन कर दिया। इसी दिन भाजपा ने उम्मीदवारों की आखिरी सूची जारी कर दी और तीन सीटें सहयोगी दलों जदयू और लोजपा को दे दी। दिल्ली में पार्टी अमूमन अपने चुनाव चिह्न पर ही सहयोगियों को लड़ाती रही है, लेकिन इस बार सहयोगी दल खुद के सिंबल पर लड़े।

शाह ने कहा- नतीजा जो भी हो, मैं लड़ूंगा
वोट पर्सेंट और सीटों से जुड़ी इस रिपोर्ट पर चर्चा के बाद शाह ने इस चुनाव को अपनी प्रतिष्ठा से ज्यादा पार्टी की साख से जोड़ा और कहा कि सीटों से ज्यादा वोट शेयर को बचाना बड़ी चुनौती है। उनका इशारा था कि अगर भाजपा का वोट शेयर घटा तो उसे भी कांग्रेस के साथ एक तराजू में तोला जाएगा। लेकिन वहां मौजूद रणनीतिकारों ने शाह से कहा कि हारी हुई लड़ाई में आप न कूदें तो ही ठीक रहेगा। इस पर शाह ने कहा, “मैं योद्धा हूं, नतीजा जो भी हो लड़ूंगा।”

शाह ने बैठक के बाद प्रचार बढ़ाया
23 जनवरी से शाह ने एक दिन में 3 से 5 पदयात्रा और जनसभाएं करना शुरू कर दी। इतना ही नहीं, गणतंत्र दिवस के दिन भी शाह ने तीन जनसभाएं कीं तो 29 जनवरी की बीटिंग रीट्रीट में भी शिरकत नहीं की और चार जनसभाओं में शामिल रहे। दिल्ली चुनाव का संकल्प पत्र जारी होने वाले दिन 31 जनवरी को केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी को संकल्प पत्र जारी करने का काम सौंपा गया और शाह ने उस दिन चार सभाओं को संबोधित किया। दिल्ली में शाह ने कुल 36 पदयात्रा, जनसभाएं कीं। इसके अलावा कुछ उम्मीदवारों के चुनाव कार्यालय तक खुद गए।

प्रदेश संगठन में बड़े बदलाव की तैयारी में भाजपा
चुनाव नतीजों के बाद के विश्लेषण में भाजपा इस बात पर संतोष कर रही है कि उसका वोट शेयर शाह की रणनीति की वजह से न सिर्फ बचा, बल्कि इसमें इजाफा भी हुआ है। लेकिन दिल्ली संगठन को लेकर जिस तरह अकर्मण्यता की रिपोर्ट पार्टी को मिली है, उसके बाद शीर्ष नेतृत्व इस बार दिल्ली भाजपा में प्रतीकात्मक बदलाव की नहीं, बल्कि बड़ी सर्जरी की रणनीति बना रहा है।



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वोट पर्सेंट और सीटों से जुड़ी रिपोर्ट पर चर्चा के बाद शाह ने दिल्ली में आक्रामक चुनाव प्रचार किया। (फाइल फोटो)
Amit Shah was upset with the report of getting 18% votes and zero seats in Delhi and threw himself into the campaign field.




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दिल्ली की हिंसा 18 साल में देश का तीसरा सबसे बड़ा सांप्रदायिक दंगा

नई दिल्ली. राजधानीदिल्ली में 4 दिन तक चले सांप्रदायिक दंगे में अब तक 42 लोगों की जान जा चुकी है। 364 से ज्यादा लोग घायल हैं। मौतों की संख्या के लिहाज से यह 18 साल में देश का तीसरा सबसे बड़ा दंगा है।2005 में यूपी के मऊ जिले में रामलीला कार्यक्रम में मुस्लिम पक्ष ने हमला कर दिया था। इसके बाद जिले में हुए दंगे में दोनों पक्षों के 14 लोगों की जान चली गई थी। 2006 में गुजरात के वडोदरा में प्रशासन द्वारा एक दरगाह को हटाने को लेकर हुए दंगे में 8 लोगों की मौत हुई थी। 2013में उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में लड़की से छेड़छाड़ को लेकर हुए दो पक्षों के विवाद ने सांप्रदायिक दंगे का रूप ले लिया। इसके बाद पश्चिमी यूपी के अलग-अलग जिलों में हुई हिंसा में 62 से ज्यादा लोगों की जान गई थी। 18 साल पहले 2002 में गुजरात दंगों के दौरान 2000 से ज्यादा लोगों की जान गई थी।

सरकारी आंकड़े: 2014 से 2017 तक देश में 2920 दंगे हुए, 389 मौतें हुईं
भारत में 2014, 2015, 2016, 2017 में कुल 2920 सांप्रदायिक दंगे हुए, इनमें 389 लोगों की मौत हुई,जबकि 8,890 लोग घायल हुए। यह जानकारी गृह मंत्रालय की ओर से फरवरी 2018 में दी गई थी। इन चार सालों में सबसे ज्यादा 645 दंगे यूपी में हुए, दूसरे नंबर पर 379 दंगे कर्नाटक में हुए, महाराष्ट्र में 316 हुए। 2017 की नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो(एनसीआरबी) और गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले चार साल में देश में सांप्रदायिक दंगों में कमी आई है।

2004 से 2017 के बीच देश में 10399 दंगे हुए, 1605 लोगों की जान गई
एक आरटीआई केजवाब में गृह मंत्रालय की ओर से बताया गया है कि 2004 से 2017 के बीच 10399 सांप्रदायिक दंगे (छोटे-बड़े) हुए। इन दंगों में 1605 लोगों की जान गई, 30723 लोग घायल हुए। सबसे ज्यादा 943 दंगे 2008 में हुए। इसी साल दंगों में सबसे ज्यादा 167 जानें भी गईं, 2354 लोग घायल हुए। सबसे कम 2011 में 580 दंगे हुए। इस साल 91 लोगों की जान गई थी।



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Delhi Violence Riots Death Toll | Delhi Violence Is The 3rd Biggest Communal Riots After Muzaffarnagar Haryana Panchkula Sirsa Punjab Violence




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एक महीने पहले दुनिया से 18 गुना ज्यादा मामले चीन में थे, अब दुनिया में चीन से 18 गुना तेजी से फैल रहा वायरस

नई दिल्ली. चीन के मुकाबले अब दुनिया के बाकी देशों में कोरोनावायरस ज्यादा तेजी से फैल रहा है। जनवरी के आखिर और फरवरी की शुरुआत में चीन में इस वायरस का संक्रमण चरम पर था। आज से ठीक एक महीने पहले 4 फरवरी को बाकी देशों में कोरोनावायरस के 221 नए मामले सामने आए थे, जबकि चीन में नए मामलों की संख्या 3,887 थी। यानी करीब 18 गुना ज्यादा। एक महीने बाद यानी 4 मार्च को हालात बदल चुके हैं। बुधवार के आंकड़े बताते हैं कि चीन में कोरोनावायरस के सिर्फ 120 नए मामले सामने आए, जबकि बाकी देशों में 2103 नए केस देखे गए। यानी 18 गुना का फर्क अब बदल चुका है।


27 दिसंबर को 1.1 करोड़ की आबादी वाले वुहान के अस्पतालों में संदिग्ध वायरस के मामले पहुंचने शुरू हुए थे। कुछ ही दिनों में कोरोनावायरस की पुष्टि हुई और जनवरी में यह तेजी से बढ़ा। 21 जनवरी तक यह दुनियाभर में सुर्खियों में आने लगा था। तब तक चीन में 291 मामले सामने आ चुके थे। इनमें से 258 मामले अकेले वुहान में थे। वुहान से ही संक्रमण की शुरुआत हुई थी। 21 जनवरी को चीन में इस वायरस से 6 मौतें हो चुकी थीं। वुहान वही शहर है, जहां दुनिया के 80 देशों की कंपनियों ने निवेश कर रखा है। यहां के बंदगाह से एक साल में 17 लाख कंटेनर दुनियाभर में जाते हैं। 23 जनवरी को यह शहर लॉकडाउन कर दिया गया था।


एक महीने में क्या बदला
1) नए मामले अब दुनिया में ज्यादा

तारीख चीन में नए मामले दुनिया में नए मामले
4 फरवरी 3,887 221
4 मार्च 120 2,103


2) नए मरीजों से ज्यादा संख्या रिकवर होने वाले मरीजों की

तारीख दुनिया में नए मामले कितने रिकवर हुए
4 फरवरी 3,887 264
4 मार्च 2,103 2,580

रिसर्च के मुताबिक, चीन में दो तरह के कोरोनावायरस
चीन के वैज्ञानिकों का एक शोध हाल ही में सामने आया है। वैज्ञानिकों ने 149 जगहों से कोरोनावायरस के 103 जीनोम का एनालिसिस किया। इसके बाद वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि कोरोनावायरस एल और एस टाइप का है। एस टाइप की वजह से दुनिया में अब इन्फेक्शन तेजी से फैल रहा है। एस टाइप का कोरोनावायरस एल टाइप से ही पैदा हुआ है। वुहान में 7 जनवरी से पहले एल टाइप वायरस मौजूद था। बाद में यह एस टाइप में तब्दील हुआ, जिस वजह से कोरोनावायरस के मामलों में अचानक तेजी आई।


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Coronavirus Latest; Coronavirus New Cases Latest Updates On Infection Spreading Outside China




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भारत में साल भर में करीब 1 करोड़ टूरिस्ट आते हैं, उसका 20% तक मार्च-अप्रैल में आ जाते हैं; वीजा पर प्रतिबंधों से सरकार को 33 से 34 हजार करोड़ का नुकसान संभव

नई दिल्ली.कोरोनावायरस केडर से दुनिया सहमी हुई है। कोरोना को रोकने के लिए केंद्र सरकार ने 15 अप्रैल तक दुनियाभर के लोगों के वीजा पर प्रतिबंध लगा दिया है। मतलब, 15 अप्रैल तक अब कोई भी विदेशी व्यक्ति भारत नहीं आ सकेगा। हालांकि, डिप्लोमैटिक और एम्प्लॉयमेंट वीजा को इस दायरे से बाहर रखा गया है। सरकार के इस फैसले का सबसे ज्यादा असर टूरिज्म सेक्टर पर पड़ेगा। पर्यटन मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि भारत में सालभर में जितने विदेशी पर्यटक आते हैं, उनका करीब 15 से 20% अकेले मार्च-अप्रैल में ही आते हैं। 2019 में मार्च-अप्रैल के दौरान 17 लाख 44 हजार 219 विदेशी पर्यटक भारत आए थे। जबकि, पूरे सालभर में 1.08 करोड़ पर्यटकों ने भारत की यात्रा की थी। वीजा रद्द होने से सरकार को 33 से 34 हजार करोड़ रुपए का नुकसान भी हो सकता है। पिछले साल मार्च-अप्रैल में सरकार को टूरिज्म सेक्टर से 33 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा की कमाई हुई थी।

बिजनेस: 2019 में जितनी कमाई हुई, उसकी 16% अकेले मार्च-अप्रैल महीने में हुई

टूरिज्म सेक्टर से सरकार को हर साल करीब 2 लाख करोड़ रुपए की कमाई होती है। 2019 में सरकार को विदेशी पर्यटकों से 2.10 लाख करोड़ रुपए की कमाई हुई थी। इसमें से 16% यानी 33 हजार 186 करोड़ रुपए की कमाई अकेले मार्च-अप्रैल में हुई थी। पिछले 5 साल के आंकड़े भी यही कहते हैं कि सरकार को विदेशी पर्यटकों से सालभर में जितनी कमाई होती है, उसमें से 15 से 20% की कमाई अकेले मार्च-अप्रैल में ही हो जाती है। मार्केट एक्सपर्ट्स कहते हैं कि यदि पिछले साल के आंकड़ों को देखें तो मार्च-अप्रैल में पर्यटकों के नहीं आने से सरकार को 33 हजार से 34 हजार करोड़ रुपए का नुकसान हो सकता है। ये कमाई सरकार को फॉरेन करंसी में होती है।

कोरोना की दहशत:इस साल जनवरी में पिछले 10 साल में सबसे कम रही पर्यटकों की ग्रोथ

कोरोना का असर दुनियाभर के टूरिज्म सेक्टर पर पड़ा है। दुनिया के प्रमुख पर्यटक स्थल सूने हो गए हैं। भारत में भी इसका असर देखने को मिल रहा है। पर्यटन मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि इस साल जनवरी में 11.18 लाख विदेशी पर्यटक ही आए, जबकि जनवरी 2019 में 11.03 लाख पर्यटक भारत आए थे। जनवरी 2019 की तुलना में जनवरी 2020 में विदेशी पर्यटकों की संख्या भले ही बढ़ी है, लेकिन ग्रोथ रेट 10 साल में सबसे कम रहा। जनवरी 2020 में विदेशी पर्यटकों का ग्रोथ रेट सिर्फ 1.3% रहा। जबकि, जनवरी 2019 में यही ग्रोथ रेट 5.6% था।

10 साल में जनवरी में आने वाले पर्यटकों की संख्या और ग्रोथ रेट

साल पर्यटकों की संख्या ग्रोथ रेट
जनवरी 2020 11.18 लाख 1.3%
जनवरी 2019 11.03 लाख 5.6%
जनवरी 2018 10.45 लाख 8.4%
जनवरी 2017 9.83 लाख 16.5%
जनवरी 2016 8.44 लाख 6.8%
जनवरी 2015 7.90 लाख 4.4%
जनवरी 2014 7.57 लाख 5.2%
जनवरी 2013 7.20 लाख 5.8%
जनवरी 2012 6.81 लाख 9.4%
जनवरी 2011 6.22 लाख 9.5%

राहत की बात: जनवरी 2020 में विदेशी पर्यटकों से होने वाली कमाई 12.2% बढ़ी

भारत आने वाले विदेशी पर्यटकों की ग्रोथ रेट में भले ही कमी आई हो, लेकिन उनसे होने वाली कमाई बढ़ी है। जनवरी 2020 में सरकार को विदेशी पर्यटकों से 20 हजार 282 करोड़ रुपए की कमाई हुई, जो पिछले साल से 12.2% ज्यादा रही। जबकि, जनवरी 2019 में सरकार को 18 हजार 79 करोड़ रुपए की कमाई हुई थी, जो जनवरी 2018 की तुलना में सिर्फ 1.8% ही ज्यादा थी। हालांकि, फरवरी के बाद कोरोनावायरस के मामले बढ़ने और मार्च-अप्रैल में वीजा पर प्रतिबंध लगने की वजह से विदेशी पर्यटकों की संख्या में कमी आनी तय है। इससे सरकार की आमदनी पर भी असर पड़ेगा।

पांच साल में जनवरी महीने में सरकार को पर्यटन सेक्टर से होने वाली आमदनी

साल कमाई ग्रोथ रेट
जनवरी 2020 20,282 12.2%
जनवरी 2019 18,079 1.8%
जनवरी 2018 17,755 9.9%
जनवरी 2017 16,135 18%
जनवरी 2016 13,671 13%

सबसे ज्यादा पर्यटक दिल्ली एयरपोर्ट पर उतरते हैं, लेकिन घूमने के लिए तमिलनाडु पसंदीदा जगह
पर्यटन मंत्रालय की 2019 की रिपोर्ट के मुताबिक, विदेशों से आने वाले पर्यटक सबसे ज्यादा दिल्ली एयरपोर्ट पर उतरते हैं। 2018 में दिल्ली एयरपोर्ट पर 30.43 लाख पर्यटक उतरे थे। लेकिन पर्यटकों को घूमने के लिए तमिलनाडु सबसे पसंदीदा जगह है। 2018 में 60.74 लाख विदेशी पर्यटक तमिलनाडु गए थे। दूसरे नंबर पर महाराष्ट्र और तीसरे पर उत्तर प्रदेश है।

5 एयरपोर्ट या इंटरनेशनल चेक पोस्ट, जहां सबसे ज्यादा विदेशी पर्यटक उतरते हैं

एयरपोर्ट/ इंटरनेशनल चेक पोस्ट पर्यटकों की संख्या
दिल्ली 30.43 लाख
मुंबई 16.36 लाख
हरिदासपुर 10.37 लाख
चेन्नई 7.84 लाख
बेंगलुरु 6.08 लाख



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38 साल पहले हरियाणा से शुरू हुई थी रिसॉर्ट पॉलिटिक्स, तब से अब तक 9 राज्यों में 14 बार सरकार बचाने-बनाने के लिए विधायकों को होटल भेजा गया

भास्कर रिसर्च. मध्य प्रदेश के सियासी घटनाक्रम में भाजपा-कांग्रेस, कमलनाथ-सिंधिया के अलावा एक और शब्द है, जिसकी चर्चा जोरों पर है। वो शब्द है- रिसॉर्ट पॉलिटिक्स। इस शब्द की चर्चा इसलिए भी क्योंकि भाजपा ने पहले अपने 107 में से 105 विधायक दिल्ली, मनेसर और गुरुग्राम के होटल भेजे। उसके बाद कांग्रेस ने भी अपने 80 विधायक जयपुर के होटल में भेज दिए। कांग्रेस के ही 20 बागी विधायक पहले से बेंगलुरु के एक होटल में हैं। देश में रिसॉर्ट पॉलिटिक्स का इतिहास 38 साल पुराना है। मई 1982 में हरियाणा में आईएनएलडी के चीफ देवी लाल ने इसकी शुरुआत की थी। तब से अब तक ये 9 राज्यों में ये 14वीं बार है, जब सरकार बचाने-बनाने के लिए विधायकों को होटल भेजा गया है। इसमें से भी 9 बार सीधी लड़ाई भाजपा-कांग्रेस के बीच रही। 4 बार एक ही पार्टी के बीच रही और एक बार क्षेत्रीय पार्टियों के बीच हुई। एक बार फिर इतिहास पर नजर डालते हैं और देखते हैं कि देश में कब-कब रिसॉर्ट पॉलिटिक्स देखने को मिली...

पहली बार : मई 1982 । हरियाणा
किस-किसके बीच : भाजपा v/s कांग्रेस

विधानसभा चुनाव से पहले इंडियन नेशनल लोकदल (आईएनएलडी) और भाजपा के बीच गठबंधन हुआ। यहां की 90 सीटों में से किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला। भाजपा-आईएनएलडी ने 37 और कांग्रेस ने 36 सीटें जीतीं। उस समय आईएनएलडी के चीफ देवी लाल ने भाजपा-आईएनएलडी के 48 विधायकों को दिल्ली के एक होटल में भेज दिया था। एक विधायक तो होटल के वाटर पाइप के जरिए वहां से भागकर भी आ गया था। उसके बाद तत्कालीन गवर्नर जीडी तपासे ने देवी लाल को बहुमत साबित करने को कहा, लेकिन वे बहुमत साबित ही नहीं कर पाए। उसके बाद कांग्रेस ने गठबंधन बनाकर सरकार बनाई, जिसमें भजन लाल मुख्यमंत्री बने।

देवी लाल और भजन लाल।- फाइल फोटो

दूसरी बार : अक्टूबर 1983 । कर्नाटक
किस-किसके बीच : भाजपा v/s कांग्रेस

उस समय कर्नाटक में जनता पार्टी की सरकार थी और रामकृष्ण हेगड़े मुख्यमंत्री थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी हेगड़े सरकार गिराना चाहती थीं। इससे बचने के लिए हेगड़े ने अपने 80 विधायकों को बेंगलुरु के एक रिसॉर्ट में भेज दिया। हालांकि, हेगड़े बाद में विधानसभा में बहुमत साबित करने में कामयाब रहे थे।

रामकृष्ण हेगड़े। - फाइल फोटो


तीसरी बार : अगस्त 1984 । आंध्र प्रदेश
किस-किसके बीच : टीडीपी v/s टीडीपी

उस समय राज्य में तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) की सरकार थी और मुख्यमंत्री एनटी रामा राव थे। उस समय एनटीआर अमेरिका गए थे। उनकी गैरमौजूदगी में गवर्नर ठाकुर रामलाल ने टीडीपी के ही एन. भास्कर राव को मुख्यमंत्री बना दिया। लेकिन,भास्कर राव के मुख्यमंत्री बनते ही पार्टी में अंदरुनी कलह पैदा हो गई। अमेरिका से लौटने से पहले ही एनटीआर ने अपने सभी विधायकों को बेंगलुरु भेज दिया। एक महीने में ही भास्कर राव को इस्तीफा देना पड़ा और एनटीआर मुख्यमंत्री बन गए।

एनटीआर और भास्कर राव।- फाइल फोटो


चौथी बार : सितंबर 1995 । आंध्र प्रदेश
किस-किसके बीच : टीडीपी v/s टीडीपी

आंध्र प्रदेश में ही 10 साल बाद फिर एनटीआर को अंदरुनी कलह का सामना करना पड़ा। इस बार उनके सामने उनके ही दामाद चंद्रबाबू नायडू थे। नायडू ने अपने समर्थक विधायकों को हैदराबाद के वायसराय होटल भेज दिया। 1 सितंबर 1995 को चंद्रबाबू नायडू पहली बार आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। एनटीआर उसके बाद कभी दोबारा मुख्यमंत्री नहीं बन पाए।

एनटीआर के बगल में बैठे चंद्रबाबू नायडू।- फाइल फोटो


पांचवीं बार : अक्टूबर 1996 । गुजरात
किस-किसके बीच : भाजपा v/s भाजपा

शंकर सिंह वाघेला पहले भाजपा के नेता थे, लेकिन 1996 में उन्होंने भाजपा छोड़कर राष्ट्रीय जनता पार्टी नाम से अपनी पार्टी बनाई। गुजरात में उस समय भाजपा की ही सरकार थी, जिसमें केशुभाई पटेल मुख्यमंत्री थे। वाघेला बागी हो गए। उन्होंने अपने 47 समर्थक विधायकों को मध्य प्रदेश के खजुराहो के एक होटल में भेज दिया। उस समय जिन विधायकों ने वाघेला का साथ दिया, उन्हें "खजुरिया' कहा जाने लगा और जिन विधायकों ने साथ नहीं दिया, उन्हें ‘‘हजुरिया’’कहा जाने लगा। हजुरिया का मतलब वफादार। उसके बाद वाघेला ने कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाई और मुख्यमंत्री बने।

केशुभाई पटेल और शंकर सिंह वाघेला।- फाइल फोटो


छठी बार : मार्च 2000 । बिहार
किस-किसके बीच : जदयू v/s राजद-कांग्रेस

2000 के विधानसभा चुनाव के बाद जब राजद-कांग्रेस विश्वास मत हार गए, तो उसके बाद नीतीश कुमार को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया गया। 3 मार्च को नीतीश कुमार ने पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली। विश्वास मत से पहले जदयू ने अपने विधायकों को पटना के एक होटल भेज दिया, लेकिन उसके बाद भी नीतीश बहुमत साबित नहीं कर पाए और 10 मार्च को इस्तीफा दे दिया। इसके बाद राबड़ी देवी दूसरी बार बिहार की मुख्यमंत्री बनीं।

नीतीश कुमार।- फाइल फोटो

सातवीं बार : जून 2002 । महाराष्ट्र
किस-किसके बीच : भाजपा-शिवसेना v/s कांग्रेस-राकांपा

1999 के विधानसभा चुनाव के बाद महाराष्ट्र में कांग्रेस-राकांपा गठबंधन की सरकार बनी। लेकिन तीन साल के अंदर ही महाराष्ट्र में सियासी उठापठक शुरू हो गई। कांग्रेस-राकांपा ने भाजपा-शिवसेना गठबंधन को रोकने के लिए अपने 71 विधायकों को मैसूर के एक होटल में ठहराया। तत्कालीन मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता स्वर्गीय विलासराव देशमुख भी विधायकों से मिलने बार-बार होटल जाते थे। हालांकि, भाजपा-शिवसेना सरकार नहीं बना सकी थी।

स्व. विलासराव देशमुख।- फाइल फोटो

आठवीं बार : मई 2016 । उत्तराखंड
किस-किसके बीच : भाजपा v/s कांग्रेस

9 कांग्रेस विधायक और 27 भाजपा विधायकों ने तत्कालीन गवर्नर केके पॉल से मिलकर तत्कालीन हरीश रावत के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार को बर्खास्त करने की मांग की। इसके बाद भाजपा ने अपने 27 विधायकों को दो ग्रुप में जयपुर के अलग-अलग होटल भेजा। एक ग्रुप को होटल जयपुर ग्रीन्स में ठहराया गया, जबकि दूसरे ग्रुप को जयपुर के एक फार्म हाउस में ठहराया गया। भाजपा-कांग्रेस ने एक-दूसरे पर हॉर्स ट्रेडिंग का आरोप लगाया। कई दिनों तक चली उठापठक के बाद उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस चुनाव हार गई और भाजपा की सरकार बनी।


नौवीं बार : फरवरी 2017 । तमिलनाडु
किस-किसके बीच : अन्नाद्रमुक v/s अन्नाद्रमुक

दिसंबर 2016 में जयललिता की मौत के बाद तमिलनाडु में राजनीतिक संकट खड़ा हो गया। कारण था- अन्नाद्रमुक (एआईएडीएमके) में ही गुटबाजी होना। इससे नाराज तत्कालीन मुख्यमंत्री ओ पन्नीरसेल्वम ने इस्तीफा दे दिया। इसके बाद जयललिता की भतीजी शशिकला मुख्यमंत्री बनीं। लेकिन,सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें बेनामी संपत्ति के मामले में सजा सुनाते हुए जेल भेज दिया। इसके बाद शशिकला ने पलानीसामी को मुख्यमंत्री नियुक्त किया। पन्नीरसेल्वम और पलानीसामी गुट की वजह से शशिकला ने अपने 130 समर्थक विधायकों को चेन्नई के एक होटल भेज दिया। हालांकि, कुछ समय बाद जब फ्लोर टेस्ट हुआ तो पलानीसामी की जीत हुई।

ओ पन्नीरसेल्वम और ई पलानीसामी।- फाइल फोटो

दसवीं बार : अगस्त 2017 । गुजरात
किस-किसके बीच : भाजपा v/s कांग्रेस

इस साल गुजरात की तीन राज्यसभा सीट पर चुनाव होने थे। दो पर भाजपा की जीत पक्की थी। इन दो सीटों में से एक पर अमित शाह और दूसरी पर स्मृति ईरानी खड़ी हुईं। तीसरी पर कांग्रेस के अहमद पटेल थे, जिनकी जीत भी लगभग तय थी। लेकिन भाजपा ने कांग्रेस से बागी बलवंत राजपूत को अहमद पटेल के खिलाफ खड़ा कर दिया। राज्यसभा चुनाव से पहले शंकर सिंह वाघेला के कांग्रेस छोड़ने से कई कांग्रेस विधायक भी बागी हो गए। कांग्रेस ने अपने 44 विधायकों को हॉर्स ट्रेडिंग से बचाने के लिए बेंगलुरु के ईगलटन रिजॉर्ट में बंद कर दिया। इन्हें 8 अगस्त को वोटिंग वाले दिन ही विधानसभा लाया गया। हालांकि, काफी देर चली खींचतान के बाद अहमद पटेल ही जीते।

बेंगलुरु के रिसॉर्ट मेंकांग्रेस प्रवक्ता शक्ति सिंह गोहिल के साथ कांग्रेस के 44 विधायक। फोटो-जुलाई 2017

11वीं बार : मई 2018 । कर्नाटक
किस-किसके बीच : भाजपा v/s कांग्रेस-जेडीएस

मई 2018 में हुए विधानसभा चुनाव में किसी पार्टी को बहुमत नहीं मिला। भाजपा 104 सीट जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी। राज्यपाल ने भाजपा के बीएस येदियुरप्पा को सरकार बनाने का न्योता दिया। उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ भी ली। लेकिन तभी सुप्रीम कोर्ट ने 48 घंटे के अंदर येदियुरप्पा को बहुमत साबित करने का आदेश दिया। हॉर्स ट्रेडिंग से बचाने के लिए कांग्रेस-जेडीएस ने अपने विधायकों को हैदराबाद के एक होटल में भेज दिया। हालांकि, फ्लोर टेस्ट से पहले ही येदियुरप्पा ने इस्तीफा दे दिया और कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन की सरकार बनी।

कांग्रेस-जेडीएस के विधायक कर्नाटक के होटल से हैदराबाद के होटल जाते हुए। फोटो- मई 2018

12वीं बार : जुलाई 2019 । कर्नाटक
किस-किसके बीच : भाजपा v/s कांग्रेस-जेडीएस
कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन की सरकार से 17 विधायकों ने अचानक इस्तीफा दे दिया। इन विधायकों को मुंबई के रेनेसां होटल में ठहराया गया। कुछ दिन बाद इन्हें गोवा के एक रिसॉर्ट में शिफ्ट कर दिया गया। 23 जुलाई 2019 को कुमारस्वामी सरकार को बहुमत साबित करना था, लेकिन ये विधायक वहां भी नहीं पहुंचे और कांग्रेस-जेडीएस की सरकार गिर गई। इसके बाद येदियुरप्पा के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी। भाजपा ने भी फ्लोर टेस्ट से पहले अपने सभी विधायकों को बेंगलुरु के चांसरी पैवेलियन होटल में ठहराया था। इन 17 में से 15 विधायकों ने दोबारा चुनाव लड़ा, जिसमें से 11 जीतकर आए।

कर्नाटक के बागी कांग्रेस विधायक मुंबई के होटल में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान। फोटो- जुलाई 2019

13वीं बार : नवंबर 2019 । महाराष्ट्र
किस-किसके बीच : भाजपा v/s शिवसेना-कांग्रेस-राकांपा

विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा-शिवसेना में गठबंधन था, लेकिन नतीजे आने के बाद शिवसेना ने मुख्यमंत्री पद की मांग पूरी नहीं होने पर गठबंधन तोड़ दिया। बाद में राकांपा के अजित पवार भाजपा से मिले और आनन-फानन में देवेंद्र फडनवीस ने मुख्यमंत्री और अजित पवार ने उप-मुख्यमंत्री पद की शपथ भी ले ली। इसके बाद टूट के डर से शिवसेना, कांग्रेस और राकांपा ने अपने विधायकों को मुंबई के हयात होटल में ठहरवाया। हालांकि, इससे पहले भी इसी डर से शिवसेना के विधायक होटल द ललित, राकांपा के विधायक द रेनेसां और कांग्रेस के विधायक जेडब्ल्यू मैरियट होटल में ठहरे थे। निर्दलीय विधायकों को भी गोवा के एक रिसॉर्ट में ठहराया गया था। हालांकि, फ्लोर टेस्ट से पहले ही अजित पवार भी अलग हो गए और देवेंद्र फडनवीस ने इस्तीफा दे दिया। इसके बाद राज्य में शिवसेना-कांग्रेस-राकांपा गठबंधन की सरकार बनी।

नवंबर में महाराष्ट्र में हुए राजनीतिक उठापठक के बीच मुंबई के रेनेसां होटल जाते राकांपा के विधायक।

14वीं बार : मार्च 2020 । मध्य प्रदेश
किस-किसके बीच : भाजपा v/s कांग्रेस
10 मार्च को कांग्रेस नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भाजपा में शामिल होने का फैसला लिया। इससे एक दिन पहले से ही उनके समर्थक विधायकों के फोन बंद हो रहे थे। बाद में पता चला कि इन विधायकों को बेंगलुरु के एक रिजॉर्ट में रखा गया है। इसके बाद 10 मार्च की रात ही भाजपा ने भी अपने 107 में से 105 विधायकों को गुरुग्राम के आईटीसी ग्रैंड होटल में भेज दिया। 11 मार्च को कांग्रेस के 80 विधायक जयपुर के एक होटल भेजे गए।



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जयपुर एयरपोर्ट से बस से रिसॉर्ट जाते कांग्रेस विधायक




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26 साल पहले तक सरकार बर्खास्त करने से पहले फ्लोर टेस्ट जरूरी नहीं था, 1989 में कर्नाटक की बोम्मई सरकार गिरने के 5 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने इसे जरूरी किया

नई दिल्ली. पिछले एक-दोसाल में कई बार फ्लोर टेस्ट के बारे में हम सुनते आ रहे हैं। कभी कर्नाटक में। कभी महाराष्ट्र मेंऔर अब मध्य प्रदेश में। जब भी किसी सरकार पर संकट आता है, जैसे- अभी मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार पर आया है। तो उसे भी फ्लोर टेस्ट से गुजरना ही पड़ता है। पहली बार ऐसा 26साल पहले हुआ।

कर्नाटक में 1985 में 8वीं विधानसभा के लिए चुनाव हुए। इस चुनाव में जनता पार्टी ने राज्य की 224 में से 139 सीटें जीतीं। कांग्रेस 65 ही जीत सकी। जनता पार्टी की सरकार बनी। मुख्यमंत्री बने रामकृष्ण हेगड़े,लेकिन हेगड़े पर फोन टैपिंग के आरोप लगे, जिस वजह से उन्होंने 10 अगस्त 1988 को इस्तीफा दे दिया। इसके बाद मुख्यमंत्री बने एसआर बोम्मई,लेकिन कुछ ही महीनों में यानी अप्रैल 1989 में उनकी सरकार को भी कर्नाटक के उस समय के राज्यपाल पी वेंकटसुब्बैया ने बर्खास्त कर दिया। कारण दिया कि बोम्मई के पास बहुमत नहीं था। हालांकि, बोम्मई ने दावा किया था कि उनके पास बहुमत है।


मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया। कई सालों तक सुनवाई चली। सरकार बर्खास्त होने के 5 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया और कहा कि फ्लोर टेस्ट ही एकमात्र ऐसा तरीका है, जिससे बहुमत साबित हो सकता है। उस समय सुप्रीम कोर्ट ने कहा था,‘जहां भी ये संदेह पैदा हो कि सरकार या मंत्रिपरिषद ने सदन का विश्वास खो दिया है, तो वहां परीक्षण ही एकमात्र तरीका है- सदन के पटल पर बहुमत हासिल करना।’ सरल शब्दों में कहें तो सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि किसी सरकार के पास बहुमत है या नहीं, उसका फैसला सिर्फ विधानसभा में ही हो सकता है।

कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एसआर बोम्मई।- फाइल फोटो

संविधान एक्सपर्ट मानते हैं कि आजादी के बाद कई सालों तक राज्यपाल बिना किसी फ्लोर टेस्ट के ही सरकारें बर्खास्त कर देते थे। अगर किसी सरकार पर संकट आता भी था, तो ऐसे हालात में विधायकस्पीकर या राज्यपाल के सामने परेड करते थे या फिर अपने समर्थन की चिट्ठी भेजते थे। इससे गड़बड़ियां भी होती थीं। 1989 में भी कर्नाटक की एसआर बोम्मई की सरकार ऐसे ही बर्खास्त कर दी गई थी। 1967 में बंगाल की अजॉय मुखर्जी के नेतृत्व वाली यूनाइटेड फ्रंट सरकार को बर्खास्त कर दिया गया। कहा गया कि उनके पास बहुमत नहीं है।उनकी जगह कांग्रेस के समर्थन से पीसी घोष को मुख्यमंत्री बना दिया गया। हालांकि, कुछ विशेष परिस्थितियों में राज्यपाल सरकार बर्खास्त करने की सिफारिश कर सकते हैं।


1994 के फैसले के 23 साल बाद यानी 2017 में गोवा से जुड़े एक मामले में फ्लोर टेस्ट को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक और टिप्पणी की,‘फ्लोर टेस्ट से सारी शंकाएं दूर हो जाएंगी और इसका जो नतीजा आएगा, उससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया को भी विश्वसनीयता मिल जाएगी।’

दो तरह के फ्लोर टेस्टहोते हैं

  • सामान्यफ्लोर टेस्टजब भी कोई पार्टी या गठबंधन का नेता मुख्यमंत्री बनता है, तो उसे सदन में बहुमत साबित करना होता है। इसके अलावा अगर सरकार पर कोई संकट आ जाए या राज्यपाल को लगे कि सरकार सदन में विश्वास खो चुकी है, तो भी फ्लोर टेस्ट होता है। इसमें मुख्यमंत्री सदन में विश्वास प्रस्ताव लाता है और उस पर वोटिंग होती है।इसको ऐसे समझिए किजुलाई 2019 में कर्नाटक मेंकांग्रेस-जेडीएस गठबंधनकी सरकार पर संकट आ गया। सदन में फ्लोर टेस्ट हुआ। इसमें कांग्रेस-जेडीएस के पक्ष में 99 और विरोध में 105 वोट पड़े। इस तरह सरकार गिर गई थी।
  • कंपोजिट फ्लोर:जब एक से ज्यादा नेता सरकार बनाने का दावा कर दें। ऐसे हालात बनने पर राज्यपाल विशेष सत्र बुला सकते हैं और देख सकते हैं कि किसके पास बहुमत है। इसमें विधायक सदन में खड़े होकर, हाथ उठाकर, ध्वनिमत से या डिविजन के जरिए वोट देते हैं। इसको ऐसे समझ सकते हैं कि फरवरी 1998 में उत्तर प्रदेश की कल्याण सिंह के नेतृत्व वाली जनता पार्टी की सरकार को बर्खास्त कर दिया गयाऔर कांग्रेस के जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री बना दिया गया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने 48 घंटे के अंदर कंपोजिट फ्लोर टेस्ट कराने का आदेश दे दिया। इसमें कल्याण सिंह की जीत हुई। उन्हें 225 वोट मिले और जगदंबिका पाल को 195 वोट।


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Kamal Nath MP Floor Test | Dainik Bhaskar Research On Floor Test; Facts History of Floor Test in Madhya Pradesh Karnataka




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दुष्यंत ने 13 मार्च को सिंगर कनिका के साथ पार्टी की, उसके बाद 3 दिन लोकसभा गए, 18 तारीख को यूपी-राजस्थान के 96 सांसदों के साथ राष्ट्रपति से भी मिले

नई दिल्ली. बॉलीवुड सिंगर कनिका कपूर कोरोना पॉजिटिव पाई गई हैं। कनिका 9 मार्च को ही लंदन से लौटी थीं। इसके बाद वे कम से कम 4 पार्टी और एक फैमिली फंक्शन में शामिल हुईं, जिनके सबूत हर कहीं मौजूद हैं। ऐसी ही एक पार्टी 13 मार्च को लखनऊ के ताज होटल में भी हुई थी। इसमें राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे बेटे दुष्यंत सिंह और बहू निहारिका के साथ मौजूद थीं। कनिका के कोरोना पॉजिटव होने की खबर के बाद वसुंधरा और दुष्यंत ने खुद को क्वारैंटाइन कर लिया। हालांकि बात यहीं खत्म नहीं होतीभाजपा सांसद दुष्यंत के ट्विटर अकाउंट से पता चलता है कि वे दो दिन पहले राष्ट्रपति भवन में हुए कार्यक्रम में भी शामिल हुए थे।

दुष्यंत सिंह ने दो दिन पहले राजस्थान और उत्तर प्रदेश के कई सांसदों के साथ राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से नाश्ते पर मुलाकात की थी। इस कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश और राजस्थान के 96 सांसद आए थे। इस कार्यक्रम की जारी तस्वीर में दुष्यंत राष्ट्रपति के ठीक पीछे खड़े दिख रहे हैं। दुष्यंत के साथ मौजूद प्रमुख नेताओं मेंपूर्व केंद्रीय मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौर, मथुरा से भाजपा सांसद हेमा मालिनी, केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल, कांग्रेस की कुमारी सैलजा और बॉक्सर मैरी कॉम शामिल हैं।इधर, राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने अपने सभी अपाइनमेंट निरस्त कर दिए हैं। जानकारी के मुताबिक, राष्ट्रपति अपनी जांच भी कराएंगे।

15 मार्च के बाद से दुष्यंत कम से कम तीन दिन लोकसभा भी पहुंचे थे और वहां की कार्यवाही में शामिल हुए थे। उनके संपर्क में आने वाले कई भाजपा और विपक्षी दल के नेता अब खुद को क्वारैंटाइन कर रहे हैं।तृणमूल कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य डेरेक ओ ब्रायन, दुष्यंत के साथ ढाई घंटे बैठे थे। अब उन्होंने खुद को अलगथलग कर लिया है। इसी तरह अपना दल की सांसद अनुप्रिया पटेल, भाजपा सांसद वरुण गांधी और कांग्रेस सांसद दीपेंदर हुड्डा ने भी खुद को आइसोलेट कर लिया है। इनके अलावा यूपी के स्वास्थ्य मंत्री जयप्रताप सिंह, राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, पूर्व सांसद जितिन प्रसाद नेभी खुद को अलग-थलग रहने का फैसला लिया है।

तारीख : 13मार्च । जगह : लखनऊ

इस फोटो में जो बीच में नजर आ रहे हैं, उनका नाम आदिल अहमद है। आदिल सेलेब्रिटी इंटीरियर डिजाइनर हैं। 13 मार्च को आदिल ने लखनऊ में बर्थडे पार्टी रखी थी। इसी पार्टी में कनिका कपूर, वसुंधरा राजे, दुष्यंत सिंह पहुंचे थे। वसुंधरा राजे के नई दिल्ली स्थित घर कोआदिल ने ही डिजाइन किया है।

तारीख : अभी कन्फर्म नहीं । जगह : अभी कन्फर्म नहीं

कनिका कपूर और वसुंधरा राजे आदिल अहमद की बर्थडे पार्टी के अलावा एक और पार्टी में भी साथ में मौजूद थीं। हालांकि, अभी तक ये कन्फर्म नहीं हो पाया है कि ये किस पार्टी की तस्वीर है।

तारीख : 13-14 मार्च । जगह : कानपुर

कनिका 13 और 14 मार्च को कानपुर में अपने मामा विपुल टंडन के घर रुकी थीं।

तारीख : 15 मार्च । जगह : लखनऊ

यूपी लोकायुक्त जस्टिस संजय मिश्रा के घर हुई इस पार्टी में बसपा सरकार में स्वास्थ्य मंत्री रहे अशु मिश्रा भी शामिल हुए थे। बिजनेसमैन नीरज यादव उनकी पत्नी नैना यादव भी इस पार्टी में मौजूद थे।

तारीख : 16 मार्च । जगह : लोकसभा

दुष्यंत सिंह सोमवार को लोकसभा पहुंचे थे। वे यहां 9 मिनट 12 सेकंड तक बोले भी थे।

तारीख : 17 मार्च । जगह : लोकसभा

दुष्यंत मंगलवार कोभी लोकसभा पहुंचे थे। इस बार उन्होंने किसानों को मुद्दा उठाया था।

तारीख : 18 मार्च । जगह : राष्ट्रपति भवन

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और दुष्यंत सिंह(दाएं से पहले)।

18 मार्च को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद में राष्ट्रपति भवन में उत्तर प्रदेश और राजस्थान के सांसदों को ब्रेकफास्ट पर इनवाइट किया था। इसमें उत्तर प्रदेश-राजस्थान के 96 सांसद मौजूद थे। केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह भी यहां आए थे।

तारीख : 19 मार्च । जगह : लोकसभा

गुरुवार कोदुष्यंत फिर लोकसभा पहुंचे थे। इस बार उन्होंने टूरिज्म का मुद्दा उठाया था।

डेरेक ने कहा- संसद सत्र स्थगित कर दें
तृणमूल कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य डेरेक ओ ब्रायन ने कहा- ‘‘यह सरकार सभी को खतरे में डाल रही है। प्रधानमंत्री कहते हैं कि सेल्फ आइसोलेट करो। लेकिन संसद चल रही है। मैं दुष्यंत के साथ एक दिन ढाई घंटे तक बैठा था। बताया जा रहा है कि दो और सांसद सेल्फ आइसोलेशन में हैं। मौजूदा संसद सत्र को स्थगित कर देना चाहिए।’’ इसके बाद डेरेक ने भी खुद को सेल्फ आइसोलेट कर लिया।

वसुंधरा ने कहा- मैं और दुष्यंत आइसोलेशन में हैं

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सांसद अनुप्रिया पटेल ने भी कहा- मैं सेल्फ आइसोलेशन में जा रही हूं
अपना दल की अध्यक्ष और मिर्जापुर से सांसद अनुप्रिया पटेल भी सेल्फ आइसोलेशन में चली गई हैं।

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फोटो 18 मार्च की है। जिसमें दुष्यंत सिंह राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के ठीक पीछे खड़े हैं।




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फरवरी में 3 मरीज थे; महीनेभर तक कोई मामला नहीं आया, 2 मार्च के बाद 320 मामले आए, पिछले 10 दिन में ही 454% की बढ़ोतरी

नई दिल्ली.देश में कोरोनावायरस का पहला मामला 30 जनवरी को केरल में सामने आया था। उसके बाद 1 और 2 फरवरी को भी केरल में 1-1 मरीज मिला। ये तीनों मरीज कुछ ही समय में ठीक हो गए। इसके बाद पूरे महीनेभर देशभर में एक भी कोरोनावायरस का नया मामला नहीं आया। लेकिन, 2 मार्च के बाद से मामलों की संख्या दिनोंदिन बढ़ती गई। 2 मार्च को कोरोनावायरस के 5 मामले (इसमें 3 केरल के केस, जो अब ठीक हो चुके हैं) थे। इसके बाद 21 मार्च तक 320 नए मामले सामने आए। पिछले 10 दिन में ही 11 मार्च से 21 मार्च के बीच देश में कोरोना के मामलों में 454% की बढ़ोतरी हुई है। 11 मार्च को 71 मामले थे और 21 मार्च को रात 11 बजे तक कुल 323 केस हो गए। संक्रमण के चलतेदेश में 4 लोगों ने अपनी जान गंवाई है। अब तक सबसे ज्यादा 64मामले महाराष्ट्र में आए हैं। उसके बाद केरल (52 मामले) और दिल्ली (26 मामले) हैं। अभी तक जितने भी लोग कोरोना से संक्रमित मिले हैं, उनमें से ज्यादातर की ट्रैवल हिस्ट्री रही हैयानी ये लोग हाल में विदेश से लौटे थे।

मार्च के पहले हफ्ते में 36 नए मामले आए थे, तीसरे हफ्ते में 176 नए मामले मिले

देश में कोरोनावायरस के नए मामले 2 मार्च के बाद से ही बढ़ने शुरू हो गए। मार्च के पहले हफ्ते यानी 2 मार्च से 8 मार्च के बीच कोरोनावायरस के 36 नए मामले सामने आए थे।दूसरे हफ्ते यानी 9 मार्च से 15 मार्च के बीच 70 नए मामले सामने आए। लेकिन, तीसरे हफ्ते यानी 16 मार्च से 21 मार्च के बीच 181 नए मामले सामने आ चुके हैं। शनिवार को ही शाम 7:30बजे तक 57 नए मामले सामने आ गए।

ईरान में सबसे ज्यादा 255 भारतीय कोरोना संक्रमित

18 मार्च को लोकसभा में विदेश राज्य मंत्री वी मुरलीधरन के दिए जवाब के मुताबिक, 7 देशों में 276 भारतीय कोरोनावायरस से संक्रमित हैं। ईरान में सबसे ज्यादा 255 भारतीय कोरोनावायरस से संक्रमित हैं। उसके बाद यूएई है, जहां 12 भारतीय संक्रमित हैं।

देश

कोरोना से संक्रमित भारतीय

ईरान 255
यूएई 12
इटली 5
हॉन्ग कॉन्ग 1
कुवैत 1
रवांडा 1
श्रीलंका 1

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# दुष्यंत ने 13 मार्च को सिंगर कनिका के साथ पार्टी की, उसके बाद 3 दिन लोकसभा गए, 18 तारीख को यूपी-राजस्थान के 96 सांसदों के साथ राष्ट्रपति से भी मिले



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Coronavirus India Comparison; Delhi Cases Vs Mumbai Pune Maharashtra Corona Vs Kerala COVID-19 Death Toll Comparison Latest News Updates




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21 दिन नहीं संभले तो 21 साल पीछे चले जाएंगे

प्यारे देशवासियों,
मैं आज एक बार फिर काेराेना वैश्विक महामारी पर बात करने के लिए आपके बीच आया हूं। 22 मार्च काे जनता कर्फ्यू का जाे संकल्प हमने लिया था, एक राष्ट्र के नाते उसकी सिद्धि के लिए हर भारतवासी ने पूरी संवेदनशीलता के साथ, पूरी जिम्मेदारी के साथ अपना याेगदान दिया। बच्चे, बुजुर्ग, छाेटे-बड़े, गरीब, मध्यम, हर वर्ग के लाेग, हर काेई परीक्षा की इस घड़ी में साथ आए। जनता कर्फ्यू काे हर भारतवासी ने सफल बनाया। एक दिन के जनता कर्फ्यू से भारत ने दिखा दिया कि जब देश पर संकट आता है, जब मानवता पर संकट आता है ताे किस प्रकार से हम भारतीय मिलकर उसका मुकाबला करते हैं।

आप सभी जनता कर्फ्यू की सफलता के लिए प्रशंसा के पात्र हैं। आप काेराेना महामारी पर पूरी दुनिया की स्थिति सुन रहे हैं और देख रहे हैं। आप यह भी देख रहे हैं कि दुनिया के समर्थ से समर्थ देशाें काे भी कैसे इस महामारी ने बिल्कुल बेबस कर दिया है। ऐसा नहीं है कि यह देश प्रयास नहीं कर रहे हैं या उनके पास संसाधनाें की कमी है। लेकिन, काेराेना इतनी तेजी से फैल रहा है कि तमाम तैयारियाें और प्रयासाें के बावजूद इन देशाें में चुनाैती बढ़ती ही जा रही है। इन सभी देशाें के दाे महीनाें के अध्ययन से जाे निष्कर्ष निकल रहा है और एक्सपर्ट भी यही कह रहे हैं कि इस वैश्विक महामारी काेराेना से प्रभावी मुकाबले के लिए एकमात्र विकल्प है- साेशल डिस्टेंसिंग। साेशल डिस्टेंसिंग यानी एक दूसरे से दूर रहना। अपने घराें में ही बंद रहना। काेराेना से बचने का इसके अलावा काेई तरीका नहीं है। काेई रास्ता नहीं है। काेराेना काे फैलने से राेकना है ताे उसके संक्रमण की साइकल काे ताेड़ना ही हाेगा। कुछ लाेग इस गलतफहमी में हैं कि साेशल डिस्टेंसिंग सिर्फ मरीज के लिए जरूरी है। यह साेचना सही नहीं है। साेशल डिस्टेंसिंग हर नागरिक के लिए, हर परिवार के लिए है। परिवार के हर सदस्य के लिए है। प्रधानमंत्री के लिए भी है। कुछ लाेगाें की लापरवाही, कुछ लाेगाें की गलत साेच आपकाे, आपके बच्चों, माता-पिता को, परिवार काे, आपके दाेस्ताें काे और आगे चलकर पूरे देश काे बहुत बड़ी मुश्किल में झाेंक देगी।

अगर ऐसी लापरवाही जारी रही ताे भारत काे इसकी बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है और ये कीमत कितनी हाेगी, इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है।पिछले दाे दिनाें से देश के अनेक भागाें में लाॅकडाउन कर दिया गया है। राज्य सरकारों के इन प्रयासाें काे बहुत गंभीरता से लेना चाहिए। हेल्थ एक्सपर्ट और अन्य देशाें के अनुभवाें काे ध्यान में रखते हुए देश आज एक अहम फैसला करने जा रहा है।

आज रात 12 बजे से पूरे देश में संपूर्ण लाॅकडाउन हाेने जा रहा है। हिंदुस्तान काे बचाने के लिए हिंदुस्तान के हर नागरिक काे बचाने के लिए आपकाे और आपके परिवार काे बचाने के लिए रात 12 बजे से घराें से बाहर निकलने पर पूरी तरह पाबंदी लगाई जा रही है। देश के हर राज्य काे, हर केंद्र शासित प्रदेश काे, हर जिले, हर गांव, कस्बे, गली, मोहल्ले काे लाॅकडाउन किया जा रहा है। यह एक तरह से कर्फ्यू है, जनता कर्फ्यू से कुछ कदम आगे की बात। उससे ज्यादा सख्त। काेराेना के खिलाफ निर्णायक लड़ाई के लिए यह कदम बहुत आवश्यक है। निश्चित ताैर पर लाॅकडाउन की आर्थिक कीमत देश उठाएगा, लेकिन एक-एक भारतीय के जीवन काे बचाना, आपके जीवन काे बचाना, आपके परिवार काे बचाना इस समय भारत सरकार की, देश की हर राज्य सरकार की, हर स्थानीय निकाय की सबसे बड़ी प्राथमिकता है। इसलिए मेरी हाथ जाेड़कर प्रार्थना है कि आप इस समय देश में जहां भी हैं, वहीं रहें। अभी के हालात काे देखते हुए देश में लाॅकडाउन 21 दिन का हाेगा। तीन सप्ताह का हाेगा।

मैं आपसे कुछ सप्ताह मांगने आया हूं। आने वाले 21 दिन हर नागरिक के लिए हर परिवार के लिए बहुत महत्वपू्र्ण हैं। हेल्थ एक्सपर्ट्स के अनुसार काेराेना के संक्रमण साइकल को ताेड़ने के लिए 21 दिन का समय बहुत अहम है। अगर ये 21 दिन नहीं संभले ताे देश और आपका परिवार 21 साल पीछे चला जाएगा। अगर ये 21 दिन नहीं संभले ताे कई परिवार हमेशा-हमेशा के लिए तबाह हाे जाएंगे। मैं ये बात प्रधानमंत्री नहीं, आपके परिवार के सदस्य के नाते कह रहा हूं। इसलिए बाहर निकलना क्या हाेता है, यह 21 दिन के लिए भूल जाएं। घर में रहें, घर में रहें और एक ही काम करें कि अपने घर में ही रहें।

आज के फैसले ने, देशव्यापी लाॅकडाउन ने आपके घर के दरवाजे पर एक लक्ष्मण रेखा खींच दी है। आपकाे ये याद रखना है कि घर से बाहर पड़ने वाला आपका सिर्फ एक कदम कोरोना जैसी गंभीर महामारी काे आपके घर में ला सकता है। आपकाे याद रखना है कि कई बार काेराेना से संक्रमित व्यक्ति शुरुआत में स्वस्थ लगता है। वह संक्रमित है, इसका पता ही नहीं चलता। इसलिए एहतियात बरतें, घराें में रहें। जाे लोग घर में हैं, वह साेशल मीडिया पर नए तरीकाें से, इस बात काे बता रहे हैं। एक बैनर जाे मुझे भी पसंद आया, मैं आपकाे भी दिखाता हूं। काेराेना यानी काेई राेड पर ना निकले।

एक्सपर्ट्स का कहना है कि आज अगर किसी भी व्यक्ति में काेराेना वायरस पहुंचता है ताे उसके शरीर में इसके लक्षण दिखने में कई कई दिन लग जाते हैं। इस दाैरान वह जाने अनजाने में हर उस व्यक्ति काे संक्रमित कर देता है जाे उसके संपर्क में आता है। डब्लूएचओ की रिपाेर्ट के अनुसार इस महामारी से संक्रमित एक व्यक्ति सिर्फ हफ्ते दस दिन में सैकड़ाें लाेगाें तक इसे पहुंचा सकता है। यानी ये आग की तरह तेजी से फैलता है। डब्लूएचओ का ही एक और आंकड़ा बहुत महत्वपूर्ण है। दुनिया में काेरोना से संक्रमिताें की संख्या काे पहले एक लाख तक पहुंचने में 67 दिन लग गए थे। उसके बाद सिर्फ 11 दिन में ही एक लाख नए लाेग संक्रमित हाे गए। ये और भी भयावह है कि दाे लाख संक्रमिताें से तीन लाख तक ये बीमारी पहुंचने में सिर्फ चार दिन लगे। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि काेराेना कितनी तेजी से फैलता है और जब ये फैलना शुरू करता है, ताे इसे राेकना बहुत मुश्किल हाेता है।

यही वजह है कि चीन, अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, स्पेन, इटली, ईरान जैसे अनेक देशाें में जब काेराेना ने फैलना शुरू किया ताे हालात बेकाबू हाे गए। और ये भी याद रखें कि इटली हाे या अमेरिका इन देशाें की स्वास्थ्य सेवा, अस्पताल, आधुनिक संसाधन दुनिया में बेहतरीन माने जाते हैं, फिर भी ये देश काेराेना का प्रभाव कम नहीं कर पाए। सवाल ये है कि उम्मीद की किरण कहां है? उपाय और विकल्प क्या हैं? इससे निपटने के लिए उम्मीद की किरण उन देशाें से मिले अनुभव हैं, जाे काेराेना काे कुछ हद तक नियंत्रित कर पाए। हफ्ताें तक उनके नागरिक घराें से नहीं निकले। उन्हाेंने 100 फीसदी सरकारी निर्देशाें का पालन किया और इसलिए ये कुछ देश अब इस महामारी से बाहर आने की ओर बढ़ रहे हैं। हमें भी ये मानकर चलना चाहिए कि हमारे सामने सिर्फ और सिर्फ यही एक मार्ग है। एष: पंथा:।

घर से बाहर नहीं निकलना है, चाहे जाे हाे जाए। घर में ही रहना है। साेशल डिस्टेंसिंग। प्रधानमंत्री से लेकर गांव के छाेटे से नागरिक तक सबके लिए। काेराेना से तभी बच सकते हैं, जब घर की लक्ष्मण रेखा न लांघी जाए। हमें इस महामारी के वायरस का संक्रमण राेकना है। इसके फैलने की चेन काे ताेड़ना है। ये धैर्य और अनुशासन की घड़ी है। जब तक देश में लाॅकडाउन है, हमें अपना संकल्प निभाना है। अपना वचन निभाना है। मेरी आपसे हाथ जाेड़कर प्रार्थना है कि घराें में रहते हुए आप उनके बारे में साेचिए, उनके लिए मंगल कामना करें, जाे कर्तव्य निभाने के लिए खुद काे खतरे में डालकर काम कर रहे हैं। डाॅक्टरों व उनके बारे में सोचें जो एक-एक जीवन काे बचाने के लिए दिन-रात अस्पताल में काम कर रहे हैं। अस्पताल के लाेग, एंबुलेंस ड्राइवर, वार्ड बॉय, सफाईकर्मी के बारे मेंसाेचें, जाे दूसराें की सेवा कर रहे हैं। आप उनके लिए प्रर्थना करें जाे आपके यहां सेनिटाइज करने में लगे हैं। आपकाे सही जानकारी देने के लिए 24 घंटे काम कर रहे मीडिया के लोगाें के बारे में भी साेचें, जाे संक्रमण का खतरा उठाकर सड़काें पर हैं। अपने आसपास के पुलिसकर्मियों के बारे में साेचें जाे परिवार की चिंता के बिना आपकाे बचाने के लिए दिन रात ड्यूटी पर हैं। कई बार कुछ लाेगों की गुस्ताखी का शिकार भी हाे रहे हैं। काेराेना वैश्विक महामारी के बीच केंद्र और देश की राज्य सरकारें तेजी से काम कर रही हैं। राेजमर्रा की जिंदगी में लाेगाें काे असुविधा न हाे इसके लिए काेशिश कर रहे हैं। जरूरी वस्तुओं की सप्लाई के लिए सभी उपाय किए गए हैं। आगे भी किए जाएंगे। निश्चित ताैर पर संकट की ये घड़ी गरीबाें के लिए भी मुश्किल वक्त लाई है। केंद्र और राज्याें के साथ समाज के संगठन गरीबाें की मुसीबत कम हाे इसके लिए जुटे हुए हैं। गरीबाें की मदद के लिए कई लाेग साथ आ रहे हैं। जीवन जीने के लिए जाे जरूरी है, उसके लिए सारे प्रयासाें के साथ ही जीवन बचाने के लिए जाे जरूरी है, उसे सर्वाेच्च प्राथमिकता देनी ही पड़ेगी। इससे मुकाबला करने के लिए स्वास्थ्य सुविधाएं तैयार की जा रही हैं। डब्ल्यूएचओ, भारत के बड़े संस्थानाें की सलाह पर काम करते हुए सरकार ने निरंतर फैसले लिए हैं।

काेराेना के इलाज के लिए केंद्र ने आज 15 हजार करोड़ का प्रावधान किया है। इससे जांच सुविधा, आइसाेलेशन, आईसीयू बेड, वेंटिलेटर और अन्य जरूरी साधन बढ़ाए जाएंगे। राज्याें से अनुराेध किया गया है कि इस समय सभी राज्याें की प्राथमिकता सिर्फ और सिर्फ स्वास्थ्य सेवा ही हाे। मुझे संताेष है कि देश का प्राइवेट सेक्टर भी पूरी तरह से कंधे से कंधा मिलाकर संकट और संक्रमण की इस घड़ी में देश के साथ खड़ा है।

ध्यान रखें कि ऐसे समय में अनजाने कई बार अफवाहें भी जाेर पकड़ती हैं। किसी भी अफवाह और अंधविश्वास से बचें। आप केंद्र, राज्य और मेडिकल संस्थानों के निर्देश और सुझावाें का पालन करें। आपसे प्रार्थना है कि इस बीमारी के लक्षणाें के दौरान डाॅक्टर की सलाह के बिना काेई दवा न लें। किसी भी तरह का खिलवाड़ आपके जीवन काे खतरे में डाल सकता है। विश्वास है कि हर भारतीय सरकार के स्थानीय प्रशासन के निर्देशों का पालन करेगा। 21 दिन का लॉकडाउन लंबा समय है। लेकिन, आपके जीवन की रक्षा के लिए, आपके परिवार के लिए उतना ही महत्वपूर्ण है। यही एक रास्ता है। हर हिंदुस्तानी इसका न सिर्फ सफलता से मुकाबला करेगा, बल्कि विजयी हाेकर निकलेगा। आप अपना ध्यान रखें, अपनाें का ध्यान रखें और आत्मविश्वास के साथ कानून नियमाें का पालन करते हुए पूरी तरह संयम के साथ विजय का संकल्प लेकर हम सब इन बंधनाें काे स्वीकार करें।



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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र को संबोधित किया।




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विदेश से आने वालों को होम क्वारैंटाइन के लिए 15 हजार रुपए मिल रहे, गांवों में 7 हजार आइसोलेशन वॉर्ड बने

भुवनेश्वर से अनु शर्मा. पिछले साल ओडिशा का सामना फैनी तूफान से हुआ था। इसके आने से पहले ओडिशा और पूरा देश दहशत में था। तूफान की रफ्तार 200 से 250 किमी प्रति घंटे थी। तूफान आया और गुजर गया। इससे संपत्ति का तो व्यापक नुकसान हुआ, लेकिन जनहानि ज्यादा नहीं हुई। ओडिशा सरकार के आपदा प्रबंधन को देखकर पूरी दुनिया चौंक गईथी। फैनी तूफान को गुजरे एक साल भी नहीं बीता औरओडिशा का सामना अब कोरोनावायरस से हो गया। अब ओडिशा सरकार कोरोनावायरस को भी हराने के लिए ताबड़तोड़ कदम उठा रही है। राज्य सरकार ने आपदा प्रबंधन अधिनियम-2005 के तहत कोरोनावारयस को भी आपदा घोषित किया है। ऐसे कई और शुरुआती कदम हैं, जो देश के बाकी राज्यों लिए सबक हैं।

शुरुआतीतैयारी: लॉकडाउन से पहले ही हेल्पलाइन नंबर जारी किया, 17 हजार 262 लोगों ने कोरोना के बारे में जानकारी ली

  • कोरोना वायरस को रोकने के लिए राज्य सरकार ने 3 मार्च 2020 को शुरुआतीकदम उठा लिए थे। सरकार ने विदेश से ओडिशा आने वाले सभी लोगों को वेब पोर्टल covid19.odisha.gov.in पर रजिस्ट्रेशन कराने को कहा।इसमें रजिस्ट्रेशन कराने वालोंको 14 दिनों तक नियमित रुप से क्वरैंटाइन में रहने पर 15 हजार रुपए देने का भी वादा किया। स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक 26 मार्च तक 4,000 से अधिक लोगों ने इस पोर्टल पर अपना नाम पंजीकृत करवाया है।
  • ओडिशा सरकार ने लॉकडाउन से बहुत पहले ही राज्य के लोगों के लिए 104 नंबर की हेल्पलाइन भी जारी कर दी थी। इस नंबर पर 13 से 22 मार्च तक 72,134 लोगों ने कॉल किया, जिनमें से 48,313 लोगों से सरकार की ओर से संपर्क किया गया। 17,262 लोगों ने कोरोना वायरस के फैलाव से जुड़ी जानकारी ली। अन्य लोगों ने सर्दी, खासी एवं स्वाइन फ्लू से जुड़े सवाल पूछे।

भुवनेश्वर में सड़कों पर लॉकडाउन काफी हद तक कामयाब है।

नेशनल लॉकडाउन से पहले: राज्य के 5 जिले और 8 शहरों को बंद कर दिया गया था, केवल जरूरी सेवाएं चल रही थीं

  • सरकार ने राज्य के 5 जिले और 8 प्रमुख शहरों को 22 मार्च से 29 मार्च तक लॉकडाउन कर दिया था। हालांकि बाद में केंद्र सरकार ने 24 मार्च से पूरे देश में लॉकडाउन घोषित कर दिया। इस दौरान केवल बैंक, एटीएम, दवाखाना, राशन दुकान एवं अन्य अहम एजेंसियों को खुला रखने का निर्देश दिया गया।
  • नवीन पटनायक सरकार ने कोरोना के खिलाफ परिवार की फिक्र छोड़ और अपनी जान की बाजी लगाकर सेवा में जुटे डाॅक्टर, पैरामेडिकल स्टाफ और हेल्थकेयर कर्मचारियों को 4 महीने का एडवांस वेतन अप्रैल महीने में ही एक साथ देने की घोषण की है।

इलाज की व्यवस्था: अब तक राज्य में कोरोना के सिर्फ 3 पॉजिटिव केस आए हैं, कोरोना वार्ड तैयार हो रहे
ओडिशा में अब तक कोरोनावारयस के 3 पॉजिटिव केस सामने आए हैं। इन सभी का भुवनेश्वर के अस्पतालों में इलाज चल रहा है। राज्य में 26 मार्च तक 166 नमूनों की जांच की गई है।
वहीं, अब पटनायक सरकार ने देश में कोरोना मरीजों बढ़ती संख्या को देखकर भुवनेश्वर में एक हजार बेडवाला अस्पताल बनाने का फैसला किया है। मुख्यमंत्री कार्यालय के मुताबिक यह अस्पताल 15 दिन में बनकर तैयार हो जाएगा। इसे दो भागों में बांटा गया है। इसके तहत केआईआईएमएस मेडिकल कॉलेज के मेडिसिन ब्लॉक में 450 बेड का अस्पताल बनेगा। इसके साथ 550 बेड की व्यवस्था एसयूएम हॉस्पिटल के कन्वेंशन सेंटर में की जाएगी। दोनों जगहों पर 24 घंटे इलाज किया जाएगा। इसका खर्च ओडिशा माइनिंग कॉरपोरेशन(ओएमसी) और महानदी कोलफिल्ड लिमिटेड(एमसीएल) के सीएसआर फंड द्वारा की जाएगी।

केआईआईएमएस मेडिकल कॉलेज के इसी मेडिसिन ब्लॉक में कोरोना के इलाज के लिए 450 बेड बन रहे।

अपनों की मदद: अन्य राज्यों में फंसे ओडिशा के लोगों के रहने-खाने और उपचार का खर्च सरकार उठाएगी
ओडिशा सरकार ने 21 दिनों के लॉकडाउन को देखते हुए अन्य राज्यों में फंसे ओडिशा के लोगों के रहने-खाने और समय पर उपचार की व्यवस्था करने के लिए सभी राज्यों के मुख्यमंत्री को पत्र भी लिखा है। इस दौरान हुए खर्च को भी ओडिशा सरकार भुगतान करेगी। इसके अलावा सरकार ने 21 दिनों के लॉकडाउन में अन्य राज्यों में फंसे ओडिशा के लोगों की मदद के लिए उच्च अधिकारी के नेतृत्व में एक कंट्रोल रूम कोविड-19 बनाया है। कंट्रोल रूम के फोन नम्बर-0674 2392115 और 9438915986 पर कॉल कर लॉकडाउन में फंसा व्यक्ति ओडिशा सरकार से संपर्क कर सकता है।


जमीनी तैयारी: गांवों में क्वरैंटाइन लोगों के घरों के सामने पोस्टर चिपकाए गए, पड़ोसियों को सावधानी बरतने की हिदायत
देश के विभिन्न राज्यों में काम करने वाले 84 हजार से ज्यादा ओडिशा के लोग लॉकडाउन से प्रभावित होकर लौटे हैं। इन सभी को होम क्वरैंटाइन रहने का अनुरोध किया गया है। राज्य में पंचायत स्तर पर अब तक 7 हजार से अधिक आइसोलेशन वार्ड तैयार किए गए हैं। होम क्वरैंटाइन में रहने वालों लोगों के घरों के सामने एक पोस्टर चिपकाया जा रहा है और पड़ोसियों को क्वरैंटाइन परिवार से दूर रहने के लिए कहा जा रहा है।

होम क्वरैंटाइन में रहने वालों लोगों के घरों के सामने एक पोस्टर चिपकाया जा रहा है।

सोशल डिस्टेंसिंगका ख्याल: खरीददारी के वक्त 1 मीटर की दूरी जरूरी, नहीं तो कार्रवाई की जा रही, राशन की होम डिलीवरी भी
कोरोना की लड़ाई में सोशल डिस्टेंसिंग का भी खास ध्यान रखा जरा है। राज्य के सभी जिलों में मॉल एवं मार्ट के माध्यम से लोगों को राशन के साथ अन्य जरूरी सामान होम डिलीवरी की जरिए भिजवाई जा रही है। ताकि सोशल डिस्टेंशिंग मेनटेन हो सके। राज्य में सब्जी और राशन के दुकानों को सुबह 6 बजे से शाम 6 बजे तक खुला रखने का निर्देश है। दुकानों पर सामान की खरीदारी के वक्त एक-मीटर की दूरी बनना अनिवार्य है। इस नियम का उल्घंन करने वाले पर कानूनी कार्रवाई दर्ज किया जाएगा।

भुवनेश्वर में सड़कों पर सब्जी मार्केट में सोशल डिस्टेंशिंग के लिए बनाए गए निशान।

स्वयंसेवी संस्थाएं भी जुटीं: रेड क्रास सोसाइटी के वॉलंटियर्स पुलिसकर्मियों को मास्क और पानी की बॉटल बांट रहे
रेड क्रोस सोसायटी के वॉलंटियर्स भी कोरोनावायरस के खिलाफ लड़ाई में सरकार की मदद कर रहे हैं। वॉलंटियर्स चौराहों पर तैनात पुलिसकर्मियों को फेस मास्क, पानी की बोतल और फल देते हुए सैल्यूटकर रहे हैं। एक वॉलंटियर्स ने कहा कि हम अपने घरों में परिवार के साथ खुशी से हैं, लेकिन हमारी सुरक्षा के लिए तैनात पुलिसकर्मी अपने घर परिवार से दूर रहते हैं। हम इनके मनोबल को बढ़ाना चाहते हैं। इस काम 100 से अधिक वॉलंटियर्स जुटे हैं। वहीं, राजधानी के कई एनजीओ भी सड़कों पर घूम रहे जानवरों को खाना देने का काम कर रहे हैं।

नेतृत्व क्षमता: मुख्यमंत्री पटनायक को आपदा प्रबंधन का चाणक्य कहा जाता है, कई राज्य भी ले चुके हैं मदद
ओडिशा की कमान पिछले 20 साल से मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के हाथों में है। इस दौरान में पटनायक ने कई बार प्राकृतिक आपदाओं का मुकाबला किया। उन्हें आपदाओं से निटपने और तैयारी कराने में चाणक्य माना जाता है। पिछले सालों में केरल, तमिलनाडु समेत कई अन्य राज्यों ने भी आपदा के समय में ओडिशा सरकार की मदद ली है। नवीन पटनायक ने अपना तीन महीने का वेतन भी मुख्यमंत्री राहत कोष में जमा किया है। मुख्यमंत्री ने अन्य लोगों से भी दान देने का अनुरोध किया है।

राज्य के सीएम नवीन पटनायक ने भी जनता कर्फ्यू के दिन शाम को थाली बजाई थी।

आपदाओं का सामना: 1999 में आए तूफान में करीब 15 हजार लोगों की जान गई थी, फिर सरकार ने आपदा प्रबंधन तंत्र बनाया

ओडिशा की समुद्री सीमा 450 किलोमीटर लंबी है। इसलिए ओडिशा को बार-बार प्राकृतिक आपदाओं की मार करने की आदत पड़ गई है। 1999 में आए एक चक्रवाती तूफान के चलते ओडिशा में करीब 15 हजार लोगों को अपनी जान गवानी पड़ी थी। तकरीबन 16 लाख लोगों को बेघर हो गए थे। इसके बाद ओडिशा ने आपदा प्रबंधन का तंत्र बनाया, जो अब मिसाल बन चुका है। इसके बाद ओडिशा में 2013 में थाईलीन, 2014 में हुदहुद, 2018 में तितली और 2019 में बुलबुल और फोनी जैसे चक्रवाती तूफान का सामना करना पड़ा। इन तूफानों से संपत्ति का तो काफी नुकसान हुए, लेकिन इंसानी मौतों की संख्या दो अंक से पार नहीं गई। ओडिशा सरकार ने आपदाओं से निपटने के लिए ओडिशा आपदा अनुक्रिया बल(ओडीआरफ) का गठन किया है।

तस्वीर पिछले साल में मई में ओडिशा में आए फैनी तूफान के बाद हुई तबाही की है।


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ओडिशा में रेडक्रॉस सोसाइटी के वॉलिंटियर्स पुलिसकर्मियों को मास्क और पानी बांट रहे।




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मार्च के 27 दिनों में चीन में कोरोना के 1.7% केस आए, 383 मौतें हुईं; दुनिया में 573% मामले बढ़े और 27 हजार की जान गई

नई दिल्ली.दुनिया के लिए मार्च का महीना बेहद खराब रहा। वो इसलिए, क्योंकि मार्च के 27 दिनों में दुनियाभर में कोरोनावायरस के मामले 573% बढ़ गए। लेकिन इसी दौरान जिस चीन से ये वायरस निकला, वहां सिर्फ 1.7% ही नए मामले आए। 1 मार्च तकदुनियाभर में 88 हजार 585 और चीन में 80 हजार 26 मामले थे। इस तरह से उस समय दुनिया के कुल मामलों में चीन की हिस्सेदारी 90% तक थी। लेकिन 27 तारीख तक दुनिया में कोरोना के 5.96 लाख और चीन में 81 हजार 394 मामले हो गए। अब कुल मामलों में चीन की हिस्सेदारी घटकर 15% से भी कम हो गई।

मौतें : दुनिया में 27 दिन में मौतों का आंकड़ा 798% बढ़ा, चीन में 13% ही
मार्च के इन 27 दिनों में मौतों का आंकड़ा भी लगातार बढ़ता रहा। 1 मार्च तक दुनियाभर में 3 हजार 50 मौतें हुई थीं, उनमें से 95% से ज्यादा यानी 2 हजार 912 मौतें अकेले चीन में हुई थी। इसके बाद 27 मार्च तक चीन में मौत का आंकड़ा बढ़कर 3 हजार 295 पर पहुंच गया, लेकिन दुनियाभर में ये आंकड़ा 798% बढ़कर 27 हजार 371 पर आ गया।

रिकवरी : चीन में अब तक 92% मरीज ठीक हुए, दुनिया में यही आंकड़ा 22% का
चीन में कोरोनावायरस का पहला केस 27 दिसंबर को सामना आया था। उसके बाद से 27 मार्च तक चीन में 81 हजार 394 मामले आ चुके हैं। इनमें से 92% यानी 74 हजार 971 मरीज ठीक भी हो गए। जबकि, 3 हजार 295 मरीजों की मौत हो गई। जबकि, दुनियाभर में अब तक 5.96 लाख मामले मिले हैं, जिनमें से 22% यानी 1.33 लाख से ज्यादा मरीज ही रिकवर हुए हैं।

और भारत में : 885 नए मरीज आए, 22 मौतें हुईं

मार्च का महीना हमारे देश के लिए भी बहुत खराब रहा। देश में कोरोनावायरस का पहला केस 30 जनवरी को केरल में आया था। उसके बाद 1 और 2 फरवरी को भी केरल से ही 1-1 केस और आए। लेकिन कुछ ही समय में ये तीनों मरीज ठीक भी हो गए। लेकिन मार्च के महीने में देश में 2 मार्च के बाद से रोजाना मामले बढ़ते गए। इस महीने 27 मार्च तक देश में 886 मामले आए। इस दौरान 22 मौतें भी हुईं।

इस महीने सबसे ज्यादा मामले अमेरिका में बढ़े, लेकिन सबसे ज्यादा मौतें इटली में हुईं

देश मामले बढ़े मौतें हुईं
अमेरिका 1.04 लाख+ 1,695
इटली 85,370 9,105
स्पेन 65,661 5,138
जर्मनी 50,792 351
फ्रांस 32,864 1,993


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In 27 days of March, 1.7% of Corona cases occurred in China, 383 deaths occurred, but 573% cases increased in the world and 27 thousand deaths occurred.




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हरिद्वार में फंसे थे गुजरात के 1800 लोग, रूपाणी के कहने पर उन्हें लॉकडाउन के बीच बसों से घर पहुंचाया गया

बात 28 मार्च की है। अहमदाबाद में रहने वाले मुकेश कुमार के मोबाइल पर एक मैसेज आया। यह मैसेज उनके ही एक दोस्त ने भेजा था। इसमें लिखा था कि ‘आज रात उत्तराखंड परिवहन की कई बसें अहमदाबाद पहुंच रही हैं। ये बसें कल सुबह वापस उत्तराखंड लौटेंगी, तुम भी इनमें वापस अपने घर लौट सकते हो।’

मुकेश मूल रूप से उत्तराखंड के ही रहने वाले हैं। बीते कुछ सालों से वे अहमदाबाद के एक होटल में नौकरी कर रहे थे। लॉकडाउन के चलते होटल बंद हुआ तो उनके रोजगार पर भी अल्पविराम लग गया। देश भर के तमाम प्रवासी कामगारों की तरह मुकेश का भी मन हुआ कि वे अपने गांव लौट जाएं। लेकिन सभी सार्वजनिक यातायात बंद हो जाने के चलते वे ऐसा नहीं कर पाए। फिर 28 मार्च को जब अचानक दोस्त का मैसेज आया कि उत्तराखंड परिवहन की गाड़ियां अहमदाबाद आ रही हैं तो पहले-पहल उन्हें इस पर विश्वास ही नहीं हुआ।

मुकेश को लगा कि उनके दोस्त ने शायद मैसेज भेजकर मजाक किया है। जब पूरे देश में यातायात ठप पड़ा है और सभी प्रदेशों की सीमाएं सील की जा चुकी हैं तो फिर उत्तराखंड परिवहन की बसें 1200 किलोमीटर दूर अहमदाबाद कैसे आ सकती हैं। दूसरी तरफ उनके मन का एक हिस्सा इस मैसेज पर विश्वास भी करना चाहता था और लगातार यही सोच रहा था कि शायद उत्तराखंड सरकार ने उन लोगों की मदद के लिए सच में कुछ बसें अहमदाबाद भेजी हों।

इसी रात मुकेश कुमार ने देखा कि उनके होटल के सामने की मुख्य सड़क पर सच में उत्तराखंड परिवहन की कई सुपर लग्जरी बसें कतारबद्ध बढ़ी आ रही हैं। उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उन्होंने तुरंत ही उत्तराखंड के अपने अन्य प्रवासी साथियों से संपर्क किया और वापस अपने गांव लौटने की तैयारी करने लगे। मुकेश और उनके साथियों ने मिलकर इन बसों के ड्राइवर से वापस लौटने का समय भी मालूम कर लिया।

मुकेश कुमार बताते हैं- ‘अगली सुबह यानी 29 मार्च को करीब 10बजे हम सब लोग इन बसों के पास पहुंच गए। हम 13 साथी एक बस थे। हमारी बस के ड्राइवर ने फिर हमसे कहा कि तुम्हें ऋषिकेश तक का कुल 18 हजार रुपए किराया चुकाना होगा। ये हमें अजीब तो लगा लेकिन हमारे पास कोई विकल्प भी नहीं था। मजबूरी थी इसलिए हम तैयार हो गए और हम 13 लोगों ने मिलकर तुरंत ही 18 हजार रुपए ड्राइवर को थमा दिए। हमें लगा था कि चलो इस मुश्किल वक्त में हम कम से कम किसी भी तरह अपने घर तो पहुंच जाएंगे। लेकिन वो भी नहीं हुआ।’

गुजरात से लौट रहे उत्तराखंड के लोगों को आधे रास्ते में ही छोड़ दिया गया।

मुकेश और उनके साथियों को उत्तराखंड परिवहन की इन बसों ने अहमदाबाद से बैठा तो लिया लेकिन उत्तराखंड पहुंचने से पहले ही रात के अंधेरे में किसी को राजस्थान तो किसी को हरियाणा में ही उतार दिया। असल में ये तमाम बसें गुजरात में फंसे मुकेश जैसे उत्तराखंड के नागरिकों को लेने नहीं बल्कि हरिद्वार में फंसे गुजरात के नागरिकों को छोड़ने अहमदाबाद गई थी।

गुजरात के मुख्यमंत्री के सचिव अश्वनी कुमार ने एक न्यूज एजेंसी को बताया- ‘गुजरात के अलग-अलग जिलों के करीब 1800 लोग हरिद्वार में फंसे हुए थे। केंद्रीय मंत्री मनसुखभाई मांडविया और मुख्यमंत्री विजय रूपाणी के विशेष प्रयासों से इन लोगों को वहां से निकालकर इनके घर पहुंचाने की व्यवस्था की गई।’ इसी व्यवस्था के चलते उत्तराखंड परिवहन की कई गाड़ियां हरिद्वार से अहमदाबाद पहुंची थी। दिलचस्प है कि ये काम इतनी गोपनीयता से किया गया कि उत्तराखंड के परिवहन मंत्री तक को ये खबर नहीं लगी कि उनके विभाग की कई गाड़ियां लॉकडाउन के दौरान कई राज्यों की सीमाओं को पार करते हुए 1200 किलोमीटर के सफर पर निकल चुकी हैं।

27 मार्च को जारी एक आदेश से मालूम पड़ता है कि उत्तराखंड परिवहन की ये गाड़ियां सीधे प्रदेश के मुख्यमंत्री कार्यालय के निर्देशों के तहत गुजरात भेजी गई थीं। इनका उद्देश्य हरिद्वार में फंसे गुजरात के लोगों को उनके घर पहुंचाना था। वापस लौटते हुए यही गाड़ियां वहां फंसे उत्तराखंड के लोगों को लेकर आ सकती थी, लेकिन ऐसा कोई भी आदेश उत्तराखंड सरकार की ओर से जारी नहीं हुआ।

वह आदेश जिसके तहत बसों को हरिद्वार से अहमदाबाद भेजा गया।

जब ये बसें हरिद्वार से रवाना होने लगी और यह खबर सार्वजनिक हुई तो यह मामला विवादों से घिरने लगा। सवाल उठने लगे कि जब लॉकडाउन के चलते पूरे देश में ही लोग अलग-अलग जगहों पर फंसे हैं और उत्तराखंड में भी कई अलग-अलग राज्यों के लोग फंसे हैं तो सिर्फ गुजरात के लोगों के लिए ही विशेष बसें क्यों चलाई जा रही हैं? इसके साथ ही यह भी सवाल उठे कि तमाम जगहों से उत्तराखंड के जो प्रवासी पैदल ही लौटने पर मजबूर हैं उनके लिए कोई बस अब तक क्यों नहीं चलाई गई? साथ ही यह सवाल भी उठने लगे कि जब अहमदाबाद के लिए बसें निकल ही चुकी हैं तो फिर ये बसें खाली वापस क्यों लौटें, वहां फंसे उत्तराखंड के लोगों को ही वापस लेती आएं।

यही वो समय था जब सोशल मीडिया पर ये बातें तेजी से फैलने लगीं। लिहाजा इन बसों के अहमदाबाद पहुंचने से पहले इनकी खबर वहां रहने वाले मुकेश कुमार जैसे तमाम लोगों तक एक उम्मीद बनकर पहुंच गई। अब उत्तराखंड सरकार पर भी दबाव बढ़ने लगा। राज्य के परिवहन मंत्री से इस संबंध में सवाल पूछे गए तो सामने आया कि उन्हें भी इन बसों के निकलने की कोई जानकारी नहीं थी।

दबाव बढ़ने पर उत्तराखंड सरकार ने यह एलान तो कर दिया कि वापस लौटती बसें गुजरात में रह रहे प्रवासियों को लेकर लौटेंगी, लेकिन इस दिशा में कोई पुख्ता कदम नहीं उठाए गए। नतीजा ये हुआ कि वहां से लौट रहे मुकेश कुमार जैसे दर्जनों उत्तराखंड के प्रवासी न तो घर के रहे न घाट के। ये तमाम लोग राजस्थान से लेकर हरियाणा के अलग-अलग इलाकों में अब तक भी फंसे हुए हैं।

रात करीब तीन बजेबस ड्राइवरों ने कई लोगों को हरियाणा बॉर्डर पर ही उतार दिया।

मुकेश और उनके साथी अब किस स्थित में और उन पर क्या-क्या बीती है, इस पर चर्चा करने से पहले इस मामले से जुड़े कुछ अन्य अहम सवालों पर चर्चा करना जरूरी है। ये सवाल उन लोगों से जुड़ते हैं जिनके चलते इस पूरे प्रकरण की शुरुआत हुई। यानी हरिद्वार में फंसे वे लोग जिन्हें वापस गुजरात छोड़ने के लिए बसें चलवाई गई।

बताया जा रहा है कि गुजरात के ये तमाम लोग किसी धार्मिक अनुष्ठान में शामिल होने हरिद्वार पहुंचे थे। प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के अपने प्रदेश से आए इन लोगों को उनका करीबी भी बताया जा रहा है। गुजरात के मुख्यमंत्री के सचिव अश्वनी कुमार के आधिकारिक बयान से भी इतना तो साफ होता ही है कि जहां देशभर में लाखों लोग यहां-वहां फंसे हुए हैं, वहीं हरिद्वार में फंसे इन लोगों को सीधा गृह मंत्री के निजी हस्तक्षेप के बाद विशेष व्यवस्था करके निकाला गया है।

दूसरी तरफ मुकेश कुमार जैसे लोग है, जिन्होंने अपने प्रदेश की गाड़ियों को आता देख अपने घर लौट पाने की उम्मीद पाली थी, लेकिन वो अब तक भी अधर में लटके हुए हैं। मुकेश बताते हैं- ‘हम लोग रात करीब तीन बजे हरियाणा बॉर्डर के पास पहुंचे थे। हमारे ड्राइवर ने यहां पहुंच कर हमसे कहा कि आगे पुलिस का नाका लगा है और वो सवारी से भरी गाड़ियों को बॉर्डर पार नहीं करने दे रहे। ड्राइवर ने कहा कि तुम लोग उतरकर पैदल बॉर्डर के दूसरी आेर जाओ तो मैं तुम्हें फिर से बैठा लूंगा। हम उसकी बात मानकर उतार गए, लेकिन वो उसके बाद रुका ही नहीं। हमने सारी रात सड़क पर काटी। फिर कई किलोमीटर पैदल चलकर यहां बवाल (हरियाणा) पहुंचे और उस दिन से ही एक स्कूल में ठहरे हुए हैं। कोई गाड़ी हमें लेने नहीं आई जबकि हमने न जाने कितने अधिकारियों को फोन किए।’

गुजरात से लौटे उत्तराखंड के दर्जनों लोग बवाल (हरियाणा) के एक स्कूल में ठहराए गए हैं।

ऐसी ही स्थिति रुद्रप्रयाग के रहने वाले हिमालय और उनके साथियों की भी हैं। हिमालय गांधीनगर (गुजरात) के कृष्णा होटल में काम किया करते थे। बीती 29 मार्च को वे भी उत्तराखंड परिवहन की ऐसी ही बस से लौट रहे थे, लेकिन उन्हें उनके लगभग 40 अन्य साथियों के साथ राजस्थान के अलवर जिले में ही उतार दिया गया। ये सभी लोग अब भी वहीं फंसे हुए हैं और एक होस्टल में रह रहे हैं।

इनसे भी ज्यादा लोग राजस्थान के उदयपुर में फंस गए हैं। पुनीत कंडारी इन्हीं में से एक हैं जो अहमदाबाद रिंग रोड पर स्थित ऑर्किड नाम के एक होटल में काम किया करते थे। पुनीत बताते हैं- ‘हम कुल 49 लोग हैं। उस रात से ही यहां फंसे हुए हैं। बस वाले ने हमें आगे ले जाने से माना कर दिया और रात के अंधेरे में यहां बीच सड़क में उतार दिया था। पुलिस हमें यहां से भगा रही थी। हमें समझ नहीं आ रहा था क्या करें। फिर हमें अपने यहां के विधायक मनोज रावत जी को फोन किया। उन्होंने ही किसी से बोलकर हमारे रहने-खाने की व्यवस्था करवाई।’

केदारनाथ से कांग्रेस के विधायक मनोज रावत बताते हैं, ‘मुझे जब इन लड़कों का फोन आया तो मुझे पहले तो इनकी बातों पर विश्वास नहीं हुआ। मुझे लगा कि जब सारा देश बंद है तो उत्तराखंड परिवहन की गाड़ियां गुजरात कैसे जा सकती हैं। फिर मैंने परिवहन मंत्री यशपाल आर्य जी को फोन किया लेकिन उन्होंने भी फोन नहीं उठाया। कई अन्य जगहों से जब पूरा मामला पता चला तो मैंने कोरोना के लिए नियुक्त हुए नोडल अधिकारी और प्रभारी मंत्री को पत्र लिखा कि इन सभी लोगों की तत्काल मदद की जाए। इसके बाद भी जब इन लोगों की वापसी की कोई राह नहीं बनी तो अंततः मैंने राजस्थान में रह रहे कुछ परिचितों से संपर्क किया फिर उन्होंने ही इन लोगों की व्यवस्था की।’

राजस्थान और हरियाणा के अलग-अलग शहरों में फंस चुके उत्तराखंड के ये प्रवासी कहते हैं- ‘गाड़ियां नहीं चल रही थी तो हम लोग गुजरात में ही रुके हुए थे। भले ही काम बंद था और पगार नहीं मिल रही थी, लेकिन हमारे रहने-खाने की व्यवस्था सेठ ने की हुई थी। हम लोगों ने तो जब ये देखा कि हमारे अपने प्रदेश की गाड़ियां गुजरात आई हुई हैं, तब हमने वापस लौटने की सोची।’ पुनीत कंडारी कहते हैं, ‘हम 14 दिन तक सब लोगों से अलग रहने को तैयार हैं, लेकिन हमें बस उत्तराखंड पहुंचा दिया जाए। यहां ऐसे अनजान इलाके में क्यों छोड़ दिया गया है? हमारे साथ जो हुआ है और हमें जिस स्थिति में छोड़ दिया गया है उसके बाद क्या हमारे मुख्यमंत्री कभी हमसे आंखें मिलाकर कह सकेंगे- आवा आपुण घौर।'

पलायन की समस्या से निपटने के लिए हाल ही में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने प्रदेश के बाहर नौकरी कर रहे तमाम युवाओं से अपील की थी – ‘आवा आपुण घौर', जिसका मतलब है- ‘आओ अपने घर।'



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उत्तराखंड परिवहन निगम के दस्तावेजों में बसों के हरिद्वार से गुजरात भेजे जाने की एंट्री भी है।




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कोविड-19 ने बदले हमारे कल के सिद्धांत, भविष्य को लेेकर जरा भी आश्वस्त नहीं हैं

(पत्रकार दैनिक भास्कर के लिए इटली से विशेष)कोविड-19 ने हमारी जिंदगी को बदल दिया है। अब हमारी जिंदगी दो अध्यायों में बंट रही है, एक कोरोना से ‘पहले’ और एक कोरोना के ‘बाद’। हमारे कल के सिद्धांत बदल गए हैं। इस हेल्थ इमरजेंसी से पहले हम सभी अपने भविष्य के बारे में इस तरह से सोचने के अादी थे कि यह तो होगा ही। एक यात्रा, कोई अन्य अनुभव या फिर कोई भी फैसला हो। लेकिन अब यह मानना कि भविष्य में सब कुछ योजना के मुताबिक नहीं होगा, इसकी वजह यह धक्का है। कम से कम हमारे दिमाग में तो कोविड-19 ने यह सब कुछ बदल दिया है। यह हमें याद दिलाता है कि कुछ योजना नहीं बनाई जा सकती। यह वायरस अब धक्का नहीं है, यह अब हमारी रोज की जिंदगी का हिस्सा बन गया है और हमें अब इसके साथ जीना सीखना है। लॉकडाउन का अगला दिन, जिसने हमें सोशल डिस्टेंस सिखाया, गुजारना मुश्किल था। हालांकि, अब री-ओपनिंग धीरे-धीरे होगी। हम सब सोचेंगे कि पहले क्या करना चाहिए। सच तो यह है कि हममें से कोई नहीं जानता कि इसके बाद का दिन या कहें कि कई दिन कैसे होंगे।

कोविड-19 ने हमारी आदतों और हमारे एक-दूसरे से संबंध रखने के तरीकों को बदल दिया है। इस महामारी से हम पर जो असर हुआ है, वह महत्वपूर्ण है और वह वैक्सीन के बनने के बाद भी बना रहेगा। यह डर हमेशा बना रहेगा कि कोई ऐसी चीज है जो बहुत तेजी से फैल सकती है और हमारे जीवन को खतरे में डाल सकती है। मास्क पहनना फैशन बन जाएगा। शायद हमारे पास ऐसे एप होंगे जो कोविड-19 से संक्रमित व्यक्ति या ऐसी जगह के बारे में बताएंगे, जहां पर दस से अधिक व्यक्ति जमा होंगे। कामकाजी लोगों की दुनिया बदल जाएगी। खुले और बड़े ऑफिस छोटे-छोटे ऑफिसों में बदल जाएंगे, जहां पर सिर्फ दो या तीन लोग काम कर रहे होंगे। यातायात भी बदल जाएगा। अभी तक चाहे ट्रेन हों, विमान हों या बसें, कंपनियां अधिक से अधिक स्थानों तक उन्हें ले जाती थीं, ताकि उनकी क्षमता बढ़ सके। लेकिन, शायद अब क्षमता का आकलन सुरक्षा, इस मामले में स्वास्थ्य सुरक्षा से होगा और निश्चित ही इससे कीमत तो बढ़ेगी ही। कैटरिंग उद्योग यानी बार, रेस्टोरेंट को भी इसी तरीके से काम करना होगा यानी अब भीड़भाड़ वाली जगहें नहीं होंगी, बल्कि अब टेबल दूर-दूर होंगी। आने वाले कल में ऐसा होगा और यह लंबे समय तक चलेगा। कोविड-19 एक ऐतिहासिक क्षण लेकर आया है, यह आधुनिक जीवन का एक टर्निंग पॉइंट है। बड़ी घटनाएं केवल नकारात्मक प्रभाव ही नहीं डालतीं, बल्कि उसका सकारात्मक असर भी होता है। लेकिन मिलान में रहने वाली एक इटैलियन के लिए आज कुछ भी सकारात्मक देखना मुश्किल है। कभी यह चर्चा होती थी कि लोग आज की भीड़-भाड़ वाली जिंदगी में कितने फंसे हुए हैं, वे अपने लिए कितना कम समय निकाल पाते हैं। नई पीढ़ियों को अक्सर यह उलाहना सुनना पड़ता था कि वे जिंदगी की छोटी-छोटी चीजों की सराहना नहीं करते हैं। कई बार हमने अपने दादा-दादी या नाना-नानी से सुना है कि ‘यह पहले ज्यादा अच्छा था’।

कोविड-19 ने हम पर क्वारेंटाइन का लंबा समय लाद दिया है। हममें से किसी ने शायद ही पहले कभी इस तरह की बंदिशों का अनुभव किया हो। हम सब अपने घरों में हैं। हममें से अनेक लोग अपने परिवारांे, माता-पिता, भाई-बहनों के साथ नहीं हैं। ‘उसके बाद’ हमें पहला काम यह करना चाहिए कि हमें अपने करीबियों या प्रियजनों से मिलने जाना चाहिए। इस क्वारेंटाइन में हमें उन चीजों की सराहना करना सिखाया है, जिन्हें हम पहले एेसे ही समझ लेते थे। जब आदमी तालांे में बंद है तो प्रकृति खुलकर बाहर आ गई है। हमने हल्के पीले दिख रहे बीच, बंदरगाहों पर तैरती डॉल्फिनों, तालाबों में नहाते भालू के छोटे-छोटे बच्चों, खाली पड़े हुए पार्कों में घूमते खरगोशों की फोटो देखी हैं और हमने इन्हें पसंद किया है। इसने हमें सोचने पर मजबूर कर दिया है।

जब यह क्वारेंटाइन खत्म होगा तो हमें इस बात के प्रति सतर्क रहना होगा कि प्रकृति का यह जादू या आकर्षण बरबाद न हो जाए। निश्चित ही दुनिया के देशों को खुद को फिर से शुरू करना होगा, लेकिन यह प्रकृति और वातावरण को सम्मान देकर हो सकता है। ग्रेटा थनबर्ग की बात को अनसुना किया गया। कोविड-19 को हर किसी ने सुना और यह हम सबके लिए एक चेतावनी भी है। कोविड-19 ने हम सभी को एक-दूसरे की एकजुटता और एक-दूसरे के महत्व को दोबारा से समझाया है। यही नहीं इसने तमाम दुनिया को हेल्थ केयर के महत्व के पुनर्मूल्यांकन को कहा है। पिछले सालों में तमाम अन्य रणनीतिक क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर धन का निवेश किया गया। हेल्थकेयर भी अब रणनीतिक क्षेत्र है। यह कोविड-19 से मिला एक और सबक है। इसके ‘बाद का दिन’ अनिश्चितताओं से भरा है। लोगों को अनेक बड़ी समस्याओं को सुलझाना होगा, नाटकीय दुष्परिणामों के साथ सामाजिक वर्गों के बीच दूरी बढ़ेगी। लेेकिन कोविड-19 हमें सिखाएगा वह है गठबंधन, एकजुटता व मानवता की ताकत। हमें इसे भूलना
नहीं चाहिए। (यह लेखिका के अपने विचार हैं।)




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Kovid-19 changed our principles of tomorrow, we are not at all confident about the future




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द्वारका से 1700 लोगों को बसों से घर तक छोड़ा गया, उज्जैन में भी प्रशासन की मदद से यात्री बाहर भेजे गए; अजमेर शरीफ में अब तक 3500 जायरीन फंसे हुए हैं

देश में कोरोनावायरस से संक्रमित मरीजों की संख्या जैसे ही 100 के पार हुई थी, ठीक वैसे ही केन्द्र समेत अलग-अलग राज्य सरकारें एक्शन में आने लगीं थीं। स्कूल, कॉलेज, पर्यटन स्थलों, रेस्त्रां, बार को बंद किया जाने लगा था। 15 मार्च के बाद अलग-अलग राज्यों में मंदिर-मस्जिद में भी एंट्री बैन होने लगी। हालांकि कुछ जगहों पर लोग मंदिरों में पूजा और मस्जिदों में इबादत के लिए अच्छी संख्या में जुटते रहे। 22 मार्च को जनता कर्फ्यू का ऐलान हुआ और फिर एक के बाद एक सैकड़ों शहर लॉकडाउन होते गए। 2 दिन बाद यानी 25 मार्च को पूरे देश को ही लॉकडाउन कर दिया गया। ऐसे में धर्म स्थलों के दरवाजे तो बंद हो गए लेकिन यहां पहुंचे हजारों लोग अपने घर नहीं लौट पाए। कुछ जगहों पर प्रशासन की मदद से लोगों को उनके शहर तक छोड़ दिया गया लेकिन कई जगहों पर सैकड़ों की तादाद में लोग अब भी फंसे हुए हैं। दैनिक भास्कर के 10 रिपोर्टरों की इस ग्राउंड रिपोर्ट में आप काशी से लेकर अजमेर तक और वैष्णोदेवी से लेकर तिरूपति तक देश के बड़े धार्मिक स्थलों के ताजा हालातों के बारे में पढ़ेंगे...

अजमेर से विष्णु शर्मा...

ख्वाजा शरीफ की दरगाह पर चादर चढ़ाने आए साढ़े 3 हजार जायरीन अभी भी फंसे हुए हैं
केंद्र और राज्य सरकार के निर्देशों के बाद 20 मार्च को जुमे की नमाज के बाद ही दरगाह शरीफ परिसर को पूरी तरह से खाली कर दिया गया था। यहां रोजाना की रस्म अदायगी के लिए दरगाह कमेटी के लोगों को विशेष पास दिए गए है।दरगाह पर तो ज्यादालोग नजर नहीं आते लेकिन इसके आसपास की होटलों, गेस्ट हाउस, धर्मशालाओं में करीब 3500 लोग फंसे हुए हैं। जनता कर्फ्यू (22 मार्च) के बाद से ही ये लोग यहां से निकल नहीं पाए।

दरगाह शरीफ के 11 गेटों में से सिर्फ 2 गेट ही खुले हैं।रोजाना की रस्म अदायगी के लिए कुछ लोगों को पास दिए गए हैं।

दरगाह कमेटी के अध्यक्ष अमीन पठान ने केंद्र और राज्य सरकार को एक पत्र लिखकर इन लोगों के अजमेर में फंसने की जानकारी दी थी, साथ ही इनके ठहरने, खाने-पीने की व्यवस्था करने की भी गुजारिश की थी। दरगाह थाना प्रभारी हेमराज सिंह चौधरी के मुताबिक, सभी लोगों पर निगरानी है। फिलहाल किसी में भी कोरोना के लक्षण नहीं पाए गए हैं। हर दिन दरगाह प्रबंधन और मस्जिदों से अनाउंसमेंट कर लोगों से अपील की जा रही है कि अगर किसी में कोरोना के लक्षण नजर आए तो वे तत्काल प्रशासन को सूचना दें। कुछ के टेस्ट भी किए गए, लेकिन रिपोर्ट नेगेटिव आई है।


वाराणसी से अमित मुखर्जी...

काशी विश्वनाथ मंदिर 20 मार्च से बंद है, घाटों पर सिर्फ एक-एक व्यक्ति गंगा आरती करता है
बनारस के दशाश्वमेध घाट पर 30 सालों से हो रही गंगा आरती इन दिनों सिर्फ सांकेतिक रूप से हो रही है। जिस आरती में सात पंडित या अर्चक होते थे, वहां अब सिर्फ एक व्यक्ति होता है। बिना किसी भजन या संगीत के आरती होती है।यही हाल अस्सी घाट पर होने वाली सुबह की आरती का भी है।

18 मार्च से ही काशी केदशाश्वमेध घाट पर एक ही व्यक्ति गंगा आरती करते हुए नजर आता है।

इन घाटों और आरतीयों को देखने आए 435 यात्री यहां फंसे हुए हैं, इनमें 35 विदेशी और 400 भारतीय हैं। होटलों और आश्रमों में ठहरे इन लोगों की लगातार मॉनिटरिंग हो रही है। काशी विश्वनाथ मंदिर,संकट मोचन मन्दिर,सारनाथ,म्यूजियम में लोगों की एंट्री बैन है। 17 मार्च से ही विश्वनाथ मंदिर में स्पर्श दर्शन और गर्भ गृह में प्रवेश बन्द कर दिया गया था और फिर 20 मार्च से पूरे मंदिर को ही बंद कर दिया गया।

उज्जैन से राजीव तिवारी...

23 मार्च से सभी श्रद्धालुओं को जिले की सीमा से बाहर भेजना शुरू किया गया
बारह ज्योतिर्लिंगों में से एकमहाकाल के साथ-साथ उज्जैन में कई प्राचीन मंदिर हैं। आम दिनों मेंयहां की होटलों, गेस्ट हाउस और धर्मशालाओं में भी लोगों की अच्छी खासी भीड़होतीहैलेकिन लॉकडाउन के बाद ये सब खाली है। जनता कर्फ्यू (22 मार्च) केदो दिन पहले ही प्रशासन ने महाकाल, हरसिद्धि, कालभैरव, मंगलनाथ सहित शहर के सभी मंदिर सील कर दिए थे और फिर 22 मार्च की रात से ही जिले को लॉकडाउन कर दिया गया। 23 मार्च को सभी श्रद्धालुओं को जिले की सीमा से बाहर भेजना शुरू किया गया। 300 श्रद्धालु ऐसे थे, जिन्हें साधन नहीं मिले तो प्रशासन ने अपने वाहनों से व्यवस्था कर उनके शहर-गांव भेज दिया।

मंदिरों की नगरी उज्जैन में हर दिन 20 हजार लोग महाकाल समेत अन्य मंदिरों के दर्शन के लिए आते हैं। 20 मार्च से यहां के सभी मंदिर बंद हैं।

107 श्रद्धालु जो गरीब हैं और अपने घर नहीं जा सकते थे, उन्हें नगर निगम के रैन बसेरों में ठहराया गया है। इनके खाने-पीने का इंतजाम नगर निगम कर रहा है। इनकी स्क्रीनिंग हुई है, इनमें से दो में कोरोना के लक्षण मिले हैं, जिन्हें माधव नगर अस्पताल में भर्ती किया गया है।

अमृतसरसे बलराजमोर...

एक चीनी और आठ पाकिस्तानियों समेत 200 से ज्यादा यात्री मौजूद हैं
अमृतसर में 200 यात्री मौजूद हैं, इनमें आठपाकिस्तानी और एक चीनी नागरिक भी शामिल हैं। दरबार साहिब की सराय गुरु रामदास में 150 लोग ठहरे हैं। सभी के स्क्रीनिंग टेस्ट हो चुके हैं, कोई भी पॉजिटिव नहीं पाया गया। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति ने 28 मार्च को श्री दरबार साहिब में फंसे लोगों को उनके घरों तक पहुंचाने के लिए विशेष बसें चलाई और दिल्ली, शाहजहांपुर और बठिंडा के लिए चार बसों को रवाना किया। इसी तरह 30 मार्च को अमृतसर से 180 लोग मलेशिया के लिए रवाना हुए। इनमें से ज्यादातर भारतीय मूल के लोग हैं, जिन्हें मलेशिया की नागरिकता हासिल है। मलेशिया सरकार ने इन्हें वहां बुलाने के लिए विशेष विमान भेजा था। इंटरनेशनल फ्लाइट्स रद्द होने के कारण वे यहां फंसे थे।

एक मुस्लिम सूफी संत ने 1588 ईस्वी में अमृतसर में स्वर्ण मंदिर की नींव रखी थी। करीब 200 साल बाद राजा रणजीत सिंह ने इसके एक खास हिस्से पर सोने की परत चढ़वाई।


शिरडी से आशीष राय...

मंदिर के पुजारी तय समय पर आते हैं, मास्क लगाकर आरती करते हैं और चले जाते हैं
साईं बाबा के इस प्रसिद्ध मंदिर के कपाट आम लोगों के लिए 17 तारीख की शाम 3 बजे के बाद से बंद हैं। यहां कोई भी श्रद्धालु नहीं है। मंदिर के पास स्थित ट्रस्ट का हॉस्पिटल खुला हुआ है, जहां स्टाफ और कुछ मरीज हैं। मंदिर के प्रसादालय में सिर्फ मेडिकल और सिक्यूरिटी स्टाफ के लिए खाना बनता है। मंदिर के पुजारी तय समय पर आते हैं, आरती करते हैं और चले जाते हैं। इस दौरान वहां मौजूद स्टाफ मास्क लगाकर दूर-दूर खड़े रहते हैं।

शिरडी के साईं मंदिर में पिछले साल 1 करोड़ 63 लाख भक्त आए थे। यानी हर दिन करीब 45 हजार लोग यहां साईं बाबा के दर्शन के लिए आते हैं। पिछले 18 दिनों से यहां सन्नाटा पसरा हुआ है।

द्वारका से जिग्नेश कोटेजा...

22 बसों से 1700 लोगाें को उनके शहर भेजा गया
जहां हमेशा “जय द्वारकाधीश” के स्वर गूंजा करते थे, वहां अब केवल पक्षियों के कलरव ही सुनाई दे रहे हैं। यहां सभी मंदिर बंद है। सुबह-शाम पुजारी आते हैं ओर पूजा करके चले जाते हैं। बिहार के 100 और कोलकाता के 28 यात्री यहां के सनातन सेवा मंडल आश्रम में ठहरे हुए हैं। जबकि 1700 लोगों को लॉकडाउन के बाद द्वारका प्रशासन ने 22 बसों से उनके शहर पहुंचाया। यहां 100 से ज्यादा होटलें हैं, सभी को खाली करवाने के बाद स्वास्थ्य विभाग ने इन्हें सेनटाइज किया है।

द्वारकाधीश मंदिर आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित देश के 4 धामों में से एक है। श्री कृष्ण भगवान का यह मंदिर करीब 2500 साल पुराना माना जाता है।

पुरी से सरत कुमार पात्रा...

15 हजार टूरिस्ट को चेक पोस्ट पर रोका, प्रशासन ने ट्रेन-फ्लाइट टिकट बुक करने में मदद की
कोरोना का फैलाव रोकने के लिए पुरी प्रशासन ने 17 तारीख को एडवाइजरी जारी की थी। उसी दिन से होटल, लॉज खाली करवाने और अगले आदेश तक कोई भी नई बुकिंग नहीं लेने के निर्देश दिए गए थे। इससे पहले 15 से 17 मार्च के बीच करीब 15 हजार टूरिस्ट को शहर के बाहर ही चेकपोस्ट बनाकर लौटा दिया गया था। जिला प्रशासन ने ट्रेन और फ्लाइट के टिकट बुक करने में यात्रियों की मदद भी की थी। जब सभी टूरिस्ट को यहां से लौटा दिया गया तो एक होटल में तीन विदेशी टूरिस्ट छिपे थे। होटल ने उनके होने की बात छिपाई थी। जिसके बाद पुलिस ने होटल को सील कर उन टूरिस्ट को दिल्ली भेज दिया।

पुरी का जगन्नाथ मंदिर भी चार धामों में से एक है। यहां की रथयात्रा दुनियाभर में प्रसिद्ध है।

वैष्णोदेवी से मोहित कंधारी...

चैत्र नवरात्र में मातावैष्णो देवी के दर्शन के लिए 35 से 40 हजार यात्री आते हैं, लेकिन इस साल यह पूरे नौ दिन बंद रहा
माता वैष्णोदेवी की यात्रा रोकने के ठीक एक दिन पहले 17 मार्च को श्राइन बोर्ड में 14 हजार 816 यात्रियों ने रजिस्ट्रेशन करवाया था। दर्शन के बाद इनमें से ज्यादातर लोग कटरा रेलवे स्टेशन से अपने घरों के लिए लौट गए। कुछ जो आसपास के इलाकों में घूमने निकले थे, उन्हें अथॉरिटी ने घर लौटने को कहा। नवरात्र में आमतौर पर यहां 35 से 40 हजार यात्री आते हैं। जबकि इस साल यात्रा पूरे नौ दिन बंद रही।

कटरा से 12 किमी दूर मां वैष्णोदेवी का मंदिर है। यह समुद्रतल से 5200 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।

तिरुपति से बीएस रेड्‌डी...

बालाजी मंदिर मेंदर्शन बंद हैं लेकिन पूरे समय एक हजार सुरक्षाकर्मी तैनात रहते हैं
तिरुपति बालाजी मंदिर में लॉकडाउन की घोषणा के बाद ही ट्रस्ट के 16 हजार से ज्यादा कर्मचारी जो मंदिर के आसपास या तिरुमाला पहाड़ पर रहते थे, उन सभी को परिवार सहित नीचे बनें आश्रमों में भेज दिया गया। करीब 1000 कर्मचारी बारी-बारी से 7-7 दिनों के लिए मंदिर की सुरक्षा और देखरेख के लिए ऊपर ही रहते हैं। इनमें सेना के रिटायर्ड अफसर और सुरक्षाकर्मी शामिल हैं। इन सभी लोगों को चेकअप के बाद ही ऊपर भेजा जाता है और जब यह 7 दिन के बाद वापस लौटते हैं तो दोबारा जांच की जाती है। इसके बाद फिर नए दल को तैयार कर 1000 लोगों को अगले 7 दिन के लिए भेजा जाता है।

तिरुपति देवस्थानम तिरुमाला (आंध्रप्रदेश) के श्री वेंकटेश्वर स्वामी का यह मंदिर उत्तर भारत में तिरुपति बालाजी नाम से ही प्रसिद्द है। यह भारत में सबसे ज्यादा देखे जाने वाला धार्मिक स्थल है।

मंदिर में बाहरी लोगों का दर्शन के लिए आना बंद है। हर दिन सिर्फ भगवान की पूजा के लिए अखंड दीप और भोग चढ़ाने के लिए पुजारी मंदिर में जाते हैं। लॉकडाउन खुलने पर मंदिर और पर्वत का पक्षालन किया जाएगा यानी वैदिक विधान से चारों ओर गंगाजल से सफाई की जाएगी। इसके बाद ही दर्शन के लिए इसे खोला जाएगा। ऐसा सूर्यग्रहण के बाद भी किया जाता है।

अयोध्या से भास्कर रिपोर्ट...

लॉकडाउन होने के दो दिन पहले ही रामनवमी मेले पर प्रतिबंध लगाने के आदेश आ गए थे
मंदिर से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के अहम फैसले के बाद इस साल आयोध्या में रामनवमी की भव्य तैयारियां थी। लेकिन रामनवमी मेले पर प्रतिबंध का आदेश लॉकडाउन होने के दो दिन पहले ही जारी कर दिया गया था। यहां सख्ती से धारा 144 लागू है। लॉकडाउन से पहले दो दिनों के अंदर ही अन्य राज्यों सेअयोध्या पहुंचे पर्यटक वापस लौट गए। हालांकि इसके बावजूद अयोध्या में अब तक 4 हजार लोगों को क्वारेंटाइन किया गया है, इनमें से 266 लोग विदेश से लौट कर अयोध्या पहुंचे हैं।

भगवान राम की इस नगरी में धुमधाम से रामनवमी मनाने की तैयारी थी, लेकिन कोरोना के चलते यहां की गलियां तक सूनसान हैं।

यहां के जैन मंदिर में एक महिला की मौत लॉकडाउन के दौरान हो गई थी। उसके अंतिम संस्कार में शामिल 27 लोंगों को जैन मंदिर में ही क्वारेंटाइन किया गया है।



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Coronavirus Shrine (Mandir) Ground Report Latest; Gujarat Dwarkadhish Temple, Ujjain Mahakal Mandir




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कोविड-19 ने किया दुनिया की चीन पर निर्भरता का खुलासा

कोरोना वायरस ने न केवल आज का परिदृश्य बदल दिया है, बल्कि यह हमारे भविष्य की दिशा भी बदल देगा। हम जिस तरह से रहने के आदी थे, उसमें बहुत बड़ा परिवर्तन होने जा रहा है और शायद यह हमेशा के लिए हो। सोमवार तक इस वायरस से दुनियाभर में 73,604 लोगों मौत हो चुकी है और 13,23,000 लोग संक्रमित हैं। सामाजिक और आर्थिक रूप से कोविड-19 बड़ा ही समानतावादी है। यद्यपि, अमीर लोग खुद को विलासितापूर्ण आराम के साथ आइसोलेट कर सकते हैं, जबकि कम धन वालों को रोजाना ही आइसोलेशन व गरीबी से जूझना पड़ता है। भावनात्मक और मानसिक तौर पर इस वायरस ने दिखा दिया है कि कोई भी सुरक्षित नहीं है और इसमें हम सब साथ हैं। समाज में भी भारी बदलाव आया है और वह धन से अधिक जिंदगी को महत्व देने लगा है, वास्तव में वह देखभाल और संवेदनाओं को महत्व देने लगा है। फायनेंस, मार्केटिंग और विज्ञापन जैसे कम अनिवार्य व्यवसायों के प्रोफेशनल की जगह अब लोगों को डाॅक्टर, नर्स, डिलीवरी ड्राइवर व सुपर मार्केट के कर्मचारी असली हीरो नजर आने लगे हैं। दुनियाभर में लोगों की जान बचाने वाले हेल्थकेयर कर्मचारियों के सम्मान में तालियां बजाना व उनका उत्साह बढ़ाना दिखाता है कि धन के आधिपत्य को चुनौती और जीवन के मूल्य को हर चीज से अधिक महत्व मिल रहा है।

इस महामारी के चारों आेर एक फैक्टर और उभरा है और वह है दुनिया की चीन पर निर्भरता। कभी खत्म न होने वाले लाभ की चाहत ने दुनिया की अर्थव्यव्स्था को सस्ती कीमत पर सामान लेने के लिए चीन पर अाश्रित कर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि हम अपने संसाधनोंको किनारे करके पूरी तरह से उनकी फैक्टरियों, श्रमिकों और अर्थव्यवस्था पर निर्भर हो गए। वुहान में कोविड-19 के प्रकोप के बाद बाकी चीन में प्रोडक्शन लाइन रुक गई और दुनिया के बाजार संकट में आ गए। इसके 29 दिन से भी कम समय में डाउ जोंस की औसत 30 प्रमुख कंपनियों के शेयर पहले के स्तर से 20 फीसदी गिर गए, यह वॉल स्ट्रीट में 1929 के क्रैश से भी तेज गिरावट दिखाने लगा। पाउंड 35 साल के न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया। यह रोचक तो था, लेकिन चौंकाने वाला नहीं था कि फार्मास्यूटिकल, तेल, डिलीवरी कंपनियां और सुपर मार्केट में धीमी किंतु निरंतर बढ़ोतरी हो रही थी।

स्कूल ऑफ ओरियंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज में लॉरेंस सायज ने 2011 में यह बात कही थी कि 20 साल के भीतर चीन एक सैन्य ताकत के रूप में अमेरिका को पीछे छोड़ देगा। हम 2020 में हैं और अब यह होना हकीकत लगता है। कोविड-19 ने ताकत के दुर्ग की दरारों को उभार दिया है। विशेषकर, अमेरिका एक विभाजित देश बन गया है और इसलिए कमजोर भी। अमेरिका में बेची जाने वाली 97 फीसदी एंटीबायोटिक चीन उपलब्ध कराता है। हेल्थ केयर ही ताकत है, यह चीन जानता है। चीन ने दुष्प्रचार मशीन के बेहतर इस्तेमाल का भी प्रदर्शन किया है। जब दुनिया ने उसे कोरोना वायरस के लिए जिम्मेदार ठहराया तो चीन ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मदद और सहयोग से जवाब दिया। जब सैन्य शक्ति, हथियार और धन आपको नहीं बचा सकता तो एकता ही काम आती है। चीन ने बेल्जियम को तीन लाख मास्क मुफ्त भेजे और उस पर अंग्रेजी, फ्लेमिश और चीनी भाषा में लिखा कि ‘एकता से ताकत बनती है’। यह चीन ही था, जिसने पूरे यूरोप के नजर फेरने के बाद इटली को मदद भेजी थी। चीन अब खुद को दुनिया से जोड़ने की कोशिश कर रहा है और उसे फायदा भी हो रहा है।

मानव की तमाम कोशिशों के बावजूद प्रकृति हमेशा जीतती ही है। कोरोना वायरस ने यह दिखा दिया है। चीन में कोविड-19 के प्रकोप के दौरान फैक्टरियां बंद होने से कार्बन डाईआक्साइड के उत्सर्जन में 25 फीसदी की कमी आई थी। उत्तरी इटली में ट्रैफिक कम होने से कार्बन डाईआक्साइड का स्तर 5-10 फीसदी गिर गया। दुनियाभर में हवाई, सड़क, रेल व जल परिवहन के बंद होने से इसमें कमी आ रही है। वन्य जीवों ने शहरों, पानी व जंगलों पर अपना दावा करना शुरू कर दिया है। उड़ीसा में करीब साढ़े चार लाख समुद्री कछुओं(ओलिव रिड्ले) ने तट पर अंडे दे दिए हैं। वेनिस की नहरें साफ हो गई हैं और मछलियां दिखने लगी हैं। दुनियाभर में लोग शहरों व फार्मों में फल व सब्जियां लगा रहे हैं, यह कोविड-19 से बनी चेतना का ही परिणाम है। एक अमेरिकी कहावत है कि ‘जब आखिरी पेड़ कटा, आखिरी मछली पकड़ी और आखिरी नदी जहरीली हुई, केवल तब हमें अहसास हुआ कि हम धन को खा नहीं सकते’ और यह जितना सामयिक आज है, उतना पहले कभी नहीं था। इस वायरस का प्रकोप खत्म होने के बाद जब हम दोबारा दौड़ने लगेंगे, तो शायद हम सभी के पास कुछ मूल्यवान सबक जरूर होंगे। यह सबक होंगे कि हमें वास्तव में मूल्यवान होने और यह सीखने की जरूरत है कि अलग तरह से कैसे जीया जा सकता है।(यह लेखिक के अपने विचार हैं।)



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Kovid-19 revealed the world's dependence on China




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2 हजार सालों में कोरोना 17वीं ऐसी बीमारी, जिसमें एक लाख से ज्यादा मौतें हुईं

दुनियाभर में तबाही मचा रहे कोरोनावायरस से मरने वालों की संख्या 1 लाख के पार पहुंच गई है। इंसान ने जब से तारीखों का हिसाब रखना शुरू किया है, यानी जीरो एडी(0 AD) से अब तक इन 2 हजार सालों में 20 बड़ी महामारियां फैल चुकी हैं। इनमें कोरोना 17वीं ऐसी महामारी है, जिसमें मौतों का आंकड़ा 1 लाख के ऊपर चला गया है। इतिहास में जाएं तो पहली बार साल 165 में महामारी फैली थी। उस समय एन्टोनाइन प्लेग नाम की महामारी एशिया, मिस्र, यूनान (ग्रीस) और इटली में फैली थी। इससे 50 लाख के आसपास लोगों की मौत हुई थी।

एन्टोनाइन प्लेग पर ये तस्वीर फ्रांसीसी चित्रकार जे. डेलुनॉय (1828-2891) ने बनाई थी। इस बीमारी से रोम में रोजाना 2 हजार लोगों की जान गई थी। फोटो क्रेडिट :fineartamerica.com


जस्टिनियन प्लेग
साल : 541-542
मौतें : 5 करोड़

उसके बाद जो महामारी फैली थी, उसका नाम था- जस्टिनियन प्लेग। ये महामारी साल 541-542 में एशिया, उत्तरी अफ्रीका, अरेबिया और यूरोप में फैली थी। लेकिन, इसका सबसे ज्यादा असर पूर्वी रोमन साम्राज्य बाइजेंटाइन पर हुआ था। 1500 साल पहले फैली इस महामारी से 5 करोड़ लोगों की जान चली गई थी। ये उस समय की दुनिया की कुल आबादी का आधा हिस्सा था। यानी एक साल के अंदर दुनिया की आधी आबादी खत्म हो गई थी। ये बीमारी इतनी खतरनाक थी कि इसने बाइजेंटाइन साम्राज्य को खत्म कर दिया था।

जस्टिनियन प्लेग पर ये तस्वीर इटली के चित्रकार फ्रा एंजेलिको (1395-1455) ने बनाई थी। इसमें सेंट कॉस्मॉस और सेंट डेमियन जस्टिनियन प्लेग से पीड़ित मरीज का इलाज करते दिख रहे हैं। फोटो क्रेडिट : www.medievalists.net


द ब्लैक डेथ
साल : 1347-1351
मौतें : 20 करोड़

जस्टिनियन प्लेग के बाद सन् 1347 से 1351 के बीच एक बार फिर प्लेग फैला। इसे 'द ब्लैक डेथ' नाम दिया गया। इसका सबसे ज्यादा असर यूरोप और एशिया में हुआ था। ये प्लेग चीन से फैला था। उस समय ज्यादातर कारोबार समुद्री रास्तों से ही होता था और समुद्री जहाजों पर चूहे भी रहते थे। इन्हीं चूहों से मक्खियों के जरिए ये बीमारी फैलती गई। ऐसा कहा जाता है कि इस बीमारी से अकेले यूरोप में इतनी मौतें हुई थीं कि उसे 1347 से पहले के पॉपुलेशन लेवल पर पहुंचने पर 200 साल लग गए थे।

14वीं सदी में फैली ब्लैक डेथ बीमारी पर ये तस्वीर डच आर्टिस्ट पीटर ब्रूजेल द एल्डर ने 1562 में बनाई थी। फोटो क्रेडिट : wikipedia


स्मॉलपॉक्स
साल : 1492 से अब तक
मौतें : 5.5 करोड़+

1492 में यूरोपियन्स अमेरिका पहुंचे। उनके आते ही अमेरिका में स्मॉलपॉक्स यानी चेचक नाम का संक्रमण फैल गया। ये बीमारी इतनी खतरनाक थी कि इससे संक्रमित लोगों में 30% की जान चली गई थी। उस समय इस संक्रमण ने करीब 2 करोड़ लोगों की जान ली थी, जो उस समय अमेरिका की कुल आबादी का 90% हिस्सा थी। इससे यूरोपियन्स को फायदा हुआ। उन्हें अमेरिका में खाली जगहें मिल गईं। उन्होंने यहां अपने कॉलोनियां बसाना शुरू किया। स्मॉलपॉक्स अभी भी फैल रही है और एक अनुमान के मुताबिक, इससे अब तक 5.5 करोड़ लोगों की जान जा चुकी है।

1492 में क्रिस्टोफर कोलंबस ने अमेरिका की खोज की थी। उसके साथ ही यूरोपीय अमेरिका आए और उनके साथ स्मॉलपॉक्स बीमारी आई। इस बीमारी से इतने अमेरिकी मरे थे, जिससे ग्लोबल कूलिंग की समस्या आ गई थी। फोटो क्रेडिट : newyorktimes


कॉलरा
साल : 1817 से अब तक
मौतें : 10 लाख+

19वीं सदी में एक ऐसी बीमारी भी थी, जो भारत से ही जन्मी थी। इस बीमारी का नाम था- कॉलरा यानी हैजा। ये बीमारी गंगा नदी के डेल्टा के जरिए एशिया, यूरोप, उत्तरी अमेरिका और अफ्रीका में भी फैल गई थी। गंदा पानी पीना, इस बीमारी का कारण था। इस बीमारी की वजह से उस समय 10 लाख से ज्यादा मौतें हुई थीं। डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, अभी भी हर साल 13 लाख से 40 लाख के बीच लोग इस बीमारी की चपेट में आते हैं। जबकि, हर साल 1.5 लाख तक मौतें हो इस बीमारी से हो रही है।

कोलरा से बचाव के लिए अमेरिकी सरकार ने 1832 में एक नोटिस जारी किया था। इस नोटिस को हर शहर की दीवार पर चिपकाया गया था। फोटो क्रेडिट : wikipedia


स्पैनिश फ्लू
साल : 1918-19
मौतें : 5 करोड़

1918-19 में फैली स्पैनिश फ्लू महामारी पिछले 500 साल के इतिहास की सबसे खतरनाक महामारी थी। ये बीमारी कहां से फैली? इस बारे में अभी तक पता नहीं चला है। अनुमान लगाया जाता है कि इस महामारी से दुनिया की एक तिहाई आबादी या 50 करोड़ लोग संक्रमित हुए थे। दुनियाभर में इससे 5 करोड़ मौतें हुई थीं। अकेले भारत में ही इससे 1.7 करोड़ से ज्यादा लोग मारे गए थे। इस महामारी में ठीक होने के चांस सिर्फ 10 या 20% ही थे। ये बीमारी इतनी अजीब थी कि इसकी वजह से सबसे ज्यादा मौतें स्वस्थ लोगों की हुई थी। स्पैनिश फ्लू से सबसे ज्यादा मौतें 20 से 40 साल की उम्र के लोगों की हुई थी।

स्पैनिश फ्लू वर्ल्ड वॉर-1 के बाद फैली थी। माना जाता है कि वर्ल्ड वॉर के समय सैनिक जिन बंकरों में रहते थे, वहां गंदगी थी। जिससे ये बीमारी सैनिकों में फैली। उसके बाद सैनिक जब अपने-अपने देश लौटे, तो उससे बीमारी सब जगह फैल गई। फोटो क्रेडिट : cdc.gov


स्पैनिश फ्लू के बाद कोरोना चौथा सबसे खतरनाक फ्लू

1) एशियन फ्लू या एच2एन2 वायरस
साल : 1957-58
मौतें : 11 लाख

ये बीमारी फरवरी 1957 में हॉन्गकॉन्ग से शुरू हुई थी। क्योंकि ये बीमारी पूर्वी एशिया से निकली थी, इसलिए इसे एशियन फ्लू भी कहा गया। कुछ ही महीनों में कई देशों में फैल गई।

ये तस्वीर 16 अगस्त 1957 की है। इसमें एक डॉक्टर नर्स को एशियन फ्लू का पहला वैक्सीन दे रहा है। फोटो क्रेडिट : news-decoder.com


2) हॉन्गकॉन्ग फ्लू या एच3एन2 वायरस
साल : 1968-70
मौतें : 10 लाख

पहली बार ये बीमारी सितंबर 1968 में अमेरिका में रिपोर्ट हुई थी। इस वायरस से मरने वाले ज्यादातर लोगों की उम्र 65 साल से ज्यादा थी। इसकी चपेट में ज्यादातर वही लोग आए थे, जिन्हें पहले से कोई गंभीर बीमारी थी।

ये तस्वीर जुलाई 1968 में ली गई थी। इस तस्वीर में हॉन्गकॉन्ग की एक क्लीनिक के बाहर मरीज अपनी बारी का इंतजार करते दिख रहे हैं। फोटो क्रेडिट : scmp.com


3) स्वाइन फ्लू या एच1एन1 वायरस
साल : 2009
मौतें : 5.5 लाख+

इस वायरस को भी सबसे पहले अमेरिका में ही रिपोर्ट किया गया था और कुछ ही समय में ये दुनियाभर में फैल गया था। इससे मरने वाले 80% लोग ऐसे थे, जिनकी उम्र 65 साल से ज्यादा थी।

तस्वीर 20 दिसंबर 2009 की है। इस तस्वीर में व्हाइट हाउस की नर्स उस समय के अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को एच1एन1 की वैक्सीन दे रही है। फोटो क्रेडिट : whitehouse


4) कोरोनावायरस या कोविड-19
साल : 2019
मौतें : 1 लाख+

कोरोनावायरस या कोविड-19 चीन के वुहान शहर से शुरू हुआ। पहली बार 8 दिसंबर 2019 को इससे संक्रमित पहला मरीज मिला था। 13 मार्च 2020 को डब्ल्यूएचओ ने इसे महामारी घोषित किया। कोरोना अब तक दुनिया के 200 देशों में फैल चुका है। इससे अब तक 1 लाख से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं।

ये तस्वीर वुहान के सीफूड मार्केट की है। अभी तक यही माना जा रहा है कि कोरोनावायरस इसी मार्केट से निकला। कोरोना से पीड़ित पहली मरीज यहीं पर दुकान लगाती थी। फोटो क्रेडिट : scmp.com

दो हजार साल में फैलीं 20 बड़ी महामारियां, इनमें 40 करोड़ से ज्यादा जानें गईं

बीमारी

टाइम पीरियड

मौतें

एन्टोनाइन प्लेग

165-180

50 लाख

जापानी स्मॉलपॉक्स

735-737

10 लाख

जस्टिनियन प्लेग

541-542

5 करोड़

ब्लैक डेथ

1347-1351

20 करोड़

स्मॉलपॉक्स

1492 से अभी तक

5.6 करोड़

इटैलियन प्लेग

1629-1631

10 लाख

ग्रेट प्लेग ऑफ लंदन

1665

1 लाख

यलो फीवर

1790 से अभी तक

1.50 लाख+

कोलरा

1817 से अभी तक

10 लाख+

थर्ड प्लेग

1885

1.20 करोड़

रशियन फ्लू

1889-1890

10 लाख

स्पैनिश फ्लू

1918-1919

5 करोड़

एशियन फ्लू

1957-1958

11 लाख

हॉन्गकॉन्ग फ्लू

1968-1970

10 लाख

एचआईवी एड्स

1981 से अभी तक

3.5 करोड़+

स्वाइन फ्लू

2009-10

5.5 लाख+

सार्स

2002-2003

770
इबोला

2014-16

11 हजार

मर्स

2015 से अभी तक

850

कोविड-19

2019 से अभी तक

1 लाख+

(ये स्टोरी नेशनल जियो ग्राफिक, अमेरिका के सेंटर फॉर डिसीज कंट्रोल एंड प्रिवेन्शन, visualcapitalist.comऔर मीडिया रिपोर्ट्स से मिली जानकारी के आधार पर तैयार की गई है)



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Coronavirus Death Count Worldwide | Novel Coronavirus Total Death Toll Count Worldwide From (COVID-19) Virus Pandemic: India Pakistan USA Spain Italy Germany China UK Russia




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30 हेक्टेयर में फैले एशिया के सबसे बड़े ट्यूलिप गार्डन में 13 लाख फूल खिल चुके हैं, लेकिन इस बार इन्हें देखने कोई नहीं आएगा

एशिया के सबसे बड़े श्रीनगर के इंदिरा गांधी मेमोरियल ट्यूलिप गार्डन में फूलों का मौसम आ गया है। जबरवान पहाड़ियों के मुहाने पर 30 एकड़ में बने इस खूबसूरत गार्डन में इस बार 55 वैरायटी के 13 लाख ट्यूलिप खिले हैं। कोरोना संकट के चलते इस बार गार्डन में फूल देखने कोई नहीं आएगा। लिहाजा पार्क सूना पड़ा है।

साल में बमुश्किल तीन से चार हफ्तों के लिए आबाद रहने वाला यह गुलशन इस बार वीरान है।

गार्डनफूल तो शबाब पर हैं, लेकिन इन्हें देखने इस बार कोई नहीं आएगा। कोरोना वायरस के चलते कश्मीर में लॉकडाउन कब तक रहेगा फिलहाल कहना मुश्किल है। सिर्फ कश्मीर में अभी तक 168 कोरोना पॉजिटिव मिल चुके हैं, जबकि 3 की मौत हो चुकी है।

मार्च-अप्रैल में ट्यूलिप गार्डन खुलने के साथ ही कश्मीर में टूरिस्ट सीजन की शुरुआत होती है।

बर्फबारी के बाद ट्यूलिप गार्डन और बादामवारी में फूल खिलना कश्मीर में बसंत के आने की निशानी होती है। इससे पहले के सालों में भी लाखों लोग इसे देखने आते रहे हैं।गार्डन का टिकट करीब 50 रुपएहोता है।

पिछले साल करीब ढाई लाख लोग यहां आए थे, जिसमें से एक लाख बाहरी पर्यटक थे। इनमें विदेशी भी शामिल हैं।

कश्मीर में कुल 308 बाग-बगीचे हैं। जिनकी देखरेख फ्लोरीकल्चर डिपार्टमेंट करता है। ट्यूलिप गार्डन भी उन्हीं के जिम्मे आता है। डिपार्टमेंट के 100 माली इसकी देखरेख करते हैं।पहले हार्वेस्टिंग फिर दो-तीन बार सनबर्न और नवंबर में रीप्लांट का काम होता है।

इस बगीचे की तैयारी पूरे साल चलती है। ट्यूलिप का मौसम बीत जाने के तुरंत बाद अगले साल की तैयारी शुरू हो जाती है।

ट्यूलिप गार्डन के एक ओर है डल झील, दूसरी ओर मुगलों का बनाया निशात बाग और तीसरी ओर वह ऐतिहासिक चश्म-ए-शाही,जहां के लिए कहा जाता है कि पंडित नेहरू सिर्फ वहां के चश्मे से निकला पानी ही पीते थे।

यहां हर साल नीदरलैंड्स से 60-70 लाख रुपए के फूल लाए जाते हैं। सरकार ने इसे पिछले साल 80 लाख रु.में आउटसोर्स किया था।

हर साल ट्यूलिप गार्डन में 10 दिन का ट्यूलिप फेस्टिवल होता है, जिसका नाम बहार-ए-कश्मीर है। इस फेस्टिव में घाटी के पारंपरिक संगीत और कला से जुड़े लोग शामिल होते हैं। इस साल इसके होने की भी कोई उम्मीद नहीं है। गार्डन की जमीन सिराजुद्दीन मलिक की थी, जो 1947 के बंटवारे में पाकिस्तान चले गए। तब सरकार ने इसे अपने कब्जे में ले लिया।

पहले कश्मीर का यह ट्यूलिप गार्डन सिराजबाग कहलाता था।

हॉलैंड के ट्यूलिप दुनियाभर में मशहूर हैं। यहां का कोएकेनहोफ ट्यूलिप गार्डन दुनिया का सबसे बड़ा फूलों का बाग है, जिसे फूलों से प्यार करनेवालों का मक्का कहा जाता है। यहां हर साल सात मिलियन, यानी 70 लाख फूल रोपे जाते हैं, जिनमें ट्यूलिप, डेफोडिल्स, गुलाब और लिली शामिल हैं।

दुनिया के पांच मशहूर ट्यूलिप गार्डन और फेस्टिव में शामिल है श्रीनगर।

दुनिया में ट्यूलिक गार्डन्स मेंपहले नंबर पर हॉलैंड का कोएकेनहोफ आता है, दूसरे नंबर पर अमेरिका के माउंट वरनोन का स्कगित ट्यूलिप फेस्टिवल है। कनाडा के ओटावा का ट्यूलिप गार्डन तीसरा सबसे मशहूर बाग है।कश्मीर का ट्यूलिप गार्डन दुनिया में पांचवा सबसे मशहूर बाग माना जाता है। ऑस्ट्रेलिया के सिलवन टाउन में टेसेलार ट्यूलिप फेस्टिवल दुनिया का चौथा सबसे शानदार आयोजन कहलाता है।

कश्मीर का ट्यूलिप गार्डन दुनिया में पांचवें नंबर पर है।


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कश्मीर के ट्यूलिप गार्डन को दुनिया का पांचवा सबसे मशहूर बाग माना जाता है। तीन से चार हफ्तों के लिए आबाद रहने वाला यह गुलशन इस बार वीरान है।




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डब्ल्यूएचओ की कुल फंडिंग का 15% अकेले अमेरिका देता है; फंडिंग रुकने से कोरोना ही नहीं, बल्कि पोलियो खत्म करने में भी असर पड़ेगा

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने डब्ल्यूएचओ की फंडिंग रोक दी है। उन्होंने कहा कि डब्ल्यूएचओ ने कोरोनावायरस को गंभीरता से नहीं लिया, जिसका खामियाजा पूरी दुनिया को भुगतना पड़ रहा है। अगर डब्ल्यूएचओ अपना काम सही से करता तो, महामारी दुनियाभर में नहीं फैलती। मरने वालों की संख्या भी काफी कम होती।


1948 में बने डब्ल्यूएचओ को अमेरिका हर साल सबसे ज्यादा मदद करता रहा है। डब्ल्यूएचओ की वेबसाइट के मुताबिक अमेरिका ने उसे दो साल में 893 मिलियन डॉलर यानी 6 हजार 876 करोड़ रुपए की मदद की है। ये डब्ल्यूएचओ की कुल फंडिंग का 15% है। इसका मतलब हुआ कि डब्ल्यूएचओ को दुनियाभर से जितनी मदद मिलती है, उसका 15% अकेले अमेरिका देता है। वहीं, चीन से अमेरिका से 10 गुना कम, यानी सिर्फ 86 मिलियन डॉलर (662 करोड़ रुपए) की मदद मिली।


अमेरिका के बाद डब्ल्यूएचओ को अमेरिका के ही अरबपति बिल गेट्स की बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन मदद करती है। फाउंडेशन ने 530.96 मिलियन डॉलर (4 हजार 81 करोड़ रुपए) की मदद की।


तो क्या ट्रम्प के फैसले से कोरोना के खिलाफ लड़ाई कमजोर होगी?
ट्रम्प ने ऐसे समय डब्ल्यूएचओ की फंडिंग रोकी है, जब कोरोनावायरस लगातार फैल रहा है। कोरोना के 20 लाख से ज्यादा मामले आ चुके हैं। 1.26 लाख से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं। खुद अमेरिका कोरोना से बुरी तरह प्रभावित है। वहां 6 लाख से ज्यादा मरीज मिल चुके हैं और 26 हजार से अधिक मौतें हो चुकी हैं।


ट्रम्प के इस फैसले से कोरोना के खिलाफ लड़ाई भी कमजोर हो सकती है। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनिया गुटेरस का कहना है कि ‘ये समय डब्ल्यूएचओ या कोरोना के खिलाफ लड़ने वाले किसी भी संगठन के रिसोर्सेज में कमी करने का नहीं है। बल्कि कोरोना के खिलाफ एकजुट होने का है।'


क्या ट्रम्प के फैसले से बाकी चीजों पर भी असर होगा?
डब्ल्यूएचओ अपने फंड का इस्तेमाल दुनियाभर में फैली बीमारियों से लड़ने और स्वास्थ्य सुविधाएं बेहतर बनाने में करता है। डब्ल्यूएचओ को मिलने वाला फंड उसके हेडक्वार्टर (जेनेवा, स्विट्जरलैंड) और छह रीजन में जाता है। रीजन और हेडक्वार्टर से ये फंड खर्च होता है।


अमेरिका से डब्ल्यूएचओ को जो फंड मिलता है, उसका सबसे ज्यादा 27% पोलियो खत्म करने पर खर्च होता आया है। पाकिस्तान समेत दुनिया के कई देशों में अब भी पोलियोगंभीर बीमारी बनी हुई है।



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WHO Funding US China | WHO Coronavirus COVID-19 News | World Health Organization USA China India Funding Update; Know Which Countries Provide Most Funding To WHO




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वैक्सीन नहीं आया तो सीजनल फ्लू बन सकता है कोविड-19, यानी हर साल लौटेगा; 2022 तक तो सोशल डिस्टेंसिंग रखनी ही होगी

महज दो महीने के भीतर ही चीन से निकलकर कोरोनावायरस पूरी दुनिया में फैल गया। 1.5 लाख लोगों की जान ले चुके कोरोनावायरस के डर से दुनिया की आधी से ज्यादा आबादी घर पर रहने को मजबूर है। अमेरिका जैसे ताकतवर देश भी इसके आगे बेबस हैं। लेकिन, बड़ा सवाल अब भी है कि ये महामारी खत्म कैसे होगी?

कुछ दिन पहले अमेरिका के कोरोनावायरस टास्क फोर्स के डॉ. एंथनी फाउची ने कहा था कि इस बात की पूरी संभावना है कि कोरोना सीजनल फ्लू या मौसमी बीमारी बन जाए। अब ऐसी ही बात साइंस मैगजीनमें छपी हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की रिसर्च में भी सामने आई है। इस रिसर्च में कहा गया है, जब तक कोरोनावायरस का कोई असरदार इलाज या वैक्सीन नहीं मिल जाता, तब तक इस महामारी को खत्म करना नामुमकिन है। इसके मुताबिक, बिना वैक्सीन या असरदार इलाज के कोरोना सीजनल फ्लू बन सकता है और 2025 तक हर साल इसका संक्रमण फैलने की संभावना है।

17 अप्रैल तक दुनियाभर में कोरोनावायरस के 22 लाख से ज्यादा मामले आ चुके हैं। जबकि, 1.50 लाख लोगों की मौत हुई है।

कोरोना क्यों सीजनल फ्लू बन सकता है?
सबसे पहले तो ये कि इस बीमारी का नाम कोविड-19 है, जो सार्स कोव-2 नाम के कोरोनावायरस से फैलती है। कोरोनावायरस फैमिली में ही सार्स और मर्स जैसे वायरस भी होते हैं। सार्स 2002-03 और मर्स 2015 में फैल चुका है। इसी फैमिली में दो ह्यूमन वायरस भी होते हैं। पहला: HCoV-OC43 और दूसरा : HCoV-HKU1।

सार्स और मर्स जैसी महामारियों से जल्द ही छुटकारा मिल गया था। जबकि, HCoV वायरस हर साल सर्दियों के मौसम में इंसानों को संक्रमित करता है। इसी वायरस की वजह से सर्दी के मौसम में सर्दी-जुकाम होता है।

दरअसल, किसी भी बीमारी से लड़ने में इम्यून सिस्टम मददगार होता है। किसी इंसान का इम्यून सिस्टम जितना स्ट्रॉन्ग होगा, वह किसी बीमारी से उतनी ही मजबूती से लड़ सकेगा। इसलिए जब हम बीमार होते हैं, तो हमारा शरीर उस बीमारी से लड़ने की इम्युनिटी बना लेता है और हम ठीक हो जाते हैं।

अब दोबारा HCoV पर आते हैं। हर साल इंसानों को सर्दी के मौसम सर्दी-जुकाम होता है। इसका मतलब हुआ कि, इस वायरस से लड़ने के लिए इंसानों में इम्युनिटी शॉर्ट-टर्म के लिए ही डेवलप होती है। यही वजह है हर साल हमें सर्दी-जुकाम हो जाता है।

इसी तरह से अगर सार्स कोव-2 से लड़ने की इम्युनिटी भी शॉर्ट-टर्म के लिए रही तो ये वायरस हमारे जीवन का हिस्सा बन सकता है और हर साल लौट सकता है। यानी, कोरोनावायरस या कोविड-19 के सीजनल फ्लू बनने की संभावना भी है।

डब्ल्यूएचओ ने हाल ही में बताया है कि दुनियाभर में कोरोना की 70 वैक्सीन पर काम हो रहा है। जिसमें से 3 पर ह्यूमन ट्रायल भी शुरू हो चुका है।

2025 तक भी रह सकती ये बीमारी
हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की स्टडी में पाया गया है कि अगर कोविड-19 को लेकर इम्युनिटी बन भी गई, तो भी इस बीमारी को पूरी तरह से खत्म होने में 2025 तक का समय लगेगा। हालांकि, इस बात की संभावना भी कम है क्योंकि, अकेले दक्षिण कोरिया में 111 लोग जो कोरोना से ठीक हो गए थे, वे दोबारा संक्रमित हुए हैं।

कोरोना से निपटने के लिए ज्यादातर देशों में लॉकडाउन है और सोशल डिस्टेंसिंग जैसे तरीक अपना रहे हैं। लेकिन, वैज्ञानिकों का कहना है कि लॉकडाउन से भी कोरोना के संक्रमण को खत्म नहीं किया जा सकता है। उनके मुताबिक, लॉकडाउन लगाकर कोविड-19 के फैलने की रफ्तार को कुछ दिन के लिए कम कर सकते हैं या रोक सकते हैं, लेकिन जैसे ही लॉकडाउन खुलेगा, दोबारा इसका संक्रमण फैल सकता है। इसीलिए, जब तक कोविड-19 का कोई असरदार इलाज या वैक्सीन नहीं आ जाता, तब तक इससे बचने का एकमात्र तरीका है- सोशल डिस्टेंसिंग।

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में डिपार्टमेंट ऑफ इम्यूनोलॉजी एंड इन्फेक्शियस के रिसर्चर और इस स्टडी के लीड ऑथर स्टीफन किसलेर का मानना है कि कोविड-19 से बचने के लिए हमें कम से कम 2022 तक सोशल डिस्टेंसिंग बनानी होगी।

टोटल लॉकडाउन नहीं, लेकिन डेढ़ साल तक कुछ प्रतिबंध जारी रखने होंगे
अमेरिका की स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की शोधकर्ता एरिन मोर्डेकाई कहती हैं कि, 1918 में जब स्पैनिश फ्लू फैला था, तब अमेरिका के कुछ शहरों ने 3 से 8 सप्ताह तक लगी पाबंदी को अचानक हटा दिया था। इसका नतीजा ये हुआ था कि ये फ्लू कम समय में ही ज्यादा जगहों में फैल गया। स्पैनिश फ्लू से 50 करोड़ से ज्यादा लोग संक्रमित हुए थे, जबकि 5 करोड़ लोगों की मौत हुई थी।

एरिन आगे कहती हैं किकोरोना के डर से हमें साल-डेढ़ साल के लिए पूरी तरह से लॉकडाउन रखने की जरूरत नहीं है,लेकिन12 से 18 महीनों तक हमें कुछ प्रतिबंध जारी रखने होंगे।



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Coronavirus Vaccine | Harvard University Researchers Novel Coronavirus (COVID-19) Report Updates On How To Stop Global Spread OF Virus Over Coronavirus Vaccine




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कोरोना के सबसे ज्यादा असर वाले 20 देशों में से भारत ने सबसे कम मामले रहते हुए लॉकडाउन लगाया, 6 देशों में अब तक टोटल लॉकडाउन नहीं

भारत में कोरोना का पहला मामला 30 जनवरी को आया था। 4 मार्च को इसके मरीजों की संख्या 7 से बढ़कर 29 हो गई थी। इसी दिन के बाद से केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों ने एहतियात के तौर पर कदम उठाने शुरू कर दिए। दिल्ली ने सबसे पहले स्कूल कॉलेज बंद किए। 10 मार्च को जब मामले दोगुने (60) हुए तो अलग-अलग राज्य सरकारों ने भी स्कूल-कॉलेजों बंद करने के आदेश जारी करदिए।

15 मार्च आते-आते मरीजों की संख्या 100 पार हुई तो देश के धार्मिक स्थलों पर तालाबंदी होने लगी। 22 मार्च को पूरे देश में जनता कर्फ्यू लगाया गया और इसी दिन से देशभर के अलग-अलग शहरों में लॉकडाउन का ऐलान होने लगा। इसके बाद 25 मार्च से पूरे देश में ही लॉकडाउन कर दिया गया।

कोरोना के सबसे ज्यादा असर वाले 20 देशों में से भारत ही ऐसा देश है, जिसने महज 500 मामले सामने आने के बाद ही टोटल लॉकडाउन कर दिया। प्रधानमंत्री मोदी का यह फैसला चौंकाने वाला था। न ही देश में और न ही बाहर किसी को उम्मीद थी कि 135 करोड़ से ज्यादा आबादी वाले देश में महज 536 मामले आने के बाद ही पूरे देश को लॉकडाउन कर दिया जाएगा।

भारत के अलावा ऑस्ट्रिया, स्विट्जरलैंड और पुर्तगाल में भी 1000 मामले होते ही फौरन टोटल लॉकडाउन लगा दिया गया था। हालांकि इन देशों की जनसंख्या भारत की10% भी नहीं थी। समय रहते लॉकडाउन के बाद इन चारों देशों में हालात ठीक हैं, जबकि जिन देशों में लॉकडाउन लगाने में देरी हुई या जिनमें अब तक लॉकडाउन नहीं लगाया गया, वहां हालात काबू से बाहर है।

20 सबसे ज्यादा प्रभावित देशों में से अमेरिका समेत 6 देशों में अब तक नेशनल लेवल का लॉकडाउन नहीं है। अमेरिका में कुल संक्रमितों की संख्या 7 लाख के करीब पहुंच गई है, मौतों का आंकड़ा भी यहां 35 हजार हो गया है। उधर, यूरोप के सबसे ज्यादा प्रभावित 5 देशों में 5-5 हजार मामले सामने आने के बाद लॉकडाउन लगाया गया था, वहां अब संक्रमण के लाखों मामले हैं। इन 5 देशों में मौतों का आंकड़ा 10-10 हजार से ज्यादा है।

10 सबसे ज्यादा प्रभावित देशों में से 3 में अब तक टोटल लॉकडाउन नहीं

1. अमेरिका
स्टेटस:
टोटल लॉकडाउन नहीं
पहला केस: 23 जनवरी
कुल कोरोना संक्रमित : 6.8 लाख+, कोरोना से कुल मौतें: 33 हजार+

लॉकडाउन से जुड़े कदम: 29 फरवरी को वॉशिंगटन के 2 स्कूलों को बंद किया गया। इसके बाद 5 मार्च को वॉशिंगटन के सभी स्कूलों को बंद कर दिया गया। 12 मार्च को ओरिगन राज्य में 250 से ज्यादा लोगों की भीड़ पर प्रतिबंध लगा। 13 मार्च को न्यूयॉर्क में 500 से ज्यादा लोगों की भीड़ पर पाबंदी लगी। इसके बाद 19 मार्च से लेकर 3 अप्रैल तक 17 राज्यों ने स्टे एट होम पॉलिसी लागू की। यहां लॉकडाउन का फैसला राज्यों पर छोड़ा गया है। नेशनल लेवल पर अब तक लॉकडाउन की घोषणा नहीं हुई है।

अमेरिका में नेशनल लेवल पर लॉकडाउन नहीं है। अलग-अलग राज्यों और शहरों के एडमिनिस्ट्रेशन ने अपनी जरूरत के हिसाब से लॉकडाउन कर रखा है। तस्वीर अमेरिका के सिएटल शहर की है। यहां सड़कें इन दिनों खामोश हैं।

2. स्पेन
स्टेटस:
टोटल लॉकडाउन
पहला केस: 1 फरवरी
कुल कोरोना संक्रमित: 1.8 लाख+ , कोरोना से कुल मौतें: 19 हजार+

लॉकडाउन से जुड़े कदम: 14 मार्च से टार्गेटेड लॉकडाउन शुरू हुआ। 16 मार्च से सभी स्कूल, कॉलेज और एजुकेशन सेंटरों को बंद करने का आदेश दिया गया। 31 मार्च तक सभी गैरजरूरी सेवाओं और दुकानों को बंद कर दिया गया।

तस्वीर स्पेन के मैड्रिड शहर की है। यहां लॉकडाउन के बीच रोजाना काम पर जाने वालों के लिए मेट्रो सर्विस चालू है।

3. इटली
स्टेटस:
टोटल लॉकडाउन
पहला केस: 31 जनवरी
कुल कोरोना संक्रमित: 1.7 लाख+, कोरोना से कुल मौतें: 22 हजार+


लॉकडाउन से जुड़े कदम: 22 फरवरी को इटली के वेनेटो और लोम्बॉर्डी में कुछ शहरों को लॉकडाउन किया गया। इनके बाद उत्तरी हिस्से के कई शहरों में लॉकडाउन लगाया जाने लगा। 4 मार्च को सभी स्कूल और कॉलेज को बंद किया गया। इटैलियन फुटबॉल लीग सीरी-ए समेत सभी स्पोर्ट्स एक्टिविटी भी बंद कर दी गईं। 10 मार्च से टोटल लॉकडाउन लागू किया गया। फिलहाल यहां, 14 अप्रैल से स्टेशनरी और बुक स्टोर को खोला जाने लगा है।

लॉकडाउन के बीच इटली के ज्यादातर शहरों में वॉलेंटियर्स ही लोगों के घरों तक खाना पहुंचा रहे हैं।

4. फ्रांस
स्टेटस:
टोटल लॉकडाउन
पहला केस: 24 जनवरी
कुल कोरोना संक्रमित: 1.5 लाख+, कोरोना से कुल मौतें: 18 हजार+

लॉकडाउन से जुड़े कदम: 29 फरवरी को 5 हजार से ज्यादा की भीड़ पर बैन लगाया। 16 मार्च से फ्रांस के सभी स्कूलों को बंद करने के आदेश दिए गए। इसके 2 दिन पहले ही बार, रेस्टोरेंट और सभी गैरजरूरी दुकानों और सेवाओं को बंद करने के आदेश आ चुके थे। 17 मार्च को फ्रांस ने अपनी सीमाएं भी सील कर लीं।

फ्रांस में हर दिन कैबिनेट मीटिंग के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस होती है। यहां 11 मई तक लॉकडाउन को बढ़ा दिया गया है।

5. जर्मनी
स्टेटस: टोटल लॉकडाउन
पहला केस: 27 जनवरी
कुल कोरोना संक्रमित: 1.4 लाख+ , कोरोना से कुल मौतें: 4 हजार+

लॉकडाउन से जुड़े कदम: 10 मार्च को जर्मनी के कई राज्यों ने 1000 से ज्यादा की भीड़ को बैन किया। 16 मार्च से स्कूलों को बंद करने के आदेश दिए गए। 20 मार्च को जर्मनी के सभी राज्यों ने सोशल इवेंट और हर छोटी-बड़ी भीड़ पर पाबंदी लगाई। 22 मार्च से देश में टोटल लॉकडाउन लागू हुआ।

म्यूनिख के बीयर गार्डन में इन दिनों टेबलें खाली हैं।

6. यूके
स्टेटस:
टोटल लॉकडाउन
पहला केस: 31 जनवरी
कुल कोरोना संक्रमित: 1 लाख+ , कोरोना से कुल मौतें: 13 हजार+

लॉकडाउन से जुड़े कदम: 21 मार्च को कुछ वेन्यू और बिजनेस को बंद करने को कहा गया। 23 मार्च से सभी स्कूल, कॉलेज बंद करने का ऐलान हुआ। 24 मार्च से टोटल लॉकडाउन लागू हुआ।

मैनचेस्टर का एम-60 मोटरवे पर इन दिनों इक्का-दुक्का गाड़ियां नजर आती हैं।

7. चीन
स्टेटस: टोटल लॉकडाउन नहीं
पहला केस: 31 दिसंबर 2019
कुल कोरोना संक्रमित: 83 हजार+, कोरोना से कुल मौतें: 4,500+

लॉकडाउन से जुड़े कदम: 23 जनवरी को वुहान लॉकडाउन किया गया, इसके बाद हुबेई राज्य और फिर कई अन्य शहरों को भी लॉकडाउन किया गया। 9 फरवरी से कुछ और राज्यों में लॉकडाउन लागू किया गया। फिलहाल, 16 मार्च से यहां स्कूल खुलने लगे। हुबेई प्रांत को छोड़कर 90% लोग काम पर लौटे। 26 मार्च से वुहान शहर में भी कमर्शियल आउटलेट खुल रहे हैं।

चीन का वुहान शहर 76 दिन तक लॉकडाउन रहा। 8 अप्रैल को यहां से लॉकडाउन हटा लिया गया।

8. ईरान
स्टेटस:
टोटल लॉकडाउन
पहला केस: 19 फरवरी
कुल कोरोना संक्रमित: 78 हजार+ , कोरोना से कुल मौतें: 4,800+

लॉकडाउन से जुड़े कदम: 22 फरवरी को किसी भी तरह के आर्ट और फिल्म से जुडे़ इवेंट कैंसिल किए गए। 24 फरवरी से स्पोर्टिंग इवेंट कैंसिल हुए और 1 मार्च से जुमे की नमाज बैन कर दी गई। 5 मार्च को सभी स्कूल, कॉलेज बंद कर दिए गए। 13 मार्च से लॉकडाउन लागू हुआ। ईरान रिवॉल्युशनरी गॉर्ड्स को सड़के और दुकानों को खाली कराने की जिम्मेदारी दी गई। फिलहाल यहां 11 अप्रैल से देश के बाहरी हिस्से में बिजनेस और कामकाज फिर से शुरू हुआ है।

ईरान में लॉकडाउन के बीच जरूरी काम के लिए बाहर जाने की छूट है। तस्वीर तेहरान के तजरीस बाजार की है।

9. तुर्की
स्टेटस:
टोटल लॉकडाउन नहीं
पहला केस: 12 मार्च
कुल कोरोना संक्रमित: 70 हजार+ , कोरोना से कुल मौतें: 1500+

लॉकडाउन से जुड़े कदम: 16 मार्च को स्कूलों को बंद किया गया। कैफे, स्पोर्ट्स, एंटरटेनमेंट वैन्यू भी बंद किए गए। हाल ही में 11-12 अप्रैल को यहां कुछ शहरों में दो दिन का कर्फ्यू भी लगाया गया। यहां अभी तक टोटल लॉकडाउन नहीं है।

तुर्की की राजधानी इस्तांबुल में दो दिन के कर्फ्यू लगने के पहले की तस्वीर। यहां 70 हजार से ज्यादा कोरोना मरीज होने के बावजूद अब तक लॉकडाउन नहीं किया गया है।

10. बेल्जियम
स्टेटस:
टोटल लॉकडाउन
पहला केस: 4 फरवरी
कुल कोरोना संक्रमित: 35 हजार+ , कोरोना से कुल मौतें: 4800+

लॉकडाउन से जुड़े कदम: 14 मार्च को स्कूलों को बंद करने का आदेश जारी किया गया। इसके साथ ही रेस्टोरेंट, जिम, सिनेमा और अन्य जगहें भी बंद किए गए। 18 मार्च से टोटल लॉकडाउन शुरू हो गया। भारत की तरह ही बेल्जियम ने भी कम मामले सामने आते ही टोटल लॉकडाउन लगाया।

तस्वीर बेल्जियम के लाईग शहर के नेशनल थियेटर की है। बेल्जियम में कोरोना संक्रमण के 1000 से ज्यादा मामले होते ही लॉकडाउन लागू कर दिया गया था।

(सोर्स: ऑक्सफोर्ड कोविड-19 गवर्मेंट रिस्पोंस ट्रैकर, जॉन हॉपकिंस कोरोनावायरस रिसोर्स सेंटर)



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लॉकडाउन से पहले नए केस की एवरेज ग्रोथ रेट 35% थी, बाद में घटकर 15% पहुंची; इस दौरान रोज औसतन 58 मरीज भी ठीक हुए

चीन के वुहान शहर से निकला कोरोनावायरस दुनिया के लिए सिरदर्द बन चुका है। फिलहाल, कोरोना का कोई असरदार इलाज या वैक्सीन नहीं है। इसलिए, दुनियाभर की सरकारें इसे रोकने के लिए एक ही तरीका अपना रही हैं और वो तरीका है- लॉकडाउन।


भारत में भी कोरोना को फैलने से रोकने के लिए लॉकडाउन लगाया गया है। पहले लॉकडाउन 21 दिन के लिए लगाया गया था, लेकिन बाद में इसे 19 दिन और बढ़ा दिया गया। लॉकडाउन का पहला फेज 25 मार्च से 14 अप्रैल के बीच लागू रहा और दूसरा फेज 15 अप्रैल से 3 मई तक रहेगा।


लॉकडाउन बढ़ाने के पीछे यही तर्क था कि देश में कोरोना के मामले कम होने के बजाय बढ़ते ही रहे। हालांकि, स्वास्थ्य मंत्रालय ने 12 अप्रैल को प्रेस कॉन्फ्रेंस को बताया था, दुनिया में कोरोना 41% की ग्रोथ रेट से फैल रहा था। अगर सरकार की तरफ से शुरुआत में कोई एक्शन नहीं लिया जाता, तो इसी ग्रोथ रेट के हिसाब से 15 अप्रैल तक 8.2 लाख लोगों के संक्रमित होने की आशंका थी।


लॉकडाउन से पहले क्या थी हमारी हालत?
देश में लॉकडाउन उस समय लगाया गया, जब कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या अचानक बढ़ने लगी थी। देश में कोरोना का पहला मामला 30 जनवरी को आया था। उसके बाद 2 फरवरी तक 3 मामले थे। लेकिन, फिर पूरे महीनेभर कोई नया मामला नहीं आया। ये तीनों मरीज भी ठीक हो चुके थे। उसके बाद 2 मार्च से देश में कोरोना के मामले अचानक बढ़ने लगे।


22 मार्च को जनता कर्फ्यू लगाया गया। और 25 मार्च से देशभर में लॉकडाउन लागू हो गया। लॉकडाउन से एक दिन पहले तक यानी 24 मार्च तक देश में कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या 571 थी। तब तक 10 मौतें भी हो चुकी थीं। लॉकडाउन से पहले तक देश में कोरोना के मामले दिखने में भले ही कम लग रहे हों, लेकिन इनकी एवरेज ग्रोथ रेट 35% के आसपास थी। यानी, हर दिन कोरोना के 35% नए मरीज मिल रहे थे।

लॉकडाउन के पहले फेज में क्या सुधार हुआ?
लॉकडाउन लगने के बाद भी 25 मार्च से 14 अप्रैल के बीच देशभर में कोरोना के 10 हजार 919 नए मामले बढ़े। यानी, 14 अप्रैल तक देश में कोरोना के जितने मामले आए, उसमें से 95% मामले लॉकडाउन में आए।


लेकिन, राहत की एक बात ये भी रही कि लॉकडाउन के दौरान कोरोना के नए मामलों की एवरेज ग्रोथ रेट में कमी आई। लॉकडाउन से पहले कोरोना की एवरेज ग्रोथ रेट 35% थी, जो लॉकडाउन में घटकर 15% रह गई।


इसको ऐसे समझिए : लॉकडाउन से पहले कोरोना की ग्रोथ रेट 35% थी। यानी, सोमवार को अगर कोरोना के 100 मरीज हैं, तो मंगलवार को मरीजों की संख्या 135 हो जा रही थी। लेकिन, लॉकडाउन में ग्रोथ रेट 15% हो गई। इसका मतलब हुआ कि, पहले मंगलवार को कोरोना संक्रमितों की संख्या 100 से 135 हो रही थी तो अब ये 100 से 115 ही बढ़ सकी।


राहत की एक बात ये भी, लॉकडाउन में हर दिन औसतन 58 मरीज ठीक हुए
लॉकडाउन के पहले फेज में राहत की एक और बात रही और वो ये कि इस दौरान कोरोना के संक्रमण से ठीक होने वाले मरीजों की संख्या बढ़ी। 24 मार्च तक देश में 40 मरीज ही ठीक हुए थे। लेकिन 25 मार्च से 14 अप्रैल के बीच 1 हजार 325 मरीज ठीक हुए। अगर इसका औसत निकालें तो हर दिन 58 मरीज कोरोना से ठीक हुए।

लेकिन, लॉकडाउन के 21 दिन में 384 मौतें हुईं, हर दिन औसतन 18 मौतें
24 मार्च तक देश में कोरोना से मरने वालों की संख्या 10 ही थी। लेकिन, 25 मार्च से 14 अप्रैल के बीच इन 21 दिनों में 384 लोगों की जान कोरोना से गई। यानी, हर दिन औसतन 18 मौतें। जबकि, लॉकडाउन से पहले तक औसतन हर 5.5 दिन में एक मौत हो रही थी।



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ढाई वर्ग किमी में रहती है 15 लाख की आबादी; दस बाई दस के कमरे में 10-10 लोग, 73% पब्लिक टॉयलेट इस्तेमाल करते हैं

धारावी चारों ओर से सील है। कोई भी बाहरी व्यक्ति यहां अंदर नहीं जा सकता। हर ओर पुलिस के बैरिकेट्स हैं और सख्त पहरा भी। यह शहर के अंदर एक शहर है। फिल्मों और लेखकों का पसंदीदा मुद्दा और लोकेशन रहा है। इतना पसंदीदा की मुंबई में धारावी के लिए स्लम टूरिज्म होता है।

दुनिया के इस सबसे बड़े स्लम (2.6 स्क्वायर किलोमीटर इलाका) में 15 लाख लोग रहते हैं। यहां दस बाईदस फीट का कमरा 8-10 लोगों का घर होता है। यहां 73 फीसदी लोग पब्लिक टॉयलेट इस्तेमाल करते हैं। किसी टायलेट में 40 सीट होती हैं, कहीं 12 और कहीं 20 सीट वाले टॉयलेट होते हैं। एक सीट को रोज अंदाजन 60 से 70 लोग इस्तेमाल करते हैं, यानी एक दिन में एक हजार से ज्यादा लोग पब्लिक टॉयलेट में आते हैं।

जाहिर है इन सबके बीच सोशल डिस्टेंसिंग कैसे संभव हो सकती है। जिस सोशल डिस्टेंसिंग के लिए पूरा देश घर के अंदर रहता है, उसी सोशल डिस्टेंसिंग के लिए धारावी घर से बाहर रहता है। यहां सुबह होते ही लोग इन घुटन भरे कमरों से बाहर गलियों में निकल आते हैं।

यहां सायन अस्पताल के एक 20 बेड के वॉर्ड को क्वारैंटाइन सेंटर बनाया गया है। यहां भर्ती होने के तीन या चार दिन बाद सैंपल लिया जाता है और तीन दिन बाद रिपोर्ट आती है। जहां से कोरोना पॉजिटिव मरीज मिलता है, उसके घर में जगह है तो परिवार और आसपास के लोगों को घर में क्वारैंटाइन होने के लिए कहा जाता है। उनसे बोल दिया जाता है कि लक्षण आने पर वे फौरन अस्पताल आएं, बीएमसी के डॉक्टर भी कॉल करके फॉलोअप लेते हैं। लेकिन अब मरीज इतने हो गए हैं कि डॉक्टर कॉल नहीं कर पा रहे हैं। पॉजिटिव मिलने पर उन्हें अस्पताल ले जाया जाता है। जाना तो कोई नहीं चाहता लेकिन उन्हें जबरदस्ती ले जाया जाता है।

बॉलीवुड-हॉलीवुड की कई फिल्मों में धारावी को दिखाया गया है। दुनिया के इस सबसे बड़े स्लम में ढाई स्क्वायर किमी में 15 लाख लोग रहते हैं।

15 अप्रैल को धारावी में 56 वर्षीय मोहम्मद तालिब शेख का कोविड-19 से इंतकाल हो गया। उनके दोनों बेटे उनके पास नहीं थे। एक सउदी में तो दूसरा उत्तर प्रदेश में है। उनके करीबी रिश्तेदार मतिउर्ररहमान बताते हैं, "हम कोरोना से इतना परेशान नहीं थे, उसका इलाज करवा लेते लेकिन शेख साहब को वक्त पर डायलिसिस नहीं मिला। क्योंकि कोरोना मरीजों का डायलिसिस अलग मशीन से किया जा रहा है और पूरे मुंबई में वह मशीन खाली नहीं थी। मेरे सामने हर दिन उनका पेट फूलता चला गया और वह बुरी तरह तड़प कर मरे हैं। ‘ मतिउर्ररहमान, तालिब शेख की वजह से धारावी के पास सायन अस्पताल में पांच दिन तक रहे।
धारावी के मरीजों और संदिग्धों के लिए यहीं क्वारैंटाइन सेंटर बनाया गया है। मतिउर्रहमान बताते हैं कि यहां 20 बेड का एक कमरा है, जहां कोरोना पॉजिटिव, निगेटिव और संदिग्ध मरीजों को रखा गया है। तालिब शेख को लक्षण आने के बाद 7 अप्रैल को सायन अस्पताल के क्वारंटीन सेंटर ले जाया गया था, जहां तीन दिन बाद उनका टेस्ट हुआ।

वह पहले से किडनी और लो बीपी के मरीज थे। उनकी हालत ऐसी नहीं थी कि वह वहां ज्यादा दिन रह सकते लेकिन किसी ने मेरी नहीं सुनी। स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना था कि उनके पास टेस्टिंग किट आएगी तो ही वह टेस्ट कर सकेंगे।

मतिउर्ररहमान ने दबाव से तालिब शेख को उस क्वारैंटाइन सेंटर से निकाला और चैंबूर के एक निजी अस्पताल में भर्ती करवा दिया, जहां उनकी कोरोना की रिपोर्ट पॉजिटिव आई लेकिन यह सुनते ही तालिब शेख को हार्ट अटैक आ गया।

धारावी में सामुदायिक तौर पर कोरोना फैलने की शुरुआत हो चुकी है। इसमें कोई शक नहीं कि यहां लोग लॉकडाउन को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं और कोरोना के भयानक नतीजों से भी बेखबर हैं। शाम के वक्त जब खाना बंटता है तो यहां मेला लग जाता है। सामान्य दिनों से ज्यादा बुरी हालत होती है।

एक अनुमान के मुताबिक, धारावी में 1 बिलियन डॉलर का कारोबार इनफॉर्मल इंडस्ट्री से होता है। फिलहाल यहां सबकुछ बंद है।

टेड स्पीकर और टाटा इंस्टीटयूट ऑफ सोशल साइंस (टिस) के छात्र फाहद अहमद बताते हैं, "हम मुंबई के बड़े स्लम धारावी-कमाठीपुरा में राशन और खाना बंटवाते हैं लेकिन धारावी में स्थितियां हाथ से निकल चुकी हैं। सरकारी मदद के बिना धारावी को बचाया नहीं जा सकता है।"

"पहले यह होता था कि धारावी में लोग सुबह काम पर निकल जाते थे और रात में बुरी तरह थककर सो जाते थे। पांव पसारने की जगह भी मिल जाती थी तो नींद आ जाती थी अब सुबह से रात तक एक खोली में 10-10 लोगों के रहने से मानसिक बीमारियां भी हो रही हैं और ऐसे में सोशल डिस्टेंसिंग तो हो ही नहीं सकती है।"

फहाद कहते हैं, "धारावी में लॉकडाउन असंभव है। अगर लॉकडाउन लगवाना है तो यहां के हर घर से आधे से ज्यादा लोगों को किसी स्कूल या किसी मैदान में शिफ्ट करना होगा। तब जाकर पॉपुलेशन डेनसिटी कम होगी।"

फाहद बताते हैं, "बीमारी फैल रही है इसमें यहां लोगों की भी गलती है। कुछ लोग तो पुलिस को भी चिढ़ाते लगते हैं कि देखो हम घर से बाहर हैं। मेरे सामने कोरोना से चार मौतें हो चुकी हैं लेकिन अब कुछ दिनों में भूख से मौतें शुरू हो जाएंगी। खाने की कतारें हर दिन लंबी होती जा रही हैं। हर दिन 40 से 50 लोगों को बिना खाने के लौटाना पड़ता है।"

धारावी में राशन बंटने के दौरान इसी तरह भीड़ इकट्ठा हो जाती है।

लंबे समय से विदेशी मीडिया के लिए धारावी कवर कर रहे पार्थ एमएन कहते हैं, "अगर धारावी पैरालाइज हो गया तो मुंबई की आर्थिक व्यवस्था में यह एक बड़ा धक्का होगा। कामगारों की एक बड़ी संख्या यहां से ही आती है। यहां दस हजार से ज्यादा मैन्युफैक्चिरिंग यूनिट्स हैं जो कि बंद पड़े है। यहां घर-घर में जींस, रेडीमेड कपड़े, लेबलिंग, प्लास्टिक और लैदर का होलसेल काम होता है और फैक्ट्रियां चलती हैं। 1 बिलियन डॉलर का कारोबार यह इनफॉर्मल इंडस्ट्री से होता है।"

लगभग दस लाख आबादी वाले धारावी को 7 वॉर्ड में बांटा गया है। यहां के सबसे अधिक प्रभावित वॉर्ड के नगर सेवक बाबू खान बताते हैं कि अगर धारावी के लिए पहले से प्रशासन सतर्क होता तो शायद हालात संभले हुए होते। लोग डरे हुए हैं, बदहवास हैं, इनके हलक सूखे हुए हैं, ये भूखे हैं, बिना पैसे के हैं, दूसरी गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं।

बाबू खान को बीएमसी की तरफ से 500 पैकेट खाने के दिए जाते हैं। जिसमें चावल होते हैं। वह कहते हैं कि एक मजदूर का उस चावल से क्या होगा? दूसरा यह भी कि इलाके में डेढ़ लाख लोग रहते हैं। डेढ़ लाख में से बीएमसी सिर्फ 500 लोगों को मुट्ठी भर चावल दे रही है।



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धारावी में बड़ी संख्या में कामगार और मजदूर रहते हैं। यहां दस हजार से ज्यादा मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स हैं। यहां घर-घर में जींस, रेडीमेड कपड़े, लेबलिंग, प्लास्टिक और लैदर का होलसेल काम होता है।




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किसी ने कमरा किराए से लिया, तो किसी ने होटल को ही घर बनाया, सुबह 5 से रात 12 बजे तक काम पर लगी रहती हैं ये वीरांगनाएं

वो घर भी संभाल रही हैं औरड्यूटी भी निभा रही हैं। उन्हें अपने बच्चों की दिन-रात फ्रिक भी हैऔरकर्तव्य का अहसास भी। उनकी जिंदगी सुबह 5 बजे से शुरू होतीहै, जो रात में 12 बजे तक चलतीहै। इस दौरान ड्यूटी के साथ ही घर के भी तमाम काम उन्हें करना होते हैं। घर और बाहर दोनों की जिम्मेदारियों को पूरा कर रही इन वीरांगनाओं में सेकिसी ने खुद और परिवार को सुरक्षित रखने के लिएकिराए से कमरा लिया है तो किसी ने परिवार से दूरी ही बना ली। आज हम ऐसीही महिला पुलिसकर्मियों की कहानी सुना रहे हैं,जो खाकी वर्दी में न सिर्फ कोरोनावायरस को हराने में लगी हुई हैं, बल्कि इस मुश्किल दौर में अपने परिवार को भी संभाल रही हैं।

भोपाल में महिला पुलिसकर्मियों के संघर्ष को बयां करती पांच कहानियां...

ड्यूटी पर तैनात महिला पुलिसकर्मी।

1. शीला दांगी, थाना कोतवाली

आपका मौजूदा वक्त में घर में क्या रोल है?

मेरा दिन सुबह 6.30 बजे से शुरू होता है। पहले बच्चे को नहलाती हूं। तैयार करती हूं। फिर खुद नहाती हूं। इसके बाद पीने का पानी भरना, पति और खुद का टिफिन तैयार करना, घर की साफ-सफाई करने जैसे तमाम छोटे-मोटे काम निपटाने होते हैं। हसबैंड 9 बजे ऑफिस के लिए निकल जाते हैं। उससे पहले उनका टिफिन तैयार करना होता है। मेरा बच्चा अभी 5 साल का है। उसे अकेला घर में नहीं छोड़ सकते। रोज ड्यूटी पर आते वक्त बच्चे को पति के ऑफिस में छोड़ते हुए आती हूं,क्योंकि उन्हें फील्ड में नहीं जाना होता। वे ऑफिस में ही रहते हैं। मैं फील्ड और ऑफिस दोनों जगह काम करती हूं। कई लोगों से मिलती-जुलती हूं। इसलिए बच्चे को अपने साथ नहीं ला सकती। शाम को 7 बजे ड्यूटी खत्म होने के बाद बच्चे को हसबैंड के ऑफिस से लेते हुए घर जाती हूं। क्योंकि हसबैंड 9 बजे तक घर आते हैं। घर पहुंचकर खुद सैनिटाइज होती हूं फिर बच्चे को सैनिटाइज करती हूं। यूनिफॉर्म वॉश करती हूं। बच्चे के कपड़े वॉश करती हूं। फिर लग जाती हूं रात का खाना तैयार करने में। हसबैंड के आने के बाद हम साथ खाना खाते हैं। सोते-सोते 12 बजे जाते हैं। 6 घंटे बाद दोबारा उठने की फ्रिक के साथ कुछ घंटे सुकून की नींद लेने की कोशिश करते हैं। अगले दिन फिर वही रूटीन।

ड्यूटी पर क्या रोल होता है?
मैं कोतवाली थाने में कॉन्स्टेबल हूं। कभी फील्ड में ड्यूटी करनी होती है, कभी थाने में काम करना होता है। फील्ड पर रहते हैं तो इधर-उधर जाने वालों को रोकते हैं। समझाते हैं। मास्क पहनने को बोलते हैं। कई बार लोग हम पर चिढ़ भी जाते हैं। हमें ही डांटने लगते हैं, फिर भी हम रिक्वेस्ट करते हैं कि हम ये सब आपकी भलाई के लिए कर रहे हैं। कई दफा गुस्सा भी आता है। तब हम भी लोगों पर भड़क जाते हैं। पर मकसद तो यही होता है कि कोई कोरोना का शिकार न हो। भीड़ न जमा हो बस।

2. मीरा सिंह, 23 बटालियन

घर में आपका रोल क्या होता है?
मैं सुबह 5 बजे उठ जाती हूं। क्योंकि 7 बजे मुझे ड्यूटी पर पहुंचना होता है। सुबह के दो घंटे बेहद व्यस्त होते हैं। नहाना, सफाई और खाना तैयार करना। मेरे दो बच्चे हैं। आठ साल का बेटा और तेरह साल की बेटी। दोनों पिता के साथ घर में रहते हैं। मैं खुद का टिफिन लेकर निकलती हूं। हमें भोजन तो उपलब्ध करवाया जा रहा, पर संक्रमण के डर से बाहर का खाना नहीं खाती। ड्यूटी खत्म होने पर पहले घर नहीं जाती। किराये का कमरा ले रखा है। वहां जाकर नहाती हूं। यूनिफॉर्म वॉश करती हूं। खुद को सैनिटाइज करती हूं। तभी घर जाती हूं। हमें विभाग ने होटल में रहने की सुविधा दी है, पर होटल में रहने लगी तो बच्चे का घर पर ध्यान कौन रखेगा? उसे खाना-पीना कौन देगा? इसलिए जैसे कोरोनावायरस का मामला सामने आया हमने घर के पास ही किराये का एक कमरा ले लिया था। बच्चे और पति को सुरक्षित रखने के लिए ये जरूरी था।

और काम के दौरान आपका रोल क्या होता है?
हमारी ड्यूटी सुबह 7 से दोपहर 3 बजे तक चलती है। इस दौरान कई बार लोगों के गुस्से का सामना करना पड़ता है। जांच के लिए रोके जाने पर तो कई लोग धमकी देते हुए जाते हैं, कि देख लेंगे तुम्हें। महिलाएं बिना मास्क लगाए बच्चों को गाड़ी पर ले जाती हुई दिखती हैं, उन्हें रोको तो वो भी झगड़ पड़ती हैं। फील्ड पर रहने के दौरान लोगों के ऐसे बिहेवियर से कई बार गुस्सा भी आता है। लेकिन फिर लगता है कि सब तो परेशान ही हैं। हम हर किसी को समझाने का काम कर रहे हैं। तपती धूप में 8 घंटे तक खड़े रहना भी चुनौती है। हालांकि बीच-बीच में बैठ भी जाते हैं। छांव में भी चले जाते हैं, लेकिन लोगों को संभालना आसान नहीं होता। हर गाड़ी को चेक करना, समझाना, कागज देखना, मास्क पहनने को कहना, ये सब हमारी ड्यटी है।

3. सुमन सिंह, 23 बटालियन

अभी आप घर में क्या रोल अदा करती हैं?
मैं सरकारी क्वार्टर में रहती हूं। अभी घर पर अकेली ही हूं, क्योंकि मां और भाई लॉकडाउन के चलते गांव में फंस गए हैं। मैं लॉकडाउन के पहले आ गई थी। अकेले रहना ठीक भी है, लेकिन अकेले रहने की चुनौतियां भी हैं। ड्यूटी सुबह 7 बजे से शुरू होती है। इसलिए 5 बजे से उठकरखाना तैयार करती हूं। चाय और नाश्ता भी घर से ही बनाकर लाती हूं, क्योंकि बाहर तो कुछ मिल नहीं रहा। मां फोन करती रहती हैं। वो कई बार रोने लगती हैंकि कब खत्म होगा कोरोना। तुम ठीक हो कि नहीं। टेंशन में ही रहती हैं। मेरे पास आना चाहती हैं, लेकिन आ नहीं सकती। ड्यूटी से आने के बाद घर की सफाई करती हूं। खुद को सैनिटाइज करती हूं। हर रोज कपड़े वॉश करती हूं। यूनिफॉर्म में प्रेस भी करना होता है। फिर डिनर तैयार करती हूं। सोते-सोते रात के 11 बज जाते हैं। अगली सुबह फिर से वही काम।

और बाहर क्या रोल रहता है?
मेरी ड्यूटी भोपाल चौराहे पर लगी है। चेकिंग में ड्यूटी है। दिनभर लोगों को समझाने और जांच करने में निकल जाता है। कई लोग सहयोग करते हैं और नियमों का पालन करते हैं। लेकिन कुछ लोग नियमों को नहीं मानते और हम पर ही गुस्सा निकालते हैं। ऐसे लोगों से भी डील करना होता है। जब से कोरोनावायरस आया है, तब से मन में डर भी हमेशा बना हुआ रहता है। फील्ड पर पूरे समय कपड़ा बांधकर ही रहते हैं। धूप में कपड़ा बांधकर खड़े होने से पसीना-पसीना हो जाते हैं, लेकिन कपड़ा हटा भी नहीं सकते, क्योंकि ऐसे में खतरा ज्यादा है। अभी जिंदगी बहुत चुनौतीपूर्ण चल रही है।

4. सोनम सूर्यवंशी, यातायात थाना

अभी घर में क्या रोल होता है?
मैं अकेले रहती हूं। सुबह 7 बजे से दोपहर 3 बजे तक ड्यूटी रहती है। विभाग भोजन उपलब्ध करवा रहा है, पर मैं तो अपना खाना खुद बनाकर लाती हूं। ताकि संक्रमण का शिकार होने की रिस्क न रहे। सुबह 5 बजे उठ जाती हूं। नहाने के बाद खाना बनाती हूं। 7 बजे तक ड्य्टी पर आ जाती हूं। दोपहर 3 बजे ड्यूटी के बाद घर जाती हूं। पहले खुद को सैनिटाइज करती हूं। नहाती हूं। यूनिफॉर्म वॉश करती हूं। फिर घर की साफ-सफाई करके रात का खाना बनाती हूं। सोना साढ़े दस, ग्यारह बजे तक ही हो पाता है। मैंने पिछले साल ही पुलिस विभाग जॉइन किया है। मैं बैतूल की रहने वाली हूं। चिंता में घरवाले दिनभर फोन करके पूछते रहते हैं। उन्हें टेंशन रहता है कि मैं बाहर जा रही हूं। ड्यूटी पर हूं, ऐसे में किसी तरह का खतरा न हो।

और बाहर क्या रोल होता है?
26 मार्च से फील्ड ड्यूटी लगा दी गई थी। सब अलग-अलग प्वॉइंट पर चेकिंग कर रहे हैं। हमें देखना होता है कि, कौन-कहां जा रहा है। कोई फालतू तो नहीं घूम रहा। मैं मैथ्स से एमएससी करके पुलिस की फील्ड में आई हूं। लोगों को प्यार से समझाते हुए मैनेज कर लेती हूं। उन्हें बाहर निकलने के नुकसान और घर में रहने के फायदे बताती हूं। अधिकतर लोग समझ जाते हैं। कुछ लोग मिसबिहेव भी करते हैं। अब हम चालानी कार्रवाई भी शुरू कर चुके हैं। कुछ लोग अलग-अलग बहाने करके निकलने की कोशिश करते हैं। कोई कहता है पेट्रोल लेने जाना है, तो कोई कहता है राशन लेना है। हम सबसे यही रिक्वेक्ट कर रहे हैं कि घर से बाहर न निकलिए। आठ घंटे सड़क पर तपती धूप में नौकरी करना किसी चुनौती से कम नहीं होता। जब मौका मिलता है, तब थोड़ी देर के लिए बैठकर आराम कर लेते हैं।

5. पल्लवी शर्मा, एमपी नगर थाना

घर में क्या रोल होता है?

मैं सीहोर की रहने वाली हूं। भोपाल में घर-परिवार का कोई नहीं है। यहां विभाग ने होटल में रुकने की व्यवस्था की है। किसी को घर नहीं जाना है, सिर्फ लोकल में जिनके परिवार हैं, वहीं लोग घर जाते हैं। मैं होटल के कमरे में ही रहती हूं। खाना भी विभाग जो उपलब्ध करवाता है, वहीं खाती हूं। घरवाले बहुत टेंशन में हैं। वे बार-बार फोन करते हैं। चिंता करते हैं, लेकिन हमें इस कठिन समय में अपनी ड्यटी भी करना है। मां को बहुत टेंशन रहता है। वो दिन में कई बार कॉल करती हैं, लेकिन ड्यूटी मेरे लिए पहले है।

और बाहर क्या रोल होता है?
सुबह 10 से शाम 6 बजे तक ड्यूटी पर रहती हूं। सबसे बड़ी चुनौती धूप में खड़े रहना ही है। एमपी नगर थाने के सामने वाले चौराहे पर मेरी ड्यूटी होती है। यह चौराहा भी थोड़ा ढलान में है, जिस कारण यहां पैर एकदम समतल नहीं होते। इस कारण रात में सोते वक्त बहुत दर्द देते हैं। हालांकि मैं अपने काम को बहुत एन्जॉय कर रही हूं। हम खाली सड़कों के फोटो लेते हैं। चाय पीते हुए सेल्फी लेते हैं। लोगों को प्यार से समझाते हैं। कई लोग चिढ़ते भी हैं। एक डॉक्टर साहब चिढ़ गए थे कि मैं यहां से रोज निकलता हूं, आप मुझे रोज रोकती हैं। अब हम किस-किस को पहचानें। हम लोगों को रोककर उनसे पूछताछ तो करना ही है। यही हमारा काम है।



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(BHOPAL) Corona Warriors; Madhya Pradesh Women Police Playing an Important Role To Fight Against Coronavirus, Report Updates From Akshay Bajpai




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बिना ग्लव्स, सैनिटाइजर के सफाई में जुटे वर्कर्स, जान को दांव पर लगाने की कीमत रोजाना 186 रु.

लॉकडाउन के बाद से ही देश के अधिकांश लोग घरों में हैं, लेकिन 40 साल के राजेश अब भी आठ से दस घंटे घर के बाहर ही बिताते हैं। राजेश भोपाल नगर निगम के सफाईकर्मी हैं। हाथों पर बिना ग्लव्सके ये शहर की गंदगी साफ कर रहे हैं। न इनके पास हैंड सैनिटाइजर होता है और न ही साबुन। यूनिफॉर्म पहने हुए हैं, लेकिन उसकी हालत देखकर ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि कई दिनों से शायद धुली भी नहीं होगी। इस काम के लिए राजेश को महीनेका 5600 रुपए यानि प्रतिदिन के करीब 186 रुपए मिलते हैं। कोरोनावायरस के फैलने के बाद से भी राजेश उसी तरह सफाई का काम कर रहे हैं, जैसे पहले करते थे। सिर्फ घरों का कचरा ही नहीं उठाते बल्कि हॉस्पिटल के बाहर पड़ा मेडिकल वेस्ट भी उठाते हैं। राजेश के साथ हमें कई ऐसे सफाईकर्मी भी मिले जिनके पास ग्लव्स और सैनिटाइजर तो छोड़िए मास्क तक नहीं था।

निगम सफाईकर्मी राजेश।

कई बार इन्हीं लोगों को कोरोना संक्रमित जगहों पर भी दवा के छिड़काव के लिए ले जाया जाता है। क्या दवा छिड़काव करते वक्त अतिरिक्त सावधानी बरतते हो? ये पूछने पर सफाईकर्मी सोनू बोले कि, ग्लव्स पहनते हैं और पैर में जूते भी होते हैं। जूते हमें नगर निगम से मिले हैं। जूते कभी-कभी पहनते हैं रोज नहीं पहनते। रोज क्यों नहीं पहनते? इस सवाल के जवाब में बोले, आदत नहीं है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक देश में 5 मिलियन (50 लाख) से भी ज्यादा सैनिटाइजेशन वर्कर्स हैं। यह ऐसे लोग हैं जो गंदगी के सीधे संपर्क में आते हैं। इनके पास बचाव के न ही कोई इक्विपमेंट होते हैं और न ही कोई प्रोटेक्शन। जहरीली गैसों से घिरे होते हैं। इसकारण इनमें से कई को श्वांस रोग की समस्या भी हो गई है।

निगम सफाईकर्मी सोनू।

साहब, हमें पहले कोरोनावायरस से डर लगता था, लेकिन अब नहीं लगता। हम तो नालों में भी कूद रहे हैं। नालियों को भी साफ कर रहे हैं। घूरे के ढेर भी उठा रहे हैं और कोरोनावायरस संक्रमित इलाकों में दवा का छिड़काव भी कर रहे हैं। ये कहते हुए राजेश हंस दिए। हालांकि राजेश के माथे पर चिंता की लकीरें भी साफ नजर आ रही थीं। कोरोनावायरस के बीच ड्यूटी भी करना है। खुद को संक्रमित होने से बचाना भी है और घरवालों को भी सुरक्षित रखना है। राजेश अन्य सफाईकर्मियों की तरह हर रोज सुबह 6 बजे से मैदान पर जुट जाते हैं। इन्हें नगर निगम ने नालों की सफाई की जिम्मेदारी दी है। नालों की सफाई करने में डर नहीं लगता? ये पूछने पर बोले, नहीं सर, मैं तो मास्क और जूते पहनकर सफाई करने के लिए नालों में उतरता हूं। अब किसी न किसी को तो ये काम करना ही पड़ेगा। हमारी ड्यूटी है इसलिए हम कर रहे हैं।

पहले डर लगता था, अब नहीं लगता

निगम सफाईकर्मी अनिता।

इतने में राजेश के नजदीक ही बैठीं अनिता बोलीं कि डर तो हम लोगों को भी लगता है, लेकिन जैसे पुलिस-डॉक्टर सेवा कर रहे हैं, वैसे हम भी कर रहे हैं। अनिता भी निगम की सफाई कर्मचारी हैं, जो जोन-2 में झाडृ लगाने का काम करती हैं। आपके घर में कौन-कौन है? ये पूछने पर बोलीं, मैं और मेरे पति दोनों सफाईकर्मी हैं। घर में बच्चे हैं। मैं सुबह अपने और बच्चों के लिए खाना बनाती हूं। हम हमारा खाना बांधकर ले आते हैं। बच्चे घर में ही खाते हैं। ड्यूटी से घर पहुंचने पर बच्चों से मिलने में डर लगता है? इस सवाल के जवाब में बोलीं, हां सर लगता है इसलिए घर के बाहर ही नहाते हैं। कपड़े धोते हैं। इसके बाद ही घर के अंदर जाते हैं।

न साबुन, न हैंड सैनिटाइजर

निगम सफाईकर्मी कमला।

सफाईकर्मी कमला कहती हैं कि, हम जिस तरह से कोरोनावायरस के पहले काम कर रहे थे, वैसे ही अब भी कर रहे हैं। पहले भी सुबह 7 से दोपहर 3 बजे तक ड्यूटी होती थी, अब भी वही टाइम है। आप दिन में कितनी बार हाथ धोती हो? ये पूछने पर कमला बोलीं कि, खाना खाने के पहले हाथ धोते हैं। बाकी टाइम तो झाडृ लगाने का काम ही चलतारहता है। क्या आपके पास हैंड सैनिटाइजर या साबुन होता है? तो बोलीं, नहीं। हम पानी से ही हाथ धो लेते हैं, फिर जब घर जाते हैं, तब साबुन से अच्छे से नहाते हैं। क्या कोरोना से डर नहीं लगता? इसके जवाब में बोलीं, शुरू-शुरू में डर तो बहुत लगा लेकिन बाद में हमें डर लगना बंद हो गया।

किसी को कोरोना नहीं, इसलिए दूर नहीं रहते

सफाईकर्मी आशा।

क्या आप लोग दूर-दूर नहीं रहते? इस सवाल के जवाब में सफाईकर्मी आशा बोलीं, हम में से किसी को कोरोना नहीं है। कई लोग मास्क भी लगाते हैं। मास्क किसने दिए? बोलीं, निगम से एक बार मिले थे, वही धोकर लगाते हैं कुछ लोग। आप नहीं लगातीं? बोलीं, कभी-कभी लगा लेते हैं। बोलीं, अब बीमारी को आना होगातो आ ही जाएगी क्योंकि हम लोग तो वैसे ही सफाई का काम करते हैं। झाडृ लगाते हैं तो धूल नाक-मुंह से अंदर जाती ही है।

किसी से पानी भी नहीं मांग सकते

एमपी नगर जोन-1 में सड़क सेकचरा उठा रहे सफाईकर्मी अनिल शंकर और संतोष सुखचंद मिले। दोनों घूरे पर पड़ा कचरा उठा-उठाकर गाड़ी में डाल रहे थे। हमने हालचाल पूछे तो बोले, अभी तो भूखे-प्यासे ही काम करना पड़ रहा है, क्योंकि दुकानें सब बंद हैं। सुबह दो रोटी खाकर आते हैं, उससे ही शाम हो जाती है। कोरोनावायरस के कारण किसी से पानी भी नहीं मांग सकते। कई बार तो प्यास लगतीरहती है, लेकिन बहुत देर तक पानी ही नहीं पी पाते। बोले, पुलिसवालों को खाना मिलता है, लेकिन हम लोगों को नहीं मिलता।

कभी-कभी मास्क बदल लेते हैं
20 साल के अनिल से पूछा कि कोरोनावायरस से डर लगता है तो बोला, नहीं लगता। हम तो सफाई करते हैं। क्या मास्क बदलते हो? ये पूछने पर बोला, कभी-कभी बदल लेते हैं। एक ही मास्क है उसे धोकर पहन लेते हैं। सफाई गाड़ी के चालक सतीश यादव ने बताया कि, सफाईकर्मियों को 5600 रुपए वेतन मिलता है लेकिन बहुत लेट आता है। दस दिन हो गए अभी तक आया ही नहीं। ये सब दिहाड़ी वाले लोग हैं। एक दिन भी तनख्वाह लेट होती है तो इनका काम रुक जाता है। वेतन लेट क्यों हुआ? ये पूछने पर बोला, हमारे साहब आइसोलेशन में हैं, इसलिए शायद पैसा रुक गया। अब सब परेशान हो रहे हैं।



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Without mask, workers engaged in cleaning gloves, the cost of putting life at stake is Rs. 186 daily.




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सिक्किम में रोज 20 से 100 ट्रक चीन-तिब्बत से सामान लेकर आते थे, इसके बावजूद राज्य में एक भी कोरोना पॉजिटिव नहीं

चीन के जिस वुहान शहर से कोरोनावायरस निकला, वहां से करीब ढाई हजार किमी दूर है सिक्किम की राजधानी गंगटोक। जबकि, वुहान से 12 हजार किमी से भी ज्यादा दूर है अमेरिका का न्यूयॉर्क। एक तरफ वुहान से इतनी दूर स्थित न्यूयॉर्क में कोरोना के 1.5 लाख मरीज हैं। दूसरी तरफ, इतने पास होकर भी सिक्किम में कोरोना का एक भी मरीज नहीं है। देशभर में लॉकडाउन का एक महीना 25 अप्रैल को पूरा हो रहा है। इस मौके पर पढ़ें उस सिक्किम से रिपोर्ट जिससे तीन देशों की सीमा सटी है और इसके बावजूद वहां कोरोना का एक भी मरीज नहीं है...

सिक्किम भारत का ऐसा राज्य है, जहां 23 अप्रैल तक कोरोना का एक भी केस नहीं मिला है। यहां, अब तक कोरोना के 81 संदिग्ध मिले तो थे, लेकिन सभी की रिपोर्ट निगेटिव आई। 7 लाख से ज्यादा की आबादी वाले सिक्किम नेकोरोना के खिलाफ लड़ाई जनवरी में उसी समय शुरू कर दी थी, जब कोरोना ने चीन समेत बाकी देशों में पैर पसारने शुरू ही किए थे। 28 जनवरी से ही यहां की सरकार ने राज्य के दो एंट्री पॉइंट- रंगपो और मेल्ली पर स्क्रीनिंग जरूरी कर दी थी।

राज्य के मुख्यमंत्री पीएस गोले कहते हैं, ‘‘सख्त निगरानी की वजह से हम कोविड-19को रोकने में सफल रहे हैं। हम देश के एकमात्र राज्य हैं, जहां अब तक कोई मामला नहीं आया। ये सब हमारे वॉरियर्स और नागरिकों के प्रयासों से हुआ है।’’हालांकि, उन्होंने ये भी कहा कि अभी भी हमें सतर्क रहने की जरूरत है।

नाथुला दर्रा। यहीं से कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए जाते हैं और यहीं से चीन-तिब्बत से ट्रेड भी होता है।

तीन तरफ से दूसरे देशों से घिरा हुआ है सिक्किम
तीन तरफ से हिमालय से घिरे हुए सिक्किम की उत्तरी सीमा तिब्बत, पश्चिमी सीमा नेपाल और पूर्वी सीमा भूटान से लगती है। जबकि, दक्षिणी सीमा पश्चिम बंगाल से लगती है। सिक्किम नाथुला के जरिए तिब्बत-चीन से एक ट्रेडिंग पोस्ट भी साझा करता है,जहां से रोजाना 20 से 100 ट्रक सीमा पार से आते हैं। इन ट्रकों से चावल, आटा, मसाले, चाय, डेयरी प्रोडक्ट और बर्तन आते हैं।पहाड़ी इलाका होने की वजह से यहां कोई रेलवे लाइन और स्टेशन भी नहीं है। यहां का पहला पाक्योंग एयरपोर्ट सितंबर 2018 में शुरू हुआ।

सख्ती के बिना भी यहां लोगों ने लॉकडाउन का अच्छे से पालन किया। राज्य में सिर्फ जरूरी सेवा देने वाले ही घरों से निकल रहे थे।

कोरोना से लड़ने के लिए सिक्किम ने क्या किया?
1.पर्यटकों की एंट्री रोकी :
सिक्किम को अपनी जीडीपी का करीब 8% टूरिज्म से मिलता है। सिक्किम टूरिज्म डिपार्टमेंट की 2018 की रिपोर्ट के मुताबिक, टूरिज्म सेराज्य को 2016-17 में 1.44 लाख से ज्यादा का रेवेन्यू मिला था।राज्य में सालाना 12 से 14 लाख विदेशी और घरेलू पर्टक आते हैं। इनमें से भी सबसे ज्यादा मार्च-अप्रैल में आते हैं। फिर भी यहां की सरकार ने 5 मार्च से विदेशी और 17 मार्च से घरेलू पर्यटकों की एंट्री पर रोक लगा दी थी। एक तरह से 17 मार्च से ही सिक्किम सेल्फ-क्वारैंटाइन में चला गया था। यहां घरेलू पर्यटकों के आने पर अक्टूबर तक रोक है। वहीं, विदेशी पर्यटकों की एंट्री पर भी इस साल के अंत तक रोक रहेगी। इसके साथ ही सिक्किम के नाथुल दर्रे के जरिए कैलाश मानसरोवर जाने का रास्ता भी बंद रहेगा।


2.दूसरे राज्यों से लौटने वाले नागरिकों को क्वारैंटाइन किया : सिक्किम ने दूसरे राज्यों की तुलना में काफी पहले से ही संदिग्ध लोगों की निगरानी और स्क्रीनिंग शुरू कर दी थी। दूसरे राज्यों से सिक्किम लौट रहे राज्य के नागरिकों को सरकार के बनाए गए क्वारैंटाइन सेंटर में 14 दिन रखा गया। इनके अलावा, दूसरे राज्यों से लौटने वाले छात्रों को भी इन्हीं सेंटरों में 14 दिनों के लिए क्वारैंटाइन किया गया।

दूसरे राज्यों में काम करने वाले और छात्र, जो सिक्किम लौटे थे, उन्हें 14 दिन क्वारैंटाइन किया गया था।

3.लॉकडाउन का अच्छे से पालन किया : सिक्किम के लोगों ने सख्ती के बिना भी लॉकडाउन का अच्छे से पालन किया। यहां सिर्फ जरूरी सेवाएं ही चालू हैं। अगर लोग किराना या सब्जी खरीदने के लिए बाहर निकलते भी हैं, तो भी सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हैं। राज्य सरकार ने प्रवासी मजदूरों और रोजाना कमाने वाले कामगारों के साथ-साथ जरूरतमंदों की पहचान कर उन्हें चावल, आलू, तेल और जरूरी सामान भी बांटे हैं।



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देश में कोरोना का पहला मामला 30 जनवरी को आया था। लेकिन, सिक्किम में 28 जनवरी से ही एंट्री पॉइंट पर स्क्रीनिंग जरूरी हो गई थी।




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शरबती की पैदावार तो खूब हुई, पर लॉकडाउन के कारण यह बाकी राज्यों में नहीं जा पा रहा; किसानों को कीमत भी कम मिल रही 

अपने खास स्वाद, सोने जैसी चमक और एक समान दाने के कारण पूरे देश में पहचान बनाने वाले शरबती गेहूं की इस बार सीहोर में बंपर पैदावार हुई है। पूरे मध्य प्रदेश का 50-60%शरबती गेहूं सीहोर में ही होता है। किसान खुश हैं कि इस बार गेहूं की अच्छी पैदावार हुई, लेकिन इस बात से मायूस भी हैं कि कहीं लॉकडाउन के चलते शरबती का भाव कमजोर न रह जाए। यह मायूसी इसलिए क्योंकि हर साल सीहोरी शरबती गेहूं तमिलनाडु, गुजरात, चेन्नई, मुंबई, हैदराबाद, दिल्ली और हिमाचल प्रदेश भेजा जाता है, लेकिन इस बार लॉकडाउन की वजह से इन राज्यों में गेहूं भेज पाना मुश्किल लग रहा है।

फिलहाल यहां की मंडियों मेंगेहूं की इस खास किस्म की कीमत 3300 से 3500 रुपए प्रति क्विंटल चल रही है। आमतौर पर इसका भाव 4000 से 4500 तक होता है।सीहोर में शरबती के साथ-साथ बाकी किस्म का गेहूं भी अच्छा हुआ है। कृषि विभाग के अनुमान के मुताबिक, यहां इस बार गेहूं का कुल उत्पादन 13 लाख मीट्रिक टन पहुंच सकता है। पिछले साल जिले में 9 लाख मीट्रिक टन गेहूं की पैदावार हुई थी। इस साल यहां करीब 2 लाख 90 हजार हेक्टेयर में गेहूं बोया गया। इसमें करीब 15-20%जमीन यानी 60 हजार हेक्टेयर पर शरबती गेहूं की बुआई हुई और इसका उत्पादन1.5 लाख मीट्रिक टन रहा।

सबसे महंगा बिकता है शरबती
शरबती गेहूं की खासियत यह है कि इसकी चमक के साथ ही इसके दाने एक जैसे होते हैं। गेहूं की सभी किस्मों में यह सबसे महंगा बिकता है। लोकमन, मालवा शक्ति और अन्य किस्म के गेहूं जहां 2000से 2500 रुपए प्रति क्विंटल बिकते हैं, वहीं शरबती का न्यूनतम भाव ही 2800 रुपए होता है। यह आमतौर पर 3500 से 4500 रुपए तक बिकता है। 2018 में सीहोर जिले की आष्टा कृषि उपज मंडी में शरबती गेहूं 4701 रुपए क्विंटल बिका था।

क्यों खास है शरबती गेहूं?
देश में गेहूं की सबसे प्रीमियम किस्म शरबती ही है। इसे 'द गोल्डन ग्रेन' भी कहा जाता है, क्योकि इसका रंग सुनहरा होता है। यह हथेली पर भारी लगता है और इसका स्वाद मीठा होता है। इसलिए इसका नाम शरबती है। गेहूं की अन्य किस्मों की तुलना में इसमें ग्लूकोज और सुक्रोज जैसे सरल शर्करा की मात्रा अधिक होती है। सीहोर में इसकी सबसे ज्यादा पैदावार होती है। सीहोर क्षेत्र में काली और जलोढ़ उपजाऊ मिट्टी है, जो शरबती गेहूं के लिए सबसे बेहतर होती है।

प्रदेश में शरबती गेहूं सीहोर के साथ ही नरसिंहपुर, होशंगाबाद, हरदा, अशोकनगर, भोपाल और मालवा क्षेत्र के जिलों में बोया जाता है। प्रदेश सरकार शरबती गेहूं को ब्रांडनेम यानी भौगोलिक संकेतक (जीआई) दिलाने का प्रयास कर रही है। ब्रांडनेम मिलते ही प्रदेश के शरबती गेहूं के नाम से कोई कंपनी या संस्था अपना नाम नहीं दे पाएगी।

बारिश अच्छी हुई तो लोगों ने 60 हजार हेक्टेयर में शरबती गेहूं की बुआईकी
कृषि उपसंचालक एसएस राजपूत के मुताबिक, जिले में रबी सीजन में करीब 3 लाख 50 हजार हेक्टेयर में खेती होती थी, लेकिन अच्छी बारिश के कारण इस बार 3 लाख 90 हजार हेक्टेयर में बोवनी की गई। इसमें गेहूं की खेती 3 लाख हेक्टेयर के आसपास रही, इसमें शरबती का हिस्सा 60 हजार हेक्टेयर रहा। पानी भरपूर मिलने से शरबती की चमक भी बढ़ी है। शरबती की पैदावार गेहूं की अन्य किस्मों के मुकाबले कम होती है, इसलिए लोग कम जमीन पर शरबती की बोवनी करते हैं, लेकिन अच्छी बारिश और सिंचाई की सुविधा के कारण जहां चने की बोवनी की जाती थी, वहां भी शरबती बोया गया था।

शरबती की बेस्टकिस्म हैसी- 306
शरबती गेहूं में सी-306 किस्म बेस्ट मानी जाती है। इसकी क्रॉस वैरायटी भी बाजार में उपलब्ध है। इसका एक-एक दाना एक समान और सोने जैसा चमकता है। इस बार कठिया गेहूं की एकदम नई वैरायटी 'दूरम' को लेकर भी यहां किसान काफी उत्साहित हैं। इस गेहूं का उत्पादन 60 से 65 क्विंटल प्रति हेक्टेयर दर्ज किया गया है।

सीहोर का शरबती गेहूंसात राज्यों में जाता है
तमिलनाडु, गुजरात, चेन्नई, मुंबई, हैदराबाद, दिल्ली और हिमाचल प्रदेश से कई कंपनियां सीजन के समय सीहोर में आकर खुद शरबती गेहूं की खरीदी करती हैं, इस साल लॉकडाउन के कारण यह व्यापारियों के जरिए शरबती की खरीदी कर रही हैं। आईटीसी ने सोया चौपाल सेंटर पर शरबती गेहूं खरीदने के लिए काउंटर बनाया है। कई किसान मंडी से अधिक कीमत पर यहां अपना गेहूं बेच रहे हैं। इस बार गेहूं खरीदी के लिए प्रशासन ने 164 केंद्र बनाए हैं।



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मध्य प्रदेश सरकार शरबती गेहूं पर अपना जीआई टैग हासिल करने की कोशिश कर रही है। यह मिलते ही शरबती गेहूं पर तमाम कानूनी अधिकार राज्य सरकार के पास आ जाएंगे।




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2004 की एक गलती ने 2013 में दस हजार लोगों की जान ली, पर सजा आज तक किसी को नहीं मिली

16 साल पहले इन्होंने केदारनाथ से पहली रिपोर्ट की थी

अगले हफ्ते केदारनाथ के कपाट खुलेंगे। कहते हैं करीब हजार साल पुराना है यह मंदिर। आदि शंकराचार्य ने बनवाया था। यह मंदिर उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले के इस शहर कीऐसी पहचान है कि उसी के नाम से जाना भी जाता है।

सात साल पहले यानी 2013 में इस शहर ने सबसे बड़ी त्रासदी झेली थी। तब दस हजार लोगों की मौत हो गई थी। और कितने अब भी गायब बताए जाते हैं। दैनिक भास्कर के एडिटर लक्ष्मी पंत ने उस त्रासदी को कवर किया था। पर ऐसा होने वाला है, इसकी आशंका उन्होंने 2004 में अपनी एक रिपोर्ट में जता दी थी। 16 साल पुरानी उस पहली खबर से लेकर त्रासदी तक की कहानी उन्होंने ही बांची हैं...तो पढ़ें इसे...

वह 15-16 जुलाई 2004 का खूबसूरत दिन था। सूरज घर के बरामदे में अच्छा लगने लगा था। काले और नमी से भरे बादल लंबी और सूखी गर्मी के खत्म होने का इशारा कर रहे थे। आप कह सकते हैं कि मानसून हिमालय में पहुंच गया था और अब पहाड़ की खूबसूरत तस्वीर एक स्वप्न की मानिंद हमारे सामने आने ही वाली थी। देहरादून घाटी में पहाड़ की कठिनाई और ऊंचाई तो नहीं है लेकिन उसकी आब-ओ-हवा बदस्तूर महसूस कर सकते हैं। दूसरे लफ्जों में शहर का शहर और पहाड़ का पहाड़।

किसी से सुना है कि जिंदगी लकीरों और तकदीरों का खेल है। मेरे कलम की लकीरें, पहाड़ की पथरीली पगडंडियों से यूं ही नहीं जुड़ जातीं। पहाड़ और इससे मेरा कभी न खत्म होने वाला आकर्षण कोई इत्तेफाक नहीं है। बस यूं कहिए कि एक-एक वाकया और बात चुन-चुनकर लिखी और रखी गई है।

पत्रकार के तौर पर चाहे वो देहरादून में रहते हुए एन्वायरमेंट और वैदर रिपोर्टिंगकरना हो या इसी जिम्मेदारी के रहते कपां देने वाली केदारनाथ त्रासदी की वैज्ञानिक भविष्यवाणी इसके घटने से दस साल पहले कर देना हो। आपको याद दिलाना जरूरी है कि केदारनाथ त्रासदी जून 2013 में हुई। इस हादसा में दस हजार से ज्यादा लोग मारे गए। कितने लापता हैं यह आज तक राज ही है।

लेकिन एक दूसरा सच यह है कि तमाम रिसर्च और सूबतों के आधार पर मैंने 2004 में अपनी एक रिपोर्ट में इसकी भविष्यवाणी 2004 में ही कर दी थी। पत्रकार के तौर पर यह एक सनसनीखेज खुलासा था। लेकिन सरकारी व्यवस्था केदारनाथ मंदिर और अपने कामकाजी सम्मोहन में इस कदर लिप्त थी उसे मेरे सारे दस्तावेजी सच पूरी तरह झूठे ही लगे।

और पूरी जिम्मेदारी से यह भी कह रहा हूं कि आप जिस वक्त या जिस भी कालखंड में केदारनाथ त्रासदी की इस कहानी से गुजरेंगे इसे पढ़ते वक्त त्रासदी की कराहऔर कराहकर रोते लाखों श्रद्धालुओं की चीखें आपको जरूर सुनाई देंगी।

यह कहानी कुछ पुरानी जरूर है लेकिन आज भी बिलकुल ताजा। इसके एक-एक पात्र किसी दुराग्रह से नहीं गढ़े गए हैं। सभी सच के साक्षी हैं। कहानी का अनदेखा-अनजाना यह घटनाक्रम कुछ तरह है। हुआ यूं कि मैं उन दिनों दैनिक जागरण के देहरादून संस्करण में विशेष संवाददाता हुआ करता था। हिमालय और उसके ग्लेशियर मेरी जिंदगी का हिस्सा तो थे ही, अब रिपोर्टिंग का हिस्सा भी थे।

वह तबाही मंदाकिनी के किनारे केदानाथ से लेकर 18 किमी दूर सोनप्रयाग तक सबकुछ बहाकर ले गई थी।

इसी कारण जब भी मेरे सर्किल में किसी को पहाड़ से जुड़ी किसी हलचल की जानकारी मिलती, खबर मुझतक पहुंच जाती। मेरा काम होता उसकी जड़ तक पहुंचना और सच सामने लाना। इसी रौ में जब मुझे पता चला कि केदारनाथ के ठीक ऊपर स्थित चैराबाड़ी ग्लेशियर पर ग्लेशियोलॉजिस्ट की एक टीम रिपोर्ट तैयार कर रही है तो मेरी भी बेचैनी बढ़ गई। मैं देहरादून से ऊखीमठ और फिर गौरीकुंड होते हुए केदारनाथ जा पहुंचा।

केदारनाथ से चैराबाड़ी ग्लेशियर की दूरी 6 किलोमीटर है। 8 जुलाई 2004 को जब मैं उस ग्लेशियर लेक के पास पहुंचा तो वहां मेरी मुलाकात वाडिया इंस्टीट्यूट के ग्लेशियोलॉजिस्ट डॉ. डीपी डोभाल से (अब वे यहां एचओडी हैं) हुई। डोभाल उस वक्त वहां उस झील की निगरानी के लिए अपने यंत्र इन्स्टॉल कर रहे थे। झील का जलस्तर 4 मीटर के आसपास रहा होगा।

मैंने पूछा- जलस्तर नापने और ग्लेशियर के अध्ययन के मायने क्या हैं? डोभाल कुछ हिचकते हुए बोले- मंदिर के ठीक ऊपर होने के कारण चैराबाड़ी झील के स्तर से केदारनाथ सीधे जुड़ा है। यदि जलस्तर खतरे से ऊपर जाता है तो कभी भी केदारनाथ मंदिर और आसपास के इलाके में तबाही आ सकती है।

लक्ष्मी प्रसाद पंत की यह रिपोर्ट 2 अगस्त 2004 को प्रकाशित हुई थी।

मेरी जिज्ञासा डोभाल के जवाब से और बढ़ गई। मैंने पूछा कि क्या इतना पुराना मंदिर भी इस झील के सैलाब में बह सकता है? उनका जवाब था, हां। यह संभव है, लेकिन अभी तक झील का स्तर खतरनाक होने के प्रमाण नहीं मिले हैं। यदि यह 11 से 12 मीटर तक पहुंचता है तो जरूर खतरा होगा। उन्होंने बात संभालते हुए कहा- एवलांच तो इस इलाके के लिए आम हैं। ये कितने खतरनाक हो सकते हैं, किसी से छुपा नहीं है।

यदि झील का स्तर बढ़ा तो एवलांच के साथ मिलकर यह किसी बम से भी ज्यादा खतरनाक असर वाला होगा। यूं समझिए कि बम के साथ बारूद का ढेर रखा है। बम फटा तो बारूद उसका असर कई गुणा बढ़ा देगा। मेरे माथे पर शिकन पड़ गई। खबर का कुछ मसौदा मिलता दिखाई दिया।

अब मेरा सवाल था, इतना खतरा? फिर तो काफी दिन से निगरानी चल रही होगी? मेरे सीधे सवालों से लगातार परेशान हो रहे डोभाल ने झल्लाते हुए कहा- हां, 2003 से। इसके बाद उन्होंने मेरे बाकी सवाल अनसुने कर दिए। हकीकत यही है कि मेरा उनसे संपर्क इससे आगे नहीं बढ़ पाया।

अब केदारनाथ के ठीक ऊपर पल रहे एक खतरे ने मुझे चौकन्ना कर दिया। फिर एक खबरनवीस के तौर पर खबर ब्रेक करने की बेचैनी कैसी रही होगी, आप समझ सकते हैं। जानकारी बेहद अहम थी। सवाल सिर्फ हिन्दू आस्था के एक बड़े तीर्थ केदारनाथ से ही नहीं, कई लोगों की जिंदगी से भी सीधे जुड़ा था। चैराबाड़ी ग्लेशियर झील की कुछ तस्वीरें लेकर मैं देहरादून पटेल नगर स्थित अपने दफ्तर लौट आया।

केदारनाथ के खतरे और चैराबाड़ी ग्लेशियर की नाजुक स्थिति पर खबर लिखकर मैंने पहला ड्राफ्ट अपने संपादक अशोक पांडे को सौंपा। इसे पढ़कर वे भी चौंक गए। बोले, ग्लेशियर, झील और एवलांच कैसे केदारनाथ जैसे ऐतिहासिक मंदिर के लिए खतरा हो सकते हैं? मैंने इतना ही कहा, विशेषज्ञ ग्लेशियर झीलों पर जाकर 2003 से ग्राउंड स्टडी कर रहे हैं। डाटा इकठ्‌ठा किया जा रहा है। टीम बनी है। इतना सब कुछ किसी आधार पर ही कर रहे होंगे। मैं खुद उन्हें ये सब करते हुए देखकर आया हूं।
जवाब मिला- लेकिन कोई कुछ बता क्यों नहीं रहा? प्रशासन को तो कोई जानकारी होगी? क्या सीएम या किसी मंत्री से कुछ पूछा? सबके वर्जन हैं या नहीं? मैं चुप था। मैंने समझाने की कोशिश की- सर। अगर बात इतनी आगे पहुंच गई तो खबर सबको मिल जाएगी। फिर मेरे वहां रातों रात जाने का क्या फायदा? अब मैंने अपनी पत्रकारीय जिम्मेदारी का हवाला देते हुए खबर छापने पर जोर दिया। केदारनाथ में कितना बडा खतरा पल रहा है इसके दस्तावेजी सबूत उनकी टेबल पर रखें।
फिर भी लंबे तर्क-वितर्क हुए। खबर में कुछ काट-छांट भी। इसके बाद खबर छपने के लिए तैयार हुई। मामला चूंकि बड़ा था इसलिए पांडे जी ने कानपुर स्थित हैड ऑफिस में फोन कर जानकारी दे दी। अंत में, एक अगस्त के दिन फैसला हुआ कि खबर वाकई बड़ी है और फ्रंट पेज की लीड बनाई जाए।

केदारनाथ से सिर्फ 2 किमी दूर चौराबाड़ी झील जो 400 मीटर लंबी, 200 मीटर चौड़ी और 20 मीटर गहरी थी, फटने से 10 मिनट में खाली हो गई।

खबर छपने के बाद चैराबाड़ी झील तो खैर नहीं फटी, लेकिन मेरे ऑफिस में पूछताछ का एवलांच सा आ गया। वाडिया इंस्टीट्यूट के कार्यवाहक डायरेक्टर और भू-वैज्ञानिक ए के नंदा (डायरेक्टर प्रो. बीआर अरोड़ा उस वक्त छुट्टी पर थे) ने गुस्से में मुझे फोन किया। बौखलाहट में बोले- यह क्या छाप दिया है। आपको कुछ गलतफहमी है। हमारा कोई वैज्ञानिक चैराबाड़ी लेक पर गया ही नहीं है और न ही हम कोई ऐसी रिपोर्ट तैयार कर रहे हैं।

एकबारगी तो मैं भी हैरान रह गया। मैंने कहा यह खबर दफ्तर में बैठकर नहीं लिखी है। झील पर होकर आया हूं। वही लिखा है जो मुझे आपके ही एक वैज्ञानिक डीपी डोभाल ने बताया है। न तो उन्होंने मेरी दलील सुनी और न यकीन किया। और तो और उन्होंने खबर के गलत और बेबुनियाद होने का एक लंबा-चैड़ा नोटिस भी इंस्टीट्यूट की ओर से भेज दिया। मुझ पर खंडन छापने के लिए दबाव डाला गया। इंस्टीट्यूट में आने के लिए भी मुझ पर पाबंदी लगा दी गई।

पत्रकार जानते हैं कि जब किसी रिपोर्टर की खबर फ्रंट पेज की लीड खबर बनी हो और उसे गलत करार दे दिया जाए तो उस पर कितना दबाव रहता है। साथी पत्रकार भी टेढे-मेढे कयास लगाने लगते हैं। मेरे पास पर्याप्त सबूत और रिकॉर्डिंग्स होने के कारण खंडन तो नहीं छपा लेकिन मेरी इस खबर ने मुझ पर संदेह का एवलांच जरूर छोड़ दिया। जाहिर है, इंस्टीट्यूट ने सवाल-जवाब डोभाल से भी किए। मैंने भी बाद में उनसे मिलकर अपनी खबर पर बात करनी चाही कि आखिर इसमें गलत क्या था? जवाब तो नहीं मिला, लेकिन उन्होंने मुझसे दूरी जरूर बना ली। खबर से मची हलचल भी धीरे-धीरे थम गई। लेक की निगरानी कर रही टीम देहरादून लौट आई। प्रोजेक्ट रोक दिया गया।

अक्टूबर 2004 में मैंने दैनिक जागरण देहरादून छोड़ दिया। खबर भी भुला दी गई। खुद पर उठे सवालों का जवाब देने की बेचैनी मन में ही बनी रही। मैं उत्तराखंड से राजस्थान, फिर कश्मीर और फिर राजस्थान आ गया। बेहतर से और बेहतर होने की यह यात्रा चलती रही। जिंदगी सिखाती रही, मैं सीखता रहा।

समय के साथ बहुत कुछ बदला। बेहिसाब चुनौतियां भी आईं लेकिन कुछ चीजों की पहचान कभी खत्म नहीं हुई। देहरादून छोड़ने के नौ साल बाद 15-16 जून 2013 की अल-सुबह चैराबाड़ी का सच केदारनाथ की तबाही के तौर पर पहाड़ से नीचे उतरा। मेरी खबर के सच का खुलासा इस तरह होगा, मैंने कभी नहीं सोचा था।

कुछ ऐसे कि इसने मुझे हिला दिया और दुनिया को भी। मैं दुखी था। दिल भी रो पड़ा। चांद की तरह गोल चैराबाड़ी झील पहाड़ों को भी खा गई। सब बहा ले गई। पीड़ा और उत्तेजना दोनों मुझ पर हावी होने लगे। आज मैं उस दिन को कोस रहा था जब इस खबर के सही होने की जिद पकड़े था। तब मैं चाहता था कि यह खबर सही हो, आज मुझे अपनी चाहत पर अफसोस और क्षोभ था। पत्रकार की जीत थी, मगर जीवन प्रकृति से हार गया था।

2013 की घटना के बाद सेना के दस हजार जवान, 11 हेलिकॉप्टर, नौसेना के 45 गोताखोर और वायुसेना के 43 विमान यहां फंसे यात्रियों को बचाने में जुटे हुए थे।20 हजार लोगों को वायुसेना ने एयरलिफ्ट किया था।

दुनिया छोटी है और गोल भी। 2004 में छोड़ी अपनी बीट पर जून 2013 में मैं फिर तैनात था। देहरादून जाकर डोभाल से मिला। मेरे जाने के बाद उनके साथ इस खबर के बारे में क्या-क्या हुआ मैं नहीं जानता। लेकिन तबाही के बाद एके नंदा ने डोभाल को फिर फोन किया और कहा- डोभाल तुम भी उस वक्त सही थे और पंत की वह खबर भी सही थी। ये स्वीकारोक्ति महज औपचारिक थी। खबर पर तो प्रकृति की निर्मम मुहर पहले ही लग चुकी थी।

देहरादून सचिवालय में मेरी मुलाकात मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा (अब बीजेपी में शामिल) से भी हुई। मेरा सवाल था-दस हजार मौतों का जिम्मेदार कौन? क्या आपदा रोकी जा सकती थी? इस सवाल पर उनका जवाब था...यह इंसानी नहीं दैवीय आपदा है। डरपोक और कायर सरकारें अपनी नाकामी ऐसी ही छिपाती हैं।


मैं चैराबाड़ी ग्लेशियरभी गया। जिस नीली झील को नौ साल पहले मैंने लबालब देखा था आज जैसे यहां किसी ने ट्रैक्टर चलाकर उसे सपाट कर दिया हो। झील नहीं यहां उसके अवशेषही शेष थे। केदारनाथ तबाही का ये एपिसेंटर उजाड़ और वीरान पड़ा था। तबाही ने मौत और जिंदगी सबके मायने बदल दिए थे।  

और क्या लिखा जाए। नंदा कुछ साल पहले रिटायर हो चुके हैं। डोभाल अब वाडिया में विभाध्यक्ष हैं और किसी और ग्लेश्यिर पर काम कर रहे हैं। लेकिन मुझे आज भी केदारनाथ त्रासदी का दर्द परेशान करता है। क्योंकि धूर्त और अंहकारी व्यवस्था के कारण चैराबाड़ी झील को पालने-पोसने की भारी कीमत केदारनाथ हादसे के रूप में पूरे देश ने चुकाई है।

और हां, मैं यकीनी तौर पर कह सकता हूं कि आपदा के तीन अक्षर, आशाके दो अक्षरों पर भारी रहे हैं। और यह कहानी भरोसे के बनने की नहीं, भरोसे के टूटने की कहानी भी है।

-लक्ष्मी प्रसाद पंत दैनिक भास्करराजस्थान के स्टेट एडिटर हैं।



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साल के कुछ महीनों के लिए खुलनेवाले इस केदारनाथ मंदिर में 2013 में आई त्रासदी के वक्त पहली बार पूजा रोकी गई थी।




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क्या मोदी सरकार कोविड-19 के दौर में मिली ताकत छोड़ सकेगी?

जब आपके सामने बहुत अधिक ढोंग और नैतिकता का दिखावा होने लगे तो आपको एक असली पंजाबी की तरह जो सच है, उसे जस का तस कहना पड़ता है। पिछले हफ्ते पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने ऐसा ही किया। इससे उन्होंने कोरोना वायरस के कारण हमारी राष्ट्रीय राजनीति और शासन में 35 साल बाद एक शक्तिशाली केंद्र की वापसी को भी रेखांकित किया। एक पंजाबी चैनल से बातचीत में उन्होंने शराब की देशव्यापी बिक्री पर केंद्र द्वारा लगाए प्रतिबंध पर सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि शराब का कोराना वायरस से क्या लेना-देना। पटियाला के पूर्व महाराजा अमरिंदर सिंह इस मामले को एक अच्छी वजह से उठा रहे हैं, क्याेंकि राज्य का खजाना खाली हो रहा है। शराब और पेट्रोलियम ही दो ऐसे उत्पाद हैं, जिन पर राज्य सरकारें खुद सीधे कर लगा सकती हैं। खासकर जीएसटी के बाद सभी कर केंद्र के पास चले गए और वह इसमें से राज्यों को उनका हिस्सा देता है। इसलिए शराब और पेट्रोलियम ही राज्यों की आय का प्रमुख साधन रह गए हैं। कोविड महामारी की वजह से अभूतपूर्व उपाय करने की जरूरत है। इसलिए केंद्र सरकार ने 1887 के महामारी कानून और 2005 के आपदा प्रबंधन कानून को लागू करके असाधारण शक्तियां हासिल कर ली हैं। इसी के तहत उसने देशव्यापी लॉकडाउन करके यह तय किया कि क्या खुलेगा और क्या बंद रहेगा।
असल में अमरिंदर जिस बात की शिकायत कर रहे हैं, वही सभी राज्यों की परेशानी है। लेकिन, शराब की बात कोई नहीं करना चाहता। अमरिंदर इस आडंबर को नहीं मानते। सबसे जरूरी बात यह है कि उन्हें आज केंद्र से अपने उस अधिकार के लिए मांग करनी पड़ रही है, जो हमेशा से राज्यों का अपना रहा है। इसलिए हम कह रहे हैं कि काेरोना वायरस ने उस ताकतवर केंद्र की वापसी कर दी है, जिसके बारे में हमें लगता था कि हम उसे 1989 में ही पीछे छोड़ आए हैं। आज केंद्र की टीमें यह निगरानी और ऑडिट करने के लिए राज्यों में जा रही हैं कि वे कोविड संकट से कैसे निपट रहे हैं। वे सवाल पूछ रही हैं, सूचनाएं मांग रही हैं और राज्यों की आलोचना भी कर रही हैं। राज्य सरकारें बात मान रही हैं। शुरू महाराष्ट्र से करते हैं। शायद वह राज्यों में सबसे अधिक मित्रवत रहा है। राजस्थान का प्रदर्शन भी बेहतर रहा है। ममता बनर्जी का पश्चिम बंगाल भी साथ आ रहा है। केंद्र सरकार उसके चिकित्सकीय रिकॉर्ड मांग रही है, सभी मौतों की जांच कर रही है, ताकि पता लग सके कि आंकड़ों से छेड़छाड़ तो नहीं हो रही। बंगाल सरकार को न केवल कई सवालों के जवाब देना पड़ रहे हैं, बल्कि आंकड़ों में संशोधन भी करना पड़ रहा है। गत गुरुवार और शुक्रवार के बीच राज्य ने मृतकों के आंकड़े को बढ़ाकर 15 से 57 किया।
यह संख्या कोई बड़ी नहीं है, लेकिन हमें याद नहीं है कि जाने कब पश्चिम बंगाल के साथ पहले ऐसा हुआ था, क्योंकि वह अपने अधिकारांे वाले गणतंत्र की तरह काम कर रहा था। पहले करीब 34 साल वामशासन में और लगभग एक दशक से ममताराज में। अगर आप सोचते हैं कि यह बदलाव महत्वपूर्ण नहीं है, तो जरा उस मुख्यमंत्री को याद करें, जो प्रधानमंत्री के साथ बैठक करने और वार्ता में आने से इनकार करती रही हैं। यही नहीं, एयरपोर्ट पर उनकी अगवानी के लिए भी नहीं आती हैं। वह अपने प्रिय आईपीएस को बचाने के लिए सीबीआई से लड़ती हैं और जीतती हैं। इस महामारी से यह बदलाव आया है। लेकिन, इसकी प्रमुख वजह वित्तीय है। पेट्रोल-डीजल की बिक्री गिरने आैर शराब की बिक्री बंद होने से राज्यों को वेतन देने के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है। यहां तक कि गरीबों के लिए मदद भी सीधे केंद्र से आ रही है।
कांग्रेस के तीन दशक के शासन, विशेषकर इंदिरा गांधी के समय हम सिर्फ नाम के ही गणराज्य रहे। अधिकतर राज्यों में कांग्रेस का शासन था और मुख्यमंत्रियों को डीएम व एसपी के तबादले के लिए भी केंद्र से अनुमति लेनी पड़ती थी। सिर्फ अंगुली के इशारे पर मुख्यमंत्रियांे को बदल दिया जाता था। 1989 में कांग्रेस के राष्ट्रीय स्तर पर प्रभुत्व खोने के बाद भारत की राजनीति बदल गई। कांग्रेस हमेशा यह डर दिखाती थी कि क्षेत्रवाद देश को तोड़ देगा, लेकिन यह गलत साबित हुआ। बल्कि भारत का संघवाद और मजबूत ही हुआ। आज भारत पहले से कहीं मजबूत है। लेकिन, मोदी के काम के तरीके से यह बदल रहा है। महामारी इसे उचित ठहराने की वजह बनी है। ऐसा अमेरिका में भी हो रहा है। यह अस्वाभाविक समय है, जो गुजर जाएगा। लेकिन, क्या ये बदलाव पलटे जा सकेंगे? अमेरिका में संस्थागत ढांचे अधिक मजबूत हैं। लेकिन, हमारे यहां केंद्र ने मोदी के नेतृत्व में उस ताकत का स्वाद ले लिया है, क्या वह वापस पुरानी व्यवस्था पर लौटेगा? हमारा राजनीतिक इतिहास बहुत आशा नहीं जगाता।(यह लेखक के अपने विचार हैं।)



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Will the Modi government give up the power it got in the Kovid-19 era?




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लोगों को रीइन्वेंट करना सिखा रहा है कोविड-19 का यह दौर

हाल ही में प्रथम महिला श्रीमती सविता कोविंद का एक फोटो वायरल हुआ है, जिसमें वे हाथ से चलने वाली मशीन पर आश्रय घर के लिए मास्क सिल रही हैं। यह एक प्रेरक और हौसला बढ़ाने वाली दृष्टि है, उनका यह योगदान इस बात का भी संकेत है कि कोविड-19 किस तरह से हमारी भूमिकाएं बदल रहा है। कोरोना वायरस का हमला हमारे जीवन की एक अप्रत्याशित घटना है और इसका एक ही प्रबंधन है- आइसोलेशन और एक-दूसरे से दूरी बनाना। यह दुनियाभर के लोगों को पुनर्विचार और खुद को रीइन्वेंट करना सिखा रहा है।

ऑटो जायंट महिंद्रा ने अपनी फैक्टरियों को वेंटिलेटर बनाने की दिशा में मोड़ दिया, फ्रांस की परफ्यूम और कॉस्मेटिक बनाने वाली एलवीएमएच ने अपनी कई यूनिटों को अस्पतालों के लिए हैंड सैनिटाइजर्स बनाने के लिए समर्पित कर दिया है। फैशन डिजाइनर मास्क बनाने के व्यापार में आ गए हैं। हमारे देशव्यापी पोस्टमैन अब स्थानीय बैंकर बन गए हैं, क्योंकि वे दूरस्थ क्षेत्रों में ग्राहकों के किसी बैंक में स्थित अकाउंट से उन्हें नगदी लाकर उपलब्ध कराते हैं।

24 मार्च से 23 अप्रैल के बीच ऐसे 21 लाख ट्रांजेक्शन के जरिये पोस्ट ऑफिसाें ने ग्रामीण व बिना बैंकों वाले इलाकों में 412 करोड़ रुपए लोगों तक पहुंचाए। अप्रैल तक ही रेलवे अपने 5000 कोचों को आइसोलेटेड वार्डों मंे बदल चुका है, ताकि जरूरत पड़ने पर देश के पिछड़े इलाकों में चिकित्सीय सुविधा उपलब्ध कराई जा सके। इससे स्पष्ट है कि बदलाव आज की जरूरत है।
जैसे उद्योग और व्यापार और अन्य सेक्टर इस संकट के समय अपने उत्पादों और सेवाओं में बदलाव करके चुनौतियों से निपट रहे हैं, वैसे ही लोग और ग्रुप भी मदद की अपनी छिपी हुई क्षमताओं का अहसास कर रहे हैं। मीडिया में जनसेवकों द्वारा अपने क्षेत्रों में जरूरतमंदों को भाेजन व राशन वितरित करने की अनगिनत कहानियां हैं।

नगर निगम के मालियों द्वारा मदद के लिए स्वच्छता टीम में शामिल होने की भी खबरें हैं। अपनी नियमित ड्यूटी के अलावा पुलिस व हेल्थ वर्कर लोगों की मदद के लिए आजकल अपनी भूमिकाओं से भी आगे बढ़कर काम कर रहे हैं। डॉक्टर भी जिंदगी बचाने के अलावा मृतकों का अंतिम संस्कार भी कर रहे हैं। आईएफएस, आईएएस, आईपीएस और आईआरएस जैसी सिविल सेवाओं के संगठनों ने वायरस से लड़ने के लिए ‘करुणा (सीएआरयूएनए)’ नाम से पहल की है।

सीएआरयूएनए का मतलब ‘सिविल सर्विस एसोसिएशन रीच टु सपोर्ट नेशनल डिजास्टर’ है। इस पहल के जरिये सिविल अधिकारी माइग्रेशन की जानकारी और डाटाबेस तैयार करने, जरूरी सामान की आपूर्ति और औपचारिक प्रयासों को गति देने के लिए मास्क, वेंटिलेटर व पीपीई आदि की व्यवस्था के लिए अपने नेटवर्क का इस्तेमाल करते हैं।
अनगिनत स्वयंसेवी संगठन, सिविल सोसायटी ग्रुप और अनौपचारिक समूह गरीबों, बुजुर्गों और संकट में फंसे अन्य लोगों तक पहुंच रहे हैं। लोगों को जरूरी चीजें, दवाएं, सूचनाएं और अन्य तरह की मदद उपलब्ध कराने के लिए भी लोग आगे आ रहे हैं। इस दाैर में स्टार्टअप्स ने अपने नवाचारांे को जन स्वास्थ्य के क्षेत्र में मोड़ दिश है। कोविड-19 के प्रबंधन में आईआईटी अनुसंधान के क्षेत्र में सबसे आगे है।

जीवन के हर क्षेत्र में यह बात नजर आ रही है कि हमें अपने आराम के जोन से बाहर निकलकर औरों की मदद करनी चाहिए। यहां तक कि हमारे व्यक्तिगत जीवन में बदलाव आ रहा है। हम अपने पास समय और इंटरनेट होने की वजह से अलग-अलग क्षेत्रों में कुछ नया कर रहे हैं। कुछ कुकिंग कर रहे हैं, अन्य संगीत या कोई विदेशी भाषा सीख रहे हैं। कुछ लोग लिख रहें या पढ़ने में व्यस्त हैं। कला वीथियों, या शहरों के वर्चुअल टूर, आॅनलाइन संगीत समारोह, ओपेरा या फिर साधारण हैंगआउट भी उपलब्ध हैं। जिज्ञासा और अपनी रुचि की किसी भी चीज को जानने कीे आज जगह मिल रही है। ऑनलाइन दुनिया में वह हर चीज कोर्सों से भरी पड़ी है, जिसके बारे में सोचा जा सकता है। लाॅकडाउन के इस दौर में नियमित तौर पर सीखने की ललक अपने आप उभर रही है।
महामारी के फैलने से पहले लोगों ने अलग-अलग काम किए। भाग्यशाली लोगों के पास ही नियमित नौकरी, निर्धारित भूमिका और वह दायरा है, जिसमें वे रहते और काम करते थे। कई बार काम, नौकरी या भूमिका से अधिक हमने जो प्रदर्शन किया वह हमें परिभाषित करता है। कोई एक ऑटो जायंट या एक कॉस्मेटिक बनाने वाला या एक रेलवे कैरियर या पोस्टल विभाग या एक एंटरटेनर रहा होगा। व्यक्तिगत तौर पर कोई सिविल सेवक, पुलिस, मैनेजर, आर्टिस्ट, बैंकर या कॉर्पोरेट प्रमुख या ऐसा ही कुछ हो सकता है।

इस वायरस ने इन परिभाषाओं की बाध्यताओं को पिघला दिया है। इसने हमें यह अहसास कराया है कि हम अपनी नौकरी और भूमिकाओं से बहुत अधिक हैं। आज एक व्यक्ति और समूह के तौर पर हम आइडिया, प्रक्रियाएं और पहल को तलाशने की अपनी क्षमता का विस्तार कर रहे हैं। जब हम अपनी जिंदगी के इस दौर से गुजर जाएंगे तो यह ज्ञान और क्षमता निश्चित ही हमारे साथ रहेगी। नौकरी और भूमिकाओं की जो परिभाषाएं हमें सीमा में बांधती हैं, हम उनसे कहीं अधिक हैं। प्रथम महिला की यह फोटो इसका ही प्रमाण है।
(यह लेखक के अपने विचार हैं।)



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This round of Kovid-19 is teaching people to reinvent




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राजनीति से ऊपर पीएम 

कोरोनावाइरस के द्रुत परीक्षण (रैपिडटेस्ट) उपकरण राजस्थान सरकार ने अस्वीकार कर दिए। राजस्थान के बीजेपी नेताओं ने दलील दी कि ममता बनर्जी सरकार की तरह अशोक गहलोत सरकार भी मेडिकल किट पर राजनीति करने की कोशिश कर रही है। लेकिन पीएम की प्रतिक्रिया भिन्न थी। उन्होंने स्वास्थ्य मंत्री से इन किट्स पर तथ्यात्मक रिपोर्ट पता करने को कहा। स्वास्थ्य मंत्री ने तुरंत आईसीएमआर से बात की। आईसीएमआर ने पहले 2 दिनों के लिए परीक्षणबंद कर दिया और फिर इन किट्स को लौटाने का निर्देश दे दिया।
छोटे उद्योगों पर नजर
ए. के. शर्मा गुजरात कैडर के 1988 बैच के आईएएस अधिकारी हैं। 2001 से मोदीजी के साथ हैं। पहले सीएमओ में उनके सचिव रहे और बाद में पहले दिन से पीएमओ में उनके साथ रहे हैं। लेकिन अब उन्हें एमएसएमई में सचिव बनाया गया है। 18 वर्ष से प्रधानमंत्री के सबसे प्रिय अधिकारी को एमएसएमई में भेजे जाने का अर्थ है कि प्रधानमंत्री एमएसएमई को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रहे हैं। एमएसएमई को एडीबी और वर्ल्ड बैंक के साथ-साथ बहुत सारी अन्य क्रेडिट स्कीमों से फंड मिलने वाला है, जहां बजट एक लाख करोड़ रुपए तक पहुंच सकता है। ए. के. शर्मा के लिए भी यह एक नया अनुभव होगा, और माना जा रहा है कि इससे भविष्य में शर्मा की बड़ी भूमिका का भी रास्ता खुल जाएगा।
एस. अपर्णा की वापसी
गुजरात कैडर की 1988 बैचकी एक अन्य आईएएस अधिकारी हैं एस. अपर्णा। फिलहाल वह विश्व बैंक में कार्यकारी निदेशक हैं। अब वह पीएमओ या अन्य महत्वपूर्ण मंत्रालय ज्वाइन कर सकती हैं। लेकिन वाशिंगटन डीसी से उनकी वापसी लॉकडाउन के कारण अटकी हुई है।
कला का पारखी चाहिए!
महाराष्ट्र के सीएम उद्धव ठाकरे को 28 मई के पहले-पहले माननीय बनना जरूरी है, वरना...। अब चुनाव तो हो नहीं सकते, लिहाजा सीएम चाहते हैं कि वह विधानपरिषद में मनोनीत हो जाएं। लेकिन परिषद का मनोनीत सदस्य कला थिएटर या फिल्म जैसे पेशेवर क्षेत्र से होना चाहिए। राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने फाइल रोक रखी है। गवर्नर सलाह ले रहे हैं। सरकार का कहना है कि आखिर उद्धव भी कलाकार हैं। वह मराठी नाटक में अभिनय करते थे और अपने पिता की तरह कार्टून भी बनाते हैं। लेकिन यह तभी होगा, जब गवर्नर उनकी कला को स्वीकार करें। वो कहावत है ना- कार्टून बना तब मानिये, जब हस्ताक्षर हो जाएं।
काले हाथों की धुलाई जारी
कोरोनावाइरस महामारी के भारी दबाव के बावजूद प्रधानमंत्री कार्यालय भ्रष्टाचार पर सख्ती में ढील देने के लिए जरा भी तैयारी नहीं है। कोयला वाशरी के माफियाओं पर नकेल डाली जा रही है, और जल्द ही बड़े नतीजे देखने को मिलेंगे।
वरिष्ठ कैमरा रोग विशेषज्ञ!
कोरोनावाइरस का पहला निशाना वे चिकित्सक बने हैं, जो वास्तव में इन मामलों के विशेषज्ञ हैं। वॉइरोलॉजिस्ट, इम्यूनोलाजिस्ट, महामारी रोग विशेषज्ञ और इंटेंसिविस्ट तो गुमनाम हो गए हैं, लेकिन हृदय रोग विशेषज्ञ, हृदय रोग सर्जन और अन्य विशेषज्ञ कोरोना विशेषज्ञ बन बैठे हैं। खैर, टीवी पर ही तो बैठना है।
सुन भई सीएम
एक छोटा सा राज्य। छोटी-छोटी सीटें। और वहां सत्तारूढ़ पार्टी के लगभग 42 विधायकों ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखा है कि उनके निर्वाचन क्षेत्र में काम नहीं हो रहा है। मतलब साफ है।
दामाद जी का संकट
अवधेश नारायण सिंह बिहार बीजेपी के बड़े नेता हैं। वह विधान परिषद के सभापति और पूर्व मंत्री रह चुके हैं। मई में सभापति का पद ख़ाली हो रहा है। लेकिन अवधेश नारायण सिंह दावेदार नहीं हैं। बाकी बातों के अलावा मामला यह है कि उनके दामाद विधान परिषद के स्नातक क्षेत्र से चुनाव की तैयारी कर रहे हैं। वह सीट फिलहाल जदयू के पास है। अब पार्टी बदली जा सकती है, दामाद तो नहीं बदला जा सकता है।
बाहर घूम रहा है ‘यमराज’
लॉकडाउन का उल्लंघन करेंगे, तो पुलिस क्या कर लेगी? ज्यादा से ज्यादा डंडा शस्त्र और डंडास्त्र? लेकिन दक्षिण भारत का अंदाज देखें। तमिलनाडु में पुलिस वाले एक एम्बुलेंस लेकर खड़े रहते हैं, और आवारा घूमते लोगों को उसमें बैठाने की कोशिश करते हैं। उस एम्बुलेंस में एक पुलिसकर्मी पहले से लेटा होता है, जिसके बारे में कह दिया जाता है कि वह कोरोना पीड़ित है। फिर उस एम्बुलेंस में बैठने के नाम पर बड़े-बड़े सूरमाओं की हालत खराब हो जाती है। कर्नाटक में पुलिस टीम बाकायदा ‘यमराज’ को साथ लेकर चलती है। भयंकर दाढ़ी मूंछें, ड्रेस वगैरह सब कुछ। साथ में एक यमदूत भी। जो प्रतिबंधों का पालन नहीं करता, यमराज उसे बाकायदा गिरफ्तार कर लेते हैं। संदेश यह कि प्रतिबंधों का उल्लंघन किया, तो यमराज आपके पास आया। तेलंगाना पुलिस यह पहले ही कर चुकी है।
दिग्विजय का गुगली लेखन
दिग्विजय सिंह ने सूचना प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर को पत्र लिखा। अरे भई, कुछ तो खुराफात होगी ही, तभी तो लिखा है। हां, तो लिखा कि आपने रामायण और महाभारत दिखा दी, अच्छा किया, इससे नई पीढ़ी को भारतीय संस्कृति का प्रबोधन मिलेगा, लेकिन अब नेहरू की लिखी भारत एक खोज भी दिखा दीजिए। किरपा रहेगी।
खिल गया ‘कमल’
कोरोना के मध्य, मध्य प्रदेश में बने एक मंत्री को पार्टी के एक बड़े नेता की पत्नी के साथ लंबे समय काम करने का लाभ मिल ही गया। वरना मुख्यमंत्री और उनके बीच 36 का आंकड़ा किसी से छुपा नहीं था। पिछले कार्यकाल में तो बॉस के ख़िलाफ़ उन्होंने ख़ूब चिट्ठीबाजी भी की थी। फिर उनके दिल्लीवाले आका भी सक्रिय हुए। उन्होंने ज़ोर का झटका धीरे से दिया और कमल खिल गया।



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दुनियाभर में अवसाद और घबराहट के मरीज बढ़ रहे, 12% भारतीयों को भी कोरोना के डर से नींद नहीं आती: रिपोर्ट

संतोष कौर (65) पंजाब के फगवाड़ा की रहने वाली थीं। 4 अप्रैल को उन्होंने सुसाइड कर लिया। पुलिस का कहना हैकि उनके दिमाग मेंकोरोना संक्रमित होने का डर बैठ गया था। संतोषकी बेटी बलजीत कौर ने भी बतायाकि न्यूज चैनल देख-देख कर उन्होंने दिमाग में बैठा लिया था कि मुझे भी कोरोना हो गया है।

यह महज एक मामला है। पिछले 2-3 महीनों में ऐसे कई मामले भारत और बाकी कोरोना प्रभावित देशों से आते रहे हैं। सुसाइड के मामले इतने ज्यादा तो नहीं हैं, लेकिन तनाव, घबराहट के मामले इतने आ रहे हैं कि इन्हें गिना नहीं जा सकता। कहीं कोराना संक्रमित होने के डर से लोगों में घबराहट और अवसाद बढ़ रहा हैतो कहीं लॉकडाउन के कारण लोगों की मानसिक हालत बिगड़ रही है। जिन लोगों को होम क्वारैंटाइन या क्वारैंटाइन सेंटरों में रखा गया है, वहां तो हालात और ज्यादा खराब है।

कोरोना के इस दौर में लोगों को नींद नहीं आ रही है, वे डरे हुए हैं, उदास हैं और कहीं-कहीं गुस्से में भी हैं। डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट, अलग-अलग यूनिवर्सिटी की स्टडी और मेडिकल जर्नल में यह सामने आया है कि कोरोना और लॉकडाउन के चलते लोग अवसाद में जा रहे हैं। इससे निपटने के लिए अलग-अलग तरह की सलाहें भी दी जा रही हैं। डब्ल्यूएचओ ने तो लोगों को यह तक सलाह दे दी थी कि चिंता और घबराहट बढ़ाने वाली खबरों को देखना और पढ़ना बंद कर दें।

भारत में कोरोना के 30 हजारमामले हैं। अन्य देशों के मुकाबले यहां मौतों का आंकड़ा (900) कम है। लेकिन लोगों में घबराहट बनी हुई है। एशियन जर्नल ऑफ सायकाइट्री में छपी एकस्टडी में भारतीय लोगों में डिप्रेशन की रिपोर्ट सामने आई थी। अप्रैल के पहले हफ्ते में 18 से ज्यादा उम्र के 662 लोगों पर हुई स्टडी में 12% लोगों का कहना था कि कोरोना के डर के कारण उन्हें नींद नहीं आती। 40% का कहना था कि महामारी के बारे में सोचते हैं तो दिमाग अस्थिर हो जाता है। 72% ने यह माना था कि उन्हें इस महामारी के दौर में खुद की और परिवार की बहुत ज्यादा चिंता होती है। 41% का कहना ये भी था कि जब ग्रुप में कोई बीमार होता है तो हमारी घबराहट बढ़ जाती है।

भारत में 25 मार्च से लॉकडाउन है। फिलहाल 3 मई तक यह जारी रहेगा। इसके आगे भी बढ़ने के आसार हैं। तस्वीर नई दिल्ली के जंगपुरा इलाके की है।

लॉकडाउन के पांचवे दिन (29 मार्च) स्वास्थ्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव लव अग्रवाल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि कोरोनावायरस के डर और लॉकडाउन के चलते लोगों के मानसिक और व्यवहारिक तौर-तरीकों में बदलाव की खबरें मिल रही हैं। इसे देखते हुए नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंस (निमहान्स) ने हेल्पलाइन नम्बर (08046110007) जारी किया है। अगर किसी को तनाव या घबराहट हो रही है तो इस टोलफ्री नम्बर पर कॉल कर आप डॉक्टरों से सुझाव ले सकते हैं।


वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन की 2019 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 7.5% भारतीयों को किसी न किसी तरह का मानसिक रोग है और इनमें से 70% को ही इलाज मिल पाता है। इसी रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि 2020 में भारत की 20% जनसंख्या का मानसिक स्वास्थ्य ठीक नहीं होगा। महज 4000 विशेषज्ञों के लिए यह संख्या बहुत ज्यादा होगी।

केरल में लॉकडाउन के 100 घंटे के अंदर 7 सुसाइड हुए थे। शराब न मिलने के कारण लोग सुसाइड कर रहे थे। इसके बाद राज्य सरकार ने शराब के आदी लोगों के लिए डॉक्टर से पर्ची लाकर शराब खरीदने की मंजूरी दी थी।

अमेरिका में कोरोनावायरस से 55हजार से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं। यहां एक सर्वे के मुताबिक, 45% लोगों को महसूस हो रहा है कि कोरोना के कारण उनकी मानसिक स्थिति को नुकसान हुआ है। केजर फैमिली फाउंडेशन का यह सर्वे 25 से 30 मार्च के बीच हुआ था। इसी तरह वॉशिंगटन पोस्ट और एबीसी न्यूज पोल के के सर्वे में 77% अमेरिकी महिलाओं और 61% पुरुषों ने संक्रमण के डर से तनाव और घबराहट की बात कही थी। अमेरिका ने भी ऐसे मामलों की संख्या बढ़ने पर हेल्पलाइन नम्बर के साथ-साथ बच्चों, वयस्कों और बुजुर्गों के लिए अलग-अलग एक्टिविटीज कराने की एडवाइजरी जारी की थी।

ब्रिटेन कोरोना से हुई मौतों के मामले में 5वेंनम्बर पर है। यहां भी लोगों में डिप्रेशन है लेकिन यह थोड़ा चौंकाने वाला है। यूनिवर्सिटी ऑफ शेफिल्ड और अल्सटर यूनिवर्सिटी की स्टडी के मुताबिक, लॉकडाउन के बाद यहां अचानक डिप्रेशन बढ़ा है। लॉकडाउन के दूसरे दिन 38% लोगों में डिप्रेशन और 36% लोगों में घबराहट की बात सामने आई थी। लॉकडाउन के ऐलान के एक दिन पहले तक ऐसे लोगों का प्रतिशत 16 और 17 था।

अमेरिका के लुईसविले शहर के एंट्री पॉइंट पर पॉजिटिव मैसेज देता पोस्टर लगा हुआ है। घबराहट को दूर करने के लिए इस तरह के पोस्टर कई अमेरिकी शहरों में दिखाई दे रहे हैं।

ब्रिटेन में 23 मार्च से लॉकडाउन है। 2 हजार लोगों पर यह स्टडी हुई थी। इस स्टडी में यह भी पाया गया था कि 35 से कम उम्र के लोगों में अवसाद और घबराहट सबसे ज्यादा था। ये वे लोग थे जिनकी इनकम बहुत कम थी या लॉकडाउन के बाद उनके पास पैसा आना पूरी तरह से बंद हो गया था। ब्रिटेन सरकार ने भी महामारी और लॉकडाउन के कारण मानसिक हालत को हो रहे नुकसान से बचाने के लिए मार्च के आखिरी हफ्ते में ऑनलाइन सपोर्ट और प्रैक्टिकल गाइड लाइन जारी की थी।

चीन के वुहान से कोरोना दुनियाभर में फैल चुका है। ज्यादातर देशों की सरकारों ने इसके लिए लॉकडाउन को ही सबसे बड़ा उपाय माना है। कहीं सख्त लॉकडाउन है तो कहीं बहुत सारी छूट के साथ यह लागू है। एक अनुमान के मुताबिक, दुनिया की एक तिहाई जनसंख्या इन दिनों घरों में कैद है। इन्हें अपनी नौकरी जाने का डर है, खुद और परिवार के लोगों को कोरोना होने का डर है, किसी ने अपनो को खोया है, कोई क्वारैंटाइन में रहकर मानसिक रोगों का शिकार हो रहा है। अलग-अलग देशों की सरकारें लोगों में देखे जा रहे इस मानसिक अवसाद को दूर करने के लिए अपने-अपने स्तर पर कोशिशें कर रही हैं। इस क्रम में सबसे अच्छी कोशिश चीन में ही देखी गई थी। यहां सरकार ने सेल्फ क्वारैंटाइन के पहले फेज में ही वुहान शहर में सॉयकोलॉजिस्ट और सायकायट्रिस्ट की टीम को पहुंचा दिया था।

यूरोपीय देश और अमेरिकी हॉस्पिटल्स में मरीजों और उनके परिवारों को अवसाद से निकालने के लिए गाना-बजाना होता रहता है।

पहले की महामारियों के दौरान भी कई स्टडियों में अवसाद और घबराहट को देखा गया था। दुनिया के सबसे पुराने मेडिकल जर्नल “द लॉसेंट” 26 फरवरी को क्वारैंटाइन के सॉयकोलॉजिकल प्रभाव पर एक पेपर पब्लिश हुआ था। इसमें पुरानी महमारियों के रिसर्च पेपरोंं का रिव्यू कर बताया गया था कि अपने किसी खास साथी को खो देना, अपने अधिकारों का सीमित हो जाना, रोग की स्थिति और अनिश्चितिता और जिंदगी में आई उदासी के कारण लोगों में अवसाद, घबराहट और गुस्से के लक्षण आने लगते हैं। कई बार यह सुसाइड का कारण बन जाता है। पिछली महामारियों के दौरान लोगों ने इस तरह के क्वारैंटाइन पर केस भी फाइल किए थे।”



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अमेरिका के फाल्स चर्च शहर का इनोवा फेयर फैक्स हॉस्पिटल। नर्स कोरोनावायरस के कारण आइसोलेशन में रह रहीं एक मरीज के साथ कांच के ग्लास पर मार्कर के जरिए टिक-टेक-टौ खेल रही हैं। क्वारैंटाइन पीरियड में लोगों का अवसाद दूर करने के लिए इस तरह के उपाय कई देशों में अपनाए जा रहे हैं।




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हर दिन प्याज के 1000 ट्रक नीलाम होते थे, कई देशों में प्याज का एक्सपोर्ट होता था, इन दिनों सब थम गया; अब व्यापारियों को बांग्लादेश बॉर्डर खुलने का इंतजार

महाराष्ट्र के नासिक में एशिया की सबसे बड़ी प्याज मंडी है...लासलगांव प्याज मंडी। देश में प्याज के दाम क्या रहने वाले हैं, ये यहीं से तय होता है। आम दिनों में इस मंडी में एक हजार से ज्यादा प्याज के ट्रकों की नीलामी होती है, लेकिन इस बार यह आंकड़ा तकरीबन 500-700 से ऊपर नहीं जा रहा।

सरकार की ओर से प्याज को बाहर भेजने पर तो कोई रोक नहीं है लेकिन न किसानों को मजदूर मिल रहे हैं और न ही मंडियों के व्यापारियों को। लॉकडाउन लगतेही दूसरे राज्यों के मजदूर अपने-अपने घर निकल गए थे। यहां ज्यादातर मजदूर यूपी-बिहार और पश्चिम बंगाल से होते हैं। अब हालत यह है कि आम दिनों में मंडी में जहां रोज 20-25 करोड़ और महीने में तकरीबन 750 करोड़ का व्यापार होता है, वहअब 25% तक घट गया है।

मंडी की कृषि उत्पन्न बाजार समिती की अध्यक्ष सुवर्णा जगताप बताती हैं कि व्यापारियों और मजदूरों में कोरोना का डर भी है, इसलिए भी कम ही लोग मंडी आ रहे हैं। हम यहां आने वाले किसानों की स्क्रीनिंग और चेकअप लगातार कर रहे हैं, मंडी को भी हर दिन सैनिटाइज किया जा रहा है ताकि लोगों का डर खत्म किया जा सके। वे यह भी कहती हैं कि किसान और व्यापारियों को नुकसान तो हो रहा है, लेकिन एक अच्छी खबर यह है कि प्याज को बाहर भेजने के लिए सरकार बांग्लादेश बॉर्डर खोल रही है। इससे एक्सपोर्ट बढ़ने की उम्मीद है।

देश में सबसे ज्यादा प्याज महाराष्ट्र में ही पैदा होता है। देश का कुल 37% प्याज यहीं से आता है। साल 2019-20 में राज्य में 90 लाख टन प्याज का उत्पादन हुआ। पिछले साल राज्य से 2655 करोड़ का 14.91 लाख टन प्याज बाहर निर्यात किया गया था।

इस बार लॉकडाउन के चलते एक्सपोर्ट बंद है, ऐसे में एक्सपोर्ट कंपनियां भी किसानों से प्याज नहीं ले रही
पुणे से सटे बारामती में स्थित 'ईवॉल एग्रो फार्मर प्रडूसर कंपनी लिमिटेड' एक बड़ी प्याज एक्सपोर्ट कंपनी है। इसके डायरेक्टर महेश प्रताप लोंढे ने बताया कि उनकी कंपनी का सालाना 500 टन का एक्सपोर्ट बिजनेस है। लेकिन पिछले दो महीने से हुए लॉकडाउन ने उनके बिजनेस को पूरी तरह से ठप कर दिया है। महेश की कंपनी गल्फ देश, इंडोनेशिया और बांग्लादेश समेत 10 देशों में प्याज का एक्सपोर्ट करती है।

महेश बताते हैं, “ट्रांसपोर्ट बंद होने के कारण किसान अपना माल हम तक नहीं पहुंचा सकते, जो कुछ थोड़ा आ भी रहा है, उसे हम बाहर नहीं भेज पा रहे। हमें बाहरी देशों से डिमांड तो है लेकिन लॉकडाउन की वजह से न कंटेनर मिल रहे। न ही इन्हें लोड करने के लिए मजदूर। प्याज को पैक करने के लिए प्लास्टिक मैटेरियल भी नहीं मिल रहा है।" महेश कहते हैं किहम किसानों से प्याज खरीद सकते हैं लेकिन हम उनका करेंगे क्या? जब एक्सपोर्ट ही बंद है तो हम उसे कहां स्टोर करेंगे। इसलिए फिलहाल हमने किसानों से प्याज लेना बंद कर दिया है।

किसान अब खुले बाजार में 10 रुपए किलों के दाम से प्याज बेच रहे
किसान विक्रम कुन्डाल बताते हैं, "फरवरी में हमारे यहां 50 टन प्याज हुआ। हमसे खरीदकर व्यापारी इन्हें एक्सपोर्ट कर देते हैं। अब एक्सपोर्ट बंद हैं तो हम इसे खुले बाजार में 10 रुपए किलो के हिसाब से बेच रहे हैं। पिछले साल मार्च 4 लाख रुपए के प्याज बेचे थे, इस बार यह 1 लाख केभी नहीं बिके।

विक्रम कहते हैं कि प्याज एक कच्ची फसल है, इसे स्टोर करके भी नहीं रखा जा सकता। अगर लॉक डाउन आगे ऐसे ही जारी रहा तो हमारी स्थिति और बिगड़ सकती है।

उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के मुताबिक, 3 फरवरी 2020 को खुदरा बाजार में प्याज औसतन 46.64 रुपए प्रति किलोग्राम के दाम से बिक रहा था। एक महीने बाद यह 32.52 रुपए हो गया।



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देश में 2018-19 के रबी सीजन में 158.28 लाख टन प्याज का उत्पादन हुआ था। इस साल 20 फीसदी ज्यादा प्याज होने की उम्मीद है। लेकिन ट्रांसपोर्ट और एक्सपोर्ट बंद होने के कारण किसानों को अच्छे दाम मिलने में मुश्किल आ रही है।




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भारत और न्यूजीलैंड में एक ही दिन लॉकडाउन लगा, लेकिन वहां कोरोना खत्म होने पर; 15 दिनों से वहां रोज 20 से भी कम मरीज आ रहे

भारत और न्यूजीलैंड दो देश। दोनों के बीच करीब 12 हजार किमी की दूरी। दोनों की आबादी में भी जमीन-आसमान का अंतर। एक तरफ भारत की आबादी 135 करोड़। दूसरी तरफ न्यूजीलैंड की आबादी करीब 50 लाख।भारत और न्यूजीलैंड दोनों ही देशों में कोरोना को फैलने से रोकने के लिए एक ही दिन लॉकडाउन लगाया गया। भारत में 25 मार्च से ही लॉकडाउन लागू है, तो वहीं न्यूजीलैंड में भी इसी दिन दोपहर 12 बजे से।


दोनों ही देशों में लॉकडाउन लगे एक महीने हो चुके हैं। इस एक महीने में एक तरफ न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री जेसिंडा आर्डर्न ने दो दिन पहले कहा था किउनका देश कोरोनावायरस से लड़ाई जीत गया है। उनका कहना था कि हम इकोनॉमी खोल रहे हैं, लेकिन लोगों की सोशल लाइफ नहीं।दूसरी तरफ, भारत में 3 मई के बाद भी हॉटस्पॉट वाले इलाकों में लॉकडाउन बढ़ाने की तैयारी हो रही है। अभी देश में 170 से ज्यादा इलाके हॉटस्पॉट हैं।

हालांकि, कोरोना से लड़ने में न्यूजीलैंड को अपनी कम आबादी और ज्योग्राफी का भी फायदा मिला। पिछले 15 दिन से वहां रोज 20 से कम ही मरीज आ रहे हैं। 28 अप्रैल तक वहां 1472 केस आ चुके हैं, जिसमें से अब सिर्फ 239 केस ही एक्टिव हैं,जबकि19 लोगों की मौत हुई है। जबकि, भारत में कोरोना संक्रमितों का आंकड़ा 31 हजार के पार पहुंच गया है। यहां अब तक 1 हजार से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है।

फरवरी में ही चीन से आने वाले यात्रियों की एंट्री पर रोक
न्यूजीलैंड में कोरोना का पहला मरीज 28 फरवरी को मिला था। लेकिन, उससे पहले से ही सरकार ने इससे निपटने की तैयारियां शुरू कर दीं।3 फरवरी से ही सरकार ने चीन से न्यूजीलैंड आने वाले यात्रियों की एंट्री पर रोक लगा दी थी। हालांकि, इससे न्यूजीलैंड के नागरिकों और यहां के परमानेंट रेसिडेंट को छूट थी। इसके अलावा, जो लोग चीन से निकलने के बाद किसी दूसरे देश में 14 दिन बिताकर आए, उन्हें ही न्यूजीलैंड में आने की इजाजत थी।


इसके बाद 5 फरवरी को ही न्यूजीलैंड ने चीन के वुहान में फंसे अपने यात्रियों को चार्टर्ड फ्लाइट से देश लेकर आ गई। इनमें 35 ऑस्ट्रेलियाई नागरिक भी थे। इन सभी लोगों को आर्मी के बनाए क्वारैंटाइन सेंटर में 14 दिन रखा गया।इसके अलावा, न्यूजीलैंड में 20 मार्च से ही विदेशी नागरिकों की एंट्री पर रोक लगा दी थी, जबकिभारत में 25 मार्च से अंतरराष्ट्रीय उड़ानें बंद हुईं।

ये तस्वीर न्यूजीलैंड के ऑकलैंड शहर की है। सोमवार से ही यहां पर लॉकडाउन में थोड़ी ढील देकर लेवल-3 लागू किया गया है।

4-लेवल अलर्ट सिस्टम बनाया, बहुत पहले ही लॉकडाउन लगाया
23 मार्च को न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री जेसिंडा आर्डर्न ने देश को संबोधित किया। उन्होंने कहा, ‘हमारे देश में अभी कोरोना के 102 मामले हैं। लेकिन, इतने ही मामले कभी इटली में भी थे।' ये कहने का मकसद एक ही था कि अभी नहीं संभले तो बहुत देर हो जाएगी।’वहां की सरकार ने कोरोना से निपटने के लिए 4-लेवल अलर्ट सिस्टम बनाया। इसमें जितना ज्यादा लेवल, उतनी ज्यादा सख्ती, उतना ज्यादा खतरा।


21 मार्च को जब सरकार ने इस अलर्ट सिस्टम को इंट्रोड्यूस किया, तब वहां लेवल-2 रखा गया था। उसके बाद 23 मार्च की शाम को लेवल-3 और 25 मार्च की दोपहर को लेवल-4 यानी लॉकडाउन लगाया गया। सोमवार से वहां लेवल-4 से लेवल-3 लागू कर दिया गया है। 25 मार्च से लेकर अभी तक दोनों ही देशों में लॉकडाउन है। न्यूजीलैंड में जब लॉकडाउन लगा तब वहां कोरोना के 205 मरीज थे और भारत में जब लॉकडाउन लगा, तब यहां 571 मरीज थे।

कोरोना पॉजिटिव मरीजों की कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग की
न्यूजीलैंड में अगर कोई व्यक्ति कोरोना पॉजिटिव मिलता, तो वहां की सरकार 48 घंटे के अंदर उसकी कॉन्टेक्ट ट्रेसिंग भी करती है। यानी, किसी व्यक्ति के कोरोना पॉजिटिव मिलने पर उसके सभी करीबी रिश्तेदारों-दोस्तों को कॉल किया जाता था और उन्हें अलर्ट किया जाता था।ऐसा इसलिए ताकि लोग खुद ही टेस्ट करवा लें या सेल्फ-क्वारैंटाइन में चले जाएं।

ये तस्वीर न्यूजीलैंड के क्राइस्टचर्च शहर की है। यहां महीनेभर बाद मंगलवार को फिर कंस्ट्रक्शन साइट पर मजदूर दिखाई दिए।

लॉकडाउन तोड़ने वालों पर सख्ती, तुरंत एक्शन
25 मार्च को लॉकडाउन लागू होने के बाद भी कुछ लोग घरों से बाहर निकल रहे थे। इनमें ज्यादातर यंगस्टर्स थे। इस पर प्रधानमंत्री जेसिंडा आर्डन ने समझाइश दी कि देश में कोरोना के ज्यादातर मामले 20 से 29 साल के लोगों में आ रहे हैं। अगर आप घर से बाहर निकलेंगे तो आपको कोरोना होने के चांस ज्यादा हैं।

31 मार्च कोरेमंड गैरी कूम्ब्स नाम का व्यक्ति लोगों पर थूक रहा था। उसने इसका वीडियो बनाकर फेसबुक पर शेयर भी किया। उसके बाद 4 अप्रैल को भी वह ऐसा ही कर रहा था। अगले ही दिन पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया। और उसके अगले दिन कोर्ट ने उसे जेल भेज दिया। हालांकि, बाद में उसे जमानत मिल गई। कूम्ब्स की सजा पर 19 मई को फैसला होना है।


न्यूजीलैंड पुलिस के मुताबिक, 28 अप्रैल तक 5 हजार 857 लोगों ने लॉकडाउन के नियमों का उल्लंघन किया। इनमें से 629 लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया गया। जबकि, 5 हजार 41 लोगों को वॉर्निंग देकर छोड़ दिया गया।



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Coronavirus India Lockdown Vs New Zealand Comparison Update, COVID-19 News; Total Corona Cases and Death From Virus Pandemic




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वादियों में 15 फिल्में शूट करने वाले ऋषि कहते थे- हमारे खानदान का कश्मीर की मिट्‌टी से रिश्ता है, हमेशा इसका कर्जदार रहूंगा

ये गुलमर्ग, यही कश्मीर है, वह जगह जिसने मुझे बनाया, जो कुछ भी मैं आज हूं। हमारे खानदान का कश्मीर की मिट्‌टी से रिश्ता है। मैं ताउम्र कश्मीर से प्यार करता रहूंगा और इसका कर्जदार भी रहूंगा। 2011 में 23 साल बाद जब ऋषि कश्मीर गए तो उन्होंने यही बात कही थी।


ऋषि का कहना था, ‘‘मैंने फैसला किया है कश्मीर की उन सब जगहों पर जाने का जहां मेरे पिता ने मेरी पहली फिल्म की शूटिंग की थी। यूं तो मैं नॉस्टैल्जिक ट्रिप से नफरत करता हूं, क्योंकि पीछे देखने का वक्त कहां मिलता है? लेकिन ये यात्रा खास है।’'


ऋषि कपूर की मौत की खबर आई तो सोशल मीडिया जिस बात से पट गया वह ये थी कि लोगों के बचपन की पहली फिल्म बॉबी है और ऋषि कपूर रोमांस का पहला एहसास दिलाने वाले हीरो। इनमें 1970-80 के दशक में पैदा हुए लोग ज्यादा थे। ऐसा कहने वालों में जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला भी शामिल हैं।

ऋषि को याद करते समय बॉबी सबसे पहले याद आती है। उनकी इस पहली फिल्म की शूटिंग कश्मीर में हुई थी। पिता राज कपूर उसके डायरेक्टर थे। इस फिल्म के नाम पर गुलमर्ग और पहलगाम में एक-एक हट आज भी हैं। उनकी यह फिल्म कश्मीर के इकलौते सिनेमाहॉल पैलेडियम में कई हफ्ते चली थी।

ये उसी हट की तस्वीर हैं जहां हम तुम एक कमरे में बंद गाने की शूटिंग हुई थी। अब ये हट बॉबी हट के नाम से मशहूर है।

कपूर खानदान का कश्मीर कनेक्शन खास है। ऋषि अपने दादापृथ्वीराज कपूर और पिताराज कपूर की परंपराओं को भाइयों और बेटे-भतीजियों के बीच बखूबी ले जाने की एक कड़ी थे। 1972 से 1988 के बीच ऋषि ने कश्मीर में 15 फिल्मों की शूटिंग की।


पृथ्वीराज कपूर 1940 में अपने थियेटर ग्रुप के साथ दो महीने के लिए कश्मीर गए थे। राजकपूर पहले फिल्ममेकर थे जिन्होंने कश्मीर में फिल्मों की शूटिंग शुरू की। बरसात फिल्म की शूटिंग के वक्त पैसों की कमी थी और पूरे क्रू को ले जाना मुमकिन नहीं था, इसलिए वे सिर्फ कैमरामेन जालमिस्त्री के साथ अकेले चले गए थे। शम्मी कपूर और शशि कपूर का कश्मीर कनेक्शन सब जानते हैं। रणबीर कपूर की फिल्म रॉकस्टार की शूटिंग भी कश्मीर में हुई है।


लार्जर देन लाइफ फिल्में और फिर फिल्मी परदे के बाहर हर मसले पर राय रखने वाले बॉलीवुड के ये बेबाक कपूर हर खांचे में अपनी छाप छोड़ते थे। कश्मीर मसले पर नवंबर 2017 में उन्होंने फारूकअब्दुल्ला को जवाब देते हुए एक ट्वीट किया था, जिस पर काफी विवाद भी हुआ। वह ट्वीट था -फारूकअब्दुल्ला जी, सलाम, मैं आपसे सहमत हूं, सर। जम्मू-कश्मीर हमारा है और पीओके उनका। इसी तरीके से हम अपनी समस्या सुलझा सकते हैं। स्वीकार करें। मैं 65 साल का हूं और मरने से पहले पाकिस्तान देखना चाहता हूं। मैं चाहता हूं मेरे बच्चे अपनी जड़ें देखें। बस करवा दीजिए, जय माता दी।

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चांदनी फिल्म की शूटिंग भी कश्मीर में हुई थी।




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ऋषि 1990 में पाकिस्तान में पेशावर वाले पुश्तैनी घर आए थे, लौटते वक्त आंगन की मिट्‌टी साथ ले गए, ताकि विरासत याद रख सकें

लगातार दूसरा दिन है जब किसी बॉलीवुड सितारे की मौत हुई है। सिसकियां सरहद के इस ओर से भी सुनाई दी हैं। एक दिन पहले इरफान खान और आज ऋषि कपूर की मौत का गम पाकिस्तान में भी है।

जहां एक ओर दिलों पर राज करने वाले ऋषि कपूर की इबारत भारतीय सिनेमा में हमेशा के लिए जिंदा रहेगी, वहीं उनके खानदान की विरासत सरहद के इस पार पाकिस्तान में भी खड़ी है। पाकिस्तान में ऋषि कपूर को उनकी अदाकारी के अलावा खैबर पख्तून की राजधानी पेशावर में मौजूद उनके खानदान की जड़ों के लिए भी पहचाना जाता है।

भारतीय सिनेमा के कपूर खानदान की यह मशहूर कपूर हवेली पेशावर के रिहायशी इलाके में हैं।यह कपूर परिवार की कई पुश्तों का घर रहा है। बंटवारे से पहले बनी यह हवेली पृथ्वीराज कपूर के पिता और ऋषि कपूर के परदादा दीवान बशेश्वरनाथ कपूर ने 1918-1922 के बीच बनवाई थी। पृथ्वीराज कपूर फिल्म इंडस्ट्री में एंट्री लेनेवाले कपूर खानदान के पहले व्यक्ति थे। इसी हवेली में पृथ्वीराज कपूर के छोटे भाई त्रिलोकी कपूर और बेटे राजकपूर का जन्म हुआ था।

हवेली के बाहर लगी लकड़ी की प्लेट के मुताबिक, बिल्डिंग का बनना 1918 में शुरू हुआ और 1921 में यह तैयार हो गई। इस हवेली में 40 कमरे हैं और हवेली के बाहरी हिस्से में खूबसूरत मोतिफ उकेरे हुए हैं। आलीशान झरोखे इस हवेली के ठाठ की गवाही देतेहैं।

यह फिल्म हिना का सीन है जो भारत और पाकिस्तान के बीच नायक-नायिकाओं की एक प्रेम कहानी है। इसकी शूटिंग पाकिस्तान में भी हुई थी।

1947 में बंटवारे के बाद कपूर खानदान के लोग बाकी हिंदुओं की तरह शहर और हवेली छोड़कर चले गए। 1968 में एक ज्वैलर हाजी कुशल रसूल ने इसे खरीद लिया और फिर पेशावर के ही एक दूसरे व्यक्ति को बेच दिया।

फिलहाल हवेली के मालिक हाजी इसरार शाह हैं। वह कहते हैं कि उनके पिता ने 80 के दशक में यह हवेली खरीदी थी। उस इलाके में रहनेवालों के मुताबिक, इस जगह का इस्तेमाल बस शादी ब्याह जैसे जश्न में किया जाता है। पेशावर में ही रहनेवाले वहां पुराने मेयर अब्दुल हाकिम सफी बताते हैं कि ये हवेली पिछले दो दशकों से खाली पड़ी है और इसके मालिक भी कभी कबार हीयहां आते हैं।

राजकपूर के छोटे भाई शशि कपूर और बेटे रणधीर-ऋषिको 1990 में पाकिस्तान के पेशावर वाले अपने पुश्तैनी घर जाने का मौका मिला था। लौटते वक्त वह आंगन की मिट्‌टी साथ ले गए थे, ताकि अपनी विरासत को याद रख सकें।

ऋषि कपूर ने अपनी इस यात्रा का जिक्र एक इंटरव्यू में भी किया था। वह 1990 में फिल्म हिना की शूटिंग के लिए लाहौर, कराची और पेशावर गए थे। इसके डायलॉग राजकपूर के कहने पर पाकिस्तानी लेखक हसीना मोइन ने लिखे थे।

हवेली के पुराने मालिकों ने इस धरोहर की ऊपरी तीन मंजिलों को कई साल पहले गिरा दिया। भूकंप से उनकी दीवारों में दरारें पड़ गईं थीं। अब यह हवेली आसपास से दुकानों से घिरी हुई है, जो इसकी दीवारों पर बोझ बन इसके लिए खतरा पैदा कर रही हैं।

हाल ही में ऋषि कपूर ने पाकिस्तान की सरकार से इसे बचाने के लिएमदद मांगी थी। विदेशमंत्री शाह महमूद कुरैशी कहते हैं, ऋषि कपूर ने मुझे फोन किया था। वह चाहते थे कि उनके पारिवारिक घर को म्यूजियम या इंस्टीट्यूट बना दिया जाए। हमने उनका आग्रह मान लिया है।

पाकिस्तान सरकार पेशावर किस्सा ख्वानी बाजार के इसघर को अब म्यूजियम बनाने जा रही है। इसमें आईएमजीसी ग्लोबल एंटरटेंमेंट और खैबर पख्तून की सरकार भी मदद कर रही है। यहपाकिस्तान में बॉलीवुड की सबसे मजबूत धरोहर है।कई विदेशी पर्यटक और स्थानीय लोग इसे देखने आतेहैं।

एक किस्सा यह भी..

रावलपिंडी में रहनेवाले सिनेमा एक्सपर्ट आतिफ खालिद कहते हैं, कपूर पेशावर के जानेमाने पठान थे। वे पृथ्वीराज कपूर का जिक्र करते हुए कहते हैं कि जब सब इंस्पेक्टर बशेश्वरनाथ का बेटा (पृथ्वीराज) पेशावर से बांबे फिल्मों में काम करने गया तो भारत में तब की सबसे बड़ी फिल्म मैगजीन के एडिटर बाबूराव ने लिखा था - जो पठान ये सोचते हैं कि वह एक्टर बन जाएंगे तो उनकी यहां कोई जगह नहीं है। लेकिन कपूर खानदान ने वहां जो नाम कमाया, वैसा और किसी के हिस्से नहीं आया।

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यह पुश्तैनी हवेली पेशावर में है जहां ऋषि कपूर के दादा पृथ्वीराज कपूर और पिता राज कपूर का जन्म हआ था।




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भारत में हर 10 कैंसर मरीजों में से 7 की मौत हो जाती है, यहां एक डॉक्टर पर 2000 मरीजों का बोझ होता है

पिछले दो दिनों में बॉलीवुड ने अपने दो बेहतरीन कलाकार खो दिए। दोनों को वह बीमारी थी, जो दुनिया की हर छठीमौत का कारण बनती है।ऋषि कपूर को ब्लड कैंसर था और इरफान खान को ब्रेन कैंसर। दोनों का इलाज देश में भी चला और विदेश में भी, लेकिन इलाज के 2 साल के अंदर ही दोनों की मौत हो गई।

हर साल देश और दुनिया में कैंसर से लाखों मौत होती हैं। डबल्यूएचओ के एक अनुमान के मुताबिक, 2018 में कैंसर से कुल 96 लाख मौतें हुईं थीं। इनमें से 70% मौतें गरीब देश या भारत जैसे मिडिल इंकम देशों में हुईं। इसी रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में कैंसर से 7.84 लाख मौतें हुईं। यानी कैंसर से हुईं कुल मौतों की 8% मौतें अकेले भारत में हुईं।


जर्नल ऑफ ग्लोबल ऑन्कोलॉजी में 2017 पब्लिश हुईएक स्टडी के मुताबिक, भारत में कैंसर से मरने वालों की दर विकसित देशों से लगभग दोगुनी है। इसके मुताबिक भारत में हर 10 कैंसर मरीजों में से 7 की मौत हो जाती है जबकि विकसित देशों में यह संख्या 3 या 4 है। रिपोर्ट में इसका कारण कैंसर का इलाज करने वाले डॉक्टरों की कमी बताया गया था। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 2000 कैंसर मरीजों पर महज एक डॉक्टर है। अमेरिका में कैंसर मरीजों और डॉक्टरों का यही रेशियो 100:1 है, यानी भारत से 20 गुना बेहतर।


कम डॉक्टर होने के बावजूद भारत में कैंसर के कई बड़े अस्पताल हैं, जहां स्पेशलिस्ट और सुविधाएं बेहतर हैं। खाड़ी देशों समेत कई अफ्रीकी देशों के मरीज भी यहां इलाज के लिए आते हैं। इसका एक बड़ा कारण यह है कि विकसित देशों के मुकाबले में भारत में कैंसर का बेहद सस्ता इलाज होता है। लेकिन इसके बावजूद भारत से कई लोग विदेशों में कैंसर का इलाज करवाना पसंद करते हैं।


ऋषि कपूर अपने इलाज के लिए न्यूयॉर्क गए थे। इसी तरह इरफान खान का इलाज लंदन में चला था। बॉलीवुड में यह फेहरिस्त लंबी है। इसमें सोनाली बेंद्रे और मनीषा कोइराला और क्रिकेटर युवराज सिंह जैसे सितारे भी शामिल हैं, जिनका इलाज अमेरिका के ही कैंसर अस्पतालों में हुआ।


एक्सपर्ट मानते हैं कि कैंसर के इलाज में भारत कहीं भी विकसित देशों से पीछे नहीं हैं लेकिन जब लोगों के पास पैसा होता है तो वे और बेहतर के विकल्प खोजते रहते हैं। हां यह जरूर है कि भारत में सभी मरीजों को सही इलाज नहीं मिल पाता इसलिए विकसित देशों के मुकाबले डेथ रेशियो ज्यादा है, लेकिन जिन्हें भी सही इलाज मिल जाता है, तो ठीक होने की संभावना विकसित देशों के ही बराबर ही होती है।

भारत: साल 2018 में महिलाओं के मुकाबले पुरुषों में कैंसर के मामले कम रहे, लेकिन मौतें ज्यादा हुईं
डब्लूएचओ की ही रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में साल 2018 में महिलाओं में कैंसर के 5.87 लाख मामले आए थे जबकि पुरुषों में यह संख्या 5.70 लाख थी। हालांकि कैंसर से हुईं मौतों के मामले में पुरुषों की संख्या महिलाओं से 42 हजार ज्यादा थी। 2018 में कैंसर से 4.13 लाख पुरुषों की मौत हुई जबकि महिलाओं की संख्या 3.71 लाख थी। पुरुषों में जहां सबसे ज्यादा मामले मुंह और फेफड़ों के कैंसर के आए, वहीं महिलाओं में सबसे ज्यादा मामले ब्रेस्ट और गर्भाशय के कैंसर के रहे।

पुरुषों में

कैंसर

नए मामले

महिलाओं में

कैंसर

नए मामले

मुंह

92 हजार

ब्रेस्ट

1.62 लाख

फेफड़े

49 हजार

गर्भाशय

97 हजार

अमाशय

39 हजार

अंडाशय

36 हजार

मलाशय

36 हजार

मुंह

28 हजार

आहारनली

34 हजार

मलाशय

20 हजार

सोर्स: ग्लोबल कैंसर ऑब्जर्वेटरी, डब्लूएचओ (आंकड़े-2018)

-भारत में साल 2018 में ब्रेस्ट कैंसर से 87 हजार महिलाओं की मौत हुई यानी हर दिन 239 मौत। इसी तरह गर्भाशय के कैंसर से हर दिन 164 और अंडाशय के कैंसर से हर दिन 99 मौतें हुईं।


दुनिया : 18% मौतें फेफड़ों के कैंसर से
साल 2018 में कैंसर के कुल 1.81 करोड़ मामले आए। इसमें पुरुषों के 94 लाख और महिलाओं के 86 लाख मामले थे। मौतें भी पुरुषों में ज्यादा देखी गई। 53.85 लाख पुरुषों की कैंसर से मौत हुई, वहीं महिलाओं की संख्या 41.69 लाख रही। पुरुषों में सबसे ज्यादा मामले फेफेड़ों, प्रोस्टेट और मलाशय कैंसरके आए। वहीं महिलाओं में ब्रेस्ट, मलाशय और फेफड़ों के कैंसर के ज्यादा केस थे।

कैंसर

मामले मौतें

फेफड़े

20.93 लाख

17.61 लाख

ब्रेस्ट

20.88 लाख

6.26 लाख

प्रोस्टेट

12.76 लाख

3.59 लाख

आंत

10.96 लाख

5.51 लाख

अमाशय

10.33 लाख

7.82 लाख

सोर्स: ग्लोबल कैंसर ऑब्जर्वेटरी, डब्लूएचओ (आंकड़े-2018)

- दुनियाभर में साल 2018 में कैंसर की22% मौतों का कारण महज तंबाकू था। गरीब और मिडिल इनकम देशों में कैंसर के25% मामले हैपेटाइटिस और एचपीवी जैसे वायरस इंफेक्शन के कारण हुए।



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In India, 7 out of every 10 cancer patients die, here a doctor carries a burden of 2000 patients.




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एक प्रदेश के दो इलाके, जम्मू में जीरो जबकि श्रीनगर में 106 पॉजिटिव केस, कश्मीर में बाहर से आनेवालों ने छिपाई ट्रेवल हिस्ट्री, स्क्रीनिंग से भी भागे

कोरोना के खिलाफ 54 दिन की लंबी और कठिन लड़ाई जम्मू ने जीत ली है। जम्मू जिले में कोरोना का अब एक भी केस नहीं है। 15 अप्रैल से ही जम्मू में कोरोना का कोई नया मरीज नहीं मिला है। यही नहीं जितने मरीज पॉजिटिव टेस्ट हुए थे, वह भी ठीक होकर अपने घर लौट गए हैं।


जम्मू और कश्मीर के बीच यूं तो बस एक जवाहर टनल का फासला है, लेकिन जम्मू से 250 किमी दूर कश्मीर में कोरोना अब भी चुनौती बना हुआ है। जम्मू और कश्मीर में कुल 666 केस अब तक मिले हैं, जिनमें से 606 कश्मीर डिविजन में और 60 जम्मू डिविजन में।

पॉजिटिव केस मिले 666
जम्मू डिविजन 60
कश्मीर डिविजन 606
मरीज ठीक हुए 254

कश्मीर डिविजन में 396 एक्टिव केस हैं जबकि जम्मू में एक्टिव केस सिर्फ 8 हैं। इनमें से 2 केस उधमपुर, 2 सांबा और एक-एक राजौरी, रियासी, रामबन और कठुआ में एक्टिव है।


जम्मू जिले में एक भी केस नहीं है, जबकि श्रीनगर जिले में 106 केस हैं।


कश्मीर में सबसे ज्यादा बांदीपोरा जिले में हैं जहां 128 केस मिले हैं, जबकि एक्टिव 91 हैं। इसी जिले में जिस मरीज की सबसे पहली मौत हुई थी, उसके कॉन्टैक्ट में आए 40 से ज्यादा लोगों को संक्रमण हुआ था।

जम्मू में रेड जोन में आनेवाले इलाकों में टेस्टिंग के बावजूद 15 अप्रैल के बाद से कोई केस नहीं मिला है। वहीं कश्मीर घाटी में गुरुवार को 33, शुक्रवार को 25 और शनिवार को 25 नए केस मिले थे।


30 अप्रैल को जम्मू में इलाज ले रहे 4 केस मुस्कुराते हुए अस्पताल से घर लौटे और डॉक्टर्स-मेडिकल स्टाफ ने तालियां बजाकर उनका हौसला बढ़ाया।

हालांकि जम्मू को कोविड फ्री घोषित करने से पहले डिप्टी कमिश्नर जम्मू ने अपने ट्विटर हैंडल पर लिखा कि, जिले के सभी 26 केस ठीक होकर घर जा चुके हैं, लेकिन अभी एहतियात बरतनी होगी।

जम्मू कश्मीर सरकार के प्रवक्ता रोहित कंसल के मुताबिक, उनकी कोशिशें सफल हो रही हैं और लॉकडाउन फायदेमंद रहा है। रोहित कंसल के मुताबिक वह हर दिन 1800 लोगों की जांच कर रहे हैं और कुछ दिन में 2000 की करने लगेंगे। जम्मू कश्मीर में 254 लोग ठीक हो चुके हैं। 74 हजार को कोविड सर्विलेंस में रखा गया था और उनमें से 56 हजार ने 28 दिन का सर्विलांस पूरा भी कर लिया है।

जम्मू में मरीजों की कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग की गई। मरीज के संपर्क में आने वाले लोगों को पहले ही क्वारैंटाइन कर दिया गया।

आखिर जम्मू ने किया क्या?

8 मार्च को जम्मू में कोरोना वायरस का पहला पॉजिटिव केस मिला था। इस पर जम्मू की डिप्टी कमिश्नर सुषमा चौहान ने तुरंत एक्शन लिया। मरीज कारगिल का रहने वाला था और उसकी ईरान की ट्रैवल हिस्ट्री थी। उससे मिलने वाले सभी लोगों की पहचान की गई और उन्हें क्वारैंटाइन किया गया। सैम्पल लेने से पहले सभी को क्वारैंटाइन कर दिया गया था।

रिपोर्ट्स पॉजिटिव आए उससे पहले जिला प्रशासन ने कंटेन्मेंट प्लान पर काम शुरू कर दिया था। 11 मार्च से स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी बंद कर दिए थे और सरकारी दफ्तर की बायोमैट्रिक एटेंडेंस भी।

फिर मॉल्स, सिनेमा हॉल और भीड़ वाले बाजार बंद कर दिए गए। मार्च के पहले हफ्ते में ही एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन और बस स्टॉप पर यात्रियों की स्क्रीनिंग की जा रही थी। होटल से मेहमानों की ट्रैवल हिस्ट्री मांगी गई। इसी के साथ सभी धार्मिक स्थल मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारों और चर्च को बंद कर दिया गया।


18 मार्च को बंद कर दी वैष्णोदेवी यात्रा

17 मार्च को माता वैष्णोदेवी श्राइन बोर्ड ने एडवायजरी जारी की और 18 से यात्रा बंद कर दी। इसी दिन इंटर स्टेट बस सर्विस और गाड़ियों की आवाजाही को भी रोक दिया गया। जम्मू कश्मीर की सीमा लखनपुर को सील कर दिया गया और भीतर आनेवालों के लिए 14 दिन का क्वारैंटीन अनिवार्य कर दिया।

इस दौरान जम्मू में 6 डॉक्टर और एक हेल्थ वर्कर पॉजिटिव पाए गए। अब वे सभी ठीक होकर घर जा चुके हैं। इन सभी के परिवार वालों को भी नियम के मुताबिक क्वारैंटाइन किया गया। जिनमें से कुछ पॉजिटिव भी मिले और अब वे सब भी ठीक हो गए हैं।

अब हेल्थ डिपार्टमेंट के लोग घर-घर जाकर स्क्रीनिंग कर रहे हैं। जिसमें आशा वर्कर और सरकारी कर्मचारी शामिल हैं। सबसे बड़ी चुनौती पॉजिटिव केस के कॉन्टैक्ट में आए लोगों की पहचान करना था।

पुलिस ने निजामुद्दीन मरकज से आए लोगों और धार्मिक नेताओं की पहचान करने के लिए तब्लीगी लिंक के लोगों की स्क्रीनिंग की। इसी के साथ रोहिंग्या बस्ती में घनी आबादी के बीच भी स्क्रीनिंग की गई।

जम्मू में कोरोना का पहला मरीज 8 मार्च को आया था। उसके बाद इस डिविजन में टेस्टिंग बढ़ा दी गई।

कश्मीर से क्या गलतियां हुईं?

कश्मीर में इसके उलट लोगों को बाहर से लौटे यात्रियों के स्क्रीनिंग न करवाने का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। जनवरी से मार्च का वक्त उन कश्मीरियों की घर वापसी का समय था जो हर बार सर्दियों में जम्मू, दिल्ली या घाटी से कहीं और चले जाते हैं। बाहर से लौटने वाले विदेश से लौटे लोग भी शामिल हैं।

एयरपोर्ट पर प्रशासन ने हेल्प डेस्क और स्क्रीनिंग काउंटर बनवाया है। लेकिन लोगों ने ओहदे और पहुंच का फायदा उठाया और स्क्रीनिंग को बायपास कर वहां से निकल लिए।

कइयों ने तो अपनी ट्रैवल डिटेल्स छिपाई और बाद में उनमें कोरोना के लक्षण मिले। यही नहीं ये लोग कई और लोगों से मिले जुले भी और बाद में पुलिस को इनके कॉन्टैक्ट में आए लोगों का पता लगाने में पसीने आ गए। कश्मीर में धार्मिक स्थलों को बंद करने का फैसला काफी बाद में लिया गया जिससे कई पॉकेट्स में कोरोना काफी गहरे फैल गया।

कश्मीर में सबसे ज्यादा प्रभावित बांदीपोरा, यहां 52 पॉजिटिव

बांदीपोरा में एक तब्लीगी धार्मिक नेता के संपर्क में आने से 40 से ज्यादा लोगों को संक्रमण फैला। बांदीपोरा कश्मीर का सबसे प्रभावित जिला है जहां 52 में से 48 केस गुंड जहांगीर गांव के एक ही मोहल्ले डांगेरपोरा के हैं। इस मोहल्ले के सभी लोगों के कोरोना टेस्ट करवाए गए। जिसमें 700 से ज्यादा नेगेटिव भी आए।

कश्मीरियों ने पहले तो ट्रैवल हिस्ट्री छिपाई। लेकिन, जब श्रीनगर में कोरोना से पहली मौत हुई तो उसके बाद खुद ही प्रशासन को फोन कर इसकी जानकारी देने लगे।

जनाजे में शामिल हुए सैंकड़ो लोग

कश्मीर के सोपोर में स्थानीय गांववालों ने आतंकवादियों के जनाजे में शामिल होकर सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियां उड़ाईं। 9 अप्रैल को शोपियां में जैश के एक आतंकी के जनाजे में 400 से ज्यादा लोग शामिल हुए। जिसके बाद प्रशासन ने आतंकवादियों के शव परिवार को सौंपना और उनके नाम पब्लिक करना बंद कर दिया।

25 अप्रैल को अनंतनाग में एक गर्भवती महिला और उनके जुड़वां बच्चों की मौत हो गई थी। उसके शव को यूं ही घरवालों को दे दिया था, बाद में उस महिला का टेस्ट पॉजिटिव आया था। उसके जनाजे में कई लोग शामिल हुए थे।

26 मार्च को पहली कोरोना संक्रमित की मौत हुई थी। मरने वाला श्रीनगर के डाउनटाउन का एक 65 वर्षीय आदमी था। पहली मौत के बाद लोगों ने प्रशासन को कंट्रोल रूम में फोन लगाने शुरू किए और जानकारियां देने लगे। हर दिन 400-500 लोगों की जानकारियां प्रशासन को मिलने लगी।

इससे पहले सिर्फ लोग छिप रहे थे। लेकिन इसके बाद प्रशासन ने भी आतंकवादियों को ढूंढने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले नेटवर्क को कोरोना मरीजों को ढूंढने में इस्तेमाल किया।

कई इलाकों में हेल्थ वर्कर और स्क्रीनिंग के लिए आए कर्मचारियों पर पथराव भी किए गए। 18 अप्रैल को हेल्थ वर्कर की टीम बांदीपोरा गई थी। ये दो पॉजिटिव केस को लेने गए थे। इन पर स्थानीय लोगों ने पथराव कर दिया और कर्मचारी को चोटें आई थीं।



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जम्मू और कश्मीर में कुल 666 केस अब तक मिले हैं, जिनमें से 606 कश्मीर डिविजन में और 60 जम्मू डिविजन में।




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मानसरोवर में 90 और अमरनाथ में 45 किमी की चढ़ाई, 12 साल में एक बार होने वाली नंदा देवी यात्रा में 280 किमी का सफर 3 हफ्ते में

नेशनल लॉकडाउन के कारण अमरनाथ यात्रा से लेकर कैलाश मानसरोवर तक की यात्राओं पर संशय के बादल हैं। केदारनाथ के कपाट खुल चुके हैं लेकिन अभी वहां जाने पर रोक है। अमरनाथ, केदारनाथ और मानसरोवर तीनों ही दुर्गम यात्राएं मानी जाती हैं। यहां पहुंचना आसान नहीं है। पर्वतों के खतरों से भरे रास्तों से गुजरना होता है। लेकिन, ये तीन ही अकेले ऐसे तीर्थ नहीं हैं। दर्जन भर से ज्यादा ऐसे कठिन रास्तों वाले तीर्थ हैं, जहां पहुंचना हर किसी के बूते का नहीं है। कुछ स्थान तो ऐसे हैं, जहां पहुंचने में एक दिन से लेकर एक हफ्ते तक का समय लग सकता है।

ऊंचे पर्वत क्षेत्रों के मंदिर आम भक्तों के लिए कब खोले जाएंगे, ये स्पष्ट नहीं है। हाल ही में केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनौत्री धाम के कपाट खुल गए हैं, बद्रीनाथ के कपाट भी खुलने वाले हैं, लेकिन यहां आम भक्त अभी दर्शन नहीं कर पाएंगे। भारत के 14 ऐसे दुर्गम तीर्थों जहां हर साल लाखों भक्त पहुंचते हैं, लेकिन इस साल ये यात्राएं अभी तक बंद हैं...

अमरनाथ यात्रा

सबसे कठिन तीर्थ यात्राओं में से एक है अमरनाथ की यात्रा। से कश्मीर के बलटाल और पहलगाम से अमरनाथ यात्रा शुरू होती है। ये तीर्थ अनंतनाग जिले में स्थित है। अमरनाथ की गुफा में बर्फ से प्राकृतिक शिवलिंग बनता है। यहां पहुंचने का रास्ता चुनौतियों से भरा है। प्रतिकूल मौसम, लैंडस्लाइड, ऑक्सीजन की कमी जैसी समस्याओं के बावजूद लाखों भक्त यहां पहुंचते हैं। शिवजी के इस तीर्थ का इतिहास हजारों साल पुराना है। यहां स्थित शिवलिंग पर लगातार बर्फ की बूंदें टपकती रहती हैं, जिससे 10-12 फीट ऊंचा शिवलिंग निर्मित होता है। गुफा में शिवलिंग के साथ ही श्रीगणेश, पार्वती और भैरव के हिमखंड भी निर्मित होते हैं।

हेमकुंड साहिब

उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित हेमकुंड साहिब सिखों का प्रमुख धार्मिक स्थल है। यहां बर्फ की बनी झील है जो सात विशाल पर्वतों से घिरी हुई है, जिन्हें हेमकुंड पर्वत भी कहते हैं। मान्यता है कि हेमकुंड साहिब में सिखों के दसवें गुरु गुरुगोबिंद सिंह ने करीब 20 सालों तक तपस्या की थी। जहां गुरुजी ने तप किया था, वहीं गुरुद्वारा बना हुआ है। यहां स्थित सरोवर को हेम सरोवर कहते हैं। जून से अक्टूबर तक हेमकुंड साहिब का मौसम ट्रैकिंग के लिए अनुकूल रहता है। इस दौरान अधिकतम तापमान 25 डिग्री और न्यूनतम तापमान -4 डिग्री तक हो जाता है। यहां पहुंचने के लिए ग्लेशियर और बर्फ से ढंके रास्तों से होकर गुजरना पड़ता है।

कैलाश मानसरोवर

शिवजी का वास कैलाश पर्वत माना गया है और ये पर्वत चीन के कब्जे वाले तिब्बत में स्थित है। ये यात्रा सबसे कठिन तीर्थ यात्राओं में से एक है। यहां एक सरोवर है, जिसे मानसरोवर कहते हैं। मान्यता है कि यहीं माता पार्वती स्नान करती हैं। प्रचलित कथाओं के अनुसार ये सरोवर ब्रह्माजी के मन से उत्पन्न हुआ था। इसके पास ही कैलाश पर्वत स्थित है। इस जगह को हिंदू धर्म के साथ-साथ बौद्ध धर्म में भी बहुत पवित्र माना जाता है। मानसरोवर का नीला पानी पर्यटकों के लिए आकर्षण और आस्था का केंद्र है। यह यात्रा पारंपरिक रूप से लिपुलेख उत्तराखंड रूट और सिक्किम नाथुला के नए रूट से होती है।

वैष्णोदेवी

जम्मू के रियासी जिले में वैष्णोदेवी का मंदिर स्थित है। ये मंदिर त्रिकुटा पर्वत पर स्थित है। यहां भैरव घाटी में भैरव मंदिर स्थित है। मान्यता के अनुसार यहां स्थित पुरानी गुफा में भैरव का शरीर मौजूद है। माता ने यहीं पर भैरव को अपने त्रिशूल से मारा था और उसका सिर उड़कर भैरव घाटी में चला गया और शरीर इस गुफा में रह गया था। प्राचीन गुफा में गंगा जल प्रवाहित होता रहता है। वैष्णो देवी मंदिर तक पहुंचने के लिए कई पड़ाव पार करने होते हैं। इन पड़ावों में से एक है आदि कुंवारी या आद्यकुंवारी।

केदारनाथ

बुधवार, 29 अप्रैल को केदारनाथ धाम के कपाट खुल गए हैं। बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक ज्योतिर्लिंग केदारनाथ है। ये मंदिर उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित है। मान्यता है कि प्राचीन समय में बदरीवन में विष्णुजी के अवतार नर-नारायण इस क्षेत्र में पार्थिव शिवलिंग बनाकर पूजा करते थे। नर-नारायण की भक्ति से प्रसन्न होकर शिवजी प्रकट हुए थे। केदारनाथ मंदिर का निर्माण पाण्डव वंश के राजा जनमेजय द्वारा करवाया गया था और आदि गुरु शंकराचार्य ने इस मंदिर का जिर्णोद्धार करवाया था। गौरीकुंड से केदारनाथ के लिए 16 किमी की ट्रेकिंग शुरू होती है। मंदाकिनी नदी के किनारे बेहद खूबसूरत दृश्य दिखाई देते हैं। एक यात्रा गुप्तकाशी से भी होती है। नए रूट में सीतापुर या सोनप्रयाग से यात्रा शुरू होती है। गुप्तकाशी रूट पर ट्रैकिंग ज्यादा करना होती है।

श्रीखंड महादेव

हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में श्रीखंड महादेव शिवलिंग स्थित है। यहां शिवलिंग की ऊंचाई करीब 75 फीट है। इस यात्रा के लिए जाओं क्षेत्र में पहुंचना होता है। यहां से करीब 32 किमी की ट्रेकिंग है। मार्ग में जाओं में माता पार्वती का मंदिर, परशुराम मंदिर, दक्षिणेश्वर महादेव, हनुमान मंदिर स्थित हैं। मान्यता है शिवजी से भस्मासुर को वरदान दिया था कि वह जिसके सिर पर हाथ रखेगा वह भस्म हो जाएगा। तब भगवान विष्णु ने भस्मासुर को इसी स्थान पर नृत्य करने के लिए राजी किया था। नृत्य करते-करते भस्मासुर ने खुद का हाथ अपने सिर पर ही रख लिया था, जिससे वह भस्म हो गया।

नंदादेवी यात्रा

उत्तराखंड के चमोली क्षेत्र में हर 12 साल में एक बार नंदादेवी की यात्रा होती है। नंदा देवी पर्वत तक जानेवाली यह यात्रा छोटे गांव और मंदिरों से होकर गुजरती है। इसकी शुरूआत कर्णप्रयाग के नौटी गांव से होती है। 2014 में ये यात्रा आयोजित हुई थी। मान्यता है कि हर 12 साल में नंदा मां यानी देवी पार्वती अपने मायके पहुंचती हैं और कुछ दिन वहां रूकने के बाद भक्तों के द्वारा नंदा को घुंघटी पर्वत तक छोड़ा जाता है। घुंघटी पर्वत को शिव का निवास स्थान और नंदा का सुसराल माना जाता है।

मणिमहेश

हिमाचल के चंबा जिले में स्थित है मणिमहेश। यहां शिवजी मणि के रूप में दर्शन देते है। मंदिर भरमौर क्षेत्र में है। भरमौर मरु वंश के राजा मरुवर्मा की राजधानी थी। मणिमहेश जाने के लिए भी बुद्धिल घाटी से होकर जाना पड़ता है। यहां स्थित झील के दर्शन के लिए भक्त पहुंचते हैं।

शिखरजी

झारखंड के गिरीडीह जिले में जैन धर्म का प्रमुख तीर्थ शिखरजी स्थित है। ये मंदिर झारखंड की सबसे ऊंची पहाड़ी पर बना हुआ है। इस क्षेत्र में जैन धर्म के 24 में से 20 तीर्थंकरों ने मोक्ष प्राप्त किया था।

यमनोत्री

यमुनादेवी का ये मंदिर उत्तराखंड के चारधामों में से एक है। यमुनोत्री मंदिर उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में स्थित है। ये यमुना नदी का उद्गम स्थल है और ऊंची पर्वतों पर स्थित है। हनुमान चट्टी से 6 किमी की ट्रेकिंग करनी होती है और जानकी चट्टी करीब 4 किमी ट्रेकिंग करनी होती है।

फुगताल या फुक्ताल

लद्दाख के जांस्कर क्षेत्र में स्थित है फुगताल यानी फुक्ताल। यहां 3850 मीटर ऊंचाई पर बौद्ध मठ स्थित है। ये मंदिर 12वीं शताब्दी का माना जाता है।

तुंगनाथ

उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में तुंगनाथ शिव मंदिर स्थित है। मंदिर के संबंध में मान्यता है कि ये हजार साल पुराना है। यहां मंदाकिनी नदी और अलकनंदा नदी बहती है। इस क्षेत्र में चोपटा चंद्रशिला ट्रेक पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है।

गौमुख

उत्तराखंड राज्य के उत्तरकाशी जिले में गंगोत्री स्थित है। यहां से करीब 18 किमी दूर गौमुख है। यहीं से गंगा का उद्गम माना जाता है। इस क्षेत्र में गंगा को भागीरथी कहते हैं। ये क्षेत्र उत्तराखंड के चार धामों में से एक है।

रुद्रनाथ

रुद्रनाथ मंदिर उत्तराखंड के गढ़वाल में स्थित है। यहां शिवजी का मंदिर है। समुद्र तल से इसकी ऊंचाई 3,600 मीटर है। मान्यता है कि रुद्रनाथ मंदिर की स्थापना पांडवों द्वारा की गई थी। सभी पांडव यहां शिवजी की खोज में पहुंचे थे। महाभारत युद्ध में मारे गए यौद्धाओं के पाप के प्रायश्चित के लिए पांडव यहां आए थे।



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Pilgrimage in India | 14 Famous Pilgrimage in India Full List Updates; Amarnath Yatra to Kailash Mansarovar




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राहुल देव बने पाकिस्तान एयरफोर्स के पहले हिंदू पायलट; 12 लाख सैनिकों में हिंदू कितने कोई नहीं जानता, खबर सिर्फ उनकी जो मारे गए या मशहूर हुए

पाकिस्तान एयरफोर्स में पहली बार एक हिंदू पायलट बना है। नाम है राहुल देव और वे सिंध इलाके के थरपरकर से हैं। राहुल पाकिस्तान एयरफोर्स में दूसरे हिंदू होंगे, उनसे पहले एयर कमोडोर बलवंत कुमार दास पाकिस्तानी एयरफोर्स में भर्ती हुए थे, लेकिन वह एयर डिफेंस का हिस्सा था, जिसके जिम्मे ग्राउंड ड्यूटी से जुड़े काम होते थे।


राहुल बतौर जीडी पायलट भर्ती हुए हैं। जनरल ड्यूटी (जीडी) के जो पायलट होते हैं वह कोई भी एयरक्राफ्ट उड़ा सकते हैं, फिर चाहे वह फाइटर हो या ट्रांसपोर्ट। पाकिस्तान एयरफोर्स में जीडी पायलट अहम होता है और वह ज्यादा ताकतवर एयरक्राफ्ट उड़ता है।


16 अप्रैल को 143 जीडी पायलट, 89 इंजीनियरिंग, 99 एयर डिफेंस और बाकी कोर्स की ग्रेजुएशन सेरेमनी पाकिस्तान एयरफोर्स एकेडमी रिसालपुर में थी। जहां वायुसेना प्रमुख एयरचीफ मार्शल मुजाहिद अनवर खान चीफ गेस्ट थे।


राहुल से जुड़ी इस खबर को सबसे पहले प्रिंसिपल स्टाफ ऑफिसर रफीक अहमद खोखर ने जासूस से राजनेता बने इंटीरियर मिनिस्टर रिटायर्ड ब्रिगेडियर एजाज शाह से ट्वीट के जरिए साझा की थी -

पाकिस्तान फोर्सेस में अल्पसंख्यकों की स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब कमोडोर बलवंत कुमार दास के बारे में पता करने की कोशिश की तो बस इतना ही पता चला की वह ग्राउंड ड्यूटी ऑफिसर थे और उन्होंने युद्ध में हिस्सा लिया था। इससे ज्यादा कुछ भी नहीं।

पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की स्थिति कोई रहस्य नहीं है। बार-बार इल्जाम लगता है कि पाकिस्तान हिंदुओं को वह जिंदगी नहीं देता जो इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ पाकिस्तान में मिले संविधान के तहत उनका हक है। बावजूद इसके हाल ही में यूनाइटेड स्टेट्स कमिशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम ने यह कहा था कि पाकिस्तान के हिंदू और सिखके लिए मुल्क पहले आता है।

हाल ही के दिनों में पाक मिलिट्री में भर्ती होने वाले हिंदुओं और सिखोंकि संख्या बढ़ गई है। जबकि, पाकिस्तान बनने से लेकर दशकों तक मिलिट्री में सिर्फ मुसलमानों का एकाधिकार रहा है। वहीं ईसाइयों को पाकिस्तानी फोर्सेस में जगह भी दी गई और ओहदा भी।

2000 तक हिंदुओं की सेना में शामिल होने पर भी पाबंदी थी। जनरल परवेज मुशर्रफ के मिलिट्री रूल के वक्त वह पहली बार सेना में शामिल हो पाए। 2006 में कैप्टन दानिश पाकिस्तान सेना के पहले हिंदू ऑफिसर बने।

ब्रिगेडियर एजाज के साथ काम करने वाले इंटीरियर मिनिस्ट्री के एक ऑफिसर के मुताबिक राहुल देव का इंडक्शन इसलिए भी खास है क्योंकि वह सिंध के थरपरकर जैसे कमजोर इलाके से आते हैं।

सिंध के अंदरूनी इलाकों में हिंदुओं की ठीक-ठाक आबादी है। इस इलाके में जरूरी सुविधाएं भी मौजूद नहीं हैं। हाल के कुछ सालों में यहां भूख और कुपोषण से मौत की कई खबरें आई हैं जिनमें बच्चे भी शामिल हैं। महेश मलानी इसी थरपरकर इलाके से नेशनल असेंबली में सीट जीतने वाले पहले हिंदू हैं।

अधिकारी के मुताबिक, पाकिस्तान अल्पसंख्यकों के लिए सबसे खराब देश है। यहां जबरन धर्म परिवर्तन आम है, ईशनिंदा के मामले और धर्म के नाम पर हत्याएं भी होती रहती हैं। यहां कानून के जरिए समुदायों को ठगा जाता है। हांलाकि यह बदल रहा है।

इंटीरियर मिनिस्ट्री के अधिकारी इस सवाल का जवाब नहीं दे पाए कि हिंदू और सिखऑफिसर के कमिशन की शुरूआत करने में इस देश को इतना वक्त क्यों लगा।

सीनियर जर्नलिस्ट नसीम जेहरा का ये ट्वीट पढ़िए -

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ट्विटर पर जहां राहुल के लिए सरहद के दोनों ओर से बधाईयों का ढेर लग गया वहीं एक शहीद हिंदू सैनिक का परिवार इस मसले पर बात करने राजी हुआ। 27 साल के लालचंद रबारी बेहद भावुक व्यक्ति थे और उनका सपना था देश की रक्षा। 2017 में मंगला फ्रंट पर लड़ते हुए उनकी मौत हुई।

मेजर कैलाश पिछले साल ही पहले हिंदू अफसर हैं जो मेजर बने। उन्हें सियाचिन पोस्टिंग के लिए तमगा-ए-दफा भी हासिल हुआ।

रबारी इस्माइल खान नौटकानी गांव बादिन जिले के रहनेवाले थे। गरीब चरवाहे पिता और किसान मां की पांचवी औलाद। उनके भाई कहते हैं रबारी की पोस्टिंग फाटा इलाके के वजीरिस्तान में हुई थी। वह देश को तबाह करने वाले आतंकियो को कुचलना चाहता था। वह कहते हैं मेरे भाई की तकदीर में लिखा था कि वह देश के लिए लड़ते शहीद होगा।

रबारी के मुताबिक जिस देश में हम रहते हैं वह हमारा घर है। जो भी उसपर हमला करेगा उसे हम जवाब देंगे, अपनी आखिरी सांस तक। वह ये भी कहते हैं कि हम राजपूत हैं जो हमेशा दुश्मन से खून के आखिरी कतरे तक लड़ते हैं।

कराची के एक हिंदू रिसर्चर कहते हैं, ‘अगर हमारी पाकिस्तान के साथ वफादारी पर कोई शक है तो उसे आंकड़ों से साबित करो। बताओ कितने पाकिस्तानी हिंदू हैं जिन्होंने देश को धोखा दिया या जिनपर धोखेबाजी के केस कोर्ट में चल रहे हैं? यह सिर्फ झूठा प्रोपेगेंडा है, जो बंद होना चाहिए और पाकिस्तान को हमें अपना मानना चाहिए। सरकार ने हम गैर मुसलमानों की उपलब्धियों को कभी माना ही नहीं।’

एयर कमोडोर बलवंत कुमार दास पाकिस्तान एयरफोर्स के पहले सीनियर हिंदू ऑफिसर थे। उन्होंने 1948 और 1965 की जंग में हिस्सा भी लिया, लेकिन उनकी कहानी को सालों पहले भुला दिया गयाा है।

कैजाद सुपारी वाला पहले पारसी और गैर मुसलमान पाकिस्तानी जनरल हैं। 1965 और 1971 की जंग में उनकी काबीलियत के किस्से सब जानते हैं लेकिन सरकार, मीडिया या लोग कभी उनका जिक्र तक नहीं करते।

एक और हिंदू सैनिक अशोक कुमार हैं जिन्होंने 2013 में वजीरीस्तान में आतंकवादियों से लड़ते अपनी जान दी। उन्हें तमगा-ए-शुजात दिया गया। लेकिन आश्चर्य की बात यह कि उनके नाम के आगे शहीद की जगह महरूम लिखा गया। जबकि मुसलमान शहीदों के साथ ऐसा नहीं होता।

हैदराबाद के डॉक्टर कैलाश गरवड़ा पिछले साल पहले हिंदू मेजर बने। उन्होंने युगांडा, मिस्त्र, दुबई, स्पेन, फ्रांस, नीदरलैंड, बेल्जियम, इटली और स्विट्जरलैंड में पाकिस्तान को रिप्रेजेंट किया। 36 दिन भारत पाकिस्तान के बीच विवादित के-2 के पास बाल्त्रो सेक्टर में दुनिया की सबसे ऊंचाई पोस्ट पर रहने के बाद उन्होंने तमगा-ए-दफा हासिल किया।

ये मेडल सियाचिन में पोस्टिंग पाने वाले सैनिकों को दिया जाता है। वह वजीरिस्तान में आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन एमीजन और स्वात में ऑपरेशन राहे निजात का हिस्सा भी थे।

मेजर हरचरण सिंह पाकिस्तान सेना में कमिशन पाने वाले पहले सिख अफसर हैं।

वहीं मेजर हरचरण सिंह ने 2007 अक्टूबर में सेना के पहले सिखअफसर बनकर इतिहास रचा। ननकाना साहिब में 1986 में पैदा हरचरण ने पाकिस्तान मिलिट्री एकेडमी से पास होते वक्त कहा था, ‘ये मेरे लिए गर्व की बात है कि आज आपके सामने खाकी वर्दी पहने खड़ा हूं, मुझे बड़ी जिम्मेदारी मिली है।पगड़ी पहने सरदार को बलूच रेजिमेंट का बैच लगाए देखना फख्र की बात है।’


पाकिस्तान की आबादी 22 करोड़ है। उसमें से हिंदू 80 लाख हैं। पाकिस्तान हिंदू काउंसिल के आंकड़े तो यही कहते हैं, हालांकि जबरन धर्मपरिवर्तन को लेकर सही आंकड़े बताना मुश्किल है। सबसे ज्यादा हिंदू सिंध में हैं जहां आबादी में हिंदू94 प्रतिशत हैं।

वहीं पाकिस्तान की सेना में 12 लाख 40 हजार सैनिक हैं। इनमें से 6 लाख एक्टिव हैं। बाकी रिजर्व। इनमें कुल 100 भी हिंदू नहीं हैं। कितने हैं इसका कोई हिसाब नहीं है। न पाकिस्तान हिंदू काउंसिल के पास न ही इंटीरियर मिनिस्ट्री की फाइलों में। खबर सिर्फ उनकी है जो या तो मशहूर हुए या मारे गए।



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राहुल देव उसी सिंध प्रांत से आते हैं जहां हिंदुओं की आबादी 94 प्रतिशत है।




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डीपी कैंट अस्पताल काे बनाएंगे डेडिकेटेड काेविड केअर सेंटर, 10 बैड की रहेगी सुविधा

प्लाउडन राेड स्थित डीपी कैंट अस्पताल काे अब डेडिकेटेड काेविड सेंटर बनाया जा रहा है। यहां पर येलाे जाेन अस्पताल के मरीज जिनकी रिपाेर्ट पैंडिंग है, लेकिन वे स्वस्थ्य हैं, एेसे मरीजाें काे रखा जाएगा। इस सेंटर में 10 बैड की क्षमता रहेगी।
तहसीलदार धीरेंद्र पाराशर ने बताया येलाे जाेन अस्पताल में बड़ी संख्या में एेसे मरीजाें की संख्या है, जिनकी रिपाेर्ट अभी आना बाकी है। वर्तमान में वे येलाे जाेन अस्पताल में उपचारत हैं, लेकिन स्वस्थ हाेने के चलते उन्हें ऑक्सीजन आदि जैसी सुविधा की आवश्यकता नहीं है। ऐसे मरीजाें काे अब येलाे जाेन वाले गेटवेल अस्पताल से डीपी कैंट अस्पताल शिफ्ट किया जाएगा। यहां पर अस्पताल में ऊपरी मंजिल पर 10 बैड की जगह ऐसे मरीजाें के लिए रखी है। मरीजाें काे ले जाने का रास्ता भी अस्पताल के मुख्य द्वार की बजाय साइड के रास्ते से दिया गया है।

लिखा पत्र : सुरक्षा की दृष्टि से सेंटर कहीं और बनाएं

डीपी कैंट अस्पताल घनी बस्ती सांघी स्ट्रीट से सटा हुआ है। ऐसेमें यहां के रहवासियाें काे जैसे ही सूचना मिली कि यहां पर काेविड संबंधित पेशेंट काे रखने की याेजना है, ताे रहवासियाें ने इसका विराेध शुरू कर दिया है। रहवासियाें ने साेशल मीडिया के माध्यम से स्थानीय प्रशासन काे इस अस्पताल काे काेविड केअर सेंटर नहीं बनाने की मांग भी की है। रहवासियाें ने पत्र के माध्यम से लिखा है कि जिस जगह अस्पताल है, उसके पिछले हिस्से में ही 10 से 12 फीट की दूरी पर ही करीब 10 से ज्यादा परिवाराें के मकान हैं। ऐसे में काेविड के पेशेंट से यहां पर खतरा रहेगा। इसके अलावा रहवासियाें ने बताया इन परिवाराें में बुजुर्ग भी रह रहे हैं। एेसे में सुरक्षा की दृष्टि काे ध्यान में रखते हुए सेंटर काे अन्यत्र स्थान पर बनाया जाए।



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DP Cantt Hospital to set up dedicated cadet care center, 10 beds to be available




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महू में 15 नए पॉजिटिव, इनमें से 2 की पहले ही हो चुकी है मौत, अब तक 61 संक्रमित, 32 में से 17 की रिपोर्ट आई निगेटिव

शहर में कोरोना संक्रमितों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। मंगलवार देर रात मिली 32 और सैंपल रिपोर्टों में से 15 पॉजिटिव निकली हैं, शेष 17 की रिपोर्ट निगेटिव आई है। संक्रमितों का अब तक का यह सबसे बड़ा आंकड़ा है। पॉजिटिव रिपोर्टों में शामिल दो की रिपोर्ट आने के पहले मौत हो चुकी है। इन्हें मिलाकर संक्रमितों की कुल संख्या 61 हो चुकी है। कुल संक्रमितों की रिपोर्ट में शामिल मृतकों की संख्या आठ हो चुकी है। जिन 15 लोगों की रिपोर्ट आई है उनमें शहर के दो नए क्षेत्रों पेंशनपुरा और राजा गली के भी शामिल हैं।
स्थानीय प्रशासन ने अागामी अादेश तक के लिए कर्फ्यू लगाया है। मंगलवार काे शहर के विभिन्न स्थानाें पर लाेग कर्फ्यू का उल्लंघन करते हुए घर से ही सब्जी व किराना का व्यापार कर रहे थे। इस मामले में पुलिस-प्रशासन ने अलसुबह ही दबिश देकर ऐसे लाेगाें काे पकड़ा। इसमें सब्जी बेचने के मामले में महिला सहित दाे व बेवजह घूमते हुए पांच लाेगाें पर लाॅकडाउन उल्लंघन की कार्रवाई की गई। अभी भी लोगों द्वारा लॉकडाउन का पालन नहीं किया जा रहा है। यदि ऐसा ही रहा तो संक्रमण का खतरा अाैर बढ़ने की संभावना है।

शहर में मंगलवार सुबह छह बजे से ही नायब तहसीलदार रीतेश जाेशी पुलिस बल के साथ हाट मैदान पहुंचेे। यहां पर भगवान काैशल अपने घर से ही बड़ी मात्रा में सब्जी बेचने का काम करता मिला। जिस पर सब्जी जब्त करने के साथ ही उसे पकड़कर थाने भिजवाया। इसके अलावा गुजरखेड़ा में भी राधा नामक महिला अपने घर से सब्जी बेच रही थी। टीम ने उसे भी पकड़ा व थाने भिजवाया।

188 में कार्रवाई : हाट मैदान के काैशल काे दूसरी बार सब्जी बेचते पकड़ा...
प्रशासन ने हाट मैदान में भगवान काैशल काे घर से सब्जी बेचते हुए पकड़ा है। इस पर घर से सब्जी बेचने व लाॅकडाउन उल्लंघन की दूसरी बार कार्रवाई की गई है। इससे पहले भी कर्फ्यू के दाैरान प्रशासन काैशल काे घर से सब्जी बेचने के मामले में पकड़ा जा चुका है, उस पर लाॅकडाउन उल्लंघन के तहत 188 की कार्रवाई की गई थी।
बेवजह घूम रहे लोगों को कोर्ट में पेश किया : राजमाेहल्ला, श्याम विलास चाैराहा, हाट मैदान आदि क्षेत्राें से प्रशासन ने दाेपहिया वाहनाें पर बेवजह घूम रहे उमेश पिता श्रीराम पाल निवासी गुजरखेड़ा, भीम पिता कुंजीलाल काैशल निवासी हाट मैदान, पिंटू पिता रामअवतार वर्मा निवासी राजमाेहल्ला पर भी केस दर्ज किया। दाेपहर में इन सभी काे प्रशासन ने न्यायालय में भी पेश किया गया। शहर के अलग-अलग इलाकाें में काेराेना संक्रमित मिलने के बाद बनाए गए कंटेनमेंट एरिया में लाेगाें की सुबह के समय खासी चहल-पहल देखी जा रही है। इसके लिए प्रशासन काे सतर्कता बरतने की खासी जरूरत है।

घर से बेच रहा था किराना, दुकान बंद करवाई...
नायब तहसीलदार जाेशी काे सूचना मिली थी कि गाेकुलगंज क्षेत्र में कुणाल नामक व्यक्ति अपने घर से ही किराना बेच रहा है। जिस पर टीम ने वहां दबिश दी, ताे कुणाल अपने घर से ही लाेगाें काे किराना सामग्री बेचता मिला। जिस पर उसे भी पकड़कर थाने भिजवाया। अभी कर्फ्यू के दाैरान प्रशासन ने सिर्फ एक दिन छाेड़कर एक दिन किराना सामग्री हाेम डिलीवरी के माध्यम से ही सप्लाय करने की अनुमति दी है। इसके बावजूद नगर में सब्जी बेची जा रही है।

एसएएफ की कंपनी भी शहर पहुंची, आज से 80 जवान संभालेंगे माेर्चा
शहर में लगातार बढ़ रहे काेराेना संक्रमित अांकड़े काे लेकर लाेगाें से सख्ती के साथ लाॅकडाउन का पालन कराने के लिए पुलिस-प्रशासन लगातार काेशिश कर रहा है। इसी के चलते अब ईगल वन कमांडेंट छिंदवाड़ा धर्मराज मीणा ने एसएएफ के 80 जवानाें की कंपनी अाैर बुलवाई है। इस कंपनी के जवानाें काे बुधवार से शहर के विभिन्न पाइंट पर तैनात किया जाएगा, जिससे लाॅकडाउन का पालन अाैर बेहतर तरीके से हाे सके।



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15 new positives in Mhow, 2 of them have already died, 61 infected so far, 17 out of 32 reported negative




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कुक्षी के काेराेना पाॅजिटिव का राजगढ़ में हुआ था इलाज, 19 लाेग संपर्क में आए थे

कुक्षी के जिस युवक काे काेराेना पाॅजिटिव पाया गया है। उसका आठदिन पहले राजगढ़ में इलाज कराया गया था। इस दाैरान तीन परिवार के 19 लाेग संपर्क में आए थे। साथ ही राजगढ़ और सरदारपुर के डाॅक्टराें ने इलाज किया था। इसी के चलते प्रशासन ने कुक्षी सहित राजगढ़ और सरदारपुर में भी साेमवार देर रात से कर्फ्यू लगा दिया है। इधर धार में 18 लाेगाें की रिपाेर्ट निगेटिव आईहै। जबकि काेई नया केस सामने नहीं अाया है। धार के 54 और राजगढ़ के 6 लाेगाें के सैंपल लिए गए हैं।
धार में 3 दिन में 98 निगेटिव रिपाेर्ट : जिला महामारी नियंत्रण अधिकारी डाॅ. संजय भंडारी के अनुसार धार में मंगलवार काने 18 लगें की रिपोर्ट निगेटिव आई है। उन्हें डिस्चार्ज किया जा रहा है। इस प्रकार गत तीन दिन में पहले 30 फिर 50 अकार अब 18 मिलाकर 98 लगें की रिपोर्ट निगेटिव आचुकी है। मंगलवार काने काई नया केस सामने नहीं आया।

13 अप्रैल से खराब थी पिता की तबीयत, 17 काे हाे गई थी माैत, इसके बाद बेटे की तबीयत बिगड़ी

पॉजिटिव आए युवक के पिता की मौत 17 अप्रैल को हुई थी। मौत के 1 दिन पहले उन्हें बड़वानी स्वास्थ्य केंद्र पर ले जाया गया था, उनके साथ बेटा भी गया था, जाे वर्तमान में पॉजिटिव है। जानकारी में सामने अाया है कि पॉजिटिव युवक के पिता की 13 अप्रैल से ही तबीयत खराब चल रही थी। जब उसके पिता की मौत हुई उसके बाद 19 अप्रैल काे बेटे को धार बुलाकर सैंपल लिया गया। लेकिन उसे वापस भेज दिया, जबकि उसे धार में ही क्वारेंटाइन करना था। अगर स्वास्थ विभाग उसे वहीं रोक लेता है ताे सरदारपुर, राजगढ़ और कुक्षी में यह स्थिति नहीं होती। क्याेंकि 20 अप्रैल से बेटे की तबीयत भी बिगड़ने लगी थी। बताया जा रहा है कि पाॅजिटिव युवक को धार से आने के बाद फिर तबियत बिगड़ी तो इंदौर ले जा रहे थे, राजगढ़ के परिवार द्वारा निवेदन करने पर 21 अप्रैल काे सरदारपुर के डॉक्टर ने उनकी जांच की अाैर राजगढ़ मानव सेवा हॉस्पिटल में बाटल चढ़ाई थी। इस बीच युवक के राजगढ़ के ससुराल पक्ष के लोग भी इससे मिलने पहुंचे थे।
कुक्षी के 11 हाईरिस्क और 17 लाे रिस्क पर : मंगलवार को कुक्षी में धार से आई टीम ने पॉजिटिव युवक के परिजन को हाईरिस्क पर 11 अकार 17 लोगों को लो रिस्क पर रखा गया है। परिवार के शेष 9 अन्य लोगों सैंपल लिए हैं। इन्हें कुक्षी के समीप तालनपुर में स्थित क्वारिन्टाइन सेंटर में रखा गया है। राजगढ़ के दाने डाॅक्टर, पाजीटिव युवक के साले अकार अस्पताल की स्टाफ नर्स अकार अटेंडर के सैंपल लिए गए हैं।

आज से देंगे कर्फ्यू में ढील
बुधवार को कर्फ्यू में सशर्त ढील रहेगी लेकिन जो संदिग्ध क्षेत्र हैं उस में कर्फ्यू लगा रहेगा। शेष यथावत जो चल रहा था वही चलेगा। दूध वालों को घर पर ही दूध देना है। सब्जी वालों को डोर टू डोर जाना है। किराना वाले को घर-घर सामान भेजना है। कुक्षी के पाजीटिव युवक के परिजन जो राजगढ़ में हैं उनको होम क्वारिन्टाइन में रहना है।विजय राय, एसडीएम सरदारपुर

भक्तामर और माेहनखेड़ा तीर्थ ने अपने यहां लोगों को रखने से मना किया
मंगलवार काे देवी राेड स्थित भक्तामर तीर्थ पर स्वास्थ्य विभाग की एंबुलेंस पहुंची थी। इसमें भाजीबाजार में पाॅजिटिव पाए गए व्यक्ति के वृद्ध माता पिता के अलावा अन्य लाेग थे। यहां टीम के लाेगाें काे कह दिया गया कि वे उनके यहां पर किसी काे भी नहीं रख सकते क्याेंकि ट्रस्ट से अभी काेई आदेश नहीं मिले हैं। यह कहकर टीम काे लाैटा दिया गया। इसी प्रकार राजगढ़ के माेहनखेड़ा तीर्थ से भी प्रशासन काे उनके यहां लाेगाें काे क्वारेंटाइन करने से मना कर दिया गया। भक्तामर तीर्थ से मना हाेने के बाद टीम अलग-अलग एंबुलेंस में करीब 16 लाेगाें काे लेकर इधर घूमती रही। अंतत: उत्कृष्ट बालक छात्रावास, अाईटीअाई काॅलेज के पीछे कन्या छात्रावास अाैर श्रद्धा गार्डन में इन लाेगाें काे क्वारेंटाइन किया गया। एसडीएम एसएन दर्राे, डीएमअाे जैन अाैर जिला महामारी नियंत्रण अधिकारी डाॅ. संजय भंडारी ने व्यवस्था कराई। जानकारी के अनुसार लाॅकडाउन के पहले इन तीर्थ ने उनके यहां लाेगाें काे ठहराने की स्वीकृति दी थी।



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Kukshi's Karenna positive was treated in Rajgarh, 19 people came in contact




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दो सदस्य खोने के बाद सराफा परिवार 14 दिन घर में रहा क्वारेंटाइन, दवाइयां लीं, पॉजिटिव आए पर लक्षण नहीं मिले

कोरोना के कारण अपने दो वरिष्ठ सदस्यों को खो चुके सराफा व्यापारी परिवार ने गजब का साहस दिखाया और कुछ सदस्यों के पॉजिटिव आने के बाद भी एक तरह से कोरोना को मात दे दी। दरअसल, परिजन की मौत के बाद सभी 16 सदस्यों ने खुद को 14 दिन तक घर में बंद रखा। अपनी इम्युनिटी बढ़ाई। एकजुटता का असर ये हुआ कि नौ लोग पॉजिटिव जरूर निकले लेकिन किसी में भी कोरोना के लक्षण नहीं मिले।
मंगलवार को प्रशासन की टीम ने पॉजिटिव आए लोगों के साथ घर के सभी 16 सदस्यों को होम क्वारेंटाइन किया। सभी सदस्य अब 10 मई तक होम क्वारेंटाइन में रहेंगे। मालूम हो कि केंद्र सरकार ने भी बगैर लक्षण वाले लोगों को घर में क्वारेंटाइन किए जाने की इजाजत दी है।
परिवार के एक सदस्य ने बताया- हम अपने परिवार के दो सबसे वरिष्ठ सदस्यों को खो चुके थे। इसके बाद किसी को भी खोना नहीं चाहते थे। घर में सबसे उम्रदराज दादी के अलावा सवा साल के बच्चे भी थे। चूंकि घर काफी बड़ा है, इसलिए क्वारेंटाइन नियम का पालन करना आसान था। दादी को अलग रखा और सिर्फ एक ही सदस्य उन्हें दवाई और खाना देने के साथ देखभाल करता था। ऐसे ही बच्चों की परवरिश का इंतजाम भी अलग किया गया। एचसीक्यूएस के साथ ही कई घरेलू इलाज भी नियमित करते रहे। 14 दिन तक क्वारेंटाइन का भी पूरी तरह पालन किया। शायद इन्हीं सब वजहों से घर में किसी की भी तबीयत नहीं बिगड़ी न ही किसी में कोरोना के लक्षण मिले।
प्रशासन की टीम भी संतुष्ट, इसलिए घर में ही रखा
मंगलवार दोपहर प्रशासन की टीम व्यापारी भाइयों के घर पहुंची और सभी सदस्यों की जांच की। पूरी तरह से आश्वस्त होने के बाद उन्होंने सभी को घर में ही क्वारेंटाइन करने का फैसला किया। परिजन के अनुसार सभी लोग 10 मई तक घर में ही रहेंगे।

पॉजिटिव हैं, लक्षण नहीं तो घर रहेंगे

ऐसे पॉजिटिव मरीज, जिनमें बीमारी के कोई लक्षण नजर नहीं आ रहे हैं, उन्हें अस्पताल नहीं भेजा जाएगा। ऐसे मरीजों को भर्ती करने की बजाय घरों में ही रखा जाएगा। यानी होम क्वारेंटाइन किया जाएगा। भारत सरकार ने इस आशय की गाइडलाइन भी जारी कर दी है।
मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी कार्यालय से मिली जानकारी के अनुसार अब से बिना लक्षण वाले पॉजिटिव मरीजों को होम क्वॉरेंटाइन किया जाएगा। दरअसल परिवार या आस-पड़ोस में किसी व्यक्ति के पॉजिटिव आने पर परिवार के अन्य सदस्यों के सैंपल लिए जाते हैं। ऐसे में ज्यादातर परिवार के सदस्य पॉजिटिव आ रहे हैं जबकि उन्हें किसी प्रकार की कोई समस्या नहीं हुई। गाइडलाइन में बदलाव करते हुए अब ऐसे पॉजिटिव मरीजों को होम क्वॉरेंटाइन करने का निर्णय लिया है। बशर्ते घर इतना बड़ा हो, जहां सोशल डिस्टेंसिंग का पालन आसानी से किया जा सके।



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After losing two members, the bullion family stayed in the house for 14 days, took quarantine, medicines, came positive but did not get symptoms.




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सड़क किनारे सोते वक्त मजदूरों को ट्रक ने रौंदा, तीन की मौत; जैसलमेर से गांव लौट रहे थे 12 लोग

कोरोनावायरस के प्रकोप से बचकर राजस्थान के जैसलमेर से लौटे तीन मजदूरों की ट्रक से कुचलकर मौत हो गई। हादसा बुधवार तड़के भैरवगढ़ स्थित साडू माता मंदिर सड़क के मोड़ पर हुआ। हादसे के वक्तमजदूर सड़क के किनारे सो रहे थे।

जानकारी के अनुसार उज्जैन के मोहनपुरा गांव के 12 मजदूर राजस्थान के जैसलमेर में मजदूरी करने गए थे। कोरोनावायरस के चलते लॉकडाउन होने से वे जैसलमेर में ही फंस गए। मध्य प्रदेशसरकार द्वारा बस भेजकर राजस्थान सेमजदूरों को यहां लाया गया था। इसमें यह सभी12 मजदूर भी शामिल थे।

राजस्थान से आए इन मजदूरों ने जब अपने गांव में प्रवेश करना चाहा तो गांववालों ने आपत्ति जताईऔर कोरोना जांच कराने को कहा। इसके बाद यह मजदूर गांव से पैदल चलकर उज्जैन के आरडी गार्डी मेडिकल कॉलेज जांच के लिए पहुंचे। संभवत: वहां से लौटते समय भैरवगढ़ स्थित साडू माता मंदिर के पास सड़क किनारे सो गए थे।

तड़के लगभग 4 बजे इंदौर से मैदा लेकर उज्जैन से गुजर रहा एक ट्रक इन मजदूरों पर चढ़ गया। हादसे में तीन मजदूरों की मौके पर ही मौत हो गई। हादसे के बाद ड्राइवर ट्रक छोड़कर भाग गया। पुलिस के अनुसार मृतकों में दो पुरुष व एक महिला शामिल है। जिनकी शिनाख्त विक्रम, बद्री और भोली बाई निवासी ग्राम मोहनपुरा, भैरवगढ़ थाना क्षेत्र के रूप में की गई है।



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हादसा बुधवार तड़के भैरवगढ़ स्थित साडू माता मंदिर सड़क के मोड़ पर हुआ। हादसे के समय मजदूर सड़क के किनारे सो रहे थे।




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3 क्वारेंटाइन सेंटरों में रखे गए 170 लोगों में से 134 हुए डिस्चार्ज

पेटलावद में बनाए गए तीन क्वारेंटाइन सेंटरों में कुल 170 लोगों को रखा गया था, इसमें से अब तक 134 को अब तक डिस्चार्ज कर दिया गया है। यहां कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय, कन्या शिक्षा परिसर व अंग्रेजी माध्यम स्कूल को क्वारेंटाइन सेंटर बनाया गया था। जहां प्रशासन बाहर से आए लोगों व मजदूरों को क्वारेंटाइन कर रही है।
कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय पर 101 लोगों को लाया गया था। इनमें से 51 को डिस्चार्ज कर दिया, 50 लोग अब भी यहां रखे गए हैं। साथ ही कन्या शिक्षा परिसर में 36 लोगों को क्वारेंटाइन किया गया था, जिसमें से 21 को डिस्चार्ज कर दिया है।
वर्तमान में यहां 24 लोग रखे गए हैं। इसी तरह अंग्रेजी माध्यम में 33 लोगों को रखा गया था, जिनमें से 11 को डिस्चार्ज कर दिया गया है। वर्तमान में 22 लोग यहां और हैं। बीएमओ डॉ. एमएल चोपड़ा ने बताया कुल 170 लोगों को क्वारेंटाइन किया गया था। तीनों सेंटरों में से अब तक 134 को घर भेज दिया है। इसके अलावा उन्हें होम क्वारेंटाइन में रहने की सलाह दी है। नोडल अधिकारी ओएस मेड़ा ने बताया केंद्र पर विशेष साफ-सफाई की जा रही है। प्रतिदिन सैनिटाइजर भी किया जा रहा है।



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134 out of 170 people kept in 3 quarantine centers




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कोई बीड़ी लेने निकला, तो किसी को गुटखेे की तड़प थी, 19 लोगों को उठाया, अस्थाई जेल में किया बंद, दोपहर बाद मुचलके पर छोड़ा

जिले में छूट मिली थी लोगों ने इसका गलत फायदा उठाया। अब इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। कलेक्टर सुरभि गुप्ता ने मंगलवार दोपहर जिले में कर्फ्यू के आदेश जारी कर दिए। आदेश का पुलिस, राजस्व विभाग के अधिकारी और मैदानी अमले ने सख्ती से पालन कराया।
रात में एसडीएम विजय कुमार मंडलोई, एसडीओपी धीरज बब्बर के मार्गदर्शन में वाहनों का काफिला पूरे नगर में निकला। विभिन्न मार्गों और चौराहों पर दुपहिया वाहनों से निकलने वालों पर सख्ती बरतते हुए घरों में ही रहने की चेतावनी दी। सुबह 4 बजे फिर पुलिस प्रशासन जगह-जगह तैनात हो गया। इस दौरान बेवजह घूमते मिले लोगों पर सख्ती की गई। बहानेबाजी करने वालों की पिटाई भी की।
हाट, गली, एमजी रोड, रणछोड़ राय मार्ग, बस स्टैंड, रामदेव मंदिर चौराहा, सिनेमा चौराहा आदि स्थानों से करीब 19 लोगों को पुलिस ने अपने वाहन में बैठा लिया। लोगों ने कई बहाने बनाए- कोई बोला हम तो बीड़ी लेने निकले थे, किसी ने कहा कि गुटखे की तड़प लगी थी तो कोई रनिंग कर के लौट रहा था। सभी को अस्थाई जेल में बंद किया गया। नायब तहसीलदार शंशाक दुबे ने कहा कि एडमिशन चालू है प्रवेश लेना है तो बेवजह घरों से निकलें। दोपहर बाद सभी को 20 हजार के मुचलके पर छा़ेड़ दिया गया।

सुनसान नजर आई सड़कें, दिनभर रही चर्चा, कभी नहीं देखी ऐसी सख्ती
मंगलवार को जो सड़कें लोगों की भीड़ से पटी थीं बुधवार को प्रशासन की सख्ती के बाद सुनसान नजर आईं। दिनभर पुलिस के वाहन साइरन बजाते हुए भ्रमण करते रहे। ओटलों पर बैठे लोग भी पुलिस को देखकर चुपचाप अंदर चले गए। पुलिस की सख्ती की चर्चा दिनभर शहर में रही। लोगों ने कहा कि आलीराजपुर के इतिहास में ऐसी सख्ती पहले कभी नहीं देखी।

पुलिस, प्रशासन ने लोगों पर की गई कार्रवाई के वीडियो भी बनाए। जिसमें कुछ लोग गिड़गिड़ाते नजर आए। लेकिन किसी की एक न चली। लोगों ने इन वीडियो को सोशल मीडिया पर खूब वायरल किया। इस कार्रवाई के बाद लोगों में पुलिस का खौफ भी बना। शहर में दिनभर शांति का माहौल रहा। लोगों ने यह भी चर्चा की पहले लगे कर्फ्यू के दौरान ही पुलिस सख्ती करती तो दूसरी बार कर्फ्यू लगाने की जरूरत नहीं पड़ती।

और... नानपुर, जोबटमें भी नजर आया खौफ
आलीराजपुर की ही तरह नानपुर और जोबट में भी लोगों में पुलिस का खौफ नजर आया। दिनभर पुलिस के वाहन घूमते रहे। हांलाकि यहां किसी को अस्थाई जेल में नहीं डाला गया। सख्ती से समझाइश देकर घरों में रहने काे कहा गया। लोगों ने भी समर्थन किया और दिनभर सड़कें सुनसान रहीं।



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When someone came out to take bidi, someone had a craving for gutkha, picked up 19 people, kept them in temporary jail, and left them in the afternoon




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पॉजिटिव आने की रफ्तार गिरी, स्वस्थ होने वालों की तादाद बढ़ी; तीन अस्पतालों से घर लौटे 44 मरीज, अब तक 221 स्वस्थ

कोरोना से गंभीर पीड़ित मकमुद्दीन आखिर 25 दिन चले इलाज के बाद स्वस्थ होकर बुधवार को घर लौट गए। अधिक उम्र और फेफड़ों में इंफेक्शन जैसी कई परेशानियों से जूझ रहे मकमुद्दीन का इलाज करना एमआर टीबी अस्पताल के डॉक्टर्स के लिए भी चुनौतीपूर्ण था। चेस्ट फिजिशियन डॉ. सलिल भार्गव ने बताया कि 4 अप्रैल को मकमुद्दीन को जब आईसीयू में लाए, तब हालत काफी गंभीर थी और सांस लेने में परेशानी आ रही थी। तेज बुखार के साथ खांसी भी बहुत ज्यादा चल रही थी। उस समय उनका ऑक्सीजन लेवल 76% रह गया था। उन्हें तुरंत ऑक्सीजन के साथ नॉन इनवेंसिव वेंटिलेटर पर रखा। साथ ही एंटीबायोटिक, हाइड्राॅक्सी क्लोरोक्विन टैबलेट, एजीथ्रोमायसिन, स्ट्रोइड, विटामिन सी के साथ सपोर्टिव ट्रीटमेंट दिया।

जब इनके ब्लड से स्पेशल जांच एबीजी कराई तो उसमें वे मॉडरेट एआरडीएस की कैटेगरी में मिले। इनका एक्स-रे भी बहुत खराब आया। दोनों फेफड़ों में निमोनिया और ग्राउंड ग्लास ऑपेसिटी थी। इस तरह के मरीजों को सारी (सीवियर एक्यूटरे स्पिरेट्री इंफेक्शन) में रखा जाता है। करीब 10 से 12 दिनों तक नॉन-इनवेंसिव वेंटीलेटर पर रखने के बाद उन्हें बाहर निकालने में सफल रहे। उसके बाद 10 दिन तक ऑक्सीजन पर रखा। ऑक्सीजन हटाने के बाद भी स्थिति ठीक रही। उनका ऑक्सीजन स्तर 94% है और एक्स-रे भी सामान्य हो गया है। इसके बाद हमने 24 घंटे के अंतराल में दो टेस्ट करवाए, जो निगेटिव निकले। अब वे स्वस्थ हैं। - डॉ. सलिल भार्गव, सीनियर चेस्ट फिजिशियन


ये थे टीम में शामिल
एमआरटीबी हॉस्पिटल की इलाज करने वाली टीम में डॉ. संजय अवर्सिया, डॉ. दीपक बंसल, डॉ. मिलिंद बल्दी, डॉ. सुनील मुकाती, डॉ. दिलीप चावड़ा, डॉ. विजय अग्रवाल, डॉ. शैलेंद्र जैन, डॉ. तपन, डॉ. सुदर्शन शामिल थे।आप इंदौर में अटके हैं या अन्य जिलों में तो indore.nic.in पर अपलोड करें जानकारी।

2 मई से सैनिटाइज की सब्जी घर-घर मिलेगी, एक पैक में 8 सब्जियां, रेट 150 रुपए

नगर निगम की घर-घर सब्जी पहुंचाने की योजना 2 मई से शुरू होगी। लोगों को इसका ऑर्डर किराना वालों को देना होगा, उसी दिन से डिलीवरी मिलेगी। 4 किलो के पैक में 8 तरह की सब्जियां होंगी, जिसका रेट 150 रुपए रहेगा। खंडवा रोड पर 7 स्थानों पर इनकी पैकिंग के बाद अल्ट्रावॉयलेट किरणाें से सैनिटाइजेशन होगा। कलेक्टर मनीष सिंह और निगमायुक्त आशीष सिंह ने सभी 85 वार्ड के प्रभारियों के साथ बैठक कर योजना को फाइनल किया। ये पैकेट 10 रुपए डिलीवरी चार्ज जोड़कर 150 रुपए में लोगों को मिलेगा। एक व्यक्ति का एक ही ऑर्डर लेंगे।। यह होगा पैक में- मिर्ची-200 ग्राम, अदरक-100 ग्राम, धनिया-200 ग्राम, नींबू-2, लौकी/गिलकी-1 किलो, भिंडी-500 ग्राम, टमाटर-1 किलो, सीजनल सब्जी 1 किलो (बैंगन, पालक, ककड़ी, गाजर, गोभी)



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फाइल फोटो




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खुद काेरोना की चपेट में आए भास्कर संवाददाता की रिपोर्ट; 15 दिन रिपोर्ट नहीं आती, मरीजों के साथ रहकर पॉजिटिव हो रहे लोग

(देवी कुंडल)सरकार 15-15 दिन के लिए लॉकडाउन बढ़ा रही है, ताकि कोरोना की चेन टूट सके। लेकिन इस बीमारी से प्रभावित व्यक्ति 15-15 दिन तक रिपोर्ट की प्रतीक्षा को विवश है। कई सैंपल का स्टेटस पता नहीं चल रहा। 17 अप्रैल को इंडेक्स में मेरा सेकंड सैंपल लिया गया। अब तक कोई जिम्मेदार यह बताने की स्थिति में नहीं है कि आखिर उसका क्या हुआ? ऐसा कई लोगों के साथ हुआ है। 12 लोगों को 14 अप्रैल को होटल रिजेंटा में क्वारेंटाइन किया गया था। इन्हें 14वें दिन जब डिस्चार्ज कर रहे थे तो 11 लोगों की रिपोर्ट पॉजिटिव आ गई। यदि समय पर रिपोर्ट आ जाती तो अब तक नए टेस्ट हो चुके होते। इनके साथ की एक महिला को रिपोर्ट आने के एक दिन पहले छुट्टी दे दी। अगले दिन उन्हें वापस घर से लाकर कोविड केयर सेंटर में रखा गया।

वाटर लिली कोविड सेंटर में दर्जनभर ऐसे लोग हैं, जो करीब 40 दिन बाद भी अटके हुए हैं। उन्होंने बताया कि वे पहले 15 दिन अरबिंदो में भर्ती रहे, उनकी 2 रिपोर्ट निगेटिव आई। डिस्चार्ज करने के बजाय उन्हें होटल प्रेसीडेंट में रखा गया। फिर वाटर लिली शिफ्ट कर दिया। अब उनके सब्र का बांध टूट गया। हंगामा किया तो पुलिस बुला ली गई। जल्द डिस्चार्ज के आश्वासन पर मामला
शांत हुआ।
ऐसे ही इंडेक्स में भी करीब 7 लोग हैं, जिनकी 2 रिपोर्ट निगेटिव आ चुकी है, लेकिन डिस्चार्ज के नाम पर रोज आश्वासन ही मिल रहा है। लोकमान्य नागौरी ने बताया कि मरीजों की रिपोर्ट में देरी तो हो ही रही है साथ ही डिस्चार्ज में भी लेटलतीफी हो रही है। कमोबेश अन्य अस्पतालों से भी ऐसी ही शिकायतें मिली हैं।
स्वस्थ्य हो रहे पॉजिटिव
65 साल के गजल गायक बून्दु खान के बेटे शादाब खान के मुताबिक उनके अब्बू को 6 अप्रैल को एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। 6 अप्रैल को उनका सैंपल लिया, जिसकी 9 अप्रैल को रिपोर्ट िनगेटिव आई, लेकिन स्वस्थ होने पर भी छुट्टी नहीं दी। वे मरीजों के बीच रखे गए। 12 अप्रैल को उनका दूसरी बार सैंपल लिया गया। उन्हें 23 अप्रैल को बताया गया कि दूसरा टेस्ट भी निगेटिव आया है। 17 दिन उपचार के बाद उन्हें 23 तारीख को अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। अचानक दो दिन बाद उन्हें फोन पर बताया गया कि उनकी कोरोना जांच रिपोर्ट पॉजिटिव आई है। इस बीच उपचार पात 2 लाख रूपये भुगतान किया जा चुका। अब उनका इलाज एमआरटीबी में जारी है। ये तो एक उदहारण है, ऐसे अनेक केस हैं जिनमें मरीजों को निजी अस्पतालों ने “लूटा” है।
निगेटिव को बेवजह अटका रखा
शहर के कुछ निजी अस्पतालों ने मानो कोरोना को इवेंट बना लिया है। एक साथ बल्क में मरीज डिस्चार्ज करने की झांकीबाजी के चक्कर में मरीजों को समय पर डिस्चार्ज नहीं कर रहे हैं। यानी हर दिन 2, 4, 6 की संख्या में मरीजों की 2-2 रिपोर्ट नगेटिव आ रही है। लेकिन एकमुश्त रिहाई के दिखावे के चलते उन्हें रोका जा रहा है। जबकि स्वस्थ्य होने पर मरीज की “रिहाई” न सिर्फ उसका अधिकार है बल्कि अनिवार्य भी है। केवल झांकी जमाने के चक्कर में स्वस्थ्य मरीज को पॉजिटिव के बीच रखना अत्यचार है, अमानवीय है।



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Report of Bhaskar correspondent caught by Karona himself; 15 days report not coming, people staying positive with patients




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कोरोना के आंकड़ों में 29 जून तक होगा सुधार, 31 जुलाई बाद 90% कम होगी मृतकों की संख्या : ऋषभचंद्र

सन् 1720 में महामारी प्लेग थी, 1820 में कालरा थी, 1920 में स्पेनिश फ्लू था और अब 2020 में कोविड-19 है। हर 100 वर्ष में कोई न कोई प्रकृति जन्य रोग होते हैं। कोरोना के आंकड़ों में 29 जून तक राहत के आंकड़े सुधरेंगे। 31 जुलाई के बाद इस रोग से मरने वालों की संख्या में 90% गिरावट आएगी। भूंकप जैसी विपदाएं भी अनेक देश देखेंगे। आचार्य विजय ऋषभचंद्र सूरि ने ज्योतिष के मुताबिक यह बताया। सोशल मीडिया के माध्यम से जारी पत्र में उन्होंने बताया ज्योतिष विज्ञान के रचयिता आचार्य भद्रबाहु स्वामी की रचना भद्रबाहु संहिता में कहा गया है कि शुक्र सूर्य के साथ असमय उदय हो तो महामारी फैलती है। 25 मार्च भारतीय संवत्सर से 31 जुलाई तक शुक्र
वृषभ राशि में उदय-अस्त-वक्री मार्गी 125 दिन एक राशि
में आगे-पीछे रहेगा, जो सामान्य रूप से 27 से 30 दिन ही किसी भी राशि में गोचर रहता है।
आंधी-तूफान, ओलावृष्टि होगी तो खत्म होने की ओर बढ़ेगी महामारी : ऋषभचंद्रजी के अनुसार मेरा ज्योतिष अनुमान है कि 30 अप्रैल से 15 मई तक आंधी-तूफान, ओलावृष्टि और बरसात होती है तो यह रोग समाप्ति की दिशा में तेजी से आगे बढ़ेगा और जनमानस आंकड़ों में राहत महसूस करेगा। 29 जून तक राहत के आंकड़े सुधरेंगे। 31 जुलाई के बाद इस रोग से मरने वालों की संख्या में 90 प्रतिशत गिरावट आएगी।



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ऋषभचंद्




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वैक्सीन के लिए 16 तरह के प्रोटीन की स्टडी कर रहा इंदौर IIT

आईआईटी इंदौर के प्रोफेसर कोरोना की दवा खोजने के लिए सीवियर अक्यूट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम (सार्स) को फैलाने वाले सार्स कोव-2 वायरस का अध्ययन कर रहे हैं। संस्थान के बायोसाइंस और बायोमेडिकल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर इस काम में जुटे हैं। आईआईटी अमेरिका, नॉर्वे, स्वीडन, फ्रांस, डेनमार्क के रिसर्च ग्रुप के साथ मिलकर स्टॉप कोविड-19 पैंडेमिक प्रोजेक्ट पर भी काम कर रहा है। नॉर्वेजियन रिसर्च काउंसिल इस प्रोजेक्ट को फंड कर रही है। देश के कई संस्थानों के इस इंडियन रिसर्च ग्रुप के प्रमुख आईआईटी इंदौर के डॉ. अविनाश सोनवाने होंगे। आईआईटी के डॉ. अमित कुमार ने बताया- हम सार्स कोव-2 वायरस के 16 तरह के प्रोटींस पर अध्ययन कर रहे हैं। इसके जरिए एक साल में कोरोना की असरकारक वैक्सीन तैयार की जाएगी।
थ्रीडी प्रिंटिंग से बना रहे दोबारा उपयोग किए जा सकने वाले मास्क
पुलिस और मेडिकल स्टाफ के पर्स, मोबाइल और चाबियों को संक्रमण रहित करने के लिए आईआईटी, आईजी विवेक शर्मा के सुझाव पर स्टरलाइजेशन चैंबर भी बना रही है। इसमें 254 एनएम की यूवी किरणों से सामान को डिसइंफेक्ट किया जा सकेगा। संस्थान के डॉ. आईए पलानी और डॉ. इंद्रसेन सिंह थ्रीडी प्रिंटिंग मशीन के जरिए कपड़े के मास्क तैयार कर रहे हैं। डॉ. विपुल सिंह और डॉ. पलानी ने ऑप्टिकल टेंपरेचर सेंसर तैयार किया है। मरीज के कपड़ों पर लगाने से शरीर के तापमान पर लगातार नजर रखी जा सकेगी।
विशेष ईंटों से बने कमरों में ट्रकों का संक्रमण भी होगा दूर
बड़े सामान, मशीन और हर बड़े आकार की चीजों को संक्रमण रहित करने के लिए आईआईटी ने विशेष प्रकार की ईंटें और मोर्टार बनाए हैं। सिविल इंजीनियरिंग विभाग के संदीप चौधरी और राजेश कुमार ने बताया, ईंट और कोटिंग वाले मोर्टार से बनी टनल में सामान को यूवी लाइट से संक्रमण मुक्त करेंगे। इसमें सामान से परावर्तित किरणों को विशेष ईंट सोख लेंगी।



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Indore IIT studying 16 types of proteins for vaccine